हमारी नदियों को जीने दो

Submitted by RuralWater on Sat, 09/26/2015 - 16:28

विश्व नदी दिवस, 27 सितम्बर 2015 पर विशेष


.“हमारी नदियों को जीने दो” - दिल्ली उद्घोषणा में निहित इस अपील के साथ गत् वर्ष सम्पन्न हुए प्रथम भारत नदी सप्ताह को एक वर्ष पूरा हो चुका, किन्तु क्या इस एक वर्ष के दौरान अपील पर ध्यान देने की कोई सरकारी-गैर सरकारी समग्र कोशिश, पूरे भारत में शुरू हुई? क्या भारत की नदियों को जीने का अधिकार देने की माँग शासकीय, प्रशासनिक, न्यायिक या सामाजिक स्तर पर परवान चढ़ सकी?

क्या याद रही नदी की परिभाषा


नदी सप्ताह के दौरान देश भर के नदी कार्यकर्ताओं, अध्ययनकर्ताओं और विशेषज्ञों ने मिलकर नदी को परिभाषित करने की एक कोशिश की थी। श्री अनुपम मिश्र ने ठीक कहा था कि इंसान की क्या हैसियत है कि वह नदी को परिभाषित करे; इसीलिये नदी की परिभाषा, निष्कर्षों के कुछ टुकड़ों के जोड़ के रूप में आई - “नदी, मात्र बहते पानी की धारा नहीं है। नदी, एक प्राकृतिक, सजीव व पर्यावरणीय तंत्र है; जो रेत और माटी को अपने साथ निरन्तर बहाती रहती है। जलागम क्षेत्र, बाढ़ क्षेत्र/खादर, नदी तल और तटों की वनस्पतियाँ आदि सभी नदी तंत्र के अभिन्न अंग हैं। इन सभी प्राकृतिक संरचनाओं को जोड़कर नदी बनती है। एक नदी असंख्य जीव, जन्तुओं और पौधों को आश्रय देती है और उनके साथ पारस्परिक सम्बन्ध बनाए रखती है। नदी, वैश्विक जलचक्र की अहम कड़ी है, जो अनवरत प्रवाहमान रहते हुए बड़े पारिस्थितिकीय तंत्रों को जोड़ती तथा पूर्ण करती है। नदी, बेसिन और एस्चुरी तक फैली असंख्य लघु-दीर्घ धाराओं का विशाल तंत्र है।’’

क्या हमें नदी की परिभाषा का यह अंश याद रहा? क्या हमने नदी के अभिन्न अंगों की समृद्धि के लिये कोई कार्य किया? क्या इस बीच हमने किसी नदी की किसी लघु अथवा दीर्घ धारा को निर्मल-अविरल बनाने की ईमानदार कोशिश शुरू की?

भूल गए दिल्ली उद्घोषणा की चेतावनी


दिल्ली उद्घोषणा के रूप में देश भर के नदी चिन्तकों-कार्यकर्ताओं ने बार-बार कहा कि प्रवाहित जल की मात्रा और गुणवत्ता में उत्तरोत्तर कमी तथा गिरते प्रदूषण से नदी की सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ता है। सहायक नदियों के जलहीन होने, जैवविविधता के कम होने तथा खादर क्षेत्र के विकृत होने से नदी पूरी तरह बीमार हो जाती है। एक सीमा के पश्चात वह प्रदूषण के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता तथा जल को सोखकर अपने में संजोए रखने की क्षमता खो बैठती है। ऐसी स्थिति में नदी पुनर्जीवन का काम दुष्कर हो जाता है।

क्या हमने किसी नदी के जलागम, बाढ़ क्षेत्र/खादर, तट, तल, वनस्पति अथवा जीवों को बचाने की कोशिश की? जवाब सोचें। हो सकता है कि हिंडन प्रदूषण मुक्ति करने और गंगा नदी तट पर औषधीय पौधे लगाने जैसी कई घोषणाओं को सामने रख आप ‘हाँ’ में उत्तर दें। किन्तु क्या सच ही उत्तर ‘हाँ’ ही होना चाहिए? सोचें। उद्घोषणा में स्पष्ट है कि बाढ़ क्षेत्र और जैव विविधता संरक्षण के बिना अन्य प्रयास आधे-अधूरे हैं।

क्या नदी कार्यों में बाधक कदम पीछे हटेे?


नदी को परिभाषित करते हुए ‘दिल्ली उद्घोषणा’ में नदी के कई कार्य बताए गए थे। गहरी घाटियों को काटना, चट्टानों को सरका देना, पत्थरों को लुढ़का कर बजरी, रेत और मिट्टी में बदल देना - इन्हें नदी की कलाकारी कहा गया। जलीय और तटीय जैव विविधता की जनन और मानवों, मवेशियों तथा वन्यजीवों के पोषण को नदी का माँ सरीखा कार्य कहा गया। भूजल को बढ़ाना, प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों को बेअसर कर स्वयं को निर्मल रखना, माटी की उर्वरा शक्ति बढ़ाना... नदी के ही कार्य हैं।

क्या हम समझ पाये कि बाढ़ लाकर नदी, भूजल को बढ़ाती और साफ ही करती है? इस एक वर्ष के दौरान क्या हमारा कोई कार्य नदी के कार्य में सहायक सिद्ध हुआ या हमने नदी कार्य में बाधाओं को हटाने की कोई कोशिश की?

नहीं, अलबत्ता हमने गंगा पर बैराजों के कार्यों पर आगे बढ़ाया। कर्नाटक में नेथरावती नदी का मार्ग बदलने को लेकर ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ की रिपोर्ट भी खिलाफ है। विद्यार्थियों ने नदी की परिभाषा को समझा और मार्ग बदलने का विरोध किया ज़रूर, किन्तु सरकार ने काम जारी रखा है। काली नदी के प्रदूषण से भूजल और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाशिन्दों की सेहत पर खतरनाक कुप्रभाव की रिपोर्ट आई, लेकिन उसमें कचरा गिराने वाली फ़ैक्टरियों और स्थानीय निकायों के खिलाफ कार्रवाई की कोई रिपोर्ट नहीं आई।

क्यों? कानपुर विकास प्राधिकरण ने उत्तर प्रदेश की पांडु नदी प्रवाह से 200 मीटर दूरी तक सभी प्रकार के निर्माण रोकने का एक सकारात्मक निर्णय लिया है। गौर कीजिए कि ऐसे सकारात्मक निर्णय गंगा, यमुना, हिंडन आदि को लेकर पहले भी लिये गए हैं, किन्तु व्यवहार कहाँ है?

ये लागू कहाँ हुए? कोई विवरण है? नहीं, क्योंकि ऐसे ज्यादातर निर्णय भ्रष्टाचार का सबब बनकर कुर्सी के नीचे दब गए हैं। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने अपने छोटे से कार्यकाल में ऐसे कितने ही सकारात्मक निर्णय दिये हैं। ऐसे सकारात्मक को व्यवहार में सुनिश्चित करने की कोशिश क्या इस अन्तरराष्ट्रीय दिवस पर होगी?

क्या नदी-समुद्र के रिश्ते का मान रखा?


सच है कि समुद्र से उठा पानी ही बादल बनकर बरसता है। इस पानी को पाकर ही ज्यादातर नदियाँ, स्वच्छ और सदानीरा होती हैं। किन्तु यह भी सच है कि यह नदी ही है, जो सागर के तापमान को नियंत्रित और उसकी लवणता को सन्तुलित करती है। सागर के नमकीन पानी को थलक्षेत्र में आने से रोकना और समुद्री जीवों को पोषक तत्व उपलब्ध कराना भी नदी के ही कार्य हैं।

नदी और समुद्र के रिश्ते की यह बात क्या भारत सरकार अथवा राज्यों के पर्यावरण, नदी व सागर विभागों के प्रभारियों को समझ में आई? नहीं, केन-बेतवा जोड़ की पूर्ति को बेताब मध्य प्रदेश को तो न नदी-समुद्र का यह रिश्ता समझ में आया और न ही यह कि कोई भी दो नदियाँ एक समान नहीं होती।

गुरुत्व आवेग के अनुकूल प्रवाह, किसी भी नदी के नदी होने का एक लक्षण है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि नदी जोड़ परियोजना के पैरोकार, भारत की नदियों को नदी परिभाषा के इस मूल लक्षण से दूर करने की तैयारी में जुट गए हैं। ग़ौरतलब है कि कई राज्य नदी जोड़ के नाम पर सपना दिखाने, बजट पाने और खपाने को बेसब्र दिखाई दे रहे हैं।

नदी प्रवाह, सिर्फ साधारण पानी नहीं है। नदी प्रवाह, अनेकानेक पारिस्थितिकीय दायित्वों की पूर्ति करता है। लिहाजा, प्राकृतिक बहाव में हस्तक्षेप सिर्फ ऐसी स्थिति में होना चाहिए, जब कोई और विकल्प शेष न हो। दिल्ली उद्घोषणा ने अधिकतम सावधानियों के साथ ही ऐसा किया जाने की अनुमति का जिक्र किया है। किन्तु क्या बीते एक साल में हमने प्रवाह को लेकर इनमें से एक भी निर्देश की पालना की। नहीं, हमने एक ओर हिमालय दिवस मनाया, दूसरी ओर हिमालय को नई चुनौतियों के घेरे में कैद करने की योजना बनाई। इस नदी दिवस पर क्या हम इससे खुश हों? नहीं, किन्तु आन्ध्र प्रदेश ने भी गोदावरी और कृष्णा को एक नहर के जरिए औपचारिक तौर पर जोड़े जाने से आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बहुत खुश हैं।

मुख्यमंत्री श्री एन. चन्द्रबाबू नायडू ने इसे एक ऐतिहासिक अवसर और विशेष रूप से कृष्णा और गुंटूर जिलों के किसानों के लिये वरदान बता डाला। आन्ध्र प्रदेश के सिंचाई विभाग ने घोषणा कि मार्च, 2016 तक इसका काम पूरा कर लिया जाएगा।

दिलचस्प है कि मुख्यमंत्री ने इसे अलमाटी बाँध की ऊँचाई बढ़ने से कृष्णा डेल्टा में आई पानी की कमी का विकल्प बनाकर पेश किया। जाहिर है कि इससे सागर की लवणता, तापमान और समुद्री जीवों के पोषण में कृष्णा की जो भूमिका ‘दिल्ली उद्घोषणा’ में बताई गई है, वह उसकी पूर्ति, ठीक से नहीं कर पाएगी। देखना है कि आगे चलकर, आन्ध्र की आने वाली सरकारें इसका क्या विकल्प बताएँगी?

क्या समझ पाये बाँध का चरित्र?


अलमाटी बाँध से उपजे संकट से नदी प्रवाह मार्ग में बाँध का चरित्र समझ में आ जाना चाहिए। किन्तु ऐसे बाँधों और नदी जोड़ परियोजना के पैरोकारों ने नदी के इस चरित्र को कभी नहीं समझा कि नदी, एक जैविक इकाई के तौर पर उद्गम से डेल्टा तक दण्डवत् (Longitudinally), खादर/बाढ़ क्षेत्रों और तटों से पार्श्ववत् (Laterally) तथा नदी तल एवं भूजल में लम्बवत् (Vertically) एकरूपता से जुड़ी हुई होती है। बाँध, इस एकरूपता को तोड़ता है।

सब जानते हैं कि नदी प्रवाह, सिर्फ साधारण पानी नहीं है। नदी प्रवाह, अनेकानेक पारिस्थितिकीय दायित्वों की पूर्ति करता है। लिहाजा, प्राकृतिक बहाव में हस्तक्षेप सिर्फ ऐसी स्थिति में होना चाहिए, जब कोई और विकल्प शेष न हो। दिल्ली उद्घोषणा ने अधिकतम सावधानियों के साथ ही ऐसा किया जाने की अनुमति का जिक्र किया है। किन्तु क्या बीते एक साल में हमने प्रवाह को लेकर इनमें से एक भी निर्देश की पालना की।

नहीं, हमने एक ओर हिमालय दिवस मनाया, दूसरी ओर हिमालय को नई चुनौतियों के घेरे में कैद करने की योजना बनाई। इसमें हिमालय को दुनिया में सबसे अधिक बाँध घनत्व वाला क्षेत्र बना देने का हमारी जानी-समझी रणनीति अपनाई।

नतीजा


उत्तराखण्ड में नौ फीट तक की लम्बाई वाली सुनहरी महासिर मछली और उसका ठिकाना.... दोनो कहीं खो गए हैं। जल परियोजनाओं को अंजाम देने वाले विस्फोट, गाँववासियों को उजाड़ने तथा डराने हिमाचल के कई इलाकों में पहुँच गए हैं।

तीस्ता (3) जल विद्युत परियोजना को मंजूरी देकर, भारत सरकार के बिजली मंत्री अपनी पीठ खुद थपथपा रहे हैं। सैंड्रप द्वारा दी जानकारी के मुताबिक, सुबर्नसिरि नदी पर 2000 मेगावाट की एनएचपीसी परियोजना और अरुणाचल तथा असम में जलविद्युत का संजाल खड़ा कर देना बिजली मंत्री श्री गोयल का अगला एजेंडा है। इसी क्रम में गौर कीजिए कि अरुणाचल प्रदेश राज्य सरकार ने तवांग बेसिन में 11 जलविद्युत परियोजनाओं के अध्ययन को मंजूरी दे दी है।

सैंड्रप ने सम्बन्धित अध्ययन के इस निष्कर्ष पर आश्चर्य जताया है कि प्रस्तावित परियोजनाओं को लागू करने से किसी इंसानी आबादी अथवा बसावट का पलायन नहीं होगा। “किसी एक नदी पर ‘रन ऑफ रिवर बाँध’ की शृंखला, उतनी ही नुकसानदेह होती है, जितनी कि जलाशय युक्त कोई बाँध परियोजना। ‘रन ऑफ रिवर’ बाँधों की ऐसी शृंखला से स्थानीय पारिस्थितिकी, मौसम और स्वयं नदी पर अधिक बुरा प्रभाव पड़ता है।’’ - पूर्व में कई विशेषज्ञों तथा अध्ययनों द्वारा यह प्रमाणिक तथ्य दोहराए जाने के बावजूद अरुणाचल प्रदेश के ये अध्ययन, यही कहते हैं कि बाँध, ‘रन ऑफ रिवर’ हो; कोई जलाशय न हो, तो उससे कोई पलायन व नुकसान नहीं होता।

घोटाले के बाँधों में बँधता भारत


केन्द्र से महाराष्ट्र के लिये बड़ी-बड़ी बाँध परियोजनाओं का बजट खींचकर ले जाने वाले नेता भी एक वक्त बाँधों के पक्ष में कुतर्क गढ़ते थे। आज, अधिक बाँधों और सबसे अधिक सिंचाई बजट खाने वाले महाराष्ट्र ने सूखे से लड़ने की अपनी क्षमता खो दी है। वहाँ सूखे के नाम पर हर साल स्यापा है।

आज, सिंचाई परियोजनाओं में घोटालों को लेकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पाटी के नेता अजीत पवार, एंटी करप्शन ब्यूरो के घेरे में हैं। उन पर कोकण क्षेत्र की कोंडाणे, कालू और बालगंगा सिंचाई परियोजनाओं में टेंडर नियमों का उल्लंघन कर ठेके देने का आरोप है। कहा गया कि इसी कारण परियोजनाओं की लागत बढ़ी।

मेधा पाटकर, सरदार सरोवर बाँध परियोजना को मध्य प्रदेश में हुए व्यापम घोटाले से बड़ा घोटाला बता रही हैं। शुक्र है कि पश्चिम बंगाल ने कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिये इस बार किसी बड़े बाँध नहीं, छोटे-छोटे चैकडैम तथा जलसंचयन ढाँचों के निर्माण हेतु 500 करोड़ की योजना को हाथ में लेने का विचार बनाया है।

स्वावलम्बन की सीख का क्या हुआ?


नदी मध्य बाँधों से बनने वाली बिजली को ‘क्लीन एनर्जी: ग्रीन एनर्जी’ कहने वाले हावर्ड विश्वविद्यालय के एक अध्ययन की भी उपेक्षा करने पर आमादा हैं। हावर्ड के अध्ययन कि मिथाइल मरकरी को हमारी नसों के लिये जहर बताते हुए बाल मस्तिष्क तथा बौद्धिक क्षमता पर दुष्प्रभाव का स्रोत पाया है। ठहरे प्रवाह में होने वाली गैस निर्माण तथा उत्सर्जन प्रक्रिया इस लिहाज से घातक है। दिल्ली उद्घोषणा में ऐसे ज़हरों के निर्माण पर लगाम लगाने के उपाय सुझाए गए थे।

प्रदूषित हिंडन नदीनदी से पानी की न्यूनतम निकासी की राय के साथ कहा गया था कि किसी भी शहर को तब तक बाहरी क्षेत्रों/खादर से जलापूर्ति न की जाय, जब तक वह शहर अपने स्थानीय जल संसाधनों के संरक्षण, वर्षाजल का संचयन तथा उपचार प्रक्रिया के पश्चात प्राप्त जल का पूरी तरह इस्तेमाल न करने लग जाये।

क्या किसी शहर ने जलसंचयन, संरक्षण के साथ-साथ उपचारित जल के उपयोग की दिशा में कदम उठाए? दिल्ली में उपचारित जल के बागवानी, बस की धुलाई आदि में उपयोग की अच्छी खबर है। सीवेज शोधन में विशेषज्ञ, श्री जनक दफ्तरी कहते हैं कि यदि सीवेज के जैविक तरीके से उपचारित न किया गया हो, तो ऐसे पानी का पुनः उपयोग, दिल्ली के खूबसूरत बागीचों की हरियाली को भी प्रदूषित कर सकता है। यदि यह ठीक है, तो दिल्ली से आई खबर भी पूरी तरह अच्छी नहीं है।

बिहार चुनाव में प्रस्तावित गंगा बैराजों का मुद्दा न बनना दुर्भाग्यपूर्ण


उद्घोषणा में नदी की अविरल और निर्मल बनाए जाने को संवैधानिक सिद्धान्त किये जाने की एक अन्य महत्त्वपूर्ण राय रखी गई थी। तटबन्ध, बाँध, बैराज की उपयोगिता तथा रेत खदान, जल परिवहन की निष्पक्ष समीक्षा के बाद ही आगे की नीति तय करने को एक जरूरी कदम के रूप में चिन्हित किया गया था। क्या हुआ?

क्या सरकार ने फरक्का से इलाहाबाद तक बैराज और जलपरिवहन की प्रस्तावित परियोजना पर पुनर्विचार करने की जहमत उठाई। नहीं, बल्कि खबर है कि सरकार ने जलमार्ग परियोजना को फरक्का से पटना के निकट बारा से आगे बढ़ाकर इलाहाबाद तक एक राष्ट्रीय जलमार्ग के रूप में अमलीजामा पहनाना तय कर लिया है। दुर्भाग्य है कि बिहार चुनाव में गंगा की दुर्गति का यह इन्तजाम, चुनावी मुद्दा नहीं है।

क्या मूर्ति विसर्जन सम्बन्धी आदेश लागू हो सके?


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंगा-यमुना में मूर्तियों के विसर्जन पर रोक का आदेश दिया। क्या उत्तर प्रदेश के धर्म समाज ने इस आदेश की पालना हेतु कोई व्यापक पहल की? उड़ीसा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सभी ज़िलाधीशों को पत्र लिखकर मूर्ति विसर्जन हेतु अपने मार्गदर्शक कायदों से अवगत् कराया है।

प्रशासन से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि विसर्जन की वजह से कोई जलसंरचना प्रदूषित न होने पाये। इसी बीच राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने भी यमुना में प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियों के विसर्जन पर इस माह से रोक लगा दी है। क्या हुआ? बीते 18 सितम्बर को विश्वकर्मा पूजा के दिन हर तरह की मूर्ति का विसर्जन हुआ। यमुना के घाट पॉली तथा अन्य कचरे से भर गए। यमुना सिसकती रही, भक्त चले गए विश्वकर्मा जी की जय बोलते हुए।

‘दिल्ली उद्घोषणा’ की लाज रखने का वक्त


एक वर्ष पूर्व दिल्ली उद्घोषणा में बहुत कुछ बताया, सुनाया और सिखाया गया था। सभी को यहाँ एक लेख में शामिल करना व्यावहारिक नहीं हैं; फिर भी मैं बार-बार प्रथम भारत नदी सप्ताह के निष्कर्षों के रूप में जारी ‘दिल्ली उद्घोषणा’ का उल्लेख एक खास मकसद से कर रहा हूँ।

मकसद यह है कि वर्ष 2015 के अन्तरराष्ट्रीय नदी दिवस पर हम इतना तो सोचें कि पिछले वर्ष 2014 में की महत्त्वपूर्ण कवायद से हमने जो कहा, जो सीखा; उसे कितना अपनाया। गौर कीजिए कि कहने और सीखने वालों में वर्तमान जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनर्जीवन मंत्री सुश्री उमा भारती और पूर्व वन एवं पर्यावरण मंत्री श्री जयराम रमेश भी थे।

सुश्री उमा भारती नेे कहा था - “यदि हम अपनी नदियों को बचाना चाहते हैं, तो हमारा सबसे पहला कदम यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि बिना शोधन किया हुआ पानी या सीवेज, शोधित किये हुए पानी व नदी में मिश्रित न होने पाये।’’ क्या भारत के सभी जल-मल शोधन संयंत्रों, नालों और फ़ैक्टरियों ने यह सुनिश्चित किया?

नदी से नाला बनी मिठी नदीउमा जी ने भारत नदी सप्ताह को आश्वस्त किया था कि नदियों के लिये ‘न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह’ सुनिश्चित किया जाएगा। क्या भारत की किसी एक भी नदी में शासकीय तौर पर यह सुनिश्चित किया गया?

उमा जी ने यह भी कहा था कि नदी जोड़ परियोजना अध्ययन के बाद यदि पारिस्थितिकीय और पर्यावरणीय समस्या का निष्कर्ष सामने आया, तो नदी जोड़ परियोजना को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।

उमा जी, अपने कहे पर टिक सकें। जयराम रमेश, पर्यावरण मंत्री के तौर पर पूर्व में दिखाए अपने तेवरों को कांग्रेस शासित वर्तमान प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों, जलसंसाधन, सिंचाई व पर्यावरण मंत्रियों को सीखा सकें और ‘दिल्ली उद्घोषणा’ की अनुपालना कर नदी के कार्यकर्ता अपनी स्थानीय छोटी नदियों को जीने का अधिकार लौटाने में लग जाएँ; इस अन्तरराष्ट्रीय नदी दिवस पर नदियों को इतनी सौगात काफी होगी। किन्तु क्या ‘दिल्ली उद्घोषणा’ के एक वर्ष बाद भी यह होगा? यह सवाल मेरे लिये भी है और आपके लिये भी।

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

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स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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