बड़गोंदा : जल-जंगल शिक्षण की ‘प्रयोगशाला’

Submitted by RuralWater on Sun, 09/06/2015 - 16:13

विश्व साक्षरता दिवस 8 सितम्बर 2015 पर विशेष


इन्दौर जिले का बड़गोंदा जल और जंगल आदि संसाधनों के विकास अध्ययन और शिक्षण की एक व्यावहारिक प्रयोगशाला है। पहाड़ियों के बीच सप्त तालाब तैयार किये गए हैं। मानव निर्मित एक घना जंगल भी सीना ताने खड़ा है। लाखों पौधे भी तैयार किये जा रहे हैं। सागवान के बीजों का उपचार भी यहाँ हो रहा है। स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी यहाँ जल-जंगल, कृषि संसाधनों के विकास का अध्ययन करने आते हैं। यह क्षेत्र नर्मदा और गंगा-भारत की दो बड़ी नदियों का जलग्रहण क्षेत्र भी है। भारत में बड़े पैमाने पर इस तरह के क्षेत्र विकसित करने चाहिए जिससे पर्यावरण शिक्षा के नए आयाम सामने आ सकते हैं। इस तरह की ‘प्रयोगशालाएँ’ बच्चों और युवाओं को प्राकृतिक संसाधनों के प्रति अनुराग भाव की शिक्षा भी देती है।

कभी जंगली घास वाला यह क्षेत्र अब जंगल में तब्दील हो चुका है। यहाँ नए जंगल रचने-बसने की दास्तान को जानने-समझने के लिये दूर-दूर से विशेषज्ञ और नर्सरी इको टूरिज्म की खातिर स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों के अध्ययन दल भी आ रहे हैं। रोपणी के एस.के. बिल्लोरे, एम.एल. कश्यप और जी.एस चतुर्वेदी की टीम इस जंगल को दिलचस्प अन्दाज के साथ घुमाती है। बड़गोंदा जंगल के अनेक रोमांचक पहलू हैं। जंगल तो आपने बहुत देखे होंगे? लेकिन जंगल की ‘गंगोत्री’ की ‘तीर्थयात्रा’ के प्रसंग कम ही आ पाते हैं। बीज से वृक्ष की यात्रा की फिलासफी तो बहुत सुनी होगी? लेकिन हकीक़त में कुछ अलग अन्दाज के नजारे कम ही देखे होंगे! अपने पुरखों और देश की कहानी सुनाते वृक्ष, चंचल और शोख बूँदों की मेहमान नवाजी, चहचहाते पक्षी और पहाड़ियों के बीच सुहानी सुबह-यही तो परिचय है, बड़गोंदा का!!

इन्दौर से मंडलेश्वर- चोरल डैम वाले मार्ग पर 40 किमी. दूर महू के पास बसा है बड़गोंदा। कभी बंजर, पथरीला और विरान यह क्षेत्र आज जंगल से सराबोर है। बड़गोंदा एक मॉडल बन सकता है- मध्य प्रदेश के उन तमाम क्षेत्रों का जहाँ पथरीली और पड़त भूमि है, जो विकास के सपने देख रही है।

बात 200 साल पुरानी है- महू क्षेत्र का यह गाँव कभी आबादी से सराबोर था। बंजारों और गुर्जरों के बड़े विवाद के बाद यह वीरान हो गया था। 16 साल पहले इस बंजर ज़मीन पर वन विभाग ने कुछ नया करने की ठानी। इसे अनुसंधान और व्याख्या केन्द्र का रूप दिया गया। 100 हेक्टेयर का क्षेत्र टारगेट में लिया गया।

कभी जंगली घास वाला यह क्षेत्र अब जंगल में तब्दील हो चुका है। यहाँ नए जंगल रचने-बसने की दास्तान को जानने-समझने के लिये दूर-दूर से विशेषज्ञ और नर्सरी इको टूरिज्म की खातिर स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों के अध्ययन दल भी आ रहे हैं। रोपणी के एस.के. बिल्लोरे, एम.एल. कश्यप और जी.एस चतुर्वेदी की टीम इस जंगल को दिलचस्प अन्दाज के साथ घुमाती है। बड़गोंदा जंगल के अनेक रोमांचक पहलू हैं।

जंगल में पाई जाने वाली अलग-अलग प्रजाति के वृक्षों की मौजूदगी यहाँ है। करीब 12 हजार 500 वृक्ष यहाँ सीना ताने खड़े हैं। कोई भद्राचलम, कोई देवास के पुंजापुरा तो कोई उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से आया है। ये अपने पुरखों की गुणवत्ता की रोचक कहानी सुनाते मिल जाएँगे। नीलगिरी, सागौन, महुआ, आँवला सहित अनेक प्रजाति के वृक्षों के यहाँ ‘क्लोन’ तैयार किये गए हैं।

बड़गोंदा को विकसित करने में 1997 से जुटे एस.के. बिल्लोरे कहते हैं- भद्राचलम से आया नीलगिरी 5 साल में 40 फीट की ऊँचाई प्राप्त कर रहा है। जबकि सामान्य तौर पर नीलगिरी 20 से 22 फीट तक ही पहुँच पाता है। देवास के पुंजापुरा का सागौन यहाँ धूम मचा रहा है। जबलपुर रिसर्च सेंटर ने इसे ‘धन वृक्ष’ कहा है। प्रतापगढ़ का ग्रापटेड आँवलान 5 साल में फल दे रहा है जबकि सामान्य आँवला 18-20 साल में इस स्थिति में आता है। बाजार में इस आँवला की माँग भी ज्यादा है।

बड़गोंदा जंगल की ‘गंगोत्री’ कैसे- प्रकृति प्रबन्धन के बुनियादी सूत्र-नन्हें बीज, पानी की बूँद, मिट्टी के कण, मित्र जीव आदि जहाँ नया जंगल खड़ा करने का संकल्प लेते नजर आते हैं। यहाँ से हर साल वन और गैर वन क्षेत्र के लिये लगभग 15 लाख पौधे तैयार हो रहे हैं।

यहाँ अलग-अलग प्रजातियों के प्रदर्शन प्रक्षेत्र विकसित किये गए हैं। इनके बीजों से उन्नत किस्म के पौधे तैयार किये जा रहे हैं। सागौन, खमेर, महुआ, शीशम, बाँस, अंजन, सीरस, धवई, धावड़ा, बैर, नींबू, चीकू, जाम, आम आदि के बीजों, कलम, ग्राफ्टिंग से उन्नत किस्म के तैयार पौधे यहाँ उम्मीदों से भरे मिल जाएँगे। सागौन का बीजोपचार भी हो रहा है।

प्राकृतिक रूप से दो साल में तैयार होने वाला बीज यहाँ केवल तीन माह में अंकुरित हो रहा है। जैविक खेती के तौर-तरीके बड़गोंद के सन्देश का बड़ा आधार है। कॉलेज के विद्यार्थी बड़े ध्यान से सुनते हैं- केंचुए का पसीना- वर्मी वाश कहलाता है जो खेती का ‘टॉनिक’ है। इस साल 5 हजार क्विंटल केंचुआ खाद यहाँ से बिकी है।

पानी की बूँदें और मिट्टी के कणों की चिन्ता नहीं की तो यह जंगल की ‘गंगोत्री’ कैसे? मुख्य वन संरक्षक पंकज श्रीवास्तव कहते हैं दरअसल पहाड़ियों से घिरे होने के कारण यह प्राकृतिक रूप से एक वाटरशेड है। यहाँ ‘सप्त सागर’ की तर्ज पर छोटी-बड़ी सात पानी संरचनाएँ तैयार की गई है। जंगल का पानी जंगल में और जंगल की मिट्टी जंगल में- यह अवधारणा भी यहाँ साकार है।

यह नर्मदा का भी जलग्रहण क्षेत्र है। जनापाव की पहाड़ी से निकली नखेरी नदी इस क्षेत्र से गुजरते हुए चोरल नदी और फिर बाद में नर्मदा जी में मिलती है। यहाँ किसानों को वृक्ष खेती, कृषि वानिकी, मेढ़ वानिकी आदि का भी प्रशिक्षण दिया जाता है। कुल मिलाकर बड़गोंदा का जंगल, यहाँ की पहाड़ियाँ, तालाब, पक्षी और सुरम्य वातावरण- अपने आप में प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन की एक मिसाल बन रहा है।

बिल्लोरे को अवार्ड


प्राथमिक स्तर से ही बड़गोंदा के विकास के बुनियादी सूत्रधार के रूप में पहचाने जाने वाले एस.के. बिल्लोरे को उनके योगदान के लिये राज्य स्तर पर चयन किया गया और इको टूरिज्म अवार्ड से भी सम्मानित किया गया है।

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About the author

.पत्रकार और लेखक क्रांति चतुर्वेदी का जल पर लेखन से गहरा नाता है। पानी पर आज कई अध्ययन यात्राएँ कर चुके हैं। जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन पर पाँच पुस्तकें भी लिख चुके हैं। मध्य प्रदेश के सन्दर्भ ग्रन्थ ‘हार्ट ऑफ इण्डिया’ के सम्पादक भी रह चुके हैं। पानी की पत्रकारिता के लिये भारतीय पत्रकारिता जग

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