भूजल गुणवत्ता प्रबन्धन पर प्रशिक्षण पुस्तिका

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भूजल गुणवत्ता प्रबन्धन पर प्रशिक्षण मार्गदर्शिका

जल एवं जल चक्रः


Untitledपृथ्वी की सतह का 2/3 भाग जल के द्वारा आच्छादित है तथा इस सम्पूर्ण जल का केवल 2.5 प्रतिशत भाग ही पीने योग्य है तथा अन्य भाग (लगभग 97.5 प्रतिशत) खारे पानी के रूप में है। पीने योग जल का लगभग 3/4 भाग बर्फ तथा हिमखण्डों के रूप में जमा है तथा केवल 1/4 भाग ही सम्पूर्ण पृथ्वी के जीवन के लिए उपलब्ध है। यह शुद्ध जल तालाओं, नदियों, झरनों तथा भूजल के रूप में उपलब्ध है।

जल चक्र के द्वारा एक स्थान का जल दूसरे स्थान जैसे वायुमंडल, समुद्र तथा जमीन आदि में विभिन्न अवस्था परिवर्तन करते हुए घूमता रहता है। तथा जल का यह चक्रण सूर्य के द्वारा मिलने वाली ऊर्जा के द्वारा सम्भव होता है। पृथ्वी में जीवों के अस्तित्व के लिए जल चक्र की एक अग्रणी एवं महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

जल चक्र में सूर्य की ऊर्जा के द्वारा जल, वाष्पन की प्रक्रिया से गुजरता है। इसके अन्तर्गत समुद्र, नदियों तथा तालाबों आदि का जल वाष्प बनकर वायुमंडल में बिखर जाता है। पौधों के द्वारा होने वाली वाष्पण की प्रक्रिया के द्वारा भी बहुत सारा जलवाष्प के रूप में वायुमंडल में पहुँचता है। इसके बाद धीरे-धीरे वाष्पण द्वारा ऊपर वायु मंडल में जाने वाला गैसीय जल पहले बादल में बदलता है तथा फिर ठंडा होकर वर्षा, तथा हिमपात आदि क्रियाओं द्वारा पुनः पृथ्वी में वापस लौट आता है। वर्षा द्वारा आये हुए जल की कुछ मात्रा सीधे पुनः वाष्पित होकर वायुमंडल में लौट जाती है तथा कुछ जल जमीन के अंदर जाकर भूजल का भंडारण करता है तथा कुछ भाग पृथ्वी की ऊपरी सतह में नदियों, तालाबों आदि के रूप में उपस्थित रहता है और जल की बहुत बड़ी मात्रा पुनः बहकर समुद्र में पहुँच जाती है।

भूजल विज्ञानः भूजल विज्ञान की वह शाखा जिसमें जमीनी सतह के अन्दर पाये जाने वाले जल का अध्ययन किया जाता है। अर्थात भूजल विज्ञान, भूविज्ञान तथा जल विज्ञान का सम्मिलित स्वरूप है।

जल स्रोत: जल के स्रोत मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं।

i. सतही जल (नदी, पोखर, तालाब तथा गदेरा आदि)
ii. भूजल (गहरे तथा उथले कुएँ, झरने, नौला, बावड़ी एवं नलकूप आदि)

भूजल क्या है?


i. पृथ्वी की ऊपरी सतह के नीचे मिट्टी के रन्ध्रों में तथा चट्टानों की दरारों आदि में एकत्रित जल को भूजल कहा जाता है।
ii. कोई भी चट्टान या चट्टानों का समूह तथा अन्य अवसाद (sediment) जिन से उपयुक्त मात्रा में जल का दोहन किया जा सके उन्हें एक्वीफर (जलीय चट्टानी पर्त) कहते हैं।
iii. वह गहराई जहाँ पर मृदा के रन्ध्र या चट्टानों की दरारें आदि जल द्वारा संतृप्त होती है उस गहराई को जल-तल (water table) कहते हैं।
iv. भूजल का भण्डारण तथा प्रवाह प्राकृतिक सतह के आधार पर निर्धारित होता है, प्राकृतिक भूजल झरनों, छोटे धारों तथा रिसाव के द्वार बाहर आता है जिससे (oases) (मरुभूमि में नमी) तथा (wetland) (नमभूमि) जैसी संरचनाएँ बनती हैं।

भूजल कहाँ से आता है?


i. वर्षा का कुछ जल पृथ्वी की सतह के नीचे छिद्रों की मदद से रिसाव के द्वारा नीचे पहुँच कर भूजल का भण्डारण करता है।
ii. भ्रंश, अपभ्रंश तथा दरारों के द्वारा वर्षा का जल सीधे चूने पत्थर की गुफाओं तथा शिंक गड्ढे आदि में जमा होकर भूजल कहलाता है।

जल तत्व:


i. संतृप्त तथा असंतृप्त सतहों को पृथक करता है, जल तल के नीचे संतृप्त सतह तथा इसके ऊपर असंतृप्त सतह होती है। भूजल का भण्डारण रिसाव वर्षा की मात्रा, भूमि की सतह तथा मृदा की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।
ii. संतृप्त सतह के ऊपरी तल को जल-तल कहते हैं, जल-तल मौसम, वर्षा तथा बर्फ के पिघलने के अनुसार कम या ज्यादा होता रहता है।
iii. सूखे गर्मी के मौसम में जल तल का मान आर्द्ध तथा वर्षा वाले मौसम की तुलना में कम होता है।

संतृप्त सतहः


i. रिसाव का कुछ पानी पेड़ पौधों की जड़ों, कीड़े मकोड़ों तथा अन्य सूक्ष्म जीवों द्वारा उपयोग कर लिया जाता है तथा बचा हुआ जल पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के द्वारा नीचे की ओर जाता है, तथा नीचे उपस्थित सभी मृदा एवं चट्टानों के खाली स्थानों में भण्डारित हो जाता है, इसी सतह को संतृप्त सतह कहा जाता है।

असंतृप्त सतह:


i. भूमि की सतह तथा जल तल के मध्य की सतह को असंतृप्त सतह कहते हैं। इस तरह में मृदा तथा चट्टानों के रन्ध्र व छिद्र आंशिक रूप से जल द्वारा भरे होते हैं तथा शेष भाग में हवा, पौधों की जड़ें तथा मृदा के जीव व सूक्ष्मजीव भरे होते हैं।
ii. नीचे स्थित जल तल को असंतृप्त सतह द्वारा जल उपलब्ध होता है तथा प्रवाहित जल का कुछ भाग पौधों की जड़ों द्वार उपयोग किया जाता है। असंतृप्त सतह सीधे तौर पर कुओं को जल उपलब्ध नहीं कर सकता।

भूजल का भण्डारण कैसे होता हैः


i. भूजल एक्वीफर में भण्डारित होता है। एक एक्वीफर मृदा या चट्टानों की वह संरचना है जो किसी कुआँ, झरने या बोर को उचित तथा उपयोगी जल प्रदान करता है।

स्थानीय भूजल प्रवाह कम, मध्यम, अधिक

छोटा

भूजल भण्डारण मध्यम, अधिक अत्याधिक

क्ष.क.अ.

न.स.च.

प.घ.भ.

ए.अ.ए.

म.ख.स.

क्षरित कणीय आधार:- अत्यधिक क्षरित अग्नेय/ रूपांतरित चट्टानें एक पतले तथा कम पारगम्य पर्त का निर्माण करते हैं जिससे कम उपलब्धता वाले एक्वीफर का निर्माण।

 

नवीन समुद्री चूना पत्थर:- कोरल तथा खोल से उत्पन्न चूना पत्थर आपस में जमकर चट्टानों का निर्माण जिससे छोटे-छोटे द्वीप का निर्माण।

 

दो पर्वतीय घाटियों का भराव:- अएकीकृत अवसाद (कंकड एवं बालू) कई बार ज्वालामुखी के लावा एवं अन्य पदार्थों से मिलकर मोटी पर्त बनाते हैं।

 

एकीकृत:- अवसादीय एक्वीफर बालूआ तथा चूना पत्थर एकीकृत होकर मोटे तथा भ्रंशयुक्त गहरे एक्वीफर का।

 

मुख्य खादर संरचनाएँ:- अएकीकृत अवसाद (कंकड, पत्थर एवं बालू) की अत्याधिक मोटी चट्टान।

 

 

पारगम्यता एवं संरन्ध्रता: किसी एक्वीफर के जल धारण की क्षमता तथा उससे उपलब्ध होने वाले जल के निर्धारण में मिट्टी एवं चट्टानों की पारगम्यता तथा संरन्ध्रता की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
i. पारगम्यता से यह पता चलता है कि किसी चट्टान या मृदा से जल किस प्रकार तथा कितनी तेजी से बह सकता है।
ii. एक अपारगम्य पदार्थ अपने द्वारा जल के प्रवाह को रोकता है। बालू तथा ग्रेवल (छोटे-छोटे पत्थरों) की पारगम्यता अत्याधिक होती है तथा एक घनी चट्टान एवं क्ले की पारगम्यता अत्याधिक कम होती है।
iii. संरन्ध्रता मिट्टी या चट्टान की पानी धारण करने की क्षमता होती है। अधिकतर जल का प्रवाह मृदा के बड़े रन्ध्रों के द्वारा होता है। यद्यपि बालू और कंकड़ों में रन्ध्रों की संख्या क्ले (चिकनी मिट्टी) की तुलना में कम होती है, परन्तु बालू और कंकड़ क्ले की तुलना में अधिक जल संग्रहित करते हैं क्योंकि इनके दो कणों के बीच में स्थान अधिक होता है।
iv. प्राथमिक संरन्ध्रता पत्थरों के कणों के बीच रिक्त स्थान के कारण होती है। जबकि द्वितीयक संरन्ध्रता टूट-फूट, जोड़ों, क्षरण तथा पत्थरों के घुलने के कारण होती है।
v. संरन्ध्रता को प्रतिशत आयतन के द्वारा निरुपति किया जाता है।
vi. किसी क्ले में जल संग्रहण की क्षमता 50 प्रतिशत तक हो सकती है परन्तु क्ले पेयजल हेतु कुँओं को पर्याप्त मात्रा में जल नहीं दे सकते क्योंकि इसमें रन्ध्रों का आकार अत्याधिक सूक्ष्म होता है।

प्रकृति में जल हमारी इच्छानुसार नहीं उपलब्ध होता अपितु यह उन जगहों पर उपलब्ध होता है जहाँ की भौगोलिक परिस्थितियाँ इसके अनुकूल होती है।

जलीय चट्टानी पर्त (एक्वीफर): इस शब्द की उत्पत्ति जल को धारण करने की क्षमता से हुई है। इसके अन्तर्गत संतृृप्त सतह की वो पारगम्य चट्टानें, बालू तथा पत्थर आते हैं जो पर्याप्त मात्रा में जल को उपलब्ध करते हैं।

पुनः भण्डारणः भूजल के पुनः भण्डारण की आवश्यकता है। वर्षा तथा हिम पिघलाव से उत्पन्न जल के रिसाव का जलीय चट्टानी पर्त (एक्वीफर) में जाने को भूजल का पुनः भण्डारण कहा जाता है।

i. किसी जलीय चट्टानी पर्त का पुनः भण्डारण क्षेत्र वह भू-भाग होता है जहाँ का / से जल उस जलीय चट्टानी पर्त में जाता है। किसी एक्वीफर का पुनः भण्डारण क्षेत्र अत्यन्त सूक्ष्म या कुछ वर्ग मील तक का हो सकता है।
ii. सीमित जलीय चट्टानी पर्त का पुनः भण्डारण क्षेत्र अत्याधिक सूक्ष्म जबकि असीमित जलीय चट्टानी पर्त का पुनः भण्डारण क्षेत्र अत्याधिक विस्तृत हो सकता है।

सीमित जलीय चट्टानी पर्त (Confined Aquifer) : पूर्णतया संतृप्त जलीय चट्टानी पर्त जिसके ऊपर और नीचे अपारगम्य पर्त होती है, इस पर्त में पानी का दाब वायुमंडल तथा जल-तालिका के दाब से अधिक होता है।

असीमित जलीय चट्टानी पर्त (Unconfined Aquifer): यह एक पारगम्य तथा आंशिक रूप से जल द्वारा भरी तथा नीचे की ओर अपेक्षाकृत अपारगम्य पर्त द्वारा ढकी होती है, इसकी ऊपरी सतह वायुमंडल दाब में मुक्त जल तालिका द्वारा निर्धारित होती है।

i. सीमित जलीय चट्टानी पर्त अथवा अरटेशियन एक्वीफर, अपारगम्य मृदा अथवा चट्टानों के मध्य दाब में रहते हैं। अपारगम्य पर्तों को परिसीमन पर्त कहा जाता है।
ii. परिसीमन पर्त जल के प्रवाह को कम करता है तथा जल को सीमित एक्वीफर से नीचे प्रवाहित होने से रोकता है। इस पर्त में जल परिसीमन पर्तों में दबाव बनाते हुए क्षैतिज दिशा में आगे बढ़ता है।
iii. परिसीमन पर्त जल को प्रदूषण से बचाता है क्योंकि मृदा में रहने वाले प्रदूषक अपारगम्य परिसीमन पर्त को पार नहीं कर पाते।
iv. असीमित एक्वीफर अथवा जल तालिका एक्वीफर में किसी भी प्रकार की परिसीमन पर्त नहीं होती जो इसे पृथ्वी की सतह से पृथक कर सके, इसलिए इस एक्वीफर के प्रदूषित होने की सम्भावना अधिक होती है।

एक्वीफ्लूडः एक संतृप्त भू-संरचना जो सामान्य अवस्था में पर्याप्त जल निर्गत करने में असमर्थ होती है जैसे चिकनी मिट्टी तथा शेल।

एक्वीटार्ड: कम पारगम्य भू-संरचना जैसे बालू/रेत की पर्त के बीच में चिकनी मिट्टी की पर्त।

एक्वीफ्यूज: अत्याधिक कम संरन्ध्र संरचना जो न तो जल ग्रहण कर सकती है और न ही जल का उत्सर्जन जैसे बसाल्ट एवं ग्रेनाइट।भूजल का प्रवाह: भूजल, जल संग्रहण क्षेत्र से जल वितरण क्षेत्र की ओर प्रवाहित होता है। सामान्यतः भूजल सतही जल की नकल करते हुए ऊँचाई वाले क्षेत्र से निचले क्षेत्र की ओर प्रवाहित होता है।

डार्सी के नियमानुसार संतृप्त परत में भूजल प्रवाह की दर पत्थरों की पारगम्यता तथा जल दाब पर निर्भर करती है। जहाँ कहीं भी जल तालिका पृथ्वी की सतह को काटती है वहाँ भूजल का उत्सर्जन होता है और झरने व धाराओं की उत्पत्ति होती है। अर्थात धारायें भूजल द्वारा पोषित होती है। भूजल के अन्य उदाहरण हैं झरनों का प्रवाह तथा प्राकृतिक रिसाव, अर्थात भूजल तथा सतही जल आपस में सम्बन्धित होते हैं।

भूजल का रसायन शास्त्र: भूजल का भू-रसायन विज्ञान, भूजल तथा मातृ चट्टानों में उपस्थित तत्वों की रासायनिक क्रिया पर निर्भर होता है।

i. तत्व जो पृथ्वी के क्रस्ट को बनाते हैं उनमें मुख्यतः सिलिकान, एल्युमिनियम और ऑक्सीजन तथा साथ में क्षारीय धातुएँ (पोटैशियम, सोडियम) तथा क्षारीय मृदा धातुएँ (कैल्शियम एवं मैग्नीशियम) होती हैं।
ii. जलीय चट्टानी पर्तें जो चूना पत्थर, डोलोमाइट, जिप्सम, हेलाइट तथा कार्बनिक पदार्थों आदि से बनी होती हैं, उनमें से होकर गुजरने वाले जल की तय की गई दूरी के अनुसार एवं ऐसी चट्टानों/पर्तों के सम्पर्क में रहने के समय के अनुसार कम या ज्यादा मात्रा में रासायनिक क्रियानुसार तत्व घुलते हैं।
iii. जल के रासायनिक गुण धर्म, जल स्रोत के प्रकार, वाष्पन, पत्थरों के प्रकार तथा समय पर निर्भर करते हैं।

जल गुणवत्ता का महत्व:


जल गुणवत्ता:
i. जल गुणवत्ता का तात्पर्य जल की उपयुक्तता विभिन्न प्रकार के उपयोगों से है।
ii. किसी भी प्रकार का जल उपयोग जल के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक गुण धर्मों के आधार पर निर्धारित किया जाता है।
iii. स्वच्छ जल का महत्व इसकी गुणवत्ता तथा उपलब्धता, जल के अत्याधिक दोहन, मौसम, तथा प्रदूषण के कारण चिन्ता का विषय बन गई है।
iv. जल - स्वच्छ, शीतल, निर्मल, गंधरहित तथा सभी ऐसी अशुद्धियों से मुक्त होना चाहिए जिसके प्रयोग से कोई दुष्प्रभाव हो।
जल की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले कारक: जल की गुणवत्ता कई प्राकृतिक तथा मानवीय कारकों के द्वारा प्रभावित होती है।

i. मुख्य प्राकृतिक कारक हैः भूगर्भीय, मौसम, जल-चक्र, जल ग्रहण क्षेत्र आदि
ii. इन कारकों के प्रभाव अधिकतम होते हैं जब जल की मात्रा कम होती है, उन लवणता जैसी समस्याओं शुष्क क्षेत्रों तथा समुद्र तटीय क्षेत्रों में अधिकतम होती है। जल की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता होने के बावजूद भी यदि गुणवत्ता में कमी है तो इसके सीमित प्रयोग ही सम्भव है।
iii. मानव क्रियाओं का प्रभाव जल गुणवत्ता में विभिन्न प्रकार से तथा विश्व व्यापी है।
iv. मानव मल द्वारा जल प्रदूषण की समस्या किसी निश्चित स्थान से लेकर व्यापक भी हो सकती है तथा इसके प्रभाव तथा उपचार विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं।
मानव मल द्वारा जल प्रदूषण होने के मुख्य कारण हैं:
- उद्योगों द्वारा उत्सर्जित अवजल तथा ठोस
- अपशिष्टों का अनुचित निस्तारण
- गाँवो, कस्बों एवं शहरों का बहिस्राव एवं वाहितमल तथा ठोस अपशिष्ट
- कूड़ा निस्तारण की सार्वजनिक सुविधायें न होने के कारण।
- कूड़ा एकत्रण तथा निष्पादन की क्षमता का कम होना या सही ढंग से न चलना।
- मानव मल तथा अन्य गंदगी का सीधे एक्वीफर में निस्पादन।

जल गुणवत्ता के प्रभावः


i. हर वर्ष एक अरब से ज्यादा लोग अत्याधिक हानिकारक जल का सेवन करते हैं।
ii. दूषित जल पीने से प्रतिदिन 3900 बच्चों की मौत होती है।
iii. अरबों लोग गरीबी और बीमारी के शिकार हो जाते हैं।

जल की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले कारकः

मुख्य

द्वितीयक

सूक्ष्म मात्रा

अति सूक्ष्म मात्रा

1-1000 मि.ग्रा./ली.

0.01-10 मि. ग्रा./ली.

0.001-0.1 मि. ग्रा./ली.

0.001 मि. ग्रा./ली. से कम

सोडियम, मैग्नीशियम कैल्शियम

पोटैशियम, लौह धातु

एल्युमिनियम, आर्सेनिक, कैडमियम, एन्टीमनी, क्रोमियम, ताम्बा, सीसा, मैगनीज, मोलिब्डेनम, निकिल, जस्ता, फास्टेट

बेरीलियम, बिस्मथ, सीजियम, गैलियम, सोना, प्लेटिनम, चाँदी, थोरियम, टिन, जिर्कोनियम आदि

बाई-कार्बोनेट, सल्फेट, क्लोराइड, सिलिका

कार्बोनेट, नाइट्रेट, फ्लोराइड, बोरान

यूरेनियम, वैनेडियम सिलेनियम आदि

-

 

जल गुणवत्ता अनुमापनः सतही जल की गुणवत्ता मौसम, मृदा तथा आस-पास के क्षेत्र की प्रकृति पर निर्भर करती है। नदी तथा झीलों के पानी के मुख्य प्रदूषक स्रोत तीव्र शहरीकरण तथा औद्योगीकरण है। भूजल के प्रदूषित होने की सम्भावना कम होती है। भूजल का प्रदूषण सामान्यतः कूड़े के ढेरों तथा गन्दे पानी के इधर-उधर फैलने तथा रिसाव के द्वारा होती है।

i. जल गुणवत्ता अनुमापन के लिए विश्वसनीय अनुमापन आँकड़े बुनियादी आधार होते हैं।
ii. अनुमापन का तात्पर्य सही तरीके से नमूना एकत्र करना, मापन और आँकड़ों के निरूपण से होता है।
iii. जल गुणवत्ता का अनुमापन समयावधि के अनुसार तीन प्रकार से किया जाता है। विस्तृत समय हेतु कम समय हेतु तथा लगातार।

अनुमापन - यह एक लम्बे समय तक चलने वाला अध्ययन है इसमें जलीय पर्यावरण के उतार चढ़ाव का आकलन किया जाता है।

सर्वेक्षण - किसी एक निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति हेतु कम समय में होने वाले अनुमापन अध्ययनों को इस श्रेणी में रखा जाता है।

निगरानी - यह एक सतत अध्ययन होता है जिसका उद्देश्य विशिष्ट अनुमापन, सर्वेक्षण होता है जिनका उपयोग जल प्रबन्धन तथा अन्य क्रियाओं हेतु किया जाता है।

जल गुणवत्ता के क्षरण को रोकने के उपायः


जल गुणवत्ता के क्षरण को रोकने के लिए त्रिस्तरीय उपाय निम्नवत हैं।
i. जल की गुणवत्ता तथा जलीय पर्यावरण की गुणवत्ता अनुमापन के बाद ऐसे जल उपयोग तरीकों का उपयोग किया जाता है जिनसे जल गुणवत्ता क्षरण कम होता है।
ii. निस्काषन से पहले जल को उपचारित किया जाता है जिससे प्रदूषण की रोकथाम हो सके।
iii. निम्न गुणवत्ता के जल को उपयोग के पहले शुद्ध किया जाता है।

जल गुणवत्ता अनुमापन हेतु कारक:


यद्यपि देखने में साफ सुथरे जल का मतलब यह नहीं कि पानी पीने योग्य सुरक्षित है। जल की गुणवत्ता को निर्धारित करने के लिए निम्न तीन बिन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक है।

i. सूक्ष्म जीव के संक्रमण - जीवाणु, विषाणु, प्रोटोजोआ तथा कीड़े
ii. रसायनिक प्रदूषण - तत्व, धातु एवं रसायन
iii. भौतिक प्रदूषण - तापमान, रंग, गंध स्वाद एवं गंदलापन

सुरक्षित पेयजल में निम्न सूक्ष्म जैविक, रासायनिक तथा भौतिक गुणवत्ता होनी चाहिए।

i. संक्रमक जीवों से मुक्त
ii. विषाक्त पदार्थों की सान्द्रता का कम होना
iii. शुद्ध
iv. रंगहीन

अधिकतर विकासशील देश के लोगों के स्वास्थ्य की अधिकतर समस्यायें जल में विषाणुओं/जीवाणुओं के संक्रमण से होती है। रसायनिक प्रदूषकों को हमेशा कम प्राथमिकता पर रखा जाता है क्योंकि इसके लिए अधिक उपभोग समय की जरूरत होती है जबकि जीवाणुओं का संक्रमण तुरन्त होता है। गंदलापन तथा जीवाणुओं के अनुमापन को जल गुणवत्ता का आधार कारक माना जाता है।

जल में पाये जाने वाले सभी रसायनों की जाँच जटिल तथा खर्चीली प्रक्रिया होती है। रसायनिक कारकों की जाँच विशिष्ट लक्षणों के आधार पर करनी चाहिए।

जल गुणवत्ता के कारकः


i. भौतिक कारक
ii. रसायनिक कारक
iii. जीवाणुवीय कारक

जल गुणवत्ता के कारकों का चयन करते समय निम्न सूचनाओं पर ध्यान देना चाहिएः


i. परीक्षण/ नमूने की भौगोलिक स्थिति
ii. परीक्षण क्षेत्र में जैविक तथा रसायनिक संदूषकों का प्रकार एवं संभावनाएँ
iii. उद्देश्य के आधार पर परीक्षण किये जाने वाले कारकों का चुनाव

पी.एच. वैद्युत चालकता-धन आयनः सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम व मैग्नीशियम-ऋण आयनः क्लोराइड, सल्फेट, बाईकार्बोनेट और कार्बोनेट- कुल घुलित ठोस- क्षारियता तथा अम्लता- फ्लोराइड- लवणता, आर्सेनिक लौह धातु-नाइट्रेट- कीटनाशी- भारी धातुएँ जैसे- सीसा, कैडमियम, क्रोमियम, पारा, आदि- कुल तथा मल कोलीफार्म जीवाणु।

नमूने की आवृति - उद्देश्य तथा स्रोत के प्रकार के आधार पर नमूने की आवृति, समय तथा संख्या का निर्धारण किया जाना चाहिए। जैसे पीने के पानी के जीवाणुओं की जाँच प्रत्येक हफ्ते तथा लगभग एक साल तक करना चाहिए। इसके पश्चात परिणामों के विश्लेषण के बाद यह आवृति घटाई या बढ़ाई जा सकती है।

जाँच आवृति की तालिका


क्र.स.

कारक

आवृति

1.

तपमान

2.

रंग

3.

गंध

4.

पी.एच.

5.

क्षारीयता अम्लता

पी. एच. के आधार पर

6.

कठोरता

7.

कुल घुलित लौह

8.

क्लोराइड

9.

फ्लोराइड

10.

नाइट्रेट

11.

अवशेष क्लोरीन

12.

कोलीफार्म जीवाणु

<b>नोटः</b> अ 7-15 दिन के अन्तराल में ब मौसमी तीन महीने में एक या दो बार

 

नमूने को एकत्र करना तथा संग्रहण


नमूने के परीक्षण के सही परिणाम तभी आते हैं जब नमूने को सही प्रकार से लिया तथा संग्रहीत किया जाए तथा उनका परीक्षण या प्रयोगशाला तक पहुँचाने की व्यवस्था जल्द से जल्द करनी चाहिए। यदि नमूने का परीक्षण समय पर न किया जाए तो उसे खराब होने से बचाने के लिए आइस बॉक्स या फ्रिज में कुछ समय तक संरक्षित किया जा सकता है।

नमूने की मात्रा: भौतिक तथा रसायनिक परीक्षणों हेतु 2 ली. नमूना लेना चाहिए। जबकि जीवाणुओं के परीक्षण हेतु अलग से 1 ली. नमूना लेना आवश्यक होता है।

नमूने का बर्तन: साफ तथा साबुन से घुलने के बाद आसुत जल से साफ की गई दो ली. की प्लास्टिक की नई बोतल का उपयोग करना चाहिए। आसुत जल की उपलब्धता न होने पर बोतल को नमूने के पानी से ही धो लेना चाहिए। जबकि जीवणुओं/कोलीफार्म के नमूने को काँच की साफ एवं sterilized (संक्रमण मुक्त) बोतल में लेना चाहिए।

नमूना एकत्र करने का तरीका: नमूना एकत्र करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि लिया गया नमूना पूरे जल स्रोत को व्यक्त / निरुपति करे।

हस्त-नल से नमूना लेने की विधिः


हैण्डपम्प से नमूना एकत्र करने से पहले हैण्डपम्प को काफी देर तक चला लेना चाहिए जिससे ये भूजल का प्रतिनिधित्व/ व्यक्त करने लगे। बोतल को नमूने से ही कई बार धुलने के बाद, बोतल को बिल्कुल भर कर हवा अवरोधी करते हुए बंद कर लेना चाहिए। जबकि कोलीफार्म विश्लेषण हेतु लिये गये नमूने की बोतल में थोड़ी सी जगह छोड़ देनी चाहिए।

सप्लाई टैप झरनों का नमूना एकत्र करनाः


सप्लाई टैप को 1-2 मिनट तक खुला छोड़ने के बाद नमूने को एकत्र करना चाहिए जिससे नमूना पूरी सप्लाई को व्यक्त करे तथा बोतल के ढक्कन को हवा अवरोधी करते हुए बंद करना चाहिए।

कुँओं, बावड़ी का नमूना एकत्र करनाः


बोतल में रस्सी की मदद से एक भार को बाँध कर कुएँ में डुबोना चाहिए तथा नमूना लेते समय यह ध्यान देना चाहिए कि बोतल न तो कुएँ के निचले तल को छुए और ना ही कुएँ के किनारों को।

सतही जल (नदी, झील तथा तालाबों) का नमूना एकत्र करना:


नदी से नमूना एकत्र करने के लिए धारा के बहाव के नीचे की तरफ खड़े होकर तथा बीच बहाव से लेना चाहिए। सामान्यतः सम्मिलित नमूना एकत्र करना चाहिए परन्तु यदि त्वरित नमूना लेना है तो धारा के मध्य तथा लगभग मध्य गहराई से लेना चाहिए। झीलों तथा तालाबों से नमूना एकत्र करते समय नमूना एकत्र करने का स्थान, गहराई और आवृत्ति इस प्रकार निर्धारित करना चाहिए जिससे स्थानीय कारक जैसे - वर्षा, वर्षा का जल, हवा आदि का प्रभाव न्यूनतम हो।

क्र. स.

कारक (Parameter)

नमूना लेने का पात्र

परीक्षण

अधिकतम समय तक रखने की सीमा

1.

तापमान

प, क

तुरन्त करें

-

2.

रंग

प, क

फ्रिज में रखें

48 घंटे

3.

पी.एच.

प, क

तुरन्त करें

2 घंटे

4.

पानी की क्षारीयता

प, क

फ्रिज में रखें

24 घंटे

5.

पानी की कठोरता

प, क

1 मि.ली. सान्द्र नाइट्रिक अम्ल/ली. में डालें

6 महीने

6.

क्लोराइड

-

-

-

7.

फ्लोराइड

-

28 दिन

8.

नाइट्रेट

प, क

1 मि.ली. सान्द्र नाइट्रिक अम्ल/ली. में डालें

48 घंटे

9.

रेसिडुअल क्लोरीन

प, क

तुरन्त करें  फ्रिज में 10 डिग्री सें.

30 मिनट

10.

कोलीफार्म

 क

फ्रिज में रखें

6 घंटे

 

प - प्लास्टिक की बोतल
क - काँच की बोतल

प्रत्येक नमूने के साथ दिनांक, समय, स्थान, स्रोत का प्रकार, जल का तापमान के साथ अन्य उपयोगी जानकारी को लिखित रूप में रखना चाहिए। यदि नमूना तुरन्त जाँचा न जा सके तो कुछ समय तक फ्रिज या आइस बाॅक्स में रखा जा सकता है।

नमूने का भण्डारण तथा परिवहन


नमूना बोतल का ढक्कन अच्छी तरह से बंद करना चाहिए। इसमें क्रम संख्या, स्थान, समय आदि के विवरण वाली चिट/पर्ची लगा देना चाहिए। यदि सम्भव हो तो नमूने को बर्फ के डिब्बे में संरक्षित करना चाहिए।

आवश्यक सावधानियाँ


i. एक नमूना स्थान से दूसरे नमूना स्थान से इतना दूर होना चाहिए कि वहाँ पानी के गुण में परिवर्तन आया हो।
ii. रुके हुए पानी एवं सड़े हुए पानी का नमूना नहीं लेना चाहिए।
iii. नदी या नहर से नमूना हमेशा बहाव के विपरीत से लेना चाहिए।
iv. जीवाणुओं का परीक्षण करने के लिए नमूना काँच की बोतल में लेना चाहिए तथा ऊपर कुछ जगह छोड़ देना चाहिए।

मानव स्वास्थ्य पर जल प्रदूषकों का प्रभाव:


भौतिक प्रदूषकों के स्वास्थ्य पर सीधे प्रभाव तो नहीं होते पर इनकी उपस्थिति से अन्य प्रदूषकों की सम्भावना बढ़ती है जैसे जीवाणुओं का संक्रमण तथा रासायनिक संक्रमण आदि। उदाहरण के लिए अधिक गंदलापन को बीमारी पैदा करने वाले विषाणु, जीवाणु तथा अन्य परिजीवियों के होने की सम्भावना बढ़ जाती है।

जल में उपस्थित रसायनों का स्वास्थ्य पर लाभदायक व हानिकारक दोनों तरह के प्रभाव हो सकते हैं। सप्लाई जल में कई रासायनिक संदूषक प्राकृतिक अथवा मानव की क्रिया से पहुँचते हैं। भूजल में प्राकृतिक रूप से पाये जाने वाले संदूषक हैं- आर्सेनिक, फ्लोराइड, सल्फर, कैल्शियम तथा मैग्नीशियम। मानक की क्रियाओं से नाइट्रोजन, फास्फोरस और कीटनाशक आदि भूजल, सतही जल तथा वर्षा जल में मिलते रहते हैं। औद्योगिक रासायनिक अपशिष्टों के द्वारा अधिकांशतः जल स्रोत प्रदूषित होते जा रहे हैं।

रासायनिक प्रदूषकों का प्रभाव लगातार दूषित जल पीने से सामने आता है। इन प्रभावों की तीव्रता रसायन के प्रकार, सान्द्रता, तथा संक्रमण अवधि पर निर्भर करती है।

भौतिक एवं रासायनिक कारकों के संक्षिप्त विवरणः-


रंग: पीने वाले जल के रंग कुछ कार्बनिक पदार्थों के साथ-साथ कुछ धातुओं जैसे लोहा, मैग्नीज तथा ताम्बा के कारण होता है। वह स्थान जहाँ चूना पत्थर होता है वहाँ भूजल में रंग प्राकृतिक जैविक पदार्थों के कारण होता है

जल का रंग

सम्भावित संदूषक/प्रदूषक

झाग, फेन

साबुन, डिटरजेंट

काला

मैग्नीज एवं जीवाणु

भूरा, पीला तथा लाल

लौह धातु

गहरा भूरा, पीला तथा हरा

पौधों के प्राकृतिक रंग से, शैवालों से

सफेद जमाव

कठोरता एवं घुली धातुएँ

 

स्वाद एवं गंध:- सामान्यतः स्वाद एवं गंध अनुभव के आधार पर अनुमापित किये जाते हैं। जब किसी अपरचित नमूने को अनुमापित कर रहे हो तो नमूने को सीधे सूँघने की बजाय गंध हाथ की सहायता से अपनी ओर धकेल कर अनुभव करना चाहिए तथा अपरिचत नमूने को कभी भी पीना नहीं चाहिए।

यदि पानी का स्वाद नमकीन है तो इसका मतलब लवण ज्यादा है।

गंध के अनुभव

सम्भाविक संदूषक

मिट्टी, फफूंद जैसी

एक्टीनो माइसिटीज जीवाणु

घास या भूसा

शैवाल एवं सड़ा हुआ घास आदि

दलदली तथा तीव्र सड़े अंडे की तरह

प्राकृतिक या मानवीय सल्फर

 

क्लोरीन: सप्लाई जल में क्लोरीन जीवाणुओं को मारने के लिए मिलाई जाती है यदि इसकी गंध ज्यादा आती है तो इसका मतलब आवश्यकता से अधिक मिलाई गई है जो आगे नुकसानदेह हो सकती है।

तापमान: जल का मुख्य भौतिक कारक तापमान है, 20 डिग्री-30 डिग्री सें. से अधिक तापमान वाले जल में जीवाणुओं की वृद्धि तेजी से होती है। जिससे स्वाद, गंध, रंग तथा क्षरण जैसी समस्याओं के साथ अन्य रासायनिक पदार्थ की ज्यादा मात्रा में घुल जाते हैं।

गंदलापनः जल में गंदलापन निलम्बित कणों के कारण होता है, अधिक गंदले जल में बालू, सिल्ट, क्ले तथा सूक्ष्म जीवाणुओं के साथ शैवालों की अधिकता हो सकती है।

वैद्युत चालकताः जल की वैद्युत चालकता का तात्पर्य जल में घुलित रसायनों से हैं। जितने ज्यादा रसायन जल में घुलें होंगे वैद्युत चालकता उतनी ही ज्यादा होगी।

कुल घुलित ठोसः कुल घुलित ठोस के अन्तर्गत घनआयन (कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, सोडियम तथा लौह आदि) तथा ऋण आयन (बाई-कार्बोनेट, कार्बोनेट, क्लोराइड, फ्लोराइड, नाइट्रेट तथा सल्फेट आदि) एवं सिलिका आदि का पानी में घुला होना प्रदर्शित करता है।

कुल कठोरताः जल की कठोरता का मतलब जल प्रदूषण से नहीं है परन्तु इससे जल में उपस्थित कैल्शियम तथा मैगनिशियम की उपस्थिति का अनुमान होता है। 75 प्रतिशत मि.ग्रा./ली. से कम कठोर जल को मृदु जल तथा इससे ऊपर कठोरता वाले जल को कठोर जल कहते हैं। कठोरता के द्वारा होने वाली बीमारियों के हानिकारक तत्व पानी में नहीं घुल पाते जैसे- कैल्शियम की अधिक उपस्थिति में कैडमियम के घुलने की दर कम हो जाती है। यदि पानी में कठोरता ज्यादा है तो, देर से उबलता है, खाना बनाने के बर्तनों में सफेद पर्त जमा हो जाती है, साबुन झाग कम देता है, सप्लाई पाईपों में पर्त जमा हो जाती है आदि।

कुल क्षारीयताः जल की अम्ल को उदासीन करने की क्षमता को क्षारीयता कहते हैं। जल की क्षारीयता का अर्थ जल में घुले हुए बाईकार्बोनेट, कार्बोनेट तथा हाईड्राक्सिल आयनों के घुलने से है। कुल क्षारीयता निम्न तत्वों के घुलने से भी होती है। बोरेट, फास्फेट, सिलिकेट तथा अन्य क्षारीय लवण मानव के लिए क्षारीयता नुकसानदायक नहीं है परन्तु इसके द्वारा कई बार जल का स्वाद बदल जाता है।

क्लोराइडः क्लोराइड आयन जल तथा अशुद्ध जल में उपस्थित मुख्य आयन है। पीने वाले जल में क्लोराइड कई बार नमकीन स्वाद पैदा करता है। सतही जल में सीवर जल से क्लोराइड पर्याप्त मात्रा में पहुँचता है क्योंकि एनएसीएल मनुष्य के द्वारा उपयोग तथा उत्सर्जित किया जाता है।

जल में क्लोराइड के स्रोत:


i. लवणों तथा लैंडफिल के रिसाव का बहाव
ii. सेप्टिक टैंक तथा औद्योगिक मल
iii. सिंचाई का बहाव तथा तटीय क्षेत्रों में समुद्र के पानी का रिसाव

सोडियमः सोडियम भूजल में प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला प्रमुख धन आयन है। यह भूजल में कई तरह की क्षरण तथा चट्टानों के द्वारा पहुँचता है।

मैग्नीशियम: प्राकृतिक भूजल में कई प्रकार की चट्टानों से मैगनीशियम पहुँचता है। मैगनीशियम की सान्द्रता विनिमय साम्य तथा अन्य उपस्थित आयनों पर निर्भर करती है। प्राकृतिक रूप से मैग्नीशियम का शुद्धीकरण, रिसाव के द्वारा स्वतः सोडियम धातु के द्वारा होता है। प्राकुतिक रूप से पाये जाने वाली मैगनीशियम की सान्द्रता, विषक्तता के नीचे होती है।

500 कि.ग्रा./ली. से अधिक सान्द्रता वाले जल का स्वाद खराब हो जाता है। मैगनीशियम से जल की कठोरता बढ़ती है तथा कैल्शियम की उपस्थिति में जल संग्रहण बर्तनों में पर्ते जमा हो जाती है।

पोटैशियम: जल में प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला तत्व होता है तथा पत्थरों के क्षरण से जल में पहुँचता है कई बार अपशिष्ट जल द्वारा भी भूजल में पहुँचता है।

नाइट्रेट: सभी पेड़ पौधों तथा जीवों के लिए नाइट्रोजन प्रोटीन बनाने के लिए आवश्यक तत्व है। सामान्यतः सतही जल में नाइट्रेट सूक्ष्म मात्रा में उपस्थित होता है परन्तु इसकी मात्रा भूजल में अधिक हो सकती है। भूजल तथा सतही जल में नाइट्रेट सही ढँग से अशोधित बहित मल, खेती की अपशिष्टों आदि से पहुँचता है।

i. स्वपोषित जीवाणुओं की संख्या जल में अधिक होने से नाइट्रेट की सान्द्रता जल में बढ़ जाती है।
ii. भूजल में अमोनिया की मात्रा ज्यादा होने पर नाइट्रेट की सान्द्रता बढ़ती है।

फ्लोराइड: भूजल में फ्लोराइड प्राकृतिक रूप से या मानव क्रियाकलापों से मिलता है अधिक फ्लोराइड सान्द्रता वाले जल को शोधित करने के बाद ही मानव उपयोग में लाना चाहिए।

कुल लौह धातुः भूजल में लौह धातु कुछ विशेष प्रकार की चट्टानों के द्वारा पहुँचता है। भूजल में अवायुवीय अवस्था में लौह धातु फेरस आयन (oxidation state +2) के रूप में मिलता है तथा जैसे ही हवा के सम्पर्क में आता है ऑक्सीकृत होकर लाल, भूरा या काले रंग का अवक्षेप बनाता है। जल में लौह की उपस्थित से अन्य भारी धातुओं के घुलने की सम्भावना कम हो जाती है।

सल्फेट: सभी प्रकार के प्राकृतिक जल में सल्फेट आयन पाया जाता है। मिट्टी के घुलित लवणों के द्वारा इसकी सान्द्रता जल में बढ़ती है। वर्षा के जल में अत्याधिक वायुमण्डलीय प्रदूषण के कारण सल्फेट की मात्रा बढ़ती है।

भारी धातुएँ: जल से पाँच गुना ज्यादा वजनी धातुओं को भारी धातुएँ कहते हैं। यह सभी यदि मानक से ज्यादा हैं तो मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त नुकसानदायक होती है।

आर्सेनिकः आर्सेनिक पृथ्वी में सूक्ष्म मात्रा में पाया जाता है, यह मृदा तथा तत्वों के द्वारा हवा, जल तथा जमीन में पहुँचता है। हवा की धूल, जल बहाव, कृषि एवं उद्योगों के अपशिष्ट इसके फैलने के प्रमुख कारक हो सकते हैं। विकासशील देशों की आर्सेनिक प्रमुख समस्या है।

कैडमियमः कैडमियम मुख्यतः पृथ्वी के क्रस्ट में पाया जाता है। कैडमियम की काफी मात्रा चट्टानों के क्षरण से जल में पहुँचती है तथा कुछ कैडमियम हवा में जंगलों के जलने तथा ज्वालामुखी फटने से पहुँचता है तथा कैडमियम रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों के द्वारा भी जल में पहुँचता है।

सीसा (लेड) : सूक्ष्म मात्रा में सीसा प्राकृतिक चट्टानों से जल में पहुँचता है पर हानिकारक सीसा उद्योगों जैसे बैटरी, चमड़ा उद्योग तथा रासायनिक औद्योगिक अपशिष्ट के द्वारा भूजल में पहुँचाता है। जीवाश्म तेलों में सीसा की मात्रा होती है जो दहन के पश्चात वायु में मिल जाता है। वायु में मिले सीसा के भारी कण कुछ ही देर में जमीन तथा सतही जल में मिल जाते हैं। तथा छोटे सूक्ष्म कण वर्षा के द्वारा नीचे जमीन तथा पानी में मिलते हैं।

पाराः सामान्यतः पारा विभिन्न प्रकार की चट्टानों के अलावा कोयला आदि में भी प्राकृतिक रूप में पाया जाता है। विभिन्न प्रकार के उद्योगों में पारे का उपयोग उत्प्रेरक के रूप में किया जाता है तथा बहुत सारे यन्त्र जैसे- थर्मामीटर, दाब मापी आदि में पारे का उपयोग सीधे तौर पर होता है। रासायनिक कीटनाशी तथा अन्य उत्पाद जबकि कार्बनिक क्लोराइड का उपयोग होता है वहाँ धातुओं के अमल गम का उपयोग उत्प्रेरक के रूप में होता है। भोपाल की विनाशकारी तथा कुछ चर्चित औद्योगिक घटना के बाद कम्पनी के सारे कच्चे पदार्थ को आस-पास ही निष्पादित किया। लगभग 28 साल बाद भी आज क्षेत्र के भूजल में पारे की मात्रा मिलती है।

भारतीय मानक अनुसंधान केन्द्र के अनुसार जल गुणवत्ता की आपेक्षित मात्रा हेतु नियम व मानक

क्रम

कारक

आपेक्षित मात्रा

प्रभाव

अनुमापन के तरीके

1.

पी.एच.

6.5-8.5

इस मात्रा से अधिक होने पर वितरण प्रणाली तथा आँतों की दीवारों में प्रभाव

आँखों में जलन व त्वचा के प्रभाव

लिटमस पेपर व इलैक्ट्रॉनिक मीटर

2.

रंग

रंगहीन

रसायनिक तथा जैविक प्रदूषण

आँखों से देखकर

3.

गंध

गंधहीन

जैविक तथा रसायनिक संक्रमण/प्रदूषण

सूंघकर

4.

तापमान

सामान्त 4-10 डिग्री सें. अधिकतम 15 डिग्री सें.

अधिक तापमान में रासायनों के घुलने की गति तीव्र हो जाती है तथा गैसों के कम घुलने से जल में स्वाद तथा गंध में परिवर्तन होता है

थर्मामीटर

5.

गंदलापन

5NTU

कार्बनिक पदार्थ, भारी धातुओं तथा सूक्ष्म जीवों के कारण जलीय जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है

नैफ्लोमीटर से सेकी डिस्क

6.

वैद्युत चालकता

-

यह जल में घुले हुए पदार्थों को प्रदर्शित करता है

कन्डीक्टीविटी

7.

कुल घुलित ठोस

500-2000 मि.ग्रा./ली.

2000 मि.ग्रा./ली. से अधिक होने पर जानवरों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। 2100 मि.ग्रा./ली. से ज्यादा कृषि हेतु हानिकारक

गुरुत्वीय तरीके से, इलैक्ट्रॉनिक मीटर से

8.

कठोरता

300-600 मिग्रा./ली.

मृदु जल से मिनरल की कमी हो सकती है जिससे हृदय सम्बन्धित रोग सम्भव है।

500 मि.ग्रा./ली. से ऊपर होने पर पथरी जैसी समस्याएँ हो सकती हैं

ई.डी.टी.ए.- अनुमापन विधि द्वारा

9.

कुल क्षारीयता

200-600 मिग्रा./ली.

अधिक क्षारीय जल सिंचाई के लिए उपयुक्त नहीं होता

अनुमापन द्वारा

10.

क्लोराइड

250-600 मिग्रा./ली.

धात्विक पाइपों में जंग तथा पौधों में समस्या, त्वरित क्लोराइड वृद्धि सीवर संक्रमण की सम्भावना

अनुमापन द्वारा

11.

सोडियम

-

हृदय सम्बनन्धि विकार

फ्लेम फोटो मीटर से

12.

मैग्नीशियम

>30 मिग्रा./ली.

500 मि.ग्रा./ली. से अधिक होने पर जल का स्वाद बदल जाता है

EDTA अनुमापन द्वारा

13.

पोटैशियम

-

कम मात्रा में मानसिक तनाव, मांसपेशियों का कमजोर होना, हृदय की धड़कन में प्रभाव, अधिक होने पर स्नायु में खराबी तथा हृदय विकार

फ्लेम फोटो मीटर

14.

नाइट्रेट

45 मिग्रा./ली.

अधिक नाइट्रेट से यूट्रोफीकेशन की घटना, तथा छोटे बच्चों में नीले बच्चे रोग (Blue baby) की सम्भावना

कैलोरीमीट्रिक

15.

फ्लोराइड

1.0 मिग्रा./ली.

दन्तीय, हड्डी तथा अहड्डी वाली फ्लोरोसिस बिमारी

रंगहीन व फोटो मीटर

16.

कुल लौह

0.3 मिग्रा./ली.

उल्टी, मानसिक तनाव, तीव्र तथा मंच श्वसन में तकलीफ, पेट की समस्याएँ आदि अत्यधिक सेवी से होमोक्रोटोसिस

फेनैब्थ्रोलीन विधि रंगमीटर

17.

सल्फेट

200 मिग्रा./ली.

अस्वीकार्य स्वाद तथा कड़वा स्वाद

गुरुत्वीय विधि, टरविडिटी विधि

18.

कैडमियम

0.01 मिग्रा./ली.

इटाई-रटाई रोग, डायरिया, उल्टी, पेट में दर्द, हड्डियों का खराब होना तथा मस्तिष्क विकास तथा शरीर की प्रतिरोधक क्षमता में प्रभाव

एटामिक एब्जार्बसन स्पेक्ट्रो-फोटोमीटर

19.

सीसा (लेड)

0.1 मिग्रा./ली.

ज्यादा समय तक सीसे की कम मात्रा के सेवन से भी बच्चों तथा गर्भवती महिला मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है

एटामिक एब्जार्बसन स्पेक्ट्रो-फोटोमीटर

20.

आर्सेनिक

0.5 मिग्रा./ली.

लीवर, किडनी, फेफड़ों तथा त्वचा में कैंसर। मस्तिष्क में बुरा प्रभाव तथा आर्सेनिकोसिस

एटामिक एब्जार्बसन स्पेक्ट्रो-फोटोमीटर अपचयन विधि

21.

पारा

0.001 मिग्रा./ली.

मस्तिष्क के मुख्य भाग में प्रभाव, किडनी पर मुख्य दुष्प्रभाव

एटामिक एब्जार्बसन स्पेक्ट्रो-फोटोमीटर मरकरी एनालाइजर

22.

कुल कॉलीफार्म

10 प्रति 100 मि.ली.

इनके द्वारा कई प्रकार की बिमारियाँ जैसे –उल्टी, दस्त, पीलिया होती है

फरमन्टेशन तथा फिल्टर मेम्बरेन द्वारा

23.

फीकल कॉलीफार्म

0 प्रति 100 मि.ली.

इससे प्रत्यक्ष रूप से कोई बिमारी नही होती, परन्तु इसकी उपस्थिति मानव मल के संक्रमण का सूचक होता है।

फरमन्टेशन तथा फिल्टर मेम्बरेन द्वारा

 

नोटः इन सभी कारकों के विश्लेषण हेतु प्रयोगशाला की आवश्यकता होती है, परन्तु इनमें से कुछ कारकों के अनुमापनों हेतु कई सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाएँ जल गुणवत्ता परीक्षण किट बनाती हैं उनसे सम्पर्क कर मंगाया जा सकता है, इनमें से लोग विज्ञान संस्थान द्वारा भी जल परीक्षण किट बनाई जाती है, जो देश के विभिन्न भागों में सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा प्रयोग की जा रही हैं।

लोक विज्ञान संस्थान द्वारा निर्मित जल गुणवत्ता मापन किट के द्वारा पी.एच. तापमान, कुल लौह, फ्लोराइड, क्लोराइड, नाइट्रेट, कुल क्षरीयता, फास्फेट कुल कठोरता, गंदलापन, तथा मल-जीवाणुओं का आंकलन किया जा सकता है। परीक्षण हेतु सरल भाषा में मैनुअल भी दिया जाता है जिसे देखकर पढ़ने एवं कुछ गुणा भाग में सक्षम कोई भी व्यक्ति परीक्षण कर सकता है।

सूक्ष्म जैव (जीवाणु) कारक:


मानव मल एवं कुल कोलीफार्म जीवाणुः
मानव जल जीवाणु के द्वारा स्वयं तो किसी प्रकार का संक्रमण नहीं होता परन्तु इसकी जल में उपस्थिति से यह पता चलता है कि जल में मानव मल मिला हुआ है तथा इससे उन सभी जीवाणुओं के पाये जाने की सम्भावना बढ़ जाती है जिससे दूसरी हानिकारक बिमारियाँ होती हैं जैसे- पेचिस, हैजा, आन्त्रशोध, तपेदिक, जिर्आडिआ, पीलिया आदि।

जल जनित बिमारियाँ: वह बिमारियाँ जो जल के उपयोग से होती हैं। कुछ बिमारियाँ जल के असुरक्षित रख-रखाव से भी फैलती हैं। जैसे- पेचिस, हैजा, पीलिया।

जल आधारित बिमारियाँ: कुछ बिमारियाँ जल में उपस्थित कीड़ें-मकोड़ों के परिजीवियों द्वारा फैलती है। जैसे- मलेरिया, डेंगू फाइलेरिआ।

जल प्रदूषण: जल प्रदूषण का तात्पर्य जल में उपस्थित उन रासायनों तथा सूक्ष्म जीवों से है जिससे जल के भौतिक गुण (जैसे तापमान, रंग, स्वाद गंध तथा गन्दलेपन में अन्तर) रासायनिक गुणों में परिवर्तन होता है जिससे जल के विभिन्न उपयोगों में प्रभाव पड़ता है अर्थात जल पीने योग्य, कृषि योग्य या औद्योगिक उपयोगों हेतु उपयुक्त नहीं रह जाता है।

भूजल प्रदूषण: जब विभिन्न प्रकार के प्रदूषण विभिन्न माध्यमों से भूजल को प्रदूषित करते हैं तथा भूजल के भौतिक तथा रासायनिक गुणों में परिवर्तन कर देते हैं। भूजल प्रदूषण के विभिन्न कारण जीवाणु, विषाणु, कीटनाशक, भारी धातुऐं तथा कार्बनिक पदार्थ होते हैं।

भूजल प्रदूषण के प्रमुख स्रोतः सैप्टिक टैंक, छोटे सोक पिट, घरेलू रसायन, ठोस अपशिष्ट, औद्योगिक बहिस्राव, भूमिगत भण्डारण (तेल गैसों का आदि) रासयनिक खादें, कीटनाशक एवं खरपतवारनाशी, परिवहन बहाव, सप्लाई पाइप लाइन, शहरी अपशिष्ट अक्रियाशील खदाने, विकास कार्य आदि।

भारत के भूजल प्रदूषण की स्थितिः सम्पूर्ण भारत के लगभग सभी राज्य किसी न किसी प्रकार के भूजल प्रदूषण से प्रभावित हैं मध्य तथा पश्चिमी भारत के 13 राज्यों में क्लोराइड का प्रदूषण, हिमालयी राज्यों को छोड़कर 19 राज्य फ्लोराइड द्वारा प्रभावित हैं, 23 राज्य लौह प्रदूषण, 21 राज्य नाइट्रेट द्वारा तथा पूर्वी भारत के 5 राज्यों का भूजल आर्सेनिक से प्रदूषित हैं। वहीं पर हिमालयन राज्य, आयरन एवं जैवाणविक प्रदूषण से प्रभावित है।

जल स्रोत संदूषण के खतरों का आंकलनभूजल प्रदूषण के स्रोतः केन्द्रित स्रोत (प्वाइंट स्रोत): ऐसा प्रदूषण जो किसी निश्चित दृश्य स्रोत के द्वारा फैलता है (जैसे- सीवर, नाली, औद्योगिक अपशिष्ट आदि)। इस प्रकार के प्रदूषकों की रोकथाम व पहचान सम्भव हैं।

विकेन्द्रित स्रोतः इस प्रकार का प्रदूषण दृश्य नहीं होता तथा इसमें बहाव का जल जो विभिन्न प्रदूषकों को अपने साथ बहाकर लाता है जैसे खेती के रसायन आदि। इसमें रिसाव वाले प्रदूषक मुख्य रूप से आते हैं।

भूजल स्रोतों की स्वच्छता स्थिति के खतरों को आंकलन के लिए बुनियादी तथ्य


प्रस्तावना
शौचालयों से ट्यूबवेल, हैण्ड पम्प, उथले कुएँ (कम गहराई के कुआँ) आदि जल-स्रोतों का संदूषण एक चिन्ताजनक मुद्दा है। जिस पर सामान्यतया कम ध्यान दिया जाता है। जलापूर्ति, स्वच्छता कार्यक्रम के क्रियान्वयन में संलग्न संस्थायें इसका आंकलन अविवेकपूर्ण ढंग से करती है और यह पूर्व अनुमानित कर लिया जाता है कि इस स्थिति से स्वास्थ्य के लिए खतरा प्रायः कम रहता है।

इस तथ्य चार्ट (Fact Sheet) में वर्णित खतरा आंकलन की विधियाँ, योग्य तकनीकी सक्षम इंजीनियर से सम्पन्न की जा सकेगी। समस्या को अच्छी तरह से समझना, इस सम्बन्ध में पहला कदम होना चाहिए। इस तथ्य चार्ट सूक्ष्म जीवों के संदूषण को उत्पन्न करने के कारकों पर आधारभूत जानकारी देता है जैसे खतरा आंकलन के सिद्धान्त और इससे सम्बन्धित विषय बिन्दुओं, खतरा आंकलन का कार्य सही ढंग से करने के लिए जिन पर अधिक ध्यान और निरीक्षण करने की आवश्यकता होती है। नाइट्रेट या रासायनिक प्रदूषण आंकलन की इस लेख की कोई जानकारी नहीं दी गयी पर कुछ क्षेत्रों में इसके प्रदूषण की भी समस्या हो सकती है।

रोगाणु के गुण और जल संदूषण


अधिकांश रोगाणु जिस पर्यावरण में रहते हैं वहाँ वे स्वयं आगे गति करने या आगे बढ़ने की क्षमता नहीं रखते हैं और न ही उनमें अधिक दूरी तक पहुँचते/चलने की क्षमता भी नहीं होती है। अतः रोगाणु एक स्थान से दूसरे स्थान पर माध्यम द्वारा जिसमें वे रहते हैं, ले जाये जाते हैं जैसे शौचालय से जल संदूषण स्थल तरल पदार्थ के रूप में गड्ढे में एकत्रित हो जाते हैं। अतः रोगाणु आगे नहीं बढ़ते हैं या जिस जल में वे निलम्बित रहते हैं उनकी तुलना में वे आगे नहीं बढ़ते हैं। इस महत्त्वपूर्ण जानकारी का स्मरण रहना चाहिए जब जल संदूषण स्थल समझने का प्रयास कर रहे हों।

रोगाणु की दो अन्य विशेषतायें हैं जो जल-स्रोत के संदूषण की उनकी क्षमता को प्रभावित करती है- रोगाणु का आकार, रोगाणु मरने की दर।

आकार


हेल्मिथींज कृमि अण्डा और प्रोटोजोआ अपेक्षाकृत बड़े हैं और मिट्टी में भौतिक छानने की प्रक्रिया के माध्यम से प्रभावी रूप से निकल जाते हैं। (लोविस फोस्टर इटआल 1980) जीवाणु और विषाणु बहुत छोटे आकार के होते हैं और वे मिट्टी और उप-मिट्टी की परतों से बगैर किसी रूकावट के चलने में बहुत अधिक सक्षम होते हैं। जीवाणु और विषाणु जिनकी घातकता बहुत चिंतनीय है उनको यहाँ पर सारणी में दिया गया है।

क्र.सं

विषाणु जनित रोग

रोगाणु

1.

इनफैक्टियस हैपेटायसिस

हैपेटायसिस ए विषाणु

2.

पेलियो मायलिटिस

पोलियो विषाणु

3.

डायरियल बीमारी

रोटा विषाणु, नारवाक एजेन्ट, अन्य विषाणु

 

जीवाणु जनित रोग

जीवाणु

1.

कॉलरा

विवरियो कोलेरो

2.

टायफायड

सलमोनिला टायफो

3.

पैराटायफायड

सलमोनिला पेराटायफो

4.

वैसीलरी डायसैन्टरी

सेजिला

5.

डायरीयल बीमारी

इण्टरटोक्सीजेनिक्स इ. कोलाई, सालमोनिला Spp कैप्यलोवैक्टर Spp

 

मृत्यु दर


भिष्टा (Faecal) के साथ सूक्ष्म जीव रहते हैं जो पर्यावरण में सीमित अवधि जीवन रखते हैं पर इनके मरने की अवधि में बहुत अधिक अन्तर देखा गया है, यह कुछ घण्टों से कई महीनों तक हो सकती है। भूजल में कुछ विषाणु 150 दिन तक जीवित रहते हैं। ई. कोलाई की सूचकांक जीवाणु की स्थिति में भूजल में आधा जीवन अनुमानित किया गया। 50 प्रतिशत संख्या कम होने में लगा समय यह अधिकतम 10 से 12 दिन तक रहते हैं। अधिकतम संख्या में 32 दिन तक जीवित रहते हैं। सलमोमिला की कुछ जातियाँ 42 दिन तक रहती हैं यदि रोगाणु को जल-स्रोत तक पहुँचने में अधिक समय लगता है तो रोगाणु मर जायेंगे और जल लम्बे समय में लोक स्वास्थ्य के लिए भय नहीं रहेगा।

नीचे चित्र में 6 विभिन्न कारकों को दर्शाया गया है जो रोगाणु को शौचालय से नजदीक के जल-स्रोत में प्रेषण को प्रभावित कर सकते हैं। ये चक्रीय रूप में वर्णित किए गए हैं।

शौचालय


जल-स्रोत
i. गड्ढे में तरल पदार्थ की मात्रा
ii. गड्ढे और भूजल स्तर के बीच की दूरी
iii. असंतृप्त क्षेत्र की प्रकृति
iv. शौचालय और जल-स्रोत के बीच क्षैतिज दूरी
v. संतृप्त क्षेत्र की प्रकृति
vi. जल प्रवाह की दिशा तथा वेग

1. गड्ढे में तरल पदार्थ की मात्रा


गड्ढे में कोई भी तरल पदार्थ निश्चित या पूरा संदूषित होगा। इस तरल की मात्रा शौचालय के प्रकार और शौच क्रिया की साफ-सफाई की विधि पर निर्भर करती है। यदि गड्ढा तरल पदार्थ से पूरी तरह भरा हुआ है तो यह गड्ढे के अन्दर में अधिक Static Head उत्पन्न करता है और तरल पदार्थ उप मिट्टी के असंतृप्त क्षेत्र पर अधिक बल के साथ दबाव डालेगा (कुछ क्षेत्र जो भूजल स्तर से ऊपर है जो जल से संतृप्त नहीं है) अगर गड्ढा सूखा है तो Static Head उत्पन्न नहीं होता है और कोई दबाव नहीं पड़ता है और असंतृप्त क्षेत्र में प्रवाह नहीं होता है। सूखे शौचालय तन्त्र में रोगाणु गड्ढे के अन्दर में रहते हैं और जल-स्रोत संदूषित नहीं होते हैं। सूखे शौचालय तन्त्र का प्रयोग भूजल संदूषण की दृष्टि से पारिस्थितिकीय स्वच्छता में सुरक्षित विकल्प है।

सामान्य नियमः गड्ढे में तरल की कम मात्रा से जल-स्रोत के संदूषण जोखिम कम हो जाते हैं।

2. असंतृप्त क्षेत्र की प्रकृति


कुछ प्रकार की उप मिट्टियों के कणों के मध्य स्थान बहुत कम है तो वे रोगाणुओं को मिट्टी से पास नहीं होने देते हैं। मिट्टी फिल्टर की तरह कार्य कर प्रभावित करती है छानने की यह प्रक्रिया शौचालय स्थापित में और बढ़ जाती है, जब सूक्ष्म जीवों की कार्बनिक परत उप मिट्टी के कणों के ऊपर विकसित होती है (जैसे मन्द रेत फिल्टर) और यह रोगाणुओं को आगे बढ़ने में प्रभावकारी रूप से रोक देती है।

अवसाद

चिकनी और बलुई

बारीक रेत

मध्यम रेत

रेतीली पथरीली

पथरीली

कणों का आकार

<0.06 मि.मी.

0.06 मि.मी. 0.2 मि.मी.

0.2 मि.मी. 0.6 मि.मी.

0.6 मि.मी.

2 मि.मी.

>2 मि.मी.

 

कुछ बलुई मिट्टियाँ विषाणुओं को अवशोषित करने की भी क्षमता रखती है और उन्हें संतृप्त क्षेत्र में जाने से रोक देती है।

सामान्य नियमः छोटे कणों के अवसाद में संदूषण का जोखिम कम रहता है।

3. गड्ढे के आधार और जल स्तर के मध्य दूरी


रोगाणु युक्त जल में रोगाणु जल स्तर की ओर जाते हैं। अधिक टेढ़ा-मेढ़ा इसका मार्ग और लम्बा, इसको रोक लेता है। इस अतिरिक्त समयान्तराल में अधिकांश रोगाणु स्वभाविक रूप से मर जाते हैं। जब इस कारक का आंकलन वर्षा के समय या गिले मौसम में अधिक गहराई के जल स्तर में कर रहे हैं और शीघ्र सूखे मौसम के जल स्तर में यह सब ध्यान देने की आवश्यकता होती है।

सामान्य नियमः गड्ढे के आधार और जल स्तर के मध्य अधिक दूरी से जल संदूषण का जोखिम कम हो जाता है।

4. संतृप्त क्षेत्र की प्रकृति (Aquifer)


जल चट्टान के माध्यम से प्रवाहित होता है तो इसे जल प्रवेश्यता (भेदता) के रूप में जानते हैं (इसे मीटर प्रतिदिन के रूप में मापते हैं) और यह कणों के आकार और कणों के मध्य में स्थान (छिद्रता) पर निर्भर करती है, काफी अच्छी तरह से एक दूसरे के साथ जुड़े हैं। रेतीली और पथरीली मिट्टी के कणों के छिद्र एक दूसरे से अच्छी तरह से जुड़े रहते हैं और जल अपेक्षाकृत सरलता से प्रवाहित हो जाता है परिणामस्वरूप वे जल प्रवेश्यता की सीमा 10 से 100 मी. प्रति दिन रखते हैं। बलुई अधिक छिद्रता रखते हैं पर उनके छिद्र बहुत कम जुड़े रहते हैं और जल उनसे बड़ी कठिनाई से निकलता है फलस्वरूप बलुई 0.01 से 0.1 मी. प्रति दिन की जल प्रवेश्यता रखते हैं।

सतत आकार के पास-पास बचे छोटे कण बहुत कम एक दूसरे से जुड़े रहते हैं। फलस्वरूप जल आसानी से प्रवाहित नहीं हो पाता।

बड़े असतत आकार कण फलस्वरूप छिद्र स्थान अच्छे से एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं और जल सरलता से प्रभावित हो जाता है।

नीचे की सतह एक्वीफर में जल एकत्र करने की क्षमता कणों के मध्य उपस्थित स्थान के आयतन पर निर्भर करता है। रेतीली मिट्टी 0.3 छिद्रता रख सकते हैं। (उनके 30 प्रतिशत आयतन में वायु है) संघटित ठोस चट्टान की छिद्रता बहुत कम अवसरों 0.1 अधिक होती है।

सामान्य नियमः एक्वीफर (नीचे की सतह) की अधिक प्रवेश्यता से जल-स्रोत के संदूषण का जोखिम अधिक रहता है।

5. जल-स्रोत और शौचालय के मध्य की क्षैतिज दूरी:


शौचालय और जल स्रोत के मध्य क्षैतिज दूरी अधिक होने पर रोगाणु मध्य स्थित दूरी को तय करके भूजल स्तर में प्रवेश कर जल-स्रोत में पहुँचते हैं। अतः रोगाणु अधिक समय तक रुके रहते हैं। इस दौरान अधिकांश रोगाणु सम्भवतया मर जाते हैं।

सामान्य नियमः
जल-स्रोत और शौचालय के मध्य अधिक क्षैतिज दूरी होने पर जल-स्रोत संदूषण का खतरा कम रहता है।

6. भूजल प्रवाह की दिशा और वेगः


सामान्यतया जल नीचे की ओर प्रवाह करता है यद्यपि भूजल के लिए प्रायः इसी तरह अपेक्षित है। यह बहुत सही कहा जाता है कि जल हमेशा कम जल शक्ति और ढाल की ओर चलता है। यह अधिक दबाव क्षेत्र से कम दबाव क्षेत्र की ओर प्रवाहित होता है। सामान्यतया भूजल पहाड़ी के ढाल का अनुसरण करेगा और नदी, झील या समुद्र की ओर प्रवाहित होगा। अधिक ढाल में भूजल पहाड़ी के ढाल का अनुसरण करेगा और नदी, झील या समुद्र की ओर प्रवाहित होगा। अधिक ढाल में भूजल अपेक्षाकृत तेजी से प्रवाहित होता है (यदि रोगाणु, संदूषित जल है) तो यह जल-स्रोत में पहुँच जाएँगे।

यदि शौचालय जल-स्रोत से अधिक ऊँचाई पर स्थित है तो जल-स्रोत में शौचालय से संदूषण की समस्या उत्पन्न होगी। फिर भी कई गाँव में शौचालय को ऊँचाई क्षेत्र/ऊँचे स्थानों पर रखते हैं जबकि जल-स्रोत सामान्यतया नीचे स्थलों/घाटी में पाये जाते हैं जहाँ इन्हें भूजल सरलता से प्राप्त हो जाता है।

सामान्य नियम: जल-स्रोत की ओर अधिक ढाल या नीचे में स्थित जल-स्रोत में संदूषण का खतरा अधिक रहता है।

उपर्युक्त छः नियमों को समझने के साथ प्रारम्भिक जोखिम आंकलन करना सम्भव होता है।

जल स्रोत संदूषण के खतरों का आंकलन


शौचालय से जल-स्रोत संदूषण के खतरों का आंकलन निम्न बातों पर आधारित है। रोगाणुयुक्त जल के जल-स्रोत तक पहुँचने में लगा समय। रोगाणुयुक्त जल शौचालय गड्ढे से जल-स्रोतों की ओर चलता है और इसे जल-स्रोत तक पहुँचने में अधिक समय लगता है तो रोगाणु मर जाते हैं और इनकी संख्या में बहुत अधिक कमी हो जाती है। हमारा आशय होना चाहिए कि शौचालय या जल-स्रोत का स्थान ऐसे सुनिश्चित करें कि रोगाणु जल-स्रोत में पहुँचने के पहले ही मर जाये और रोगाणु संदूषण के खतरे का स्तर कम हो जाये जिससे लोग स्वास्थ्य के लिए कोई समस्या न हो सके।

शौचालय से जल-स्रोत तक पहुँचने में लगा समय संदूषण के खतरों के सूचकांक के रूप में उपयोग किया जा सकता है। ब्रिटिश भूगर्भ सर्वेक्षण (बीजीएस) ने शौचालय/स्वच्छता के क्षेत्र से भूजल संदूषण के खतरों के आंकलन में किया जाता है।

1.

संदूषण का अधिक खतरा

25 दिन से कम समय

2.

कम खतरा

25 दिन से अधिक समय

3.

बहुत कम खतरा

50 दिन से अधिक समय

 

(BGS-ARGOSS 2001)
ARGOSS ने सावधानी लेते हुए कहा कि कम खतरा श्रेणी से विश्वास बनाना चाहिए लेकिन इसकी गारण्टी नहीं है कि दूरी तय करने के समय परिणाम के साथ सूक्ष्म जीवों के स्तर और उनसे होने वाले स्वास्थ्य के खतरे भी हो सकते हैं। बहुत कम खतरा श्रेणी कुछ सुरक्षा और अधिक विश्वास बढ़ाती है कि जल (डब्ल्यूएचओ) की निर्देशिका के स्तर को पा सकेगा और अधिक समय रहने वाले रोगाणु को अलग करेगा।

आंकलन की पहली अवस्था-क्या असंतृप्त क्षेत्र पर्याप्त मात्रा में रोगाणुओं के स्तर का कम कर रहा है?


शौचालय रुपरेखा से खतरों में कमी एक्वीफर के प्रकार

छिद्रता

प्रवेश्यता (मी./दिन)

चिकनी

0.1-0.2

0.01-0.1

बारीक  चिकनी रेत

0.1-0.2

0.1-10

असंगठित क्षरित चट्टान

0.5-0.2

0.1-10

रेत

0.2-0.3

10-100

पथरीली

0.2-0.3

100-1000

टूटी चट्टान

0.01

कहना  कठिन है -1000 मी. प्रतिदिन हो सकता है।

 

असंतृप्त क्षेत्र में जल प्रवाह का वेग बहुत कम होने के कारण एक्वीफर में फीकल का संदूषण रोकने या बचाने के लिए महत्त्वपूर्ण स्तर हैं (Cave Kalsky 1999) यदि एक्वीफर के जल प्रवेश की दर धीमी है और गड्ढे से जल एक्वीफर में देर से पहुँचता है तो रोगाणु मर जायेंगे और लोक स्वास्थ्य के लिए होने वाला खतरा कम हो जायेगा।

शौचालय रूपरेखा की क्षमता और असंतृप्त क्षेत्र जल-स्रोत संदूषण के खतरा को कम करते हैं। इनका संयुक्त रूप में उपयोग करके निम्न तालिका में अनुमानित किया गया।

खतरा श्रेणी शौचालय के प्रकार बहुत कम सूखी अपघटन पारिस्थितिकीय शौचालय कम वी.आई.पी. परम्परागत गड्ढा शौचालय फ्लश शौचालय बहुत अधिक सेप्टिक टैंक, अक्वा प्रिवी, हाई यूसिज पोर फ्लैश शौचालय, गड्ढे के साथ स्नान घर के जल सम्बन्ध रखना।

यदि यह रोगाणुओं को पर्याप्त मात्रा में कमी कर संदूषण के खतरे को कम नहीं करता है तो यह आवश्यक होगा कि एक्वीफर का रोगाणुओं पर कैसा प्रभाव रखता है। इसका अनुमान करना होगा।

आंकलन की दूसरी अवस्था- संतृप्त क्षेत्र का रोगाणुओं के स्तर पर प्रभाव:


जल स्रोत में रोगाणु प्रवेश करने के पहले कितने दिन एक्वीफर में रहते हैं यह इस पर आधारित है। निम्न सूत्र का प्रयोग करकेे यह गणना की जाती है कि दूरी तय करने में लगेे दिन = छिद्रता गुणा क्षैतिज दूरी/प्रवेश्यता गुणा जल शक्ति (ढाल) ए. आर. जी. ओ. एस. एस. निम्नलिखित सारणी को देती है जो मार्ग निर्देशन के रूप में कार्य करेगी। जब सही मान का पता न हो। यह 1/100 (0.01) जल ढलान = 0.15 गुणा 20 मी. / 6 मी./ दिन गुणा 0.01 दूरी तय करने में लगे दिन = 50 दिन = संदूषण का खतरा बहुत कम।

यदि छिद्रता और प्रवेश्यता के वास्तविक मानों की जानकारी नहीं है तो शीर्ष, मध्य और तल्ली के दिए गए शक्ति के उपयोग का सुझाव भी देता है।

उदाहरण - 1


रेतीले एक्वीफर में जहाँ शौचालय जल-स्रोत से 20 मीटर की दूरी पर स्थित है। रोगाणुओं को जल-स्रोत में प्रवेश/पहुँचने में कितने दिन लगेंगे।

जल-स्रोत में पहुँचने में लगा समय = 0.25 गुणा 20/60 मी./दिन गुणा 0.01 दूरी तय करने के दिन = 8.3 दिन = पर्याप्त संदूषण खतरा।

उदाहरण 2.


बारीक चिकनी रेत एक्वीफर में जहाँ शौचालय जल-स्रोत से 20 मी. पर स्थित है। अतः रोगाणुओं को जल - स्रोत में पहुँचने में कितने दिन लगते हैं।

दूरी तय करने में लगे दिन
मानों को रखकर विशेष परिस्थिति के लिए गणना करके निकाल लें। संतृप्त क्षेत्र की रोगाणुओं को कम करने की न्यूनतम और अधिकतम क्षमता जो रोगाणुओं को कम करके सुरक्षित स्तर तक पहुँचाती है मार्गदर्शन के रूप में उपलब्ध करेगी और रूपरेखा निर्मित करने वाले को अधिक सघन आंकलन करने के लिए निर्देशित करेगी।

विचारणीय अन्य कारकः


i. शहरी क्षेत्रों में जहाँ शौचालय अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र में हो सकते हैं, प्रदूषण का संचय प्रभाव भूजल स्तर पर करेगा, जो महत्त्वपूर्ण होना चाहिए तथा इसके लिए अतिरिक्त सावधानी लेने की आवश्यकता है।

ii. एक्वीफर के भीतर में पतली अधिक जल प्रवेश्यता की क्षैतिज परत होने पर यह जल-स्रोत को जाने के लिए तेजी का रास्ता उपलब्ध कराती है। एक्वीफर में एकरूपता कैसे हैं?

iii. एक्वीफर में टूटी हुई चट्टानों की उपस्थिति बहुत तेजी के साथ रोगाणुओं को जल-स्रोत में भेज सकती है।

iv. स्रोत से जल निकास की अधिक दर (उदाहरण - ट्यूबवेल अधिक बड़े समुदाय की जलापूर्ति की जाती है।) जल स्रोत के पास जल शक्ति ढाल (जल दबाव) को बढ़ायेगी जिससे जल स्रोत पहुँचने में लगने वाला समय कम हो जायेगा और संदूषण का खतरा बढ़ जायेगा।

संदूषण के खतरे को कम करने की विधियाँ


i. शौचालय और जल-स्रोत के मध्य क्षैतिज पृथक्करण दूरी को बढ़ाना।

ii. शौचालय की तुलना में जल-स्रोत को अधिक ऊँचाई पर बनाना।

iii. शौचालय के सूखे रूपों में बदलाव।

iv. उथले गड्ढे या वोल्ट्स शौचालय उपयोग करके शौचालय गड्ढा और भूजल स्तर के मध्य क्षैतिज पृथक्करण दूरी को बढ़ाना।

v. यदि बोरहोल का (ट्यूबवैल) का उपयोग किया जा रहा है तो भूजल स्तर के नीचे चलनी लगानी चाहिए।

vi. जलापूर्ति के जल को संशोधित करे या घरेलू संशोधित करने के उपयोग को बढ़ावा दे।

अपने भूजल की सुरक्षाः


i. भूमिगत गड्ढों में जल को एकत्र करने की बजाए जमीन के ऊपर कंक्रीट या धातु की टंकियों का प्रयोग तथा समय-समय पर इनकी साफ सफाई।

ii. घर में कम से कम विषाक्त पदार्थों का उपयोग तथा उपयोग होने पर उनको नालियों, लैट्रीन के गड्ढों तथा खुले जमीन में नहीं निष्पादित करना चाहिए। विषाक्त पदार्थों को केवल उतनी ही मात्रा में खरीदना चाहिए जितनी उनकी आवश्यकता हो।

iii. मोटर गाड़ियों में प्रयुक्त होने वाले तेल की कुछ बूंदें कई लीटर पानी को दूषित करने में सक्षम होती है अतः इन तेलों को पुर्नउपयोग करना चाहिए।

iv. घर के आस-पास के खाली जमीन में घास तथा अन्य पौधों को लगाना चाहिए जिससे जल का बहाव कम से कम हो तथा पेड़ ऐसे लगाने चाहिए जो कई सालों तक चल सके तथा उनमें कम से कम खाद तथा कीटनाशक तथा पानी का उपयोग करना पड़े।

v. पालतू जानवरों को तथा उनके अपशिष्ट उत्सर्जन को पीने के पानी के स्रोत से दूर रखना चाहिए।

जल उपचार की विधियाँ/उपाय पानी को जीवाणु (रोगाणु) रहित करना


अवसादन और छानने की प्रक्रिया के बाद पानी को जीवाणुरहित करते हैं। पानी को शुद्ध करने का यह सामान्यतया अन्तिम चरण होता है। इस चरण के बाद पानी उपयोग करने के लिए उपयुक्त हो जाता है। इस चरण में हानिकारक जीवाणुओं (विषाणु प्रोटोजोआ आदि) को नष्ट अथवा निष्क्रिय किया जाता है।

पानी को कई तरीके से जीवाणु रहित किया जा सकता है -


i. ताप अथवा अन्य भौतिक कारक द्वारा।
ii. सतही सक्रिय रसायनों द्वारा।
iii. पराबैगनी किरणों तथा रेडियोधर्मी आयन के द्वारा।
iv. अम्ल व क्षार द्वारा।
v. धात्विक आयन जैसे - सिल्वर, तांबा तथा पारे के द्वारा।
vi. रसायनों द्वारा ऑक्सीकरण जैसे- हैलोजन, ओजोन तथा अन्य ब्रोमीन, आयोडीन और क्लोरीन के यौगिकों द्वारा।

(0.5 पीपीएम) सान्द्रता वाला ओजोन 5 मिनट, 1.0 पीपीएम सान्द्रता वाली क्लोरीन लगभग 2 घंटे तथा 1.00 पीपीएम सान्द्रता की ब्रोमीन 4 से 10 घण्टे में जीवाणुओं को नष्ट कर सकते हैं।

म्युनिसिपाॅलिटी के द्वारा सामान्यतया जीवाणुओं को मारने के लिए क्लोरीन, आयोडीन तथा सिल्वर का उपयोग किया जाता है। औद्योगिक संस्थानों में अधिक पानी सप्लाई हेतु पराबैगनी किरणों तथा ओजोन का भी उपयोग पानी के शुद्धिकरण में किया जाता है। ये तरीके घरेलू स्तर में भी उपलब्ध है। इन प्रक्रियाओं का बाद में विस्तार से वर्णन किया गया है। पानी को शुद्ध करने के दो सबसे अच्छे तरीके क्लोरोनीकरण तथा पानी को उबालना है। यदि ये दोनों तरीके सही ढंग से किये जाये तो पीने के पानी को रोगाणुरहित रखा जा सकता है।

क्लोरीनीकरण


क्लोरीनीकरण एक प्रभावी आॅक्सीकारक है। इसके उत्पादों को सरल, सुगम और उपलब्धता, सस्ते एवं प्रभावी होने के कारण बड़े पैमाने तथा घरेलू स्तर में पानी के रोगाणुओं को नष्ट करने का एक उत्तम तरीका है। यह जीवाणुओं के कोशिका दीवार को भेदकर उनके जीवद्रव्य को नष्ट करता है कई प्रकार के क्लोरीनीकरण पदार्थ उपलब्ध हैं जिनमें ब्लीचिंग पाउडर प्रमुख है।

प्रायः प्रयोग में लाये जाने वाले क्लोरीन उत्पाद निम्न प्रकार हैं :


i. ब्लीचिंग पाउडर
ii. क्लोरीन की गोली
iii. सोडियम हाइपोक्लोराइट

प्रभावी तरीके से रोगाणु नष्ट करने के लिए क्लोरीन की मात्रा, प्रभावी सम्पर्क समय तथा अवशेष क्लोरीन की जानकारी होनी चाहिए। अवशेषी क्लोरिन, क्लोरिन की वह मात्रा है जो निश्चित समय तक पानी के सम्पर्क में रहने के बाद बचती है। एक तरफ अवशेष क्लोरीन शुद्धिकरण प्रक्रिया के पूरे होने का आभास, संचय करने एवं आवागमन के समय संक्रमण से रोकती है तथा दूसरी तरफ यदि इसकी सान्द्रता 0.2 पीपीएम से अधिक हो तो हानिकारक प्रभाव डाल सकती है। इसलिए क्लोरीन की उचित मात्रा का उपयोग करना चाहिए। कार्बनिक अशुद्धियों से बचने के लिए क्लोरीनीकरण से पहले पानी को छानना तथा संकलित करना चाहिए। गन्दे या कार्बनिक अशुद्धि युक्त पानी में क्लोरीनीकरण नहीं करना चाहिए क्योंकि मुक्त क्लोरीन कार्बनिक पदार्थों से क्रिया करके हानिकारक क्लोरोकार्बनिक यौगिक (थायोमेथेन्स) बनाता है जिससे कैन्सर हो सकता है।

क्लोरीन के उत्पाद यदि मुँह, आँखों आदि में लगने पर हानिकारक प्रभाव डाल सकते हैं। घरेलू उपयोग में आने वाले ब्लीचिंग पाउडर में 5 प्रतिशत क्लोरीन होती है। सामान्य ब्लीचिंग पाउडर का प्रयोग करना चाहिए और इसे सफाई कार्यों में उपयोग किये जाने वाले पदार्थों से दूर रखना चाहिए।

जल में क्लोरीनीकरण से लाभः


i. जीवाणुओं को नष्ट करने में अत्यधिक प्रभावी
ii. अधिक मात्रा हो जाने पर अवशेष क्लोरीन के रूप में आसानी से पहचानी जा सकती है।
iii. सस्ती
iv. सुगम उपलब्धता
v. उपयोग में आसानी/सुगमता से घुलना।

दोषः


कार्बनिक अशुद्धियों की उपस्थिति में यह हानिकारक ट्राइहैलोमेथेन्स बनाती है जिससे कि कैन्सर हो सकता है। अतः शोधित होने वाले पानी में कार्बनिक अशुद्धियाँ नहीं होनी चाहिए।

i. असहनीय स्वाद एवं गन्ध
ii. कम से कम 20 मिनट सम्पर्क समय की अनिवार्यता
iii. पानी में जन्में रोगाणु जैसे सिसट व प्रोटोजोआ (क्रिप्टोस्पोरीडियम व जिआरडिआना) क्लोरीन द्वारा नष्ट नहीं होते।
iv. क्लोरीनीकृत पानी जिसमें अधिक अवशेष क्लोरीन होती है वे अन्य प्रक्रमों जैसे रिवर्स ओसमोसिस सिल्ली में प्रभाव डालती है।

क्लोरीनीकरण विधि


(अ) ब्लीच घोल (विलयन)
i. एक गैलन पानी अथवा चार ली. पानी में चार बूँद ब्लीच विलयन मिला लेते हैं।
ii. यदि पानी गन्दा हो तो चार ली. पानी में आठ बूँद ब्लीच मिलाते हैं।
iii. अच्छी तरह मिलाने के बाद 15 मिनट के लिए छोड़ देते हैं। 15 मिनट के बाद हल्का स्वाद तथा 30 मिनट बाद क्लोरीन का स्वाद नहीं होना चाहिए। यदि 30 मिनट बाद भी पानी में क्लोरीन का स्वाद हो तो अगली बार एक बूँद कम ब्लीच डालना चाहिए।

(ब) ब्लीचिंग पाउडर
1.3 से 5 मि.ग्रा. ब्लीचिंग पाउडर (संक्रमण पर निर्भर) 1 ली. पानी को रोगाणु रहित करने के लिए जरूरी होता है। यह रोगाणु रहित करने में 0.5 ये 1 घंटा समय लेता है। 26 से 100 मि.ग्रा. अथवा एक चुटकी ब्लीचिंग पाउडर 20 ली. पानी को रोगाणु रहित कर सकता है।

सोडियम हाइपोक्लोराइट


आवश्यक सामग्रीi. सोडियम हाइपोक्लोराइट विलयन जिसमें लगभग 4 प्रतिशत भाग/आठ क्लोरीन उपस्थित हो।
ii. 10-20 ली. क्षमता वाले दो जैरी बर्तन
iii. अवशेष क्लोरीन निकालने की सामग्री

विधि:


1 लीटर पानी में 2-3 बूँद सोडियम हाइपोक्लोराइट डाल कर इसे एक घण्टे या पूरी रात के लिए रख देते हैं। इसके बाद अवशेष क्लोरीन की मात्रा निकालते हैं। यदि ये 0.2 एमजी/ली. से अधिक है तो पानी को सूर्य के प्रकाश में रखते हैं जिससे कि क्लोरीन कम हो जाए।

यह ध्यान रखना चाहिए कि क्लोरीनीकृत होने वाले पानी में कार्बनिक अशुद्धियाँ कम हों।

कुँओं में क्लोरीन उत्पाद डालने की प्रयोग विधिः


यह देखा गया है कि कुएँ के 1 ली. पानी को रोगाणु रहित करने के लिए 4 मि.ग्रा. ब्लीचिंग पाउडर पर्याप्त होता है जो कि समस्त सूक्ष्म जीवों को नष्ट करता है तथा 0.2 - 0.5 अवशेष क्लोरीन छोड़ता है। 25 प्रतिशत उपस्थित क्लोरीन वाले ब्लीचिंग पाउडर का उपयोग करना चाहिए।

पानी का आयतन (ली. में) = 3.14 x व्यास x पानी के सतह की ऊँचाई x 1000/4
आवश्यक ब्लीचिंग पाउडर (ग्राम में) = पानी का आयतन (ली. में) x 4/1000

आवश्यक सामग्री


i. बाल्टी 2
ii. ब्लीचिंग पाउडर
iii. काँच की छड़ी

प्रयोग विधि


i. आवश्यक ब्लीचिंग पाउडर की मात्रा बाल्टी में लेते हैं।
ii. कम से कम पानी मिला कर काँच की छड़ की सहायता से सानते हैं।
iii. कुएँ से बाल्टी में पानी डालते हैं।
iv. मिश्रित करके अवसादित होने के लिए छोड़ देते हैं।
v. अवसाादन हो जाने के बाद विलयन के ऊपरी भाग को दूसरी बाल्टी में डालते हैं।
vi. अब दूसरी बाल्टी के विलयन को कुएँ में डाल देते हैं।
vii. कुएँ के पानी को हिलाते हैं।
viii. 30 मिनट के बाद अवशेष क्लोरीन की मात्रा की गणना करते हैं तथा फिर पानी का उपयोग पीने के लिए किया जा सकता है।

सूर्य किरण के साथ सम्पर्क


पीईटी बोतल में किसी नदी या कुएँ का पानी भरकर ढक्कन बन्द करके सूर्य की रोशनी में रख देते हैं।

37 डिग्री.से. से 45 डिग्री.से. ताप उपयुक्त होता है। तीन घण्टे तक सूर्य के प्रकाश में रखने पर 95 प्रतिशत तथा 6 घण्टे तक रखने पर 100 प्रतिशत हानिकारक जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।

ताम्बे के बर्तन का उपयोग


12 घंटे तक पानी को ताम्बे के बर्तन में रखने पर उसमें उपस्थित 90 प्रतिशत जीवाणु नष्ट हो जाते हैं जबकि मिट्टी के बर्तन द्वारा 50 प्रतिशत जीवाणु नष्ट होते हैं। तीन ताम्बे के बर्तनों का उपयोग करना चाहिए जिसमें पानी तीन दिन तक रखा रहे।

हैण्डपम्प या बोरहोल में क्लोरीनीकरण करने की प्रक्रिया हैण्डपम्प या बोरहोल खोलना और सफाई।


हैण्डपम्प सफाई करने से पूर्व सभी चिकनी मिट्टी, मलवा आदि हटा देना चाहिए। यह निम्नलिखित चरणों में की जानी चाहिए:

i. यदि पहले चरण से मलवा और चिकनी मिट्टी सफाई नहीं की गई तो बोरहोल से पम्प या मोटर को बाहर निकालें और उसकी सफाई और मरम्मत करें।
ii. दाबित वायु या जल का प्रयोग करके बोरहोल से जमा अवसाद को बाहर निकालें। दाबित वायु के पाइप को बोरहोल में रखें और अवसाद को उड़ाकर बाहर करें।
iii. बोर होल से जमा मिट्टी को निकालें। छन्ने को दाबित वायु की नली पर रख कर वाल्व को खोलें जब तक पानी बोरहोल के ऊपर से आना प्रारम्भ कर दें। वाल्व एक को बन्द कर दें और दूसरे वाल्व को खोले रखें जब तक अधिक वायु बाहर आना सुनाई देता है। दोहरायें जब तक पानी बोरहोल से बाहर आता है।
iv. बलुई मिट्टी की स्वच्छता शील का उपयोग करके बोरहोल के ऊपरी भाग को पुनः बन्द करें।
v. बोर होल के चारों ओर दीवार बनाकर जल निकास कर निर्माण करें जिससे सतही जल कीड़े-मकोड़े या जीव-जन्तुओं आदि को बोरहोल में प्रवेश करने से रोका जा सके।
vi. पम्प को बोर होल में पुनः बैठायें और उसकी जाँच करें कि यह कार्य कर रहा है। पानी आ रहा है और यह मिट्टी से साफ है। यदि पानी गन्दा है तो पम्प को हटायें और बोरहोल की फ्लश मार कर सफाई करें। यदि दो फ्लश मारने के बाद बोर से गन्दा पानी आ रहा है तो सम्भवतया भूजल छन्ना टूट गया। अतः सफाई करने का आगे और प्रयास नहीं करना चाहिए।

हैण्डपम्प जाँच:


एक बार पम्प बोरहोल में बैठा दिया जाता है तो इसे सामान्य रूप से चलायें। यदि चलाने में कठिनाई होती है थोड़ी मात्रा में पानी आता है तो यह अवशोषित हो सकता है या पम्प टूटा हो सकता है। पम्प की कार्य प्रणाली तन्त्र की पुनः जाँच करें और बोरहोल में पुनः फ्लश करें।

बोरहोल से आ रहे जल प्रवाह आकलन


पम्प से निकले निकास नली के नीचे बाल्टी रखें। बाल्टी भरने में कितना समय लगा इसका मापन करें।

1 घंटे में पम्प से कितना पानी निकाला गया।
(AXC/B)=Q
A = जहाँ बाल्टी का आयतन लीटर में
B = बाल्टी भरने में लगा समय सेकेंड में
C = 3600 सेकेंड
Q = प्रवाह (लीटर प्रति घण्टा)

बोरहोल में जीवाणु रहित करने वाले पदार्थों का प्रयोग


हैण्डपम्प या बोरहोल पुनः स्थापित करने की प्रक्रिया का अनुसरण करते हुए। बोरहोल जल का पी.एच. जाँच करके क्लोरीन की प्रभावी मात्रा को निकाल लेते हैं। गन्दे, रंगयुक्त जल में क्लोरीनेशन कभी नहीं करते हैं क्योंकि इसमें उपस्थित छोटे-छोटे निलम्बित ठोस जीवाणुओं को सुरक्षा प्रदान करते हैं और वे आसानी से नहीं मारे जा सकते हैं। नीचे तालिका में पी.एच और गन्दलेपन के महत्व और निश्चित मानक के साथ क्लोरीन के प्रयोग को सुनिश्चित करने के लिए दिशा निर्देशन किया गया है। हैण्डपम्प या बोरहोल सफाई और पुनः स्थापन के बाद यदि जल में गन्दलापन 5 एम.टी.यू. से अधिक है तो जल को पम्प से बाहर निकालें और पुनः गन्दलेपन की जाँच करें।

जीवाणुरहित करने के कई तरीके हैं परन्तु क्लोरीनेशन प्रायः प्रयोग किया जाता है। इसमें अवशेषी क्लोरीन रहती है जो जल को जीवाणुरहित करती है। सफाई प्रक्रिया के दौरान किसी को भी बोरहोल का जल प्रयोग न करने दें। इस दौरान जल में बहुत ही सान्द्र क्लोरीन की मात्रा रहती है जिससे जल का स्वाद खराब और गंध आती है। यह खतरनाक भी हो सकती है।

(ब्लीचिंग पाउडर से क्लोरीन गैस निकलती है जो बहुत खतरनाक होती है। कुएँ की दीवार को ब्रश की सहायता से साफ करने का प्रयास करें।)

भौतिक रसायनिक कारक

कारक

डब्ल्यू.एच.ओ. पेयजल गुणवत्ता मार्ग निर्देशिका

क्यों

क्रिया

पी.एच.

6-8

6.8 से 7.2 पी.एच. आवश्यक क्लारीन के स्तर को कम कर देता है।

यदि पी.एच. 6 से कम है तो हाइड्रेट लाइम (कैल्शियम हाइड्राक्साइड को बढ़ाता है)

 

कैल्शियम हाइपोक्लोराइट क्लोरीन यौगिक प्रायः जल के क्लोरीनेशन के लिए प्रयोग किया जाता है। इसका प्रयोग कठोर या पाउडर के रूप में होता है। सोडियम हाइपोक्लोराइट का प्रयोग ब्लीच विलयन के रूप में किया जाता है। प्रत्येक क्लोरीन यौगिक में उपयोगी क्लोरीन की मात्रा अलग-अलग होती है। यह कितने समय तक पदार्थ रखा गया, वातावरण के साथ सम्पर्क आदि पर निर्भर करता है।

आवश्यक क्लोरीन की मात्रा बोरहोल के जल के आयतन पर निर्भर करती है। 0.2 प्रतिशत क्लोरीन विलयन की एक लीटर मात्रा 100 लीटर बोरहोल जल में मिलायें और जल को 30 मिनट तक कोई व्यवधान न करें।

बोरहोल से जल की सफाई


बोरहोल से जल निकालने के लिए दाबित वायु का प्रयोग करें। जल निकालने के बाद बोरहोल में जल पुनः भरने दें। जल भर जाने के बाद तीस मिनट तक इन्तजार करें और क्लोरीन सान्द्रता की जल में जाँच करें। यदि अवशेषी क्लोरीन की सान्द्रता जल में 0.5 मि.ग्रा./ली. से कम है तो बोरहोल का जल प्रयोग के लिए सुरक्षित है। यदि सान्द्रता 0.5 मि.ग्रा./ली. से अधिक मिलती है तो बोरहोल जल पुनः बाहर निकालें। यह प्रक्रिया बार-बार दोहरायें जब तक अवशेषी क्लोरीन की सान्द्रता जल में 0.5 मि.ग्रा./ली. के स्तर से कम नहीं हो जाती है।

बोरहोल को जीवाणुरहित बनाने का उपकरण
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