ग्लोबल वार्मिंग के मुकाबले में सतही जल का समेकित प्रबन्धन

Submitted by RuralWater on Sun, 09/13/2015 - 11:30
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जल सम्पदा का प्रचलित वर्गीकरण संक्षिप्तीकरण का शिकार है। इसके तीन वर्ग वर्षाजल, भूजल और सतही जल किये जाते हैं। सतही जल में नदी, नदी प्रणाली के हिस्से -चौर, मोइन, झील, बिल आदि प्राकृतिक संरचनाओं के साथ तालाबों और कुओं में एकत्र जल को भी शामिल कर लिया जाता है। जबकि इनको अलग-अलग देखने की जरूरत होती है। नदी और तालाब में सतही जल रहता जरूर है, पर केवल वही सतही जल नहीं होता। सतही जल नदियों से निकला पानी नहीं होता, नदी में जाने वाला पानी होता है। ‘हर खेतीहर को कट्ठा, दो कट्ठा में डबरा बनाना होगा’ - सरोजाबेला (सुपौल, मुरौना) के श्रीप्रकाश यादव ने यह सलाह पाट की खेती के सन्दर्भ में दी, पर वे एक बड़ी समस्या के सम्भावित समाधान की ओर संकेत भी कर रहे थे। उत्तर बिहार में सतही जल के उपयोग की कोई व्यवस्थित प्रणाली नहीं है।

यही पानी जलजमाव और जलजनित बीमारियों का कारण बनता है। लेकिन उत्तर बिहार के बाढ़ की चर्चा जब नीति निर्धारकों के बीच होती है तो हिमालय से निकली नदियों के जरिए नेपाल से आने वाली पानी और पतली मिट्टी-बालू का जिक्र होता है। उस बाढ़ को नियंत्रित करने के लिये नदियों को तटबन्धों से घेर दिया गया। फिर तटबन्धों के टूटने से आई बाढ़ और तटबन्धों के भीतर फँसी आबादी की तबाही की चर्चा होती है।

सिल्ट से वंचित होने या उसके बेतरतीब जमने से तबाही की चर्चा होती है। थोड़ा आगे बढ़कर तालाबों-कुओं के नष्ट होने का मातम भी मना लिया जाता है। पर यह नहीं समझा जाता कि असली समस्या सतही जल है जो नदियों से नहीं बह पाता, तालाबों और कुओं में नहीं अँट पाता। जहाँ-तहाँ बेतरतीब जमा होता है और विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों का कारण बनता है।

यह सही है कि उत्तर बिहार की नदियों में दो तिहाई पानी बाहर से आता है। वह पानी तटों के बाहर नहीं फैले और तेजी से सागर में पहुँच जाए- इसके लिये उनके तटों को बाँध दिया गया। पर तटबन्ध बनाने में दो महत्त्वपूर्ण तथ्यों का ध्यान नहीं रखा गया।

पहला यह कि नदियों की बाढ़ में पानी के साथ महीन मिट्टी अर्थात सिल्ट भी होती है और दूसरा नदियों में सारा पानी बाहर से नहीं आता, एक तिहाई पानी बिहार की धरती पर हुई वर्षा से आता है। तटबन्ध बनने से एक तरफ नदी के पानी में आई महीन मिट्टी तटबन्धों के भीतर जमने और नदी तल को ऊँचा करने लगी।

उसमें मौजूद उर्वरता बढ़ाने वाले विभिन्न खनिज तत्वों से तटबन्धों के बाहर की जमीन वंचित हो गई। तो दूसरी ओर तटबन्धों के बाहर हुई वर्षा का पानी नदी की धारा में प्रविष्ट नहीं हो पाने के कारण जगह-जगह जल-जमाव का कारण बनने लगा। इस दोहरी समस्या का कोई समाधान नहीं खोजा जा सका है बल्कि तटबन्धों के गुण-दोष की विवेचना करने में ही सारी ऊर्जा खपा दी जाती है।

दरअसल, जल सम्पदा का प्रचलित वर्गीकरण संक्षिप्तीकरण का शिकार है। इसके तीन वर्ग वर्षाजल, भूजल और सतही जल किये जाते हैं। सतही जल में नदी, नदी प्रणाली के हिस्से -चौर, मोइन, झील, बिल आदि प्राकृतिक संरचनाओं के साथ तालाबों और कुओं में एकत्र जल को भी शामिल कर लिया जाता है। जबकि इनको अलग-अलग देखने की जरूरत होती है।

नदी और तालाब में सतही जल रहता जरूर है, पर केवल वही सतही जल नहीं होता। सतही जल नदियों से निकला पानी नहीं होता, नदी में जाने वाला पानी होता है। वह पानी जो तालाबों और कुओं में नहीं अँटता और धरती की सतह पर ढाल के मुताबिक प्रवाहित होता है और नदी में जाता है।

नदियाँ अपने आसपास के पानी को समेट कर उसे समुद्र में पहुँचाने की साधन होती हैं। जो पानी नदियों में नहीं जा पाता, या नदी में जाने के पहले जहाँ-तहाँ जमा होता है। उस पानी का सही प्रबन्धन हो तो जलजमाव नहीं होगा, भूजल पर निर्भरता कम होगी, सिंचाई के लिये अच्छी गुणवत्ता का पानी प्राप्त होगा। वर्षा कम होने की स्थिति में हालत का मुकाबला बेहतर ढंग से किया जा सकेगा।

दक्षिण बिहार की आहर-पइन प्रणाली को सतही जल के उपयोग की बेहतरीन व्यवस्था मान सकते हैं। दक्षिण के पठारों पर हुई वर्षा का पानी गंगा में समाहित होने के लिये तेजी से प्रवाहित होता है। उसे जगह-जगह बाँध बनाकर रोका जाता है और पइनों के सहारे आहरों में ले जाकर एकत्र किया जाता है।

खरीफ की फसल खासकर धान की खेती में सिंचाई के लिये यह पानी उपलब्ध रहता है। फसल कट जाने के बाद आहर को खाली कर लिया जाता है। इससे रबी की फसल के लिये ज़मीन को आवश्यक नमी मिल जाती है। बाद में सिंचाई के लिये तालाब और कुओं में वर्षाजल संग्रहित रहता है।

इस आहर-पइन व्यवस्था के विभिन्न कारणों से अस्त-व्यस्त हो जाने से टाल क्षेत्र में जलजमाव की समस्या विकराल हो गई है। दक्षिण बिहार में उस प्रणाली को फिर से जीवित करने की जरूरत तो है ही, इसे देखने की जरूरत भी है कि क्या उत्तर बिहार में ऐसी कोई व्यवस्था हो सकती है? इसके संकेत श्रीप्रकाश यादव की सलाह में मिलते हैं। डबरा तालाबों का एक रूप है। विभिन्न आकार और प्रकार के तालाबों की विशिष्ट भूमिका को समझना दिलचस्प है।

तालाब वर्षाजल संग्रह की ऐसी व्यवस्था है जो धरती के भीतर पानीे के अक्षय भण्डार को संवर्धित करता है और सभी जलस्रोतों के समेकित प्रयोग से मनुष्यों, पशुओं, खेतों के पानी की जरूरत को पूरा करने के लिये सदा प्रस्तुत रहता है। वर्षा की बूँदें जहाँ गिरे वहाँ रोक लेने’ के सिद्धान्त पर बने तालाब क्षेत्र विशेष में हुई वर्षा के पानी को क्षमता भर रोकें और अतिरिक्त पानी ढाल के अनुरूप बहते हुए अगले तालाब में जाए।

इससे बरसात के दौरान सतह पर प्रवाह के लिये उपलब्ध पानी की मात्रा कम होगी। तालाबों में एकत्र यह पानी भूगर्भीय जलभण्डार का पुनर्भरण करेगा। तालाबों और उनके बीच जल प्रवाह के सम्पर्क मार्ग के पानी का उपयोग उन कामों के लिये भी किया जा सकेगा जिसके लिये आज भूजल पर निर्भरता हैै। उस पानी की गुणवत्ता बेहतर होगी क्योंकि सूर्य और हवा के सम्पर्क के कारण उसमें अधिक ऑक्सीजन घुला होगा।

जलपुरुष राजेन्द्र सिंह कहते हैं कि किसी क्षेत्र विशेष में हुई वर्षा की आधी मात्रा को अगर उसी क्षेत्र में रोक लिया जाये तो बाढ़ और सूखा की समस्या नहीं होगी। प्राकृतिक कारणों से अगर आपदा आई तो उसका मुकाबला किया जा सकेगा। एनआईटी पटना के प्राध्यापक रहे प्रो सन्तोष कुमार बताते हैं कि सतह का पानी तेजी से प्रवाहित होता है तो धरती के तल के भीतर का पानी भी प्रवाहित होता है, पर मंथर गति से और पानी की कमी वाले क्षेत्रों से होते हुए आखिरकार समुद्र में ही पहुँचता है।

तह के ऊपर प्रवाहित पानी जितना कम होगा, बरसात के दौरान जल-जमाव व जल निकासी की समस्या उतनी कम होगी। भूजल का पुनर्भरण जितना अधिक होगा, बरसात के बाद नदी में भी पानी की उपलब्धता उतनी अधिक होगी। क्योंकि सतही जल रिसकर भूजल बनता है तो भूजल रिसकर नदियों में भी जाता है और नदियों में सतही पानी कम होने पर यह भूजल भी प्रवाहित होता है। भूजल का यही रिसाव नदियों को सदानीरा रखती हैं, अन्यथा नदी बरसाती हो जाती है। ध्यान देने की बात है कि बरसात में धरती की सतह पर उपलब्ध वर्षाजल का कुछ हिस्सा रिसकर भूगर्भ जलभण्डार में शामिल हो जाता है, बाकी हिस्सा ही नदी की धारा में जाता है। समाजकर्मी रंजीव बताते हैं कि बेतरतीब ढंग से एकत्र अवांक्षित पानी के सतह पर जलकुम्भी और दूसरे खर-पतवार पनप जाते हैं।

जलकुम्भी पानी की सतह को ढँककर उसे सूर्य की रोशनी से वंचित कर देते हैं। इससे पानी सड़ने लगता है। पर उसका रिस रिसकर भूगर्भीय जलभण्डार में जाना रुक नहीं जाता। इसलिये दूषित जल से भूजल भण्डार का पुनर्भरण रोकने का इन्तजाम करने की भी जरूरत है।

वर्षा की बौछारों में धरती की सतह का खुरचना और मिट्टी के उन कणों का सतही प्रवाह में शामिल होना स्वाभाविक है। यह पानी जहाँ रुकता है, वहाँ मिट्टी जमती है। पानी फिर आगे बढ़ता है तो अपने तल और किनारों में नई मिट्टी का कटाव होता है। नदियों के मिट्टी या गाद आने की प्रक्रिया यही होती है।

यह पानी अगर तालाबनुमा छोटी-छोटी संरचनाओं में एकत्र हो तो उसके साथ गाद के रूप में आई मिट्टी और महीन बालू से निपटना आसान होगा। यह कार्य गाँव के स्तर पर स्थानीय लोगों द्वारा किया जा सकेगा। यह कोरी कल्पना नहीं है, उत्तर बिहार में इस तरह के पर्व-त्योहार प्रचलित रहे हैं जिसमें लोग तलाबों के कीचड़-पानी निकालते और उससे होली खेलते थे।

इतना तय है कि सतह के ऊपर प्रवाहित पानी जितना कम होगा, बरसात के दौरान जल-जमाव व जल निकासी की समस्या उतनी कम होगी। भूजल का पुनर्भरण जितना अधिक होगा, बरसात के बाद नदी में भी पानी की उपलब्धता उतनी अधिक होगी। क्योंकि सतही जल रिसकर भूजल बनता है तो भूजल रिसकर नदियों में भी जाता है और नदियों में सतही पानी कम होने पर यह भूजल भी प्रवाहित होता है।

भूजल का यही रिसाव नदियों को सदानीरा रखती हैं, अन्यथा नदी बरसाती हो जाती है। तालाबों में बरसात के दौरान आये कीचड़-मिट्टी को निकालने का प्रचलन रहा है।

बिहार में सतही जल के प्रबन्धन की प्रणाली पर ध्यान नहीं दिये जाने का कारण भूजल का आँकड़ा भी है। यहाँ प्रतिवर्ष 27 लाख हेक्टेयर मीटर भूजल उपलब्ध होता है। ध्यान रहे कि गंगा नदी जिस इलाके का बरसाती पानी लेकर बिहार को बीचोंबीच से विभाजित करती हुई समुद्र में जाती है, उस इलाके के भूजल भी बिहार की धरती के गर्भ से होकर समुद्र की ओर जाता है।

जबकि वर्तमान में केवल 8 लाख हेक्टेयर मीटर भूजल का ही उपयोग होता है। इसलिये फटाफट नतीजे निकालने के अभ्यस्त योजनाकारों को निकट भविष्य में भूजल भण्डार के समाप्त होने की आशंका नजर नहीं आती। पर भूजल में आयरन, फ्लोराइड या आर्सेनिक निकलने का कोई जवाब उनके पास नहीं होता।

पाइप लाइनों के पेयजल आपूर्ति करने की फटाफट घोषणा कर दी जाती है, उस रासायनिक तत्व की अधिकता से मनुष्यों, पशुओं और फसल में जो बीमारियाँ फैलती हैं, उनके उपचार के उपाय खोजे जाने लगते हैं। इन फौरी इन्तजामों के बजाय भूजल के दोहन को घटाने वाले उपाय नहीं किये जाते, धरती की जलधारण क्षमता बनाए रखने और बढ़ाने के इन्तजाम नहीं किये जाते।

प्रसंगवश, इसी महीने आई एक शोध रपट प्रकाशित हुई है जिसके अनुसार, सब्जी की सिंचाई के लिये वर्षाजल का संग्रह करना सर्वाधिक फायदेमन्द होगा। इससे सब्जियों के पौष्टिक गुण बढ़ेंगे। द हिन्दू अखबार में छपी खबर के अनुसार, शोध सहायक डॉन स्टॉट ने कहा कि हमने छोटे तालाबों में वर्षाजल संग्रह करने की प्रणालियों का अध्ययन किया और इसका आश्चर्यजनक प्रभाव देखा।

छतों पर हुई वर्षाजल को छोटी टंकियों में जमाकर घरेलू कामों के लिये भूजल पर निर्भरता को कम किया जा सकता है। ऐसे छोटे और सरल काम आज भी भारत में चमत्कार कर सकते हैं। वहाँ वर्षाजल संग्रह कोई नई अवधारणा नहीं है। पर वर्तमान भारत में इसका काफी कम उपयोग हो रहा है।

हालत ऐसी बन गई है कि भारत के सभी निवासियों को पेयजल उपलब्ध कराना गम्भीर समस्या है। डॉन स्टॉट उटा युनिवर्सिटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग में कार्यरत हैं। यह शोधपत्र अर्बन वाटर जर्नल में प्रकाशित हुआ है। जिसे नासा और जापान के वैज्ञानिकों ने संयुक्त मिशन के रूप में किया है।

उल्लेखनीय है कि ग्लोबल वार्मिंग का मुकाबला करने के उपायों पर दुनिया भर में विभिन्न प्रकार के शोध चल रहे हैं। ऐसे शोधकर्ताओं को सबसे अधिक चिन्ता वर्षा की मात्रा घटने की वजह से है। इसलिये उपरोक्त शोध में पिछले बीस वर्षों में हर महीने के वर्षापात के आँकड़ों के आधार पर गणना की गई है। जिससे साफ हुआ है कि विभिन्न सब्जियों की खेती के लिये सही समय पर आवश्यक मात्रा में पानी की उपलब्धता वर्षाजल के निरन्तर संग्रह से सुनिश्चित की जा सकती है।

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