सूखे के मद्देनज़र सरकारी अनुदानों के बँटवारे की कवायद

Submitted by RuralWater on Fri, 09/18/2015 - 15:58
सूखा प्रभावित जिलों में बुआई में अतिरिक्त लागत और सूखा प्रतिरोधक उपयुक्त नस्लों के बीजों की खरीद के लिये सरकारी सहायता के बारे में यह निर्णय लिया गया है कि सूखे से प्रभावित अधिसूचित जिलों में बीजों पर राज सहायता वितरण के मौजूदा स्तरों के अतिरिक्त 50 प्रतिशत दिया जाये। यह वृद्धि 31 दिसम्बर तक मान्य होगी। बीजों और अन्य संसाधनों की उपलब्धता की निरन्तर निगरानी और समीक्षा कृषि विभाग के साप्ताहिक निगरानी समूह में की जाएगी। बरसात में कम वर्षा होने से खरीफ फसलों पर आये संकट को देखते हुए किसानों के शीघ्र कल्याण के उपाय करने के नाम पर केन्द्र सरकार ने कई निर्णय लिये हैं। सभी राज्य सरकारों को इन उपायों को अपनाने का निर्देश दिया गया है। परिस्थिति का मूल्यांकन के आधार राज्य सरकारें इन्हें लागू कर सकेंगीे।

चलते-चलते राज्य सरकारों को यह सलाह भी दे दी गई है कि वे सीआरआईडीए, आईसीएआर और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के परामर्श से हर जिले के लिये आकस्मिक फसल योजना तैयार करें। कृषि मंत्रालय ने भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद और केन्द्रीय शुष्कभूमि कृषि अनुसन्धान संस्थान, हैदराबाद के माध्यम से देश के करीब 600 जिलों के लिये यह योजना तैयार की है।

लेकिन मानसून में वर्षा कम होने के बारे में ताजा शोध-निष्कर्ष पूरे देश के लिये चिन्ताजनक हैं। भूमि उपयोग में व्यापक फेरबदल और वायु प्रदूषण की वजह से भारत में मानसून के निष्क्रिय अवस्था की ओर जाने की सम्भावनाएँ बढ़ गई हैं। जर्मनी के पोट्सडेम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट रिसर्च के मौसम विज्ञानी किर्सटेन जिंकफेल्ड और ब्रिटेन के वैज्ञानिक हेन्स श्रेल्नहुबर ने इसके प्रति अगाह किया है।

प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित शोध रिपोर्ट में वे बताते हैं कि यहाँ मानसून मुख्यतः भू सतह और हिन्द महासागर के बीच वायुदबाव के अन्तर से संचालित होता है। सामान्यतया गर्मी के मौसम में भारतीय उपमहाद्वीप की धरती के तपने से इसके ऊपर हवा का दबाव कम हो जाता है। जिसकी पूर्ति करने के लिये समुद्र से ठंडी मानसूनी हवाएँ वर्षा लेकर पहुँचती हैं।

वैज्ञानिकों ने बताया है कि भारत और दक्षिण-पूर्वी एशिया में कई कारक मिलकर धरातल की तापमान-वृद्धि में बाधा डाल रहे हैं। औ़द्योगिक गतिविधियों और वाहनों की संख्या में हो रही अभूतपूर्व वृद्धि ने हवा में प्रदूषणकारी कणों (एयरोसॉल) को इस कदर बढ़ा दिया है कि धूप पर्याप्त मात्रा में सतह तक नहीं पहुँच रही है।

इसके अलावा जंगलों के सफाए से प्रकाश को सोखने वाले वृक्षों की जगह धूप को परावर्तित करने वाली नंगी धरती दिखाई देने लगी है। इन कारणों से सूर्य का प्रकाश धरती की सतह तक पहुँचने से पहले ही वापस अन्तरिक्ष में परावर्तित हो रहा है। इस स्थिति को खतरे की घंटी बताते हुए इन वैज्ञानिकों ने कहा कि अगर भूमि उपयोग में बदलाव इसी तरह जारी रहा और हवा में एयरोसॉल की मात्रा इसी तरह बढ़ती रही तो दक्षिण एशिया के मानसून के निष्क्रिय अवस्था में जाने से रोका नहीं जा सकता।

उन्होंने बताया कि बिल्कुल इन्हीं वजहों से चीनी मानसून पर भी संकट के बादल छाए हुए हैं। इसके अलावा शोधकर्ताओं ने ग्लोबल वार्मिंग के कारण कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती मात्रा से बिल्कुल विपरीत परिणामों की भी चेतावनी दी है।

रोलर कोस्टर इफेक्ट नामक प्रभाव से मानसून सूखने की परिणति कभी-कभी अप्रत्याशित मूसलाधार बारिश में भी हो सकती है क्योंकि गर्मी के मौसम के बाद एयरोसॉल की मात्रा घटने लगती है। लेकिन कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ोत्तरी में लगाम नहीं लगती। इन कारणों का निराकरण के उपाय खोजने के बजाय सरकारें अनुदान और आवंटन के भ्रमजाल में फँसी है।

केन्द्र सरकार ने फैसला किया है कि सूखा प्रभावित क्षेत्रों में परिवारों के लिये महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी कार्यक्रम के अन्तर्गत अधिक रोज़गार उपलब्ध कराया जाएगा। सरकार ने अकुशल मजदूरों के लिये अधिसूचित ग्रामीण क्षेत्रों में जॉब कार्डधारकों के लिये वित्त वर्ष के दौरान 100 दिन के सुनिश्चित रोज़गार के अलावा 50 दिन का रोज़गार उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है।

इससे राज्य सरकार सूखा और कम बारिश वाले क्षेत्रों के ग्रामीण निर्धनों के लिये अतिरिक्त रोज़गार प्रदान करने में सक्षम होगी। इससे निर्धनतम ग्रामीण परिवार लाभान्वित होंगे क्योंकि इससे गाँव में सीजन आधारित बेरोज़गारी की समस्या तत्काल निदान होगा और ग्रामीण समस्याओं में कमी आएगी।

डीजल पम्पों के माध्यम से सूखा और कम बारिश वाले क्षेत्रों में जीवन रक्षक सिंचाई सुविधा प्रदान करने के लिये किसानों को डीजल पर राज सहायता देने का निर्णय किया गया है ताकि खरीफ फसलों की सुरक्षा की जा सके। इस मद में केन्द्र सरकार ने 100 करोड़ रुपए आवंटित किये हैं।

30 सितम्बर अर्थात दक्षिण-पश्चिम के मानसून की अवधि के दौरान प्रभावित क्षेत्रों के किसानों को इसके दायरे में रखा जाएगा। राज्य सरकारों की भागीदारी में डीजल पर राज सहायता योजना कार्यान्वित होगी। यह योजना ऐसे जिलों-क्षेत्रों में लागू होगी जहाँ 15 जुलाई तक बारिश में 50 प्रतिशत से अधिक कमी हुई है।

सूखा प्रभावित जिलों में बुआई में अतिरिक्त लागत और सूखा प्रतिरोधक उपयुक्त नस्लों के बीजों की खरीद के लिये सरकारी सहायता के बारे में यह निर्णय लिया गया है कि सूखे से प्रभावित अधिसूचित जिलों में बीजों पर राज सहायता वितरण के मौजूदा स्तरों के अतिरिक्त 50 प्रतिशत दिया जाये। यह वृद्धि 31 दिसम्बर तक मान्य होगी। बीजों और अन्य संसाधनों की उपलब्धता की निरन्तर निगरानी और समीक्षा कृषि विभाग के साप्ताहिक निगरानी समूह में की जाएगी।

जल की कमी वाली बागवानी फसलों को पुनर्जीवित करने के समुचित उपाय करने के लिये 150 करोड़ रुपए का अतिरिक्त आवंटन किया गया है। देश के सभी सूखा प्रभावित जिले, प्रखण्डों में यह योजना लागू की जा रही है जो समन्वित बागवानी मिशन के अधीन है।

इस योजना को कृषि, सहकारिता और किसान कल्याण विभाग द्वारा कार्यान्वित किया जाएगा। सूखा प्रभावित जिले -प्रखण्डों के किसानों को प्रति लाभार्थी अधिकतम 2 हेक्टेयर क्षेत्र के लिये लागत के आधार पर 6000 रुपए प्रति हेक्टेयर से सरकारी सहायता प्रदान की जाएगी। इस प्रकार दी जाने वाली सहायता में केन्द्र और राज्य सरकारें आधा-आधा हिस्सेदारी करेंगी।

पशुधन पर सूखे के प्रतिकूल प्रभाव में कमी लाने के उद्देश्य से चारा उत्पादन के लिये अतिरिक्त सहायता के तौर पर 50 करोड़ रुपए आवंटित किये गए हैं। सूखा प्रभावित जिले के किसानों को अतिरिक्त चारा उत्पादन के लिये प्रति लाभार्थी अधिकतम 2 हेक्टेयर क्षेत्र के लिये लागत के आधार पर 3200 रुपए प्रति हेक्टेयर की दर से सहायता प्रदान की जाएगी। राज सहायता के माध्यम से इस प्रकार दी जाने वाली सहायता में भारत सरकार और सम्बन्धित राज्य सरकार आधा आधा हिस्सेदारी करेंगे।

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अधीन आवंटित रकम का पाँच से 10 प्रतिशत रकम सुरक्षित रखने का निर्देश राज्य सरकारों को दिया गया है ताकि कृषि क्षेत्र पर मानसून के प्रतिकूल प्रभाव में कमी लाने के उद्देश्य से आवश्यक उपाय किये जा सकें। राज्य सरकारों को सलाह दी गई है कि वे महात्मा गाँधी रोज़गार गारंटी और ऐसी अन्य योजनाओं के अन्तर्गत जल संभरण संरचनाओं के निर्माण जैसे स्थायी निदान की दिशा में पहल करें।

मानसून की कमी से उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिये कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के सभी विभागों के साथ 9 सितम्बर को बैठक हुई। जिसमें जल संसाधन, भू-संसाधन, उर्जा, पेयजल, खाद्य मंत्रालय सहित आईएमडी, सीडब्लू आदि के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कर्नाटक और महाराष्ट्र की हालत अधिक खराब है।

कर्नाटक सरकार ने राज्य के 30 जिलों में से 27 जिलों (126 तालुकों ) को सूखाग्रस्त घोषित किया है। उसने राष्ट्रीय आपदा राहत कोष से 3050 करोड़ की सहायता माँग की है। हालत का जायजा लेने के लिये कृषि एवं सहकारिता विभाग की अन्तरमंत्रालयीय समिति संयुक्त सचिव आरबी सिंह के नेतृत्व में वहाँ गई। उसके आकलन और सिफारिश के अनुसार कोष के आवंटन का फैसला किया जाएगा। महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों-खासकर मराठवाड़ा और मध्य महाराष्ट्र में कम वर्षा के कारण स्थिति बिगड़ने का अंदेशा है।

बैठक में उपस्थित भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के महानिदेशक ने बताया कि महाराष्ट्र, तेलंगाना और कर्नाटक के जिन हिस्सों में अभी बारिश सामान्य से कम है, उन राज्यों में अगले सप्ताहों में अच्छी बारिश की सम्भावना है। उन्होंने बताया कि बंगाल की खाड़ी में मानसूनी वर्षा का एक नया सिस्टम विकसित हो रहा है।

यह कम वायु दाब का क्षेत्र 15 सितम्बर को चल कर आन्ध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्र से होते हुए अन्दरुनी राज्यों में बारिश प्रदान करेगा। उत्तरपूर्वी भारत में भी अच्छी बारिश होने की सम्भावना है। बैठक में निर्णय लिया गया कि कृषि राज्य मंत्री और बागवानी आयुक्त प्रभावित राज्यों का दौरा कर स्थिति पर लगातर नजर रखेंगे।

सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार, प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में आवश्यक राहत प्रदान करने के लिये प्राथमिक तौर पर राज्य सरकारें जिम्मेवार होती है। केन्द्र सरकार वित्तीय सहायता के माध्यम से राज्य सरकारों की मदद करती है। राहत सम्बन्धी उपायों के संचालन के लिये राज्य आपदा मोचन निधि के रूप में राज्य सरकारों के पास धन उपलब्ध होती है।

केन्द्र द्वारा आवंटित रकम की पहली किस्त राज्य सरकारों के लिये जारी कर दी गई है। इसके अलावा कृषि मंत्रालय पंजीकृत किसानों को एम-किसान पोर्टल के माध्यम से मौसम के बारे में चेतावनी भेजना नियमित करने की व्यवस्था की गई है। साथ ही कृषि और सहकारिता विभाग की वेबसाइट पर सूखे के लिये संकट प्रबन्धन योजना उपलब्ध कराई गई है।

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