किसानों में हाहाकार सो रहे हैं केसीआर

Submitted by RuralWater on Mon, 09/07/2015 - 10:27
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यथावत 1-15 सितम्बर 2015
किसान आत्महत्या कर रहे हैं। सरकार हाथ-पर-हाथ धरे बैठी है। वह आत्महत्या को दूसरे नज़रिए से देख रही है। उसका मानना है कि इसकी वजह किसानों की आपसी प्रतिस्पर्धा है। मगर सवाल ये है कि क्या सच वही है जो सरकार बता रही है। उसी को उजागर करती यह रिपोर्ट…

मानसून की बारिश कम होने का असर राजधानी हैदराबाद पर भी दिखने लगा है। यहाँ भूजल का स्तर तेजी से नीचे गिरा है। शहर के बड़े इलाके में लगे पानी के नल सूखने लगे हैं। आने वाले दिनों में पेयजल संकट गहराने का खतरा साफ नजर आ रहा है। जिस नागार्जुन सागर से शहर की सत्तर फीसदी आबादी की प्यास बुझती है, वहाँ का स्टॉक तेजी से खतरे की घंटी बजा रहा है। अगस्त के पहले सप्ताह में नागार्जुन सागर का जलस्तर 510 फीट मापा गया, जबकि इसकी पूरी क्षमता 590 फीट है। तेलंगाना के महबूबनगर जिले के गाँव पोलीपल्ली के किसान राकलावत केवुलू ने 6 अगस्त को अपने खेत में कीटनाशक खाकर आत्महत्या कर ली, उसी खेत में जहाँ बड़े अरमान से उसने मक्के और धान की फसल लगाई थी। राकलावत ने इसके लिये स्थानीय साहूकार से दो लाख और को-ऑपरेटिव बैंक से 40 हजार रुपया कर्ज ले रखा था।

मानसून की दगाबाजी ने उसके अरमानों पर मानो तुषारापात कर दिया। नतीजतन उसके सामने मौत को गले लगाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। राकलावत ने अपनी चार एकड़ ज़मीन में धान और मक्का बोया था और आठ एकड़ जमीन लीज पर लेकर उसमें कपास उगाया था। लेकिन जिस खेत की पैदावार के भरोसे कर्ज उतारकर वो चिन्तामुक्त होता वही खेत उसकी चिता बन गया।

लगातार खेती में हो रहे नुकसान ने आखिरकार उसे तोड़ दिया और कर्ज के बोझ तले दबकर उसने मौत को गले लगा लिया। राकलावत अकेला ऐसा किसान नहीं है जिसने आत्महत्या की। केवल महबूबनगर में एस. बलैया, के. शेशैया, बी. बेचूपल्ली, एम. बालचन्द्रैया, चांदिया नायक जैसे आधे दर्जन किसानों ने पिछले एक पखवाड़े के भीतर आत्महत्या की है। यदि तेलंगाना के केवल पाँच जिलों की बात करें तो इसी अवधि में पन्द्रह किसान खुदखुशी कर चुके हैं।

कांग्रेस के नेता आरोप लगा रहे हैं कि तेलंगाना बनने के बाद से 11 सौ किसान आत्महत्या कर चुके हैं। हालाँकि राज्य की टीआरएस सरकार किसानों की आत्महत्या के कारणों को किसी वजह से जोड़ रही है। सरकारी अधिकारी कहते सुने जा रहे हैं कि अधिकांश किसान अपनी पारिवारिक वजहों से आत्महत्या कर रहे हैं।

तेलंगाना के गाँवों में खेती के भरोसे जीवन निर्वाह करने वाली बड़ी आबादी के सामने भूखों मरने की नौबत आ गई है। किसान बड़ी तेजी से रोजी-रोज़गार के चक्कर में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। जिसके सामने विकल्प सीमित है वे दिहाड़ी करने शहरों की ओर भाग रहे हैं। लेकिन जिस किसान ने लीज पर ज़मीन लेकर और साहूकारों से ऊँची ब्याज पर कर्ज ले रखा है उनके सामने समस्या विकट है। उनको न सरकार से मदद मिल रही है और न बैंकों से राहत।

महबूब नगर के रामकिस्तैयापल्ली के 63 वर्षीय सुथारी बल्लैया की कहानी इसी दर्द को बयाँ करती है। काश्तकार बलैया ने कीटनाशक दवा पीकर अपने खेत में आत्महत्या कर ली। घटना बीते 29 जुलाई की है। बलैया ने छह एकड़ ज़मीन पर मक्का, धान और अरंडी लगाया था। इसके लिये साहूकार से डेढ़ लाख रुपए कर्ज लिये थे। लेकिन मानसून की दगाबाजी ने बलैया के सपने तोड़ दिये। उनकी पत्नी मानेम्मा बताती है कि कहीं से उसे सहायता नहीं मिली।

बैंक वालों ने भी पूरा कागजात नहीं होने का बहाना बनाकर लोन नहीं दिया। खेती में गत तीन साल से भारी घाटा हो रहा था। साहूकार से लिये गये 40 हजार रुपए का ब्याज बढ़कर डेढ़ लाख रुपया हो गया था। ऐसे में बलैया ने संसार को ही छोड़ देना मुनासिब समझा। अब उसके घर में विधवा मानेम्मा के अलावा एक तलाकशुदा बेटी भी है। गृहस्थी की गाड़ी अब कैसे चलेगी, भगवान ही जाने।

कम बारिश और लगातार सूखे से तेलंगाना में किसानों की स्थिति अत्यन्त भयावह और दुखद होती जा रही है। खेती से इतर रोज़गार के अभाव में वे लगातार मौत को गले लगा रहे हैं। इस साल भी तेलंगाना के अदिलाबाद, करीमनगर और वारंगल के कुछ इलाके को छोड़ दें, जहाँ इस मानसून में प्रचुर बारिश हुई तो बाकी जिले पूरी तरह सूखे की चपेट में हैं।

जून महीने के शुरुआती दिनों में हुई बारिश के बाद से तेलंगाना के आकाश पर केवल काले बादल ही मँडरा रहे हैं। बारिश की बूँदे सपना हो गई है। यहीं वो मौसम होता है जब खरीफ की अहम फसल धान की रोपनी होती है। परन्तु बारिश के अभाव में खेती-किसानी का धन्धा बेहद मन्दा हो गया है।

जानकार बताते हैं कि धान की रोपनी का काम जुलाई महीने के अन्त तक हो जाना चाहिए। लेकिन दस अगस्त बीत जाने के बाद भी पानी के अभाव में धान की रोपाई नहीं हो सकी। वैसे भी मानसूनी बारिश में इस साल माइनस 21 फीसदी की कमी रिकॉर्ड की गई है। ऐसे में चावल के उत्पादन पर गहरा असर पड़ने से कोई भी इनकार नहीं कर रहा है।

आँकड़े बताते हैं कि तेलंगाना में आमतौर पर प्रतिवर्ष 33 लाख टन चावल का उत्पादन होता है जो इस बार 5 लाख टन से ज्यादा होने की उम्मीद नहीं है। हर साल यहाँ 41.43 लाख हेक्टेयर में खेती होती है जबकि इस बार 29.64 लाख हेक्टेयर भूमि पर ही खेती हो सकी है। ऐसे में चावल का उत्पादन बेहद कम होने वाला है। जानकार कह रहे हैं कि लगभग 90 फीसदी चावल का इस साल दूसरे प्रदेशों से आयात करना पड़ सकता है। ऐसे में तेलंगाना वासियों के मुख्य खाद्यान्न चावल के भाव भी आकाश छूने लगे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

महाअकाल की स्थिति में गाँवों से बड़ी संख्या में पलायन शुरू हो चुका है। सीपीएम से जुड़े रायतु संघम के महासचिव एम.मल्ला रेड्डी बताते हैं कि तेलंगाना के सभी जिलों से जो आँकड़े मिले हैं उससे पता चलता है कि साढ़े तेरह लाख लोग आजीविका की खोज में दूसरे राज्यों और शहरों में पलायन कर चुके हैं।

अकाल के साइड इफेक्ट पर शोध करने वालों का कहना है कि अच्छी खेती नहीं होने की स्थिति में अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ता है। पैसे के लिये लोग चोरी, डकैती और दूसरे आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं।

इन सबसे अलग केसीआर की सरकार तेलंगाना अस्मिता के भावनात्मक मुद्दे को भुनाने में तल्लीन है। पिछले दिनों जब तेलंगाना के आठ विधायकों के एक दल ने प्रगतिशील किसान के नाम पर इजरायल का दौरा किया था तो केसीआर की बहुत किरकिरी हुई थी। कहा ये जा रहा था कि सूबे के किसान मर रहे हैं विधायक मौज करने विदेश जा रहे हैं।

तेलंगाना में मानसून की बारिश कम होने का असर राजधानी हैदराबाद पर भी दिखने लगा है। यहाँ भूजल का स्तर तेजी से नीचे गिरा है। शहर के बड़े इलाके में लगे पानी के नल सूखने लगे हैं। आने वाले दिनों में पेयजल संकट गहराने का खतरा साफ नजर आ रहा है। जिस नागार्जुन सागर से शहर की सत्तर फीसदी आबादी की प्यास बुझती है, वहाँ का स्टॉक तेजी से खतरे की घंटी बजा रहा है।

अगस्त के पहले सप्ताह में नागार्जुन सागर का जलस्तर 510 फीट मापा गया, जबकि इसकी पूरी क्षमता 590 फीट है। ये स्थिति मानसून सीजन में है। आज की तारीख में ग्रेटर हैदराबाद में तीन पाइप लाइनों के जरिये प्रतिदिन 225 मिलियन गैलन जलापूर्ति होती है। जानकार बता रहे हैं कि 6 साल पहले भी ऐसी ही स्थिति पैदा हुई थी, लेकिन बाद में हुई भारी बारिश ने स्थिति सम्भाल लिया था।

कम बारिश और सूखे की स्थिति ने तेलंगाना सरकार की अति महत्वाकांक्षी हरिता हरम योजना पर ब्रेक लगा दिया है। सीएम के. चन्द्रशेखर राव ने जुलाई महीने में इस योजना की शुरुआत की थी। इसके तहत अगले तीन साल के भीतर सूबे में 230 करोड़ पेड़ लगाये जाने वाले हैं। केसीआर ने कहा था कि अकेले इस साल 40 करोड़ पेड़ लगाए जाएँगे। लेकिन मानसून की बेरुखी ने केसीआर के इस ड्रीम प्रोजेक्ट पर ग्रहण लगा दिया है। हरिता हरम के तहत सभी विधान सभा क्षेत्रों के हरेक गाँव में प्रतिवर्ष 40 हजार पौधे लगाए जाएँगे।

तेलंगाना में किसानों के आत्महत्या की बढ़ती वारदातों के बीच एक बार फिर यह बहस छिड़ी है कि क्या कारण है कि धरती के भगवान कहे जाने वाले किसान को अब फाँसी के फन्दे या खेतों में छिड़के जाने वाले कीटनाशक ज्यादा भाने लगा है। इसको लेकर अलग-अलग कारण गिनाए जा रहे हैं।

बताया जाता है कि किसानों में एक-दूसरे से आगे निकलने की प्रतिस्पर्धा हाल के दिनों में बढ़ी है। वे महंगे ब्याज पर कर्ज लेकर और ज़मीन लीज पर लेकर खेती में ज्यादा पैसा झोंक रहे हैं। लेकिन सिंचाई की सुविधा के अभाव में मानसून पर उनकी निर्भरता घाटे का सौदा साबित हो रही है। पिछले छह साल से तेलंगाना इलाके के किसान मानसून की मार झेलने को विवश हैं।

एक बड़ी वजह सरकार की बेरुखी भी है। किसानों के हित के लिये चलाई जाने वाली योजनाएँ जमीनी स्तर पर ढंग से कार्यान्वित नहीं हो पाती। समय पर खाद-बीज की उपलब्धता कौन कहे, उनकी उपज का सही दाम भी नहीं मिल पाता। सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज की खरीददारी करने की योजना भी बिचौलियों और अधिकारियों की मिली-भगत की भेंट चढ़ जाती है। सबसे बढ़कर बैंकों का नकारात्मक रवैया है।

किसानों को क्रेडिट कार्ड देकर आत्मनिर्भर बनाने और खेती के समय पर लोन देकर उन्हें आर्थिक मदद पहुँचाने के प्रयास भी अब तक सफल साबित नहीं हुए हैं। क्रेडिट कार्ड बनाने तक में रिश्वतखोरी का बाजार गर्म है। बैंक ब्लॉकों तक आम किसान की पहुँच नहीं के बराबर है। इस कारण सरकार से मिलने वाले फायदे से भी वे अनजान रहते हैं और कुछ दलाल किस्म के लोग ही इसका फायदा उठा ले जाते हैं।

तेजी से महंगे होते कृषि उपकरण, डीजल के बढ़ते दाम और उर्वरकों की माँग के मुताबिक अनुपलब्धता जैसी चीजें भी खेती को घाटे का सौदा बना रही है। कृषि के जानकार भारत में छोटे जोत के किसानों की बहुलता को एक बड़ी समस्या के तौर पर गिनाते हैं। उनका कहना है कि भूमि एक बहुमूल्य परिसम्पत्ति है और इसकी मात्रा सीमित है।

इसीलिये समुचित ढंग से इसका उपयोग आवश्यक है। इस सम्बन्ध में लोगों की ज़रूरतों को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है। साथ ही ये भी देखना होगा कि भूमि सम्बन्धित जरूरतों को पूरा करने के रास्ते में क्या कठिनाइयाँ हैं एवं उनको कैसे दूर किया जा सकता है।

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