पानी : साक्षरता बनाम देशज ज्ञान

Submitted by RuralWater on Mon, 09/07/2015 - 11:08

विश्व साक्षरता दिवस 08 सितम्बर 2015 पर विशेष


आज से एक हजार साल पहले के समाज में छोटे–बड़े तालाब बनाने और उसे अस्तित्व को बचाने–सहेजने की जो भावना थी, उसमें क्या सिर्फ पढ़े–लिखे तबके के ही लोग शामिल थे। अनपढ़ समझे जाने वाले आदिवासी पीढ़ियों से पानी को पहाड़ियों पर चढ़ाते हुए अपने छोटे–छोटे खेतों में पाट के लिये पानी की नालियाँ बनाते हैं ताकि बिना किसी मशीन, बिजली या डीजल ईंधन के वे खेतों को पानी पहुँचा सकें।

साक्षरता के मौजूदा मायनों को लेकर बहस चलती रही है। साक्षरता को जिस तरह से संकुचित कर केवल अक्षर ज्ञान या किताबें पढ़ लेने भर तक ही सिमित कर लिया गया है, उसमें कहीं भी हमारी परम्परागत, अनुभवजन्य और देशज ज्ञान या लोक विद्या का समावेश ही नहीं है, बल्कि चर्चा तक नहीं है।

यही वजह है कि हम अब भी ज्ञान के लिये सिर्फ पढ़े-लिखे लोगों के बूते ही समझते हैं और अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोगों को केवल और केवल अज्ञानी ही समझते हैं। समाज में पानी की बात का उदाहरण लेकर हम देखें तो बात साफ है कि पढ़े–लिखे समाज से ज्यादा पानी की तकनीकें, समझ आधारभूत ज्ञान, जागरुकता और अनुभव समाज के उस तबके के पास है जिसे हम अक्सर ऐसी जगहों पर याद ही नहीं करते।

पानी का सन्दर्भ इसलिये कि इन दिनों बड़ी बहस है कि पानी के अकाल से हमें किताबी ज्ञान ही बचा सकता है जबकि इस क्षेत्र में देशज और परम्परागत ज्ञान की कहीं बात ही नहीं की जाती।

साक्षर होने का अर्थ केवल स अक्षर होना नहीं बल्कि अक्षर ज्ञान के साथ समाज और सामाजिक सरोकारों से ज्ञान युक्त होना भी जरूरी है। हमें अपने परम्परागत और अनुभवजन्य ज्ञान को भी उसी शिद्दत से सीखने–समझने और अमल करने की दिशा में भी साक्षर होना ही चाहिए। ज्ञान-तो-ज्ञान ही होता है और फिर सैकड़ों सालों के अनुभव से एक समाज का अर्जित ज्ञान कैसे सिर्फ पुराना भर होने से खारिज किया जा सकता है।

जब भी समाज के अर्जित ज्ञान की बात की जाती है तो कुछ लोग इसे सिर्फ पारम्परिक या लोक संस्कृति तक ही सिमित कर देते हैं पर देखते हैं कि हमारे अंचल में कारीगरों, किसानों, महिलाओं, और आदिवासियों के पास जो संचित और अर्जित ज्ञान है, शिल्प या कला है, वह समग्र ज्ञान है और उसे हमें उसी स्वरूप में लेना चाहिए। जो समाज अपनी परम्परा से उखड़ा हुआ होता है वह एकांगी ही होता है।

यदि वह ज्ञान सामान्य जीवन का हिस्सा नहीं होता तो शायद इतने सैकड़ों बरसों तक इस तरह कैसे जीवित रह सकता है। दरअसल देशज ज्ञान या लोक विद्या समाज की सैकड़ों सालों से चली आ रही बौद्धिक क्रिया का जीवन्त रूप है, जो चाहे कहीं कागज–किताबों में दर्ज न हो या किसी कम्प्यूटर में संग्रहित नहीं हो पर यह मनुष्य समाज की सहज गतिविधियों का एक मौलिक रूप तो है ही।

देशज ज्ञान या लोक विद्या जनश्रुति, स्मृति, जनहित और सामाजिक न्याय के मिले-जुले रूपों से बनता और सहेजा जाता है। सरल शब्दों में कहें तो यह लोगों के जीने का तरीका है, जिसे उन्होंने लम्बे अनुभवों की आँच में खरा पकाया है। कई बार देखने में आता है कि एक पढ़े लिखे इंजीनियर से ज्यादा सटीक और तथ्यपरक ज्ञान एक किसान या आदिवासी के पास भी हो सकता है।

जैसे आज हमारे पास जल संकट से बचने का एक ही विकल्प रह गया है हैण्डपम्प या ट्यूबवेल। किसी भी गाँव से शिकायत आई नहीं कि हम सीधे इन्हीं संसाधनों की ओर देखते हैं गोया इसके अलावा कोई विकल्प बचा ही नहीं हो। यह भी जानते हुए कि भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। लाखों सालों से संग्रहित पानी भी अब खत्म होने की कगार पर है।

क्या किसी गाँव को जल संकट से बचाने के लिये वहाँ का कोई देशज उपाय या बारिश के पानी को सहेजने जैसा कोई संसाधन विकसित नहीं किया जा सकता। फौरी तौर पर तो बात दूसरी है पर हमें यह जल्दी ही समझना होगा कि ऐसे उपाय तुरन्त तो राहत पहुँचा सकते हैं पर ये स्थायी निदान नहीं हो सकते बल्कि इससे हम समस्या को बढ़ा ही रहे हैं दिन-ब-दिन।

अब देखिये कि आज से एक हजार साल पहले के समाज में छोटे–बड़े तालाब बनाने और उसे अस्तित्व को बचाने–सहेजने की जो भावना थी, उसमें क्या सिर्फ पढ़े–लिखे तबके के ही लोग शामिल थे। अनपढ़ समझे जाने वाले आदिवासी पीढ़ियों से पानी को पहाड़ियों पर चढ़ाते हुए अपने छोटे–छोटे खेतों में पाट के लिये पानी की नालियाँ बनाते हैं ताकि बिना किसी मशीन, बिजली या डीजल ईंधन के वे खेतों को पानी पहुँचा सकें।

पीढ़ियों से हमारे गाँवों की प्यास बुझाते कुएँ–कुण्डियाँ। नदियों का जाल और उनके किनारे की समृद्धि। देश भर में हजारों कुएँ–कुण्डियाँ, चौपड़े, बावलियाँ, नहरें, छोटे–छोटे बाँध और भी न जाने क्या-क्या ...। करीब सात सौ साल पहले राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और दिल्ली में कुछ बेमिसाल बावड़ियाँ बनाई गईं, जिन्हें आज देखने पर ही हमें ताज्जुब लगता है। 400 साल पहले अकबर के जमाने का बुरहानपुर में खुनी भण्डारा एशिया में अपनी तरह की अनूठी जल संरचना है।

समाज को साफ और मीठा पानी पहुँचाने के लिये दूर सतपुड़ा के पहाड़ों से निकले पानी को भूमिगत सुरंगों के जरिए खुनी भण्डारे तक चढ़ाने की यह इन दिनों पूरी दुनिया में एकमात्र जीवित संरचना है। कितने उत्कर्ष पर रही होगी उस दौर की जल अभियांत्रिकी। सात–सात मंजिला बावड़ियाँ, आलिशान प्रासाद, हजारों सीढ़ियाँ, वातानुकूलित परिवेश वह भी तब जब न तो आवागमन के इतना साधन थे और न ही वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित मशीनें या इतने संसाधन। और इन सबसे बड़ी बात तो यह कि वे पानी का कितना मोल समझ गुन रहे थे, शायद आने वाले खतरों को भी भाँप रहे थे।

सूचना के विस्फोट के इस दौर में हमारे किसानों, ग्रामीणों, आदिवासियों, महिलाओं, कारीगरों, मजदूरों और छोटा–मोटा धंधा करने वालों की होती जा रही दुर्दशा का एक बड़ा कारण यह भी है कि हम औद्योगिक समाज बनने के क्रम में औद्योगिक समाज तो नहीं बन सके पर पश्चिम के देशों की तरह के दुष्प्रभाव हम भी उठाने को मजबूर हैं। हम बीते 68 सालों से औद्योगिक समाज बनने की प्रक्रिया में हैं पर नहीं हो सका। अब भी 70 फीसदी से ज्यादा लोग गाँवों में खेती पर जीवित हैं।

हमारे समाज का एक छोटा सा तबका भले ही चमचमाता हुआ नजर आने लगा हो पर एक बड़ा तबका इस वजह से स्थानापन्न होकर आज बड़ी बुरी दशा में आ पहुँचा है। इससे भिड़ने के लिये देशज ज्ञान ही एकमेव विकल्प नजर आता है। हमें देशज ज्ञान को और सहज, व्यापक और सर्वग्राही बनाने की जरूरत है।

हम गाँधी और उनके विचारों को भी भूलते जा रहे हैं। गाँधी का दर्शन तो अपनी जगह है पर उनकी लड़ाई का बड़ा हथियार यह देशज ज्ञान ही था। इसी सैद्धान्तिक क्षमता के बल पर एक ताकतवर और सम्पन्न हुक़ूमत को भी गाँधी ने ललकारा था। गाँधी ने कभी अपने विचार में और अपने आन्दोलन में तब के पढ़े–लिखों को ही अगुवा नहीं किया था। उनका ज्ञान और विचार दोनों ही लोक से निसृत थे न कि किताबी ज्ञान से। देशज ज्ञान ज्ञान का सार्वभौम रूप है। गाँधी का सहजपन प्रकारान्तर से देशज ज्ञान या लोक विद्या का ही सहजपन है।

दरअसल हमारे यहाँ साम्राज्यवादी दौर में देशज ज्ञान की पहचान को एक सुविचारित क्रम में तोड़ा–मरोड़ा गया ताकि लोग अपनी ताकत की पहचान भूल सकें। देशज पारम्परिक ज्ञान और संस्कृति लोगों में आजादी, चेतना और समाज में बदलाव को प्रेरित -प्रोत्साहित करती है। लेकिन यह सब कब तक चलता। धीरे–धीरे लोक चेतना जागृत हुई और लोग उन ताकतों के खिलाफ एकजुट होते चले गए।

एक बार फिर इस तरह की कोशिशें नए रूप में सामने आ रही हैं पर बार-बार ऐसी कोशिशों के बाद भी इन्हें आसानी से खत्म किया जाना मुमकिन नहीं है क्योंकि इनकी जड़ें हमारे जनमानस में गहरे तक पैठ जमाए हुए है पर फिर भी हमें लगातार इसके लिये सतर्क रहने की जरूरत भी है। बात यह भी कि साक्षरता के साथ ही हमें अपने देशज और परम्परागत ज्ञान को भी सहेजने और संवर्धित करने की भी महती जरूरत है।

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ से ज़्यादा आलेख लिखे हैं। वे नव भारत तथा देशबन्धु के प्रथम पृष्ठ के लिये मुद्दों पर आधारित अ

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