परदेशी पक्षी

Submitted by Hindi on Fri, 09/18/2015 - 11:42
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योजना, अगस्त 1997

भारत में साइबेरियन पक्षीसितम्बर का महीना शुरू होते ही पक्षियों का मधुर कलरव अचानक कुछ तेज हो जाता है, पक्षियों के चहचहाने में कुछ नई ध्वनियाँ, कुछ नए स्वर सुनाई पड़ने लगते हैं। चाहा (स्नाइप), कलहंस, सारस जैसे पक्षी और टिटिहरी, चंडल (भरत पक्षी), लवा जैसे छोटे पक्षी अचानक न जाने कहाँ से प्रकट होने लगते हैं। उन्हें देखकर आम आदमी आश्चर्य में पड़ जाता है। शीत ऋतु में आने वाले इन रहस्यपूर्ण प्रवासी पक्षियों से माहौल में एक बदलाव सा आ जाता है।

युगों से मनुष्य मौसम की तरह पक्षियों का आना-जाना देखता रहा है और उस पर अटकलें लगाता रहा है। रेड इंडियन (अमेरिका के मूल प्रवासी) पक्षियों के आगमन के आधार पर वर्ष के महीनों के नाम रखते थे। कुछ लोगों का विश्वास है कि कुछ स्तनपायी जानवरों की तरह कोयल, कोकिया और बुलबुल भी सर्दी की ऋतु में सो जाती हैं और केवल बसन्त ऋतु आने पर फिर से प्रकट होती हैं। लेकिन इस विषय पर किए गए अध्ययनों से पता लगाता है कि पक्षी गर्म खून वाले होते हैं, उनका शरीर पंखों से ढका रहता है और उनमें उड़ान भरने की असीमित शक्ति होती है। अतः वे ऊँचाई वाले स्थानों के खराब और तूफानी मौसम तथा छोटे दिनों से बचने के लिए भोजन की तलाश में अन्य स्थानों पर शरण ले लेते हैं। ग्रीष्म ऋतु में वे फिर से पर्वतों पर लौट जाते हैं क्योंकि तब उन्हें वहाँ अंडे देने क लिए उपयुक्त स्थान और पर्याप्त भोजन उपलब्ध होता है।

पक्षी वैज्ञानिकों का मत है कि उपयुक्त मौसम में अन्यत्र प्रवास करने की प्रबल इच्छा और प्रेरणा पक्षियों को आन्तरिक और बाहरी दोनों कारणों से मिलती है। प्रयोगों से पता चलता है कि प्रवास का प्रमुख बाहरी कारण दिन की रोशनी में कमी आना है। आन्तरिक कारण जननेन्द्रियों की स्थिति से उत्पन्न होता है। आमतौर पर पक्षी उत्तर दिशा से दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करते हैं। कुछ पक्षी थोड़े कि.मी. दूर शरण लेते हैं जबकि ‘आर्कटिक टर्न कुररी’ वर्ष में दो बार बहुत लम्बी यात्रा करती है- एक दिशा में 17,000 कि.मी.।

प्रवासी पक्षी किस प्रकार सही दिशा में यात्रा करते हैं, यह इस क्षेत्र में किए गए प्रयोगों से पता चलता है। सूर्य धरती पर जो कोण बनाता है उससे दिन में ये पक्षी अपनी दिशा का निर्धारण करते हैं जबकि रात के समय वे तारों की स्थिति देखकर अपना मार्ग निर्धारित करते हैं। यही कारण है कि जब आकाश में लम्बे समय तक बादल छाए रहते हैं, पक्षी अक्सर अपना मार्ग भूल जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों से पक्षियों की यात्रा के मार्ग पर राडारों, विमानों, गति संकेतकों और अल्टीमीटरों की सहायता से नजर रखी जा रही है। उदाहरण के लिए बत्तख और कलहंस की औसत चाल 65 से 80 कि.मी. प्रतिघंटा पाई गई है। एक पक्षी दिन और रात में औसतन 6 से 11 घंटे उड़ान भरता है। उदाहरण के लिए डा. सलिम अली का कहना है कि एक बार में टिकरी औसतन 250 कि.मी., सारस जाती का पक्षी 200 कि.मी., वुडकाक 450 कि.मी. और टिटिहरी 880 कि.मी. की यात्रा करती है। यद्यपि यात्रा करते समय ये पक्षी आमतौर पर 400 मीटर की ऊँचाई पर उड़ान भरते हैं और कभी भी 900 मीटर से अधिक ऊँचाई पर शायद ही कभी उड़ान भरते हों तथापि हाल ही में राडार से इन पर नजर रखने से पता चला है कि कुछ चिड़ियों के झुंड 7500 मीटर से अधिक की ऊँचाई पर उड़ान भरते हैं। 1953 में अपने एवरेस्ट विजय अभियान के दौरान सर एडमंड हिलेरी ने एक पक्षी को 8500 मीटर की ऊँचाई पर अपने पीछे आते देखा था। ईस्टर्न गोल्डन प्लोवर 3200 कि.मी. लम्बे समुद्र को पार करके जाड़े की ऋतु में अलास्का और पूर्वोत्तर साइबेरिया से भारत आती है। जापानी चाहा 4800 कि.मी. लम्बे समुद्र को बिना रुके पार करके पूर्वी आस्ट्रेलिया और तस्मानिया में शरण लेती है।

इन प्रवासी पक्षियों में से साइबेरियाई क्रेन का अस्तित्व संकट में है। इसने सभी पक्षी प्रेमियों का मन मोह लिया है। यह साइबेरियाई पक्षी राजस्थान के भरतपुर में केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान में विश्राम करता है। यह साइबेरियाई पक्षी 6000 कि.मी. की लम्बी यात्रा पूरी करके आता है। भारत में आने वाली इस साइबेरियाई क्रेन की संख्या में निरन्तर गिरावट आई है। 1960 में 200 साइबेरियाई क्रेन भारत आए थे जबकि 1996-97 में केवल तीन आए। 1994-95 और 95-96 में दो वर्ष तक कोई पक्षी नहीं आया।

इनकी संख्या में कमी के कई कारण हैं। लम्बी दुर्गम यात्रा, चूजों की उच्च मृत्यु-दर, भारत आने वाले मार्ग में शिकारियों और बहेलियों द्वारा पक्षियों की हत्या और कम जन्म-दर। वन्य जन्तु विशेषज्ञों का कहना है कि इधर पिछले कुछ वर्षों के दौरान इस पक्षी पर जबर्दस्त दबाव पड़ा है जिसके कारण इसकी संख्या बेहद कम हो गई है और यह लुप्त होने को है।

साइबेरियाई क्रेन का निवास आर्कटिक वृत्त के दक्षिण में कूनोवात नदी के थाले में टुंड्रा वन क्षेत्र है। ये पक्षी कजाखिस्तान, उजबेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान होकर अपने शीत ऋतु के निवास स्थान केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान में पहुँचते हैं। इन भौगोलिक राजनीतिक क्षेत्रों को पार करते हुए उन पर गोलियाँ चलाकर उनकी हत्या कर दी जाती है, या उनको जाल में फंसाकर पकड़ा जाता है। आर्कटिक क्षेत्र से केवलादेवघना पहुँचने में उन्हें दो महीने लगते हैं। अपनी यात्रा के दौरान अफगानिस्तान में अब-ए-इस्तदा झील उनके विश्राम का पुराना स्थल है।

इन पक्षियों का पूर्वी झुण्ड चीन में प्रवास करता है, पश्चिमी झुण्ड ईरान में और मध्यवर्ती झुण्ड भारत में प्रवास करता है। इन पक्षियों का केवलादेवघना पहुँचने का समय बदलता रहता है। ये नवम्बर के शुरू से जनवरी के अन्त तक वहाँ पहुँचते रहते हैं। इस बात के प्रयास किए जा रहे हैं कि साइबेरियाई क्रेन को पालतू बनाकर उनकी संख्या बढ़ाई जाए। ‘इंडिया एक्शन प्लान 1997’ में व्यवस्था की गई है कि पाल कर बड़ी की गई चार साइबेरियाई क्रेनों को केवलादेवघना राष्ट्रीय पक्षी उद्यान में छोड़ दिया जाए और इनका उपयोग अनुसंधान प्रयोजनों के लिए किया जाए। हाल ही में अमेरिका की इन्टरनेशनल क्रेन फाउन्डेशन (आईसीएफ) से लुफ्ता विमान सेवा से साइबेरियाई क्रेन के चार चूजे भारत पहुँचाए गए। फिर उन्हें लकड़ी के बक्सों में रखकर भरतपुर भेजा गया। वहाँ उन्हें लोहे के तारों और जाल से बने बाड़े में रखा गया। उसी जगह साईबेरियाई क्रेन रहते थे।

वैज्ञानिकों को आशा थी कि नौ महीने का नर-चूजा जंगली साईबेरियाई क्रेन के जोड़े के साथ घुल-मिल जाएगा और 1995 में विकसित मादा क्रेन ‘बहरामी’ जो अब उस आयु की हो गई है जब आमतौर पर वह जोड़ा बनाती है, साईबेरिया से आए अकेले नर के साथ जुड़ जाएगी और जोड़े बनाने की समस्या स्वतः सुलझ जाएगी। 1995 में विकसित शेष दो मादा ‘अयाफात’ और ‘अनबर’ साथ-साथ ही रहेंगी क्योंकि उन्हें आईसीएफ में साथ-साथ रखा गया था। अनबर को युरेशियाई क्रेन ने पाला-पोसा था और वैज्ञानिकों की दिलचस्पी इस बात में थी कि मुक्त किए जाने के बाद साईबेरियाई क्रेनों के साथ उसकी कैसी पटती है।

यह पहला अवसर है कि वैज्ञानिक ढँग से पाले-पोसे गए पक्षी शरणस्थली में छोड़े जा रहे हैं। आईसीएफ में पशुचिकित्सक डा. जूली लेनजनबर्ग का मत है कि ‘‘इन पक्षियों के जंगली क्रेन के साथ उड़ान भरने के अवसर बहुत कम थे क्योंकि दोनों के घुलने-मिलने और उनकी उड़ान क्षमता की जाँच करने का समय बहुत कम था। अगर उन्हें पहले लाया जाता तो उड़ान भरने का अवसर अधिक होता। माँ-बाप के बिना पाले-पोसे गए क्रेन 12 फरवरी को छोड़े गए और जंगली क्रेन इसके एक सप्ताह बाद अपने निवास को रवाना हो गए।’’

तथापि केवलादेवघना की क्षेत्र निदेशक श्रुति शर्मा का मत है- ‘‘वे शिक्षा, विस्तार और अनुसंधान के सर्वोत्तम अवसर प्रदान करेंगे। चार चूजों पर रेडियो ट्रांसमीटर लगाए गए हैं। इनकी सहायता से दो किलोमीटर की दूरी तक पक्षियों का पता लगाया जा सकता है। हम इन क्रेनों की तस्वीरें गाँव के स्कूलों और पंचायत घरों में लगाएंगे ताकि अगर ये दिखायी दें तो उनकी पहचान कर उसकी सूचना दी जा सके। वन विभाग के सात कर्मचारी मुम्बई नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के दल के साथ इस अनुसंधान कार्य में सहयोग करेंगे’’।

मुम्बई नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के डा. विभु प्रकाश का कहना है; ‘‘बढ़ता हुआ तापमान अधिक समस्या पैदा नहीं करता लेकिन मानसून के शुरू होने के बाद भोजन की समस्या होगी। तथापि हम उनके आचरण और किस तरह वे भयंकर गर्मी का सामना करते हैं, इस पर नजर रख रहे हैं। हम जंगली क्रेनों और उनके भोजन, आवास आदि का भी तुलनात्मक अध्ययन कर रहे हैं। वे कन्द-मूल, कीड़े-मकोड़े और झींगुर आदि खा रहे हैं। साइबेरियाई क्रेन आमतौर पर शाकाहारी और अवसरवादी होते हैं। वे जो कुछ प्रचुरता से मिलता है उस पर गुजर-बसर करते हैं। हम इस बात पर नजर रख रहे हैं कि वे अपना समय किस तरह गुजारती हैं। दिन के समय आमतौर पर क्रेन अपना 70 प्रतिशत समय भोजन करने में बिताते हैं। हम पारिस्थितिकी, अन्य पक्षियों के साथ उनके मेल-मिलाप और युगलन (जोड़ा बनाना) का भी अध्ययन कर रहे हैं।’’

वर्तमान चूजों को पालतू क्रेनों ने पाला-पोसा था जबकि पिछले चूजों को वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से पाला-पोसा गया था। यद्यपि वे जंगली क्रेनों के साथ नहीं गए तो भी इन पक्षियों का जीव-विज्ञान तथा उनकी भोजन सम्बन्धी आदतों को समझने और दृष्टि सीमा को ऊँचा रखने के लिए वे महत्त्वपूर्ण हैं।

सन 1991 में दो नर क्रेन, ‘व्हाइट’ और ‘बगल’ रूस से भारत लाए गए। वे जंगली क्रेन द्वारा प्रयुक्त क्षेत्र में बाड़े में रखे गए। 1993-94 में रूस और आईसीएफ से दो चूजे लाए गए। रूस से लाए गए चूजों का कृत्रिम उपायों द्वारा लालन-पालन किया गया। बाद में इन चूजों को कुनोवात थाले में छोड़ दिया गया और तत्पश्चात उन्हें केवलादेवघना राष्ट्रीय पक्षी उद्यान में भेज दिया गया। आईसीएफ से लाए गए दो चूजों को माता-पिता ने पाला-पोसा। इन चूजों को जनवरी, 1994 के अन्त में केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में छोड़ दिया गया।

अलगाव, पालन-पोष और वन्य क्षेत्र में छोड़ देने की तकनीक का प्रयोग पहली बार 1991 में किया गया। 1992 में वर्तमान प्रयासों के हिस्से के रूप में साइबेरियाई क्रेन के छह उर्वर अंडे आईसीएफ अमेरिका से विमान द्वारा रूस भेजे गए। इन अंडों को ओका स्टेट नेचर रिजर्व क्रेन ब्रीडिंग सेन्टर में सेया गया। छह अंडों में से चार में से बच्चे निकले। इन चूजों और पिछले वर्ष के चूजों को कुनोवात नदी थाले में छोड़ दिया गया। चार में से तीन चूजे जंगली क्रेनों के साथ यात्रा पर निकल गए।

सुदूर उत्तरी क्षेत्र से भारत में प्रवास के लिए आने वाले पक्षियों के झुण्ड सैकड़ों वर्षों से पक्षियों का अध्ययन करने वालों और साहित्यकारों को समान रूप से मोहित करते रहे हैं। ये पक्षी पर्यावरण को संतुलित रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा ये उस उत्कृष्ट साहित्य के प्रेरक भी हैं जो भारत की लोक कथाओं का अभिन्न अंग हैं। इन पक्षियों की कुछ जातियों का विलुप्त होना चिन्ता का विषय है। इस ओर पक्षी विज्ञानियों का ध्यान गया है और वे इन पक्षियों को विलुप्त होने से बचाने के उपाय कर रहे हैं।

सन 1993 की शीतऋतु में रूस के ओका ब्रीडिंग सेन्टर में बन्दी अवस्था में सेये गए और बाद में जयपुर चिड़ियाघर में रखे गए साइबेरियाई क्रेन के दो चूजे केवलादेवघना राष्ट्रीय पक्षी उद्यान में छोड़ दिए गए। दोनों पक्षियों ने अपने प्रादेशिक क्षेत्र के प्रति लगाव दिखाया और वे जंगली क्रेनों से दूर ही रहे। गर्मी शुरू होने पर साइबेरियाई जंगली क्रेन तीन मार्च को स्वदेश रवाना हो गईं। अतः ‘बगल’ और ‘व्हाइट’ को फिर से जयपुर चिड़ियाघर भेज दिया गया। उन्हें नवम्बर में फिर से पक्षी उद्यान में छोड़ दिया गया।

परियोजना से जुड़े एक क्षेत्र प्रेक्षक सोहन लाल ने इस विषय पर विस्तार से बताया ‘‘कि ‘व्हाइट’ और ‘बगल’ को मार्च, 1994 से केवलादेवघना में रखा गया। उनके खंड को सूखने से बचाने के लिए उसमें पानी पम्प किया गया। छोड़े जाने पर ये अपने आप कन्द मूल, और कभी-कभी कीड़े-मकोड़े, मछली मेंढक और केंचुए खाते थे। उनका आचरण सामान्य था। वे कभी-कभी छोटी दूरी की कुछ मिनटों की उड़ान भरते थे और एक स्वर में आवाज भी निकालते थे। वे भोजन की तलाश और भोजन करने में सात से आठ घंटे तक लगाते थे और दोपहर को विश्राम करते थे।’’

तथापि अंडे से रही एक सारस क्रेन द्वारा किए गए घावों से ‘व्हाइट’ की मृत्यु हो गई जबकि ‘बगल’ गर्मी झेल गया। नवबर, 1994 में जयपुर चिड़ियाघर में चार क्रेन पक्षियों को राष्ट्रीय पार्क में छोड़ दिया गया। प्रवासी साइबेरियाई क्रेन एक वर्ष और नहीं आई यद्यपि बंदी अवस्था में रखी गई क्रेन ने सामान्य क्रेनों के साथ घुलने-मिलने के लक्षण दिखाए।

राजस्थान के पूर्व प्रमुख अरण्यपाल आर.एस. भंडारी का कहना है, ‘‘यह तथ्य कि साइबेरियाई क्रेन ग्रीष्म ऋतु की गर्मी सहन कर सकीं और प्राकृतिक परिवेश के अनुसार स्वयं को ढाल सकी, उद्यान में साइबेरियाई क्रेन पालने का मार्ग प्रशस्त करता है। अगर माता-पिता द्वारा पाले-पोसे गए साइबेरियाई क्रेन के चूजे पार्क से बड़ी संख्या में खुले छोड़ दिए जाएँ तो इस बात की प्रबल सम्भावना है कि वे सामान्य क्रेनों के साथ घुल-मिल जाएँगे।’’

पिछले कुछ वर्षों के दौरान आंकड़े एकत्र करने के लिए प्रवासी पक्षियों को बड़ी संख्या में छल्ले पहनाए गए हैं। इसमें फंदे या जाल में फँसे पक्षी या घोंसला छोड़ने वाले पक्षी के पैर के ऊपरी भाग या टखने में उपयुक्त आकार का अल्युमीनियम का छल्ला पहना दिया जाता है। छल्ले पर एक नम्बर और पक्षी की वापसी के स्थान का पता लिखा होता है।

कार्ययोजना में एक वयस्क पक्षी पर प्लेटफार्म टर्मिनल ट्रांसमीटर (पीटीटी) लगाने को भी कहा गया है ताकि भारत में शीत ऋतु के दौरान प्रवासी पक्षी के रुकने के वैकल्पिक क्षेत्र का तथा लौटने के मार्ग का पता लगाया जा सके। बेगूसराय बिहार के अली हुसैन, जो मुम्बई नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के साथ पक्षियों को पकड़ने और उनका पता लगाने की विभिन्न परियोजनाओं से जुड़े हैं, का कहना है, ‘‘पीटीटी लगाने की अनुमति केवल अकेले नर पक्षी के लिए है। इसे पूरा करना बहुत कठिन है क्योंकि वह हमेशा सैकड़ों पेलीकन पक्षियों और अन्य बत्तखों के साथ आराम करता रहता है। पीटीटी लगाने के लिए एक जोड़े को पकड़ना कहीं अधिक आसान होता है।’’

भारत ने जोखिम में पड़े यायावर पशुओं के ‘बान समझौते’ पर हस्ताक्षर किए हैं। अतः उसने इसी क्रम में साइबेरियाई क्रेन के संरक्षण के बारे में क्रेन श्रेणी (पंक्ति) के देशों के साथ सहमति के ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। ये दश हैं: ईरान, पाकिस्तान, रूस, अफगानिस्तान, अजरबेजान, कजाखिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उजबेकिस्तान। सहमति के ज्ञापन पर भारत इस बात के लिए तैयार है कि वह साइबेरियाई क्रेन के शरण-स्थलों का व्यापक हवाई सर्वेक्षण करेगा साइबेरियाई क्रेनों के भारत आने के मार्ग का अध्ययन करने के लिए उन पर पीटीटी लगाएगा और इस कार्य में अमेरिका की आईसीएफ और जापान की वाइल्ड बर्ड सोसाइटी के साथ सहयोग करेगा।

साइबेरियाई क्रेन एक महत्त्वपूर्ण आर्द्र भूमि पक्षी है और अगर हमें उसकी रक्षा करनी है तो हमें सम्पूर्ण प्राकृतिक परिवेश की रक्षा करनी होगी। ऐसा करते समय हमें पक्षी उद्यान के समीप आर्द्र भूमि जलस्तर बनाए रखने, वनस्पति को नुकसान पहुँचाने वाली घासों की रोकथाम, कीड़ामार दवाओं के प्रयोग पर नियंत्रण, और देश में शीत ऋतु में पक्षियों के वैकल्पिक शरण स्थलों की रक्षा, पक्षियों की कम संख्या में उत्पत्ति आदि प्रमुख समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। इनमें केवलादेवघना राष्ट्रीय पक्षी उद्यान में इनकी गिरती संख्या का खतरा भी शामिल है।

इस लम्बे रमणीय पक्षी की रक्षा के सभी उपाय करने के लिए रूस सरकार, अमेरिका की इन्टरनेशनल क्रेन फाउन्डेशन और जापान की वाइल्ड-बर्ड सोसाइटी के सक्रिय सहयोग से यहाँ एक साइबेरियाई क्रेन परियोजना शुरू की गई है। इस परियोजना के मुख्य उद्देश्य हैं बन्दी स्थिति में पाये गए साइबेरियाई चूजों को उपयुक्त स्थान पर मुक्त करना, साधारण क्रेनों के यात्रा मार्ग का पता लगाना और केवलादेवघना में साइबेरियाई क्रेनों की बस्ती विकसित करने की सम्भावनाओं का अध्ययन करना।

शीत ऋतु में केवलादेवघना आने वाले अन्य पक्षी हैं: पेलीकन, वेडर (जलचर पक्षी), राजहंस, फाख्ता, हरियल। पक्षियों का आगमन अगस्त के मध्य में शुरू हो जाता है। सबसे पहले आने वाले पक्षी झुंड हैं: च्याता या खीरा, टिकरी, टिटिहरी। इसके तत्काल बाद आती है छोटी मुर्गाबी। सितम्बर के प्रारम्भ में आती है सीखयार या दिघोंच, ग्रीनशैंक (बड़ा बटान) और जल कुक्कुटी। फुदकी और पिल्लाख भी हजारों की संख्या में पहुँचती हैं। अक्तूबर तक टिडारी, तिलयर, स्पेनी चिरी यहाँ पहुँच जाती हैं। चाहा, टिटिहरी, बड़ा गुलिन्दा सहित वेडर भी यहाँ पहुँच चुके होते हैं। अक्तूबर में ही रोजी पास्टर, स्पेनी गौरेय्या और चकवा-चकवी, कलहंस, भुआर, नील-सीर और अनेक छोटे पक्षी यहाँ चहकने लगते हैं। यही समय है जब यहाँ पेलीकन या कुरेर, बोग हंस और साइबेरियाई क्रेन भी पहुँचते हैं। थोड़े समय के लिए यहाँ अनेक मुर्गाबी भी आती हैं। ये दिसम्बर में उड़कर चली जाती हैं।

सीमा पार से प्रवासी पक्षियों के आने के साथ इस क्षेत्र में भारतीय पक्षियों का आना-जाना भी लगा रहता है। इन पक्षियों में प्रमुख हैं: मेनी पक्षी, पीलक और पित्ता। जैसा कि सुप्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सलिम अली ने अपनी पुस्तक ‘इंडियन बर्डस’ (भारतीय पक्षी) में लिखा है ‘‘भारतीय उपमहाद्वीप का कोई भाग ऐसा नहीं है जहाँ अधिक समय पक्षियों की संख्या स्थिर रहे। तरह-तरह के पक्षी देश के सभी भागों में बराबर आते-जाते रहते हैं।”

(लेखिका वन्य जीवन और पर्यावरण विषयों पर लिखने वाली स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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