खनिज विकास और पर्यावरण (Mining and Environment)

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योजना, अगस्त 1997

खनन के कारण पर्यावरण को होने वाला नुकसान गम्भीर चिन्ता का विषय है। लेखक का कहना है कि इस कार्य से जुड़ी पर्यावरण प्रबंध योजना में इस बात की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए कि खनन के कारण पर्यावरण का कम-से-कम नुकसान हो, खान क्षेत्र को फिर से पुरानी स्थिति में लाने के उपाय किए जाएँ और निर्धारित मानकों के अनुसार वहाँ पेड़ लगाए जाएँ।

भारत 64 खनिजों का उत्पादन करता है जिनमें 4 ईंधन खनिज, 11 धात्विक खनिज और 49 गैर धात्विक खनिज शामिल हैं। 1993-94 में अस्थाई अनुमानों के आधार पर 3,794 खानों में कार्य हो रहा था। इनमें पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के कुएँ, गौण खनिजों की खानें और आणविक खनिज शामिल नहीं हैं। कोयले और लिग्नाइट की 562 खानें धात्विक खनिजों की थीं और शेष गैर-धात्विक खनिज थे। 1993-94 में देश में निकाले गए खनिजों का कुल मूल्य 26386.5 करोड़ रुपये था। 1993-94 में उत्पादित खनिजों के मूल्य का प्रतिशत इस प्रकार था- ईंधन 84.7 प्रतिशत, धात्विक खनिज 7 प्रतिशत, गैर-धात्विक खनिज 3.6 प्रतिशत और गौण खनिज 4.6 प्रतिशत। धात्विक वर्ग के खनिजों का लगभग पूरा मूल्य लौह अयस्क, क्रोमाइट, ताम्बा अयस्क, मैंगनीज अयस्क, बाक्साइट आदि से प्राप्त होता है। गैर-धात्विक खनिजों के मूल्य का 89 प्रतिशत चूना पत्थर, एपेटाइट, डोलोमाइट, काओलिन, बेरीटेस आदि से प्राप्त होता है।

खनिज उद्योग देश के भीतरी और आदिवासी इलाकों में फैला है और स्थानीय जनता को रोजगार प्रदान करता है। वास्तव में खनिज उद्योग स्थानीय जनता के सामाजिक-आर्थिक विकास का साधन बन सकता है। भारतीय खनिज उद्योग की विशेषता बड़ी संख्या में छोटी-छोटी खानों का होना है। 1991 में आर्थिक नीतियों में परिवर्तन की घोषणा के पश्चात भारत सरकार द्वारा 1993 में नई खनिज नीति लागू की गई। इससे भारतीय खनिज उद्योग में देशी और विदेशी निजी पूँजी निवेश के द्वार खुल गए हैं। आशा है इससे घरेलू खनिज उद्योग को बढ़ावा मिलेगा, खनिज उत्पादन की दर बढ़ेगी और सभी तरह के खनिज और खनिज आधारित उत्पाद अन्तरराष्ट्रीय मंडियों में अपना स्थान बना सकेंगे।

इधर देश में खनिजों की आवश्यकता बहुत तेजी से बढ़ी है और हम तेजी से उस स्थिति की ओर बढ़ रह हैं जब हमारी अर्थव्यवस्था की न्यूनतम विकास दर को कायम रखने के लिए खनिजों की अधिक खपत जरूरी होगी। यह याद रखना प्रासंगिक है कि हमारे देश के 32 लाख 90 हजार वर्ग किलोमीटर कुल क्षेत्रफल में से खनन के लिए पट्टे पर दिया गया क्षेत्र 1 जनवरी, 1994 को 7126.13 वर्ग किलोमीटर था। इसके अन्तर्गत 9,213 खानों के पट्टे थे। इसमें आणविक खनिज, गौण खनिज, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की खानें आदि शामिल नहीं थी। यह क्षेत्र देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का मात्र 0.25 प्रतिशत है और अगर इसमें आणविक खनिज, गौण खनिज, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस शामिल कर लिए जाएँ तो यह कुल क्षेत्र के 0.28 प्रतिशत तक हो सकता है। यद्यपि खनन के लिए प्रयुक्त होने वाला क्षेत्र कम है फिर भी उससे पर्यावरण को होने वाला नुकसान गम्भीर चिन्ता का विषय है। खनन के कारण पर्यावरण का होने वाला नुकसान संक्षेप में इस प्रकार है:

(1) खानों में बर्मों से छेद करने तथा बारूद से उड़ाने, खानों से ढुलाई एवं सड़क से परिवहन और छीजन, कचरे के ढेरों के कारण होने वाला वायु प्रदूषण;

(2) अगर अयस्क/खनिज खानों से निकलने वाले मल में आणविक अथवा अन्य नुकसानदेह तत्व हैं तो उनसे होने वाला जल प्रदूषण;

(3) खनन के कारण उपलब्ध जल क्षेत्र में होने वाले परिवर्तन जैसे कि सतही बहाव, भूमिगत जल की उपलब्धता में परिवर्तन और जल स्तर का और नीचे चला जाना;

(4) भूमि कटाव, धूल और नमक से भूमि के स्वरूप में परिवर्तन;

(5) खानों और उसके समीपस्थ बस्तियों और वन्य क्षेत्रों में शोर और प्रदोलन की समस्या;

(6) भूमि के स्वरूप और दशा में परिवर्तन

(7) वनों के विनाश के कारण पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं को होने वाला नुकसान और

(8) अनुपचारित कचरे के ढेर के कारण क्षेत्र की सुन्दरता का नाश।

कानूनी ढाँचा


खनिज विकास और पर्यावरण के बीच समन्वय बनाए रखने के लिए अनेक कानून बनाए गए हैं जैसे कि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, वन संरक्षण अधिनियम, 1980, एम.एम.आर.डी. अधिनियम, वन्य जीवन अधिनियम 1972, जल (प्रदूषण की रोकथाम और नियन्त्रण) अधिनियम, 1974 और वायु (प्रदूषण की रोकथाम और नियन्त्रण) अधिनियम 1981। वन क्षेत्र में खनिजों की खोज और खनन के लिए वन संरक्षण अधिनियम 1980 की व्यवस्थाओं के अन्तर्गत सरकार की पूर्वानुमति आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अन्तर्गत 5 हेक्टेयर क्षेत्रफल से अधिक की सभी परियोजनाओं में खनिजों की खोज और खनन सम्बन्धी गतिविधियाँ केवल पर्यावरण और वन मंत्रालय की अनुमति से की जा सकती है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत स्थल और पर्यावरण सम्बन्धी मंजूरियाँ भी आवश्यक हैं। इसके लिए आवश्यक है कि खान मालिक खनन के सम्बन्ध में विस्तृत प्रारम्भिक सूचना, पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन और पर्यावरण प्रबंध योजना पेश करें।

सरकार ने एम.एम.आर.डी. अधिनियम के अधीन अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए खनिज संरक्षण और विकास नियम, 1988 के अन्तर्गत पर्यावरण संरक्षण की व्यापक व्यवस्थाएँ की हैं। खनिज संरक्षण और विकास नियमों के अन्तर्गत लाइसेन्सधारी/पट्टेदार के लिए यह जरूरी है कि वह खनन की ऐसी योजना तैयार कराए जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ इस विषय में भी सावधानी बरतने की व्यवस्था हो:-

(क) ऊपर की मिट्टी, अधिभारित कचरे और निचली श्रेणी की सामग्री को हटाना और उसका भंडारण;

(ख) भूमि को पुनः सुधारना और उपयोगी बनाना;

(ग) प्रदोलन और पत्थर के टुकड़े उड़ने के खिलाफ सावधानी;

(घ) वायु प्रदूषण के विरुद्ध सावधानी;

(ङ) खान के आसपास के क्षेत्र में जल-प्रदूषकों के सम्बन्ध में सावधानी;

(च) खान से निकलने वाले विषैले द्रव/अयस्क के सम्बन्ध में सावधानी;

(छ) शोर के विरुद्ध सावधानी और

(ज) पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं का पुनर्स्थापन।

1993 की राष्ट्रीय खनिज नीति के अनुसार पारिस्थितिकीय दृष्टि से कमजोर और जैव सम्पदा सम्पन्न क्षेत्रों में गैर-ईंधन और गैर-आणविक खनिजों सम्बन्धी खनन कार्यों पर प्रतिबंध है और वन क्षेत्रों में टुकड़ों में खनन की भी अधिकांशतः अनुमति नहीं दी जाती। इस कार्य की अनुमति तभी दी जा सकती है जब ऐसे क्षेत्र को फिर से सुधारने का विस्तृत समयबद्ध कार्यक्रम आवेदन के साथ संलग्न किया जाए। इसमें आगे कहा गया है कि किसी भी पार्टी को, चाहे वह निजी हो या सार्वजनिक, तब तक खनन का पट्टा नहीं दिया जाएगा जब तक कि वह खनन की योजना के साथ कानूनी अधिकारियों द्वारा मंजूर पर्यावरण प्रबंध योजना पेश नहीं करती। पर्यावरण प्रबंध योजना में पर्यावरणीय क्षति में कमी, खनन क्षेत्र के पुनर्स्थापन, और वृक्षारोपण सम्बन्धी पर्याप्त व्यवस्था होनी जरूरी है। जहाँ तक सम्भव हो खनिज निकालने के साथ ही साथ भूमि सुधारने और वृक्षारोपण का काम भी किया जाना चाहिए। पुराने खनन-क्षेत्रों को वन क्षेत्र में विकसित करने और उसे पुनरुपयोगी बनाने के भी प्रयास किए जाने चाहिए।

इधर लोगों का ध्यान खनन से होने वाली पर्यावरणीय क्षति की ओर गया है। अधिकांश छोटी खानें खुले मुँह वाली होती हैं। अतः खनिज निकालने के परिणामस्वरूप वनों के विनाश के साथ-साथ सम्बन्धित भूमि की स्थिति में भी गिरावट आती है। बारूद से चट्टानों को उड़ाने, खनिजों के परिवहन के परिणामस्वरूप और उन्हें कूटने-पीसने के कारण गम्भीर वायु प्रदूषण होता है। कुछ किस्म के खनिजों की बिना कूटे-पीसे बिक्री नहीं की जा सकती। खनिजों का कचरा भी वायु प्रदूषण करता है। वर्षा ऋतु के दौरान यह कचरा पानी के साथ बह कर धरती को प्रदूषित करता है। खनन के दौरान एकत्र कचरा आस-पास की भूमि को नुकसान पहुँचाता है और सीपस्थ खेती योग्य भूमि और जल स्रोतों को प्रदूषित करता है।

पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम के अन्तर्गत जनवरी, 1994 में जारी अधिसूचना (यथा संशोधित मई, 1994) के अनुसार प्रमुख खनिजों की उन सभी खानों के लिए जिनके खनन पट्टे का क्षेत्रफल 5 हेक्टेयर से अधिक है अथवा प्रत्येक उस मामले में जहाँ खनन पट्टे का क्षेत्रफल 5 हेक्टेयर से अधिक है जिसे और बढ़ाने का प्रस्ताव है, पर्यावरण और वन मंत्रालय से मंजूरी प्राप्त करना आवश्यक है। इस उद्देश्य के लिए प्रार्थी को एक विस्तृत प्रार्थना-पत्र देना होगा जिसके साथ उसे खनन व्यवहार्यता रिपोर्ट, पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन की प्रारम्भिक सूचना, विश्लेषण आँकड़े, पर्यावरण प्रबंध योजना और एक प्रश्नावली का जवाब संलग्न करना होगा।

जहाँ तक खानों में वृक्षारोपण का सम्बन्ध है, छोटे पट्टे वाले क्षेत्रों में जब तक खान का काफी हिस्सा खाली न छोड़ा जाए, बड़ी संख्या में पेड़ नहीं लगाए जा सकते जैसा कि प्रतिवर्ष मांग की जाती है। छोटी पट्टे वाली खानों में पेड़ लगाने का कार्य खनन कार्य पूरा होने के बाद बाहरी किनारों पर शुरू किया जाना चाहिए। बाद में गड्ढों को भर कर उनमें पेड़ लगाए जा सकते हैं।

प्रभाव


जैसा कि पहले कहा जा चुका है भारत में अनेक बड़ी और छोटी यांत्रिक और गैर-यांत्रिक (मनुष्य चालित) खानें हैं। शुरू में खनन कार्य छोटे पैमाने पर शुरू किया गया। बाद में लौह अयस्क, चूना पत्थर, बाक्साइट आदि की बड़ी खुली खानें (ओपनकास्ट) विकसित की गईं। अगले अनुच्छेद में उल्लिखित खनिजों की खानों के विकास प्रयासों का प्रभाव, पर्यावरण प्रबंध पहलू, प्राप्त नतीजे और साथ ही भारत से निर्यात किए जाने वाले प्रमुख खनिज संगमरमर का विवेचन किया गया है।

लौह अयस्क


देश में लौह अयस्क का उत्पादन करने वाली लगभग 257 खानें हैं। लौह अयस्क के उत्पादक प्रमुख राज्य हैं: मध्य प्रदेश 26 प्रतिशत, गोवा 22 प्रतिशत, बिहार 19 प्रतिशत और कर्नाटक 18.8 प्रतिशत। अनुमान है कि 1996-97 में देश में 6 करोड़ 91 लाख टन लौह अयस्क (सांद्रण सहित) का उत्पादन हुआ। इसमें से 6 करोड़ 38 लाख टन खान क्षेत्रों से रवाना किया गया, जिसमें से 4 करोड़ 4 लाख टन की खपत देश में हुई और शेष का निर्यात किया गया।

देश में नए कारखानों की स्थापना के कारण लौह अयस्क की आन्तरिक खपत बढ़ती जा रही है। ब्रूसेल्स आधारित अन्तरराष्ट्रीय लौह इस्पात संस्थान द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार सन 2005 में देश में 8 करोड़ 60 लाख टन लौह अयस्क का उत्पादन होने लगेगा। 1995 में 2 करोड़ 70 लाख टन लौह अयस्क विदेशों में निर्यात किया गया। अनुमान है कि सन 2000 तक यह 3 करोड़ 70 लाख टन हो जाएगा। वर्तमान उत्पादन स्तर पर भारतीय लौह अयस्क उद्योग प्रति वर्ष 3 करोड़ टन लौह अयस्क का निर्यात कर सकता है। सन 2000 में भारत से किया जाने वाला प्रमुख निर्यात इस प्रकार होगाः कुंद्रेमुख 1 करोड़ टन प्रतिवर्ष, रा.ख.वि.नि. (बैलाडीला + दोन्निमलइ) 74 लाख टन प्रतिवर्ष, गोअन शिपर्स 1 करोड़ 80 लाख टन जबकि बिहार उड़ीसा और बैलारी हासपेट आदि अतिरिक्त 25 लाख टन का उत्पादन करेंगे। पिछले वर्ष देश से निर्यात किए जाने वाले कुल लौह अयस्क का 52 प्रतिशत गोवा से किया गया। भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण की रिपोर्टों के अनुसार गोवा से बड़ी मात्रा में निकाले जा रहे लौह अयस्क को देखते हुए गोवा के लौह अयस्क भंडार सन 2020 तक समाप्त हो जाएँगे।

हाल ही में जब इस बात का पता लगा कि गोवा के पूर्व ऐतिहासिक स्थल प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं तो लोगों का ध्यान गोवा की ओर गया। यद्यपि खनन राज्य की अर्थव्यवस्था को सबसे अधिक अंशदान करता है, इससे उत्पन्न पारिस्थितिकी दुरावस्था अत्यधिक चिन्ता का विषय है क्योंकि पूरे प्रयत्न के बावजूद लौह अयस्क कचरे को नदियों में जाने, मछलियों के जीवन को प्रभावित करने और पेयजल का प्रदूषित करने से नहीं रोका जा सका है। जमीन से निकाले गए हर एक टन लौह अयस्क के साथ ढाई टन कचरा निकलता है। कई खनन क्षेत्रों को लौह अयस्क निकालने के बाद ऐसे ही छोड़ दिया गया है। वहाँ पर बड़े-बड़े कटोरे के आकार के गड्ढे हो गए हैं। खनन कम्पनियाँ एहतियात के उपाय तो करती हैं लेकिन ये उपाय पर्याप्त नहीं होते।

कचरे या अस्वीकृत ढेरों की समीपस्थ कृषि भूमि पर उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इस सन्दर्भ में राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (रा.ख.वि.नि) अपनी बैलाडीला लौह अयस्क खानों में पर्यावरण सुरक्षा के जो उपाय किए हैं, वे उल्लेखनीय हैं। रा.ख.वि.नि. बैलाडीला (म.प्र.) और दोन्निमलई (कर्नाटक) में सबसे बड़ी यांत्रिक लौह अयस्क की खानें चलाता है। लौह अयस्क परियोजना के आस-पास के क्षेत्र में वायु गुणता के मानक बनाए रखने के साथ सभी खानों के स्क्रीनिंग प्लांट्स से निकले ठोस कचरे या अन्य पदार्थों को पछोड़न बाँध बनाकर नियन्त्रित किया जाता है। इसके अलावा खानों से निकलने वाली अन्य छीजन और बहाव के प्रवाह को रोकने के लिए रुकावट बाँध बनाकर उसे नियंत्रित किया जाता है। इसके अलावा बीच में कई बाँध बनाए गए हैं जो प्रवाह की गति को और बरीक पदार्थों को आगे जाने से रोकते हैं। पछोड़न बाँध के ऊपर इस तरह की व्यवस्था बनाई जाती है कि ठोस पदार्थ निश्चल होकर वहीं ठहर जाएँ। पछोड़न बाँध से निकलने वाले पानी पर, जो प्रदूषण नियन्त्रण ढाँचे का काम करता है, लगातार नजर रखी जाती है ताकि वह जी एस आर 422 ई में निर्धारित मानकों के अनुसार हो। उपयुक्त प्रदूषण नियन्त्रण उपायों के अभाव में बैलाडीला खानों से निकलने वाली छीजन ने भयंकर प्रदूषण फैलाया और इस क्षेत्र की शंखिनी नदी सहित सभी नदियों के पानी को मनुष्यों के पीने के अयोग्य बना दिया। पछोड़न बाँध प्रदूषण नियन्त्रण सुविधा का काम करता है जहाँ लौह अयस्क अवपंक (द्रव) भौतिक प्रक्रिया से धीरे-धीरे ठहर जाता है और साफ पानी आगे को बह निकलता है। क्योंकि बाँध नया है अभी ठोस पदार्थों को फिर से इस्तेमाल नहीं किया जाता है। छीजन या कचरे का ढेर जब उस क्षेत्र की पूर्ण क्षमता के बराबर हो जाएगा, उसे प्रयोग में लाना शुरू किया जाएगा। इस क्षेत्र में सुनियोजित वनीकरण किया जा रहा है। लगभग 16 लाख पौधे लगाए जा चुके हैं। इनमें से 90 प्रतिशत बच गए हैं। बैलाडीला का डिपाजिट संख्या 5 हरे-भरे पेड़ों से घिरा है। दोन्निमलइ लौह अयस्क परियोजना को भारतीय खनन उद्योग परिसंघ द्वारा शुरू किए पुरस्कार के अन्तर्गत भारत की सर्वोत्तम खुली (ओपनकास्ट) यांत्रिक खान घोषित किया गया है।

लौह अयस्क और चूना पत्थर की खानों में प्रदूषण का बड़ा कारण बड़ी मात्रा में लौह अयस्क, चूना पत्थर आदि का खुले ट्रंकों/डम्परों से इधर-उधर ले जाया जाना है। इसमें बड़ी मात्रा में डीजल, फ्यूअल आयल आदि की खपत होती है। डीजल/फ्यूअल आयल आदि के जलने और खनिजों को इधर-उधर ले जान से खानों में धूल, धुएँ और शोर प्रदूषण की समस्या उग्र हो जाती है। विश्व भर में इस बात के प्रयास किए जा रहे हैं कि खानों में विभिन्न संचालन अवस्थाओं में खनिज या अयस्क इधर-उधर ले जाने के जमीनी परिवहन के वैकल्पिक साधन विकसित किए जाएँ। इसलिए अमेरिका, कनाडा आदि में ट्रान्सपोर्टेशन सिस्टम यानी ‘बेल्ट कनवेयर’ और ‘स्लरी ट्रांसपोर्ट’ का अधिकाधिक प्रयोग किया जा रहा है। ये व्यवस्थाएँ विश्वसनीय हैं और अधिक उपलब्धता प्रदान करती हैं। गोवा लौह अयस्क क्षेत्र में 35 लाख टन क्षमता का एक खान ‘बेल्ट कनवेयर’ सफलतापूर्वक कार्य कर रहा है। यह कनवेयर खुली खान के तले से आर ओ एम के परिवहन के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह लगभग 300 मीटर से खनिज ऊपर उठाता है। लौह अयस्क की बड़ी खानों में ‘स्लरी ट्रांसपोर्ट’ काम में लाई जाती है। खानों में उपर्युक्त तकनीकों का प्रयोग अयस्क के लिए ट्रकों और काम के बोझ से दबी परिवहन व्यवस्था के विकल्प के रूप में किया जाता है।

चूना पत्थर


भारत में चूना पत्थर के पर्याप्त भंडार हैं। अनुमान है कि देश में 76 अरब 44 करोड़ टन चूना पत्थर के भंडार हैं। आशा है कि 1996-97 के दौरान चूना पत्थर का उत्पादन 9 करोड़ 80 लाख टन तक पहुँच जाएगा। सीमेंट उद्योग में 88.5 प्रतिशत चूना पत्थर इस्तेमाल किया जाता है। इसके बाद लौह और इस्पात क्षेत्र 6 प्रतिशत, रसायन उद्योग 3 प्रतिशत और इसी तरह अन्य उद्योग चूना पत्थर का इस्तेमाल करते हैं। चूना पत्थर का खनन पूरी तरह से ‘ओपन पिट मेथड’ या खुली खानों से छोटे, मझोले और बड़े पैमाने पर किया जाता है। कोयला क्षेत्र की खानों को छोड़कर कुल खुली खानों (ओपन पिट माइन्स) की 70 प्रतिशत चूना पत्थर और लौह अयस्क की खानें हैं। भारत में खुली खानों में जो टेक्नोलॉजी इस्तेमाल की जाती है वह आमतौर पर वही है जो इस आकार के निक्षेपों और परिचालनों में विदेशों में काम लाई में जाती है।

चूना पत्थर की खुदाई के दौरान पर्यावरण को आमतौर पर जो नुकसान होता है वह इस प्रकार है: (क) भूमि की दुर्यव्यवस्था, (ख) धरती के ऊपर की मिट्टी का हटाया जाना, (ग) ठोस कचरे का निपटान, (घ) जल और जल-मल निकासी की व्यवस्था, (ङ) वायु की गुणता, (च) शोर प्रदूषण, (छ) भूमि दोलन, (ज) सामाजिक आर्थिक-परिवर्तन आदि।

चूना पत्थर खानों में पर्यावरण ह्रास को नियंत्रित करने के लिए जो उपाय किए जा रहे हैं वह इस प्रकार हैं:

खनन कार्य के लिए प्रयुक्त भूमि को सुधारने का काम पेड़-पौधे लगाकर और धरती को ऊँचा-नीचा करके अथवा खनन स्थल को सुधार कर, मिट्टी की गुणवत्ता सुधार कर और उस स्थान पर वनस्पति लगाकर किया जाता है। यद्यपि खनन के परिणामस्वरूप खराब हुई जमीन और सुधारी गई जमीन के बीच काफी अन्तर रहता है, इस बात पर जोर दिया जाता है कि इस इलाके को कचरे से पाट दिया जाए जिससे इस क्षेत्र की भूमि को फिर सुधारा जा सके। जहाँ तक वायु प्रदूषण का सम्बन्ध है भारत में धूल को दबाने के लिए चाहे वह सूराख करने, बारूद से उड़ाने या सड़क पर खनिज ढोने से पैदा हुई हो, आमतौर पर पानी के फुहारे का इस्तेमाल किया जाता है। बड़े व्यास की ड्रिलिंग वाली यांत्रिक खुली खानों में धूल निकालने के यंत्र (डस्ट एक्सट्रेक्टर) काम में लाए जाते हैं। जल प्रदूषण की रोकथाम नालियों का जाल बिछाकर और ‘चेक डैम’ आदि बनाकर की जाती है। जल प्रदूषण की रोकथाम के यही आम तरीके हैं। शोर प्रदूषण को इन तरीकों का इस्तेमाल करके रोका जाता है: (1) स्रोत पर आवाज कम करके, (2) शोर के मार्ग में बाँधा खड़ी करके, (3) भूमि का दोलन रोक कर। यह देखा गया है कि कुछ चूना पत्थर की खानें चूना पत्थर निकालने के बाद वैसे ही छोड़ दी जाती हैं और सुधार के उपाय नहीं किए जाने के कारण उनमें गड्ढे हो जाते हैं और वे धँस जाती हैं। इस तरह की कुरूप, भद्दी और वनस्पतिविहीन निर्जन खानें आम तौर पर दिखाई देती हैं।

बाक्साइट


विश्व का 70 प्रतिशत बाक्साइट भारत सहित विकासशील देशों में पाया जाता है। बाक्साइट भंडारों (7.5 प्रतिशत) की दृष्टि से भारत का विश्व में छठा स्थान (3 अरब 3 करोड़ 70 लाख टन) है। विश्व में 12 करोड़ 50 लाख टन बाक्साइट का उत्पादन किया जाता है। इसमें भारत का उत्पादन 50 लाख टन प्रतिवर्ष है। भारत में बाक्साइट के पर्याप्त भंडार हैं। इन्हें शीघ्र विकसित करना आवश्यक है। निर्यातोन्मुख अल्युमिनियम संयंत्रों के साथ दो बाक्साइट खानें विकसित की जा रही हैं। निर्यातोन्मुख अल्युमिनियम संयंत्रों के लिए बाक्साइट खनन बढ़ाने की काफी गुंजाइश है। संसाधन स्थिति को देखते हुए भारत कम से कम अगले 50 वर्षों तक सुखद स्थिति में है। देश का 90 प्रतिशत धातुकर्मीय ग्रेड का बाक्साइट भंडार पूर्वी घाट क्षेत्र में है। 1995-96 और 1996-97 में बाक्साइट का उत्पादन लगभग 51 लाख टन था। देश में बाक्साइट की 224 खानें हैं। इनमें से अधिकांश छोटी खुली (ओपन कास्ट) और गैर-यांत्रिक हैं। देश में 15 बड़ी खानें हैं। इनसे देश के कुल उत्पादन का 72 प्रतिशत प्राप्त होता है। इनमें से एक खान पंचपटमाली है जहाँ देश के कुल उत्पादन का 45 प्रतिशत होता है। उड़ीसा देश में बाक्साइट का प्रमुख उत्पादक है। इसके बाद हैं: बिहार, गुजरात और मध्य प्रदेश आदि।

भारत में बाक्साइट केवल खुली खानों (ओपनकास्ट) से निकाला जाता है। खनन मशीनरी और संसाधित औद्योगिक सामग्री यानी चट्टानों को उड़ाने के लिए विस्फोटकों की आवश्यकता मुख्य रूप से खुली खानों की विधि से लेटराइटिक बाक्साइट प्राप्त करने के लिए पड़ती है। किसी अन्य सतही खनन की तरह बाक्साइट निकालते समय धरती की ऊपरी सतह को निश्चित नुकसान होता है और पठार के ऊपरी हिस्से में लाली युक्त भूरे टुकड़े दिखाई देने लगते हैं। बाक्साइट खनन के साथ जुड़ी प्रमुख पर्यावरण समस्याएँ हैं- वनों का विनाश, मिट्टी की ऊपरी सतह का नाश, पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं की उपस्थिति में परिवर्तन, सतही और भूमिगत जल का प्रदूषण, वायु, धूल और शोर प्रदूषण तथा कचरा। तथापि, कारण पर्यावरण प्रबंधन योजना द्वारा पर्यावरण सम्बन्धी इन परिवर्तनों को बहुत कम किया जा सकता है और बाक्साइट खनन स्थल को कुछ वर्षों के खनन के बाद हरे-भरे वन क्षेत्र में बदला जा सकता है। इस प्रकार पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में बाक्साइट खनन असुविधाजनक और खर्चीला हो सकता है। पूर्वी घाट के कुछ बड़े और आर्थिक दृष्टि से उपयोगी भंडार पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील घने वनों में स्थित है जहाँ कुछ मामलों में खनन कार्य निषिद्ध होगा या फिर उसके लिए विशेष सावधानी बरतनी होगी। इन सबसे लागत बढ़ जाती है और क्षेत्र की संवेदनशीलता के कारण होने वाला आवश्यक खर्च भी उसमें जुड़ जाता है। पूर्वी घाट के बाक्साइट भंडार मुख्य रूप से आदिवासी क्षेत्रों में हैं और कुछ मामलों में यह भू-भाग अत्यधिक विच्छेदित और उबड़-खाबड़ है। दूर-दराज के इलाकों में नई खानों की स्थापना करते समय बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था पर काफी पूँजी लगानी पड़ती है तथापि बड़ी खानें शुरू करके उत्पादन लागत में कमी की जा सकती है।

बाक्साइट के खनन से पर्यावरण को कितना नुकसान होता है इसे अमर कंकट क्षेत्र में देखा जा सकता है। देश के दोनों प्रमुख अल्युमिनियम उत्पादकों अर्थात हिन्दालको और बालकों ने अपनी आवश्यकता का अल्युमिनियम यहीं से निकाला। इससे यह क्षेत्र विकृत हो गया, यहाँ का जल प्रदूषित हो गया, वन नष्ट हो गए, जीव-जन्तुओं का प्राकृतिक आवास समाप्त हो गया और पेड़-पौधों एवं जीव-जन्तुओं का अस्तित्व संकट में पड़ गया। परियोजना अधिकारियों ने राज्य और केन्द्रीय प्रदूषणरोधी एजेंसियों की सीधी देख-रेख में नुकसान पूरा करने की कार्रवाई शुरू की है। खान क्षेत्र को सुधारने का काम भी हाथ में लिया गया है। इस क्षेत्र को पारिस्थितिकी की दृष्टि से संवेदनशील घोषित कर दिया गया है।

संगमरमर


देश में संगमरमर का उत्पादन मुख्य रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश और गुजरात में होता है। आंध्र प्रदेश, बिहार, हरियाणा और मध्य प्रदेश में भी थोड़ी मात्रा में संगमरमर पाया जाता है। देश में संगमरमर के कुल उत्पादन का 88 प्रतिशत राजस्थान से प्राप्त होता है। वर्तमान संकेतों के अनुसार नौवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान संगमरमर की मांग और सप्लाई के बीच कोई असंतुलन होने की सम्भावना नहीं है। भारत में 16 अप्रैल, 1990 तक संगमरमर के कुल 10 करोड़ 9 लाख टन के भंडार थे। देश में बहुत अच्छी किस्म, बनावट और तरह-तरह के रंग के संगमरमर के विशाल भंडार हैं। 1994-95 में भारत से 73.253 टन संगमरमर का निर्यात किया गया। राजस्थान देश का प्रमुख संगमरमर उत्पादक है।

संगमरमर के प्रयोग से पर्यावरण प्रदूषण की समस्या पैदा हो गई है। संगमरमर संसाधित करने वाले कारखानों और उसकी कटाई और पालिश करने वाले कारखानों के सामने संगमरमर के चूरे के भंडारों की समस्या पैदा हो गई है। यह पाउडर किसी काम में इस्तेमाल नहीं होता। संगमरमर की खानों के समीप रहने वाले लोगों के शरीर में सांस के जरिए यह पाउडर पहुँचता है। एक अन्य समस्या पानी जमा होने की है। संगमरमर के चूरे का उपयोग खान मालिकों के लिए बड़ी समस्या बन गया है। यह पर्यावरण प्रदूषण भी करता है। संगमरमर के चूरे से इमारतों के निर्माण की ईंटें और टाइल्स बनाने का काम हाथ में लिया गया। संगमरमर के चूरे को काली मिट्टी और लाल मिट्टी में मिलाकर ईंटें बनाने का प्रयास किया गया। यह देखा गया कि इस तरह बनी ईंटें ठंडी होने के बाद एकदम बिखर जाती हैं। सीमेंट और संगमरमर के चूने को मिलाकर जो ईंटें बनाई गईं, वे भी मजबूत नहीं थीं। समुचित अनुपात में संगमरमर का चूना, शीशा, पत्थर आदि के टुकड़े और सीमेंट मिलाकर बनाए गए टाइल्स अच्छे थे। स्पष्ट है कि संगमरमर के चूरे का मिट्टी या सीमेंट में मिलाकर उसका उपयोग नहीं किया जा सकता। इस सम्बन्ध में अधिक अध्ययन की जरूरत है।

सुझाव


- अगर कुल मिलाकर देखा जाए तो छोटी खानें बड़ी अन्य खानों की तुलना में पर्यावरण को कम नुकसान नहीं पहुँचाती। यह जरूरी है कि बुद्धिमत्तापूर्ण पर्यावरण प्रबंध के लिए प्रमुख खनन केन्द्रों का ध्यानपूर्वक विस्तृत अध्ययन किया जाए।

- पर्यावरण प्रबंध योजना तैयार करने में मुख्य बाधा छोटी खानों के सीमित संसाधनों के कारण विश्वसनीय प्रारम्भि आँकड़े उपलब्ध न होने की है। इसलिए इस तरह के आँकड़े खानों के एक समूह के लिए तैयार किए जा सकते हैं। और इन छोटी खानों में नियन्त्रण उपायों की कारगरता की जाँच करने के लिए पर्यावरण प्रबंध योजना तैयार की जा सकती है। यह पता चला है कि पर्यावरण और वन मंत्रालय ने इस सम्बन्ध में कुछ उपाय किए हैं और गुड़गाँव (हरियाणा) और अलवर (राजस्थान) में पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन और पर्यावरण प्रबंध योजना की तैयारी को मंजूरी प्रदान की है।

- बेखबर और परम्पराबद्ध श्रमिकों, निरीक्षकों और लापरवाह कर्मचारियों को इस बात से परिचित कराने की जरूरत है कि वायु, पानी, शोर आदि के प्रदूषण से लोगों के स्वास्थ्य और सामान्य जीवन का नुकसान पहुँच सकता है और इसे कम किया जाना चाहिए। खान सुरक्षा के महानिदेशक द्वारा आयोजित ‘खान सुरक्षा सप्ताह’ और आईबीएम द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित ‘खान, पर्यावरण और खनिज संरक्षण सप्ताह’ के दौरान लोगों को इन समस्याओं से परिचित कराया जाता है। देश के विभिन्न भागों में इस तरह के और अध्ययन किए जाने चाहिए।

- भारतीय खनन उद्योग परिसंघ द्वारा सर्वोत्तम काम करने वाली खान के लिए वार्षिक पर्यावरण पुरस्कार शुरू किए जाने से सभी खानों में नियंत्रण उपायों को बढ़ावा मिला है। इस तरह की और कार्यशालाएँ आईबीएम भारतीय खनन उद्योग, एन.आई.एस.एम. और अन्य गैर-सरकारी संगठनों द्वारा केन्द्र और राज्य सरकारों के सम्बन्धित अधिकारियों की सहायता तथा समर्थन से देश के विभिन्न भागों में शुरू की जानी चाहिए।

- जहाँ कहीं सम्भव हो सतही खनन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए क्योंकि इसमें खुदाई और चट्टानों को बारूद से उड़ाने की जरूरत नहीं होती। इससे लागत में कमी आती है और शोर प्रदूषण और धूल-प्रदूषण नहीं होता। इस मशीन में सभी प्रक्रियाएँ उखाड़ना, पीसना और सामान लादना आदि संयुक्त रूप से की जाती हैं।

- खान योजना बनाने के लिए अति आधुनिक कम्प्यूटर संचालित साफ्टवेयर के प्रयोग से न केवल खनिज भंडार, उसकी गुणवत्ता, कारगर मिश्रण और ‘पिट डिजाइन’ का विश्वसनीय अनुमान लगाया जा सकता है बल्कि पर्यावरण अनुकूल और कम खर्चीले खनन द्वारा उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।

- स्थानीय परिस्थितियों और लाभ-हानि के अन्य पहलुओं को ध्यान में रखते हुए उद्योग और प्रदूषण नियन्त्रण अधिकारियों के बीच निरन्तर बातचीत होना जरूरी है ताकि स्वेच्छा से एक कार्ययोजना विकसित की जा सके और चरणबद्ध रूप से उसे लागू किया जा सके।

- विश्व भर के खान क्षेत्रों में ‘इन पिट’ पिसाई और ‘कनवेइंग सिस्टम’ का संयोग अधिक स्वीकार्य है क्योंकि इसमें ट्रक की ढुलाई की तुलना में कम खर्च आता है। सचल पिसाई को जब लचीले ‘बेल्ट कनवेयर सिस्टम’ के साथ प्रयुक्त किया जाता है तो वह अधिक उत्पादक, अधिकतम उपयोगी और उच्च लचीलापन लिए होती है और खनन उद्योग में भविष्य में वह अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

(लेखक योजना आयोग में उप-सलाहकार हैं।)

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