80 साल बाद सूरज की आग से कौन बचाएगा

Submitted by RuralWater on Sun, 09/20/2015 - 15:21
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राजस्थान पत्रिका 16 सितम्बर 2015
रोज़ाना इस्तेमाल होने वाले कई उत्पाद ऐसे हैं जिनमें मौजूद हानिकारक गैसें आसमान में करीब 15-50 किमी. ऊँचाई पर स्थित ओजोन परत को भारी नुकसान पहुँचा रही हैं। इसके दुष्प्रभाव आने वाले 70-80 सालों में भारत समेत एशियाई देशों को भुगतने पड़ेंगे। परफ्यूम, डियो, शेविंग फोम, कूलेंट ऑयल, रेफ्रिजरेटर आदि में क्लोरोफ्लोरो कार्बन्स (सीएफसी), हायड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन्स (एचएफसी), हेलोन्स, मेथाइलक्लोराइड, मेथाइलब्रोमाइड और कार्बन टेट्राक्लोराइड गैसें होती हैं जो ग्लोबल वार्मिंग के साथ ओजोन परत को नुकसान पहुँचा रही हैं।

क्या है ओजोन परत


वायुमण्डल पृथ्वी की सतह से 50 किमी. की ऊँचाई तक होता है। 0-10 किमी. तक के क्षेत्र को ट्रोपोस्फेयर व 10-50 किमी. तक के क्षेत्र को स्ट्रेटोस्फेयर कहते हैं। ओजोन परत स्ट्रेटोस्फेयर में होती है। यह बादलों से ऊपर होती है और पृथ्वी से दिखाई नहीं देती। ओजोन परत का निर्माण बादलों और सूर्य की किरणों की आपसी क्रिया होने के कारण स्वतः होता रहता है। सूर्य की किरणें बादलों के साथ क्रिया कर ऑक्सीजन को अलग करती है। इसे नवजात ऑक्सीजन कहते हैं। यही ऑक्सीजन मुक्त रूप से घूमती रहती है। जो बाद में ऊपर जाकर ओजोन परत से मिल जाती है और यह परत बनती रहती है। सबसे ज्यादा ओजोन परत 25 किमी. के आसपास वाले क्षेत्र में होती है। ओजोन परत फिल्टर की तरह काम करती है। सूर्य से आने वाली हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट (यूवी) किरणों को पृथ्वी तक पहुँचने से रोकती है। ये किरणें सीधे तौर पर जीव-जंतुओं या पेड़-पौधों को नुकसान पहुँचाती है।

ओजोन परत में छिद्र कैसे


पृथ्वी पर मौजूद हानिकारक गैसें ऊपर-नीचे (ब्रेवेर डोबसन सर्कूलेशन) घूमती हुई स्ट्रेटोस्फेयर में पहुँच जाती है। स्ट्रेटोस्फेयर में पहुँचकर वहाँ ये गैसें मुक्त रूप से घूमती नवजात ऑक्सीजन गैस के साथ मिल जाती हैं। ये मिश्रित गैसें ओजोन परत से चिपककर उनके अणुओं के साथ क्रिया कर ओजोन परत को धीरे-धीरे कमजोर करने लगती है। इसके बाद ओजोन परत बनने की प्रक्रिया ठप हो जाती है। इसे ही ओजोन परत में छिद्र कहते हैं।

नष्ट नहीं होती ये गैंसे


परफ्यूम, डियो, शेविंग फोम, कूलेंट ऑयल, रेफ्रिजरेशन और कीटनाशकों आदि में इस्तेमाल गैसों की आयु 100-200 साल रखी जाती है जिससे कि इनका असर ज्यादा समय तक रहे। इसलिये ये वायुमण्डल से खत्म नहीं होती बल्कि ऊपर-नीचे (ब्रेवेर डोबसन सर्कुलेशन) घूमती रहती हैं। ये गैसें वायु प्रदूषण में मौजूद हानिकारक तत्वों के साथ घुलकर जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और अन्ततः ओजोन परत को नुकसान का कारण बनती है। अगर इन गैसों की आयु कम कर दी जाये तो ओजोन परत के लिये खतरा घट जाएगा।

कार्बन मोनोऑक्साइड से भी खतरनाक हैं


ओजोन परत को सीधे नुकसान पहुँचाने वाली गैसें गाड़ियों से निकलने वाला धुआँ (कार्बन मोनोऑक्साइड व कार्बन डाइऑक्साइड) से भी ज्यादा खतरनाक होती है। यह सीधे फेफड़ों में पहुँचकर नुकसान करती है। यही वजह है कि पहले की तुलना में इस कैंसर के मरीजों की संख्या बढ़ी है। पर्यावरणविद डॉ. एल के दधीच का कहना है कि यह गैसें मानवजनित हैं। ऐसे उत्पाद और उपकरणों का प्रयोग कम करना चाहिए।

ओजोन परत फैक्ट्स


1. 1978 में नासा के वैज्ञानिक ने की थी ओजोन परत में छिद्र की पुष्टि।
2. 1981 में वैज्ञानिकों का दावा 10 फीसदी ओजोन परत में छिद्र।
3. 2006 में तीन करोड़ वर्ग किमी. क्षेत्रफल में फैल गया था ओजोन परत का छिद्र।
4. 2014 में ओजोन परत में छिद्र घटकर दो करोड़ वर्ग किमी तक रह गया।

विश्वस्तरीय प्रयास


1. ओजोन परत को लेकर पहली बैठक वर्ष 1981 में। कई अन्तरराष्ट्रीय समझौतों पर हुए हस्ताक्षर।
2. सीएफसी बन्द करने के लिये मार्च 1965 में विश्व स्तरीय सम्मेलन का वियना में आयोजन।
3. 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल। इसमें भारत समेत सैकड़ों देशों ने हस्ताक्षर किये।
4. 1990 में मॉन्ट्रियल सन्धि वाले देशों में सन् 2000 तक सीएफसी व टेट्राक्लोराइड बन्द करने की पहल।

कहाँ कौन-सी गैस इस्तेमाल


सीएफसी व एचसीएफसी परफ्यूम, शेविंग फोम, मेडिकल उपकरणों को साफ करने वाले कैमिकल, एसी-फ्रिज की गैस और गाड़ियों के ठण्डा करने वाले कूलेंट के रूप में। (वर्ष 2000 से एसी-फ्रिज में सीएफसी की जगह एचएफसी गैस)।

हैलोन्स : अग्निशमन यन्त्रों में।
कार्बन टेट्राक्लोराइड : इलेक्ट्रॉनिक सर्किट बोर्ड की सफाई में।
मेथाइल ब्रोमाइड : कीटनाशक में।
एयरोसोल्स : परफ्यूम, डियो और शेविंग फोम में।

पॉलीथिन सी पतली परत


अगर पृथ्वी का आकार बास्केटबॉल के बराबर मान लें तो पृथ्वी के चारों ओर ओजोन परत पॉलीथिन जितनी पतली होगी।

भारत के पास है ओजोन परत को बचाने का समय: डॉ. गुफरान बेग


यूनाइटेड नेशन्स एन्वॉयरमेंट प्रोग्राम (यूएनईपी) की ओर से 2014 में जारी एक शोध में पता चला है कि सीएफसी, एचएफसी और कुछ अन्य गैसों से भारत समेत एशियाई देशों पर ओजोन परत में छिद्र होने का खतरा बढ़ गया है। अगर समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया तो सदी के अन्त तक पर्यावरण को बहुत अधिक नुकसान होगा। ओजोन परत में छिद्र भी हो सकता है। इस शोध में इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी पुणे के डॉ. गुफरान बेग शामिल थे। यूएनईपी में भी सदस्य डॉ. बेग ने बताया कि ओजोन परत के नुकसान को रोकने के लिये एसी और रेफ्रिजरेटर में क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स (सीएफसी) गैस का प्रयोग बन्द हो गया है, लेकिन दूसरे दैनिक उपयोग में आने वाले उत्पादों में सीएफसी का इस्तेमाल खूब हो रहा है। दूसरी तरफ सीएफसी के विकल्प के रूप में एसी और फ्रिज में हायड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन्स (एचसीएफसी) आदि गैसों का प्रयोग हो रहा है, लेकिन अब इन गैसों की मात्रा इतनी अधिक बढ़ गई कि यह पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने लगी हैं। इससे भारत और एशियाई देशों पर ओजोन परत में छिद्र होने का खतरा बढ़ता जा रहा है।

मानव सेहत पर असर


1. स्किन कैंसर, मोतियाबिन्द
2. टीकाकरण का असर कम होना
3. रोग प्रतिरोध क्षमता का घटना
4. संक्रमण की आशंका

पर्यावरण को खतरा


1. बायोमास उत्पादन में कमी
2. जैव विविधता के नष्ट होने की आशंका
3. ध्रुवीय तंत्र के बिगड़ने का खतरा

स्किन कैंसर से बचेंगे हर साल 20 लाख लोग


ओजोन परत में बढ़ते छिद्र को रोकने के लिये वर्ष 1987 में सैकड़ों देशों ने मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल तैयार किया था। इस प्रोटोकॉल के तहत ओजोन परत को नुकसान पहुँचाने वाली गैसों के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। पिछले वर्ष यूएनईपी की जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के चलते वर्ष 2030 तक हर साल लगभग बीस लाख लोग स्किन कैंसर से बचेंगे।

क्या करें हम


1. सीएनजी को बढ़ावा दें।
2. केमिकल उत्पादों का प्रयोग कम करें।
3. ऊर्जा के प्राकृतिक स्रोतों का इस्तेमाल ज्यादा करें।
4. प्राकृतिक रोशनी का प्रयोग अधिक हो।
5. डीजल से चलने वाली गाड़ियों व मशीनरी का प्रयोग कम करें।
6. एसी और फ्रिज आदि का सीमित इस्तेमाल हो।
7. कैमिकल वाले परफ्यूम, डियो और फोम्स का प्रयोग न करें।

गाड़िया


1.97 करोड़ नई गाड़ियाँ बीते वित्तीय वर्ष में सड़कों पर उतरीं। गाड़ियों से पर्यावरण को दोहरा नुकसान हो रहा है। उनके एसी और कूलेंट सीधे ओजोन परत को नुकसान पहुँचाते हैं जबकि धुआँ वायु प्रदूषण बढ़ाता है।

एयर कंडीशन


प्रति वर्ष बिक्री 35 लाख यूनिट। 1050 करोड़ रुपए का कारोबार। प्रतिवर्ष 10-15 प्रतिशत की दर से माँग वृद्धि।

रेफ्रिजरेटर


प्रतिवर्ष बिक्री 40 लाख यूनिट। 1050 करोड़ रुपए का कारोबार। 25.7 प्रतिशत (2012-15) की दर से माँग वृद्धि।

परफ्यूम


हर 45 सेकेंड में 1 बॉटल बिकती है। 800 करोड़ रुपए का कारोबार। 20.25 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से माँग वृद्धि।

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