पानीदार समाज ; पढ़ने–लिखने से ज्यादा गुनना जरूरी

Submitted by RuralWater on Fri, 09/04/2015 - 09:54

विश्व साक्षरता दिवस 08 सितम्बर 2015 पर विशेष


. पानीदार समाज सिर्फ पढ़ने–लिखने भर से नहीं बन जाया करता। पढ़ने–लिखने के लिये साक्षरता जरूरी हो सकती है लेकिन पानीदार होने के लिये पानी के पर्यावरण को समझने भर या मात्र शिक्षित हो जाने से काम नहीं चलता बल्कि उसके लिये ज़मीन पर काम करना ही पड़ता है। पढ़ने–लिखने से हमारी समझ विकसित हो सकती है, दृष्टि बन सकती है हम जागरूक हो सकते हैं पर पानीदार होने के लिये केवल इतना ही जरूरी नहीं होता।

पानी आज जीवन के लिये सबसे जरूरी होता जा रहा है। पानी के बिना सामाजिक और आर्थिक प्रगति के बारे में सोचा तक नहीं जा सकता। अब सोचिए, उस जमाने के बारे में जब न तो इतने लोग पढ़े–लिखे हुआ करते थे और न ही कागज–किताबों में पानी की इतनी बातें हुआ करती थी तो भी पानी को लेकर उनके अनुभव का ज्ञान किस हद तक उन्नत और उर्वर था कि उन्होंने उस संसाधन विहीन दौर में भी ऐसी–ऐसी जल संरचनाएँ और तकनीकें जुटाई कि आज के वैज्ञानिक दौर में भी हम उन्हें देखकर हैरत में पड़ जाते हैं।

पर्याप्त पानी होने के बाद भी तब पानी का मोल उन्होंने कितनी अच्छी तरह समझा और उसे इस तरह सहेजा कि हमें अब तक धरती से पानी मिल पा रहा है।

विश्व साक्षरता दिवस पर हमें नए सिरे से यह भी सोचना होगा कि साक्षरता के मायने क्या हों। अब केवल अक्षर ज्ञान या अपने हस्ताक्षर भर कर लेने की प्रवृत्ति से आगे बढ़कर समाज को पानी जैसे अहम मुद्दों पर शिक्षित कर जागरूक करने की भी बहुत शिद्दत से जरूरत महसूस की जा रही है। क्या हमें साक्षरता के साथ पानी और पर्यावरण को भी जोड़कर देखने की जरूरत नहीं है।

भारत के परम्परागत जलस्रोतहमारे पूर्वजों ने साक्षरता की कमी के बावजूद इसे अपने अनुभवजन्य ज्ञान से न केवल गुना–समझा, पानी के पर्यावरण को पूरे मनोयोग से सहेजा भी। जिस तरह से पानी हमसे दूर होता जा रहा है, उससे पानी का मोल अब सबको पहचानना ही होगा। पानी रोकने और उसे थाम कर ज़मीन में रिसाने के लिये हमें देशज और पारम्परिक ज्ञान का भी पूरा-पूरा इस्तेमाल करना होगा। जल संवर्धन के लिये अलग–अलग भौगोलिक और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ही किए जाएँ।

आज दुनिया छठे प्रलय की ओर तेजी से बढ़ रही है। इसके लिये प्रकृति का कोप शुरू भी हो चुका है। जिस नादानी से हम प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग करते जा रहे हैं, उसके हमें भयावह परिणाम भुगतना पड़ेंगे। 2050 तक तापमान इतना अधिक होने लगेगा कि हमारे देश के कुछ हिस्सों में खेती लायक जमीनें ही नहीं बच पाएँगी।

हालात इतने बुरे हैं कि अगले 15 सालों में भूमिगत जलस्तर में 50 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। हर साल 3.2 प्रतिशत की दर से जलस्तर गिर रहा है। हम हजारों साल से धरती में खज़ाने की तरह सहेजे हुए संग्रहित पानी को लगातार उलीचकर खत्म होने की कगार तक ले आएँ हैं।

हमने देशज और परम्परागत ज्ञान को भुला दिया। सदियों पुरानी पानी की जरूरी संरचनाओं को उपेक्षित कर दिया। नदियों के प्रति श्रद्धा भाव तो रहा पर उनके लगातार दूषित होते जाने पर भी हम चुप रहे। पानी के मोल को पहचानते हुए भी हम इस पर अमल करने में कोताही करते रहे। यह जानते हुए कि बारिश और जंगलों का क्या रिश्ता है, जंगल कटते रहे।

पर्यावरण को नष्ट होते देखते रहे, बिना यह समझे कि यह तो हम अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। हम अपनी ही समृद्ध विरासत खत्म कर रहे हैं तथा हम अपने ही हाथों अपनी कब्र खोदने में जुटे हैं। कई बार इसका दोष केवल बढ़ती हुई आबादी पर ही डाल कर बाकी जरूरी सवालों से बचने की कोशिश की जाती है लेकिन आबादी ही प्राकृतिक संसाधनों के खत्म होते जाने के पीछे एकमात्र कारण नहीं है बल्कि हमारा प्रकृति से बेहूदा बर्ताव इसके लिये मुख्य रूप से जिम्मेदार है।

पानीदार बनने से पहले हमें पानी को समझना पड़ेगा। पानी के पर्यावरण को समझना होगा। हमें समझना होगा कि पानी हमें कहाँ से और कैसे मिलता है। हमें इसका उपयोग कैसे और किस हद तक करना है। हमें लाखों सालों से भण्डारित पानी को सहेजने के लिये क्या–क्या कदम उठाने की जरूरत है और यदि हम नहीं जागे तो हमें किस भयावहता का सामना करना पड़ेगा। हमें समझना होगा पानी के भूगोल को। पानी धरती से कैसे मिलता है और यह धरती की नसों तक जाता कैसे है।हमारे पर्यावरण की किसी को चिन्ता नहीं है। पर्यावरण को बिगाड़ने के लिये हम खुद दोषी हैं, हमने अपने फायदे के लिये पूरी प्रकृति का ताना-बाना ही बिगाड़ दिया। हमारी हालत ठीक वैसी ही हो चुकी है, जैसे कोई बच्चा खेल–खेल में अपने आसपास ईंटों का घेरा बनाता जाये और वही उसमें घिर जाए।

हम भी आज ऐसे ही घिरे हुए साफ हवा और पानी तक को तरसने को मजबूर हैं। हमें अब प्रकृति के प्रति प्रायश्चित करना होगा। आज हमें न नदियों से साफ पानी मिल पा रहा है और न ही खेतों से अच्छा खानपान मिल रहा है। नदियों में हानिकारक रसायनों और सीवेज मिलने से अमृत रूपी पानी जहर बनता जा रहा है तो खेतों में लगातार रासायनिक खादों और कीटनाशकों के दुष्प्रभाव से हमें कई बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है।

जल जनित बीमारियों की तादाद तेजी से बढ़ी है। हमारे देश के स्वास्थ्य बजट का करीब 80 फीसदी हिस्सा जल जनित बीमारियों से निपटने पर ही खर्च हो रहा है। अब भी जागने का समय है। पर्यावरण को सहेजने के लिये लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। इसमें विचारों को जन–जन तक ले जाने में सहभागी हो सकती है। हमें पर्यावरण जैसे मुद्दों पर बार–बार बात करने और इसे सुधारने की दिशा में छोटी ही सही पहल करते रहना होगा।

भारत के परम्परागत जलस्रोतशायद जबसे दुनिया शुरू हुई होगी, तब से अब तक पानी की अनवरत यात्रा जारी है – आसमान से धरती और धरती से आसमान। यह अनवरत यात्रा जारी है सदियों से इसी तरह। कुदरत की अनमोल नेमत है बारिश। बारिश आती रही और धरती पर पानी का संसार फैलाती रही। फिर हौले–हौले यही पानी कब धरती से आसमान पहुँचता, पता ही नहीं चलता। वहाँ से फिर काले मेघों के घोड़ों पर सवार होकर तैयारी होती धरती पर फिर बरसने की।

आसमान में काले रूई के फाहों की तरह बादल उमड़ते और जब झमाझम बरसते तो धरती का दामन पानी की बूँदों से भर उठता। धरती हरियाली की चुनर ओढ़ लेती। पहाड़ों और मैदानों से होता हुआ पानी नदी–नालों की नीली नसों में भर उठता। नदी–नालों की बाढ़ से साल-दर-साल खूब सारा पानी बह निकलता।

आसमान में उड़ने वाले पखेरुओं से लेकर धरती पर रहने वाले सब कोई तृप्त हो उठते, आनन्दित हो उठते। बारिश के संगीत से पूरी धरती झूम उठती। यही सब कुछ जारी रहता तो शायद किसी को इस बात का इल्म भी नहीं आता लेकिन बीते कुछ सालों में धरती के आँचल में पानी सही तरीके और अनुपात में रिसा नहीं और धीरे–धीरे बारिश भी कम होने लगी। ... और यहीं से शुरू हुई पानी पर फिर से सोचने की बात।

समाज को पानीदार बनाने से पहले उन्हें हमें पानी के पर्यावरण से परिचित कराना होगा।

पानीदार बनने से पहले हमें पानी को समझना पड़ेगा। पानी के पर्यावरण को समझना होगा। हमें समझना होगा कि पानी हमें कहाँ से और कैसे मिलता है। हमें इसका उपयोग कैसे और किस हद तक करना है। हमें लाखों सालों से भण्डारित पानी को सहेजने के लिये क्या–क्या कदम उठाने की जरूरत है और यदि हम नहीं जागे तो हमें किस भयावहता का सामना करना पड़ेगा। हमें समझना होगा पानी के भूगोल को। पानी धरती से कैसे मिलता है और यह धरती की नसों तक जाता कैसे है।

भारत के परम्परागत जलस्रोतकहीं पानी कम और कहीं ज्यादा क्यों होता है। कहीं का पानी मीठा और कहीं का पानी कसैला सा क्यों होता है। धरती की नदियों में इतना पानी कहाँ से आता है और कुछ ही दिनों में कहाँ चला जाता है। हमारी नदियाँ जो पहले साफ–सुथरी सी हुआ करती थी, वे अब गंदले नालों में कैसे बदल रही हैं।

तालाब क्यों खत्म होते जा रहे हैं और कुएँ–कुण्डियाँ क्यों सूखते जा रहे हैं। बारिश अनियमित क्यों होती जा रही है। गर्मियों के मौसम में हर साल पानी की हाहाकार क्यों मचने लगती है। हमारे जंगलों के लगातार कटते जाने और पानी के कम होते जाने में क्या अन्तर्सम्बन्ध है। तापमान बढ़ने से क्या बारिश भी गड़बड़ाने लगी है।

ऐसे तमाम सवाल हैं जो समाज के सामने हैं और इन दिनों समाज को इनसे रूबरू होने की महती जरूरत है। इन सवालों के जवाब महज साक्षरता से ही नहीं मिल सकते बल्कि इसके लिये एक कदम आगे बढ़कर पानी से मेलजोल बढ़ाने या पानी के बारे में समझ बढ़ाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। जरूरी यह भी है कि हम अब एक्शन मोड में आएँ और चिन्ता करते रहने से आगे बढ़कर कुछ करने की ठाने जिससे कुछ तो बदल सकें।

विश्व साक्षरता दिवस पर अब हमें इस बात को शिद्दत से और नए नजरिए से समझने की जरूरत बढ़ गई है कि हालत लगातार चिन्ताजनक होते जा रहे हैं और ऐसे घटाटोप में पानी और पर्यावरण जैसे जरूरी मुद्दों पर आम लोगों के बीच सरल और सहज भाषा तथा उनकी बोलियों में उन तक बात पहुँचाने के साथ उनकी बात व ज्ञान को भी सहेजने की जरूरत है। साक्षरता के संकीर्ण मायने बदल कर उसमें पर्यावरण और पानी की समझ को भी शामिल करना होगा।

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ से ज़्यादा आलेख लिखे हैं। वे नव भारत तथा देशबन्धु के प्रथम पृष्ठ के लिये मुद्दों पर आधारित अ

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