छतरी में छेद

Submitted by RuralWater on Sun, 09/27/2015 - 10:11
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जनसत्ता (रविवारी), 13 सितम्बर 2015
ओजोन परत को खतरा हमारे वायुमण्डल में बढ़ती रासायनिक गैसों की वजह से है। इनमें सबसे खतरनाक है क्लोरोफ्लोरो कार्बन, जो ओजोन के परमाणुओं को खत्म कर सकती है। क्लोरीन के एक परमाणु में करीब एक लाख ओजोन अणुओं को खत्म करने की क्षमता होती है। इनके प्रभाव से ओजोन केवल पतली ही नहीं हो रही, उसमें छेद भी हो रहे हैं। धरती से 93,00000 मील दूर ‘आग का गोला’ कहा जाने वाले सूरज जहाँ पूरी दुनिया को जीवन दान देता है, वहीं उसकी 5,500 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान और हानिकारक पराबैंगनी किरणों का विकिरण पूरी धरती को जला सकता है।

सूरज की पराबैंगनी किरणों में ऊर्जा ज्यादा होती है। ओजोन की मोटी परत सूरज की इन पराबैंगनी किरणों को धरती तक पहुँचने से रोकती है, जिसने एक छतरी या कवच की तरह हमारी धरती को चारों तरफ से ढँका हुआ है और उसकी रक्षा करती है।

वास्तव में ओजोन एक नीले रंग की प्राकृतिक गैस है जो ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनी है। जब सूर्य की किरणें वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर ऑक्सीजन से टकराती हैं, तो ऊर्जा विकिरण से इसका कुछ हिस्सा ओजोन में बदल जाता है। ओजोन का कुछ हिस्सा आकाश में बादल और बिजली बनने की प्रक्रिया में बनता है।

ओजोन परत औसतन 300 डोबसन इकाई या तीन मिलीमीटर मोटी है। यह हमारे वायुमण्डल के वातावरण की पाँच परतों में से पहली दो में मौजूद है। हमारी धरती की सतह के ऊपर फैले ट्रोपोस्फेयर में करीब ओजोन का नौ प्रतिशत भाग है। इसे ओजोन परत को ज़मीनी स्तर का ओजोन भी कहा जाता है।

देखा जाये तो यह परत प्राकृतिक तौर से मौजूद नहीं है, बल्कि आज के भौगोलिक, औद्योगिक और प्रगतिशील दौर में हमारे द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले संसाधनों की देन है।

सूरज के प्रकाश की उपस्थिति में ओजोन की यह परत एक धुंध की तरह है। इसमें क्लोरोफ्लोरो कार्बन, क्लोरीन, नाइट्रोजन, ऑक्साइड, ब्रोमीन, कार्बन डाइऑक्साइड जैसी जहरीली रासायनिक गैसें भी घुलमिल गई हैं जो कि इलेक्ट्रॉनिक और फायर कंट्रोल उपकरणों, खादों, वाहनों के अधिक प्रयोग और जेट विमानों और फैक्टरियों से निकलने वाले धुएँ के कारण है।

इससे हमारी धरती का पर्यावरण वायु प्रदूषण की चपेट में आ गया है और यह हमारे स्वास्थ्य के लिये नुकसानदायक साबित हो रहा है।

दूसरी ओर ओजोन परत का 91 प्रतिशत भाग स्ट्रैटोस्फेयर परत में है जो धरती से 10-50 किलोमीटर ऊपर वायुमण्डल में है। स्ट्रैटोस्फेयर परत के 10-35 किलोमीटर के हिस्से में ओजोन परत है। स्ट्रैटोस्फेयर परत में मौजूद ओजोन परत सूरज की हानिकारक पराबैंगनी किरणों के लिये छननी का काम करती है।

यह सूरज की 98 प्रतिशत किरणों को अवशोषित कर धरती पर आने से रोकती है। इसीलिये इसे पृथ्वी के पर्यावरण और जीवन का रक्षक माना जाता है। हमारे विकास के लिये उपयोगी सूरज का प्रकाश जिससे हमें विटामिन डी मिलता है, वह ओजोन की इसी परत से छन कर आता है।

ओजोन परत को खतरा हमारे वायुमण्डल में बढ़ती रासायनिक गैसों की वजह से है। इनमें सबसे खतरनाक है क्लोरो फ्लोरो कार्बन, जो ओजोन के परमाणुओं को खत्म कर सकती है। क्लोरीन के एक परमाणु में करीब एक लाख ओजोन अणुओं को खत्म करने की क्षमता होती है। इनके प्रभाव से ओजोन परत केवल पतली ही नहीं हो रही, उसमें छेद भी हो रहे हैं।

ओजोन परत में छेद होने से सूरज की हानिकारक पराबैंगनी किरणें धरती ही नहींं, समुद्र की गहराई तक पहुँच जाती हैं और वहाँ के जीव-जगत को नुकसान पहुँचाती हैं। इनके विकिरण से धरती के पेड़-पौधे भी झुलस सकते हैं और भोजन का संकट हो सकता है।

पिछले कुछ दशकों में वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि ओजोन की परत धरती के ध्रुवीय वातावरण में पतली हो रही है और अंटार्कटिका के ऊपर की ओजोन परत में तो छेद भी हो गया है जो लगभग यूरोप के आकार के बराबर है। वैज्ञानिकों ने साबित किया है कि गर्मी के महीनों में ओजोन परत को ज्यादा नुकसान होता है।

हर दशक में करीब पाँच प्रतिशत की दर से ओजोन परत घट रही है। अगर नुकसान की यही गति रही तो अगले अस्सी-सौ ओजोन का 11-16 प्रतिशत भाग नष्ट हो जाएगा।

वैज्ञानिक ने ज़मीनी स्तर के ओजोन को जहाँ ग्लोबल वार्मिंग की नजर से खतरनाक घोषित किया है। छेद से होने वाले नुकसान भी गिनाएँ हैं। अधिक मात्रा में सूरज की पराबैंगनी किरणें आने से त्वचा कैंसर हो सकता है और सही इलाज न होने पर मौत भी हो सकती है।

पराबैंगनी किरणें हमारी आँखों के लिये भी खतरनाक होती हैं। इससे रेटिना खराब होने से व्यक्ति अन्धा भी हो सकता है। अस्थमा जैसी साँस सम्बन्धी बीमारियाँ बढ़ाने में सहायक है। श्वसन प्रणाली में संक्रमण से शरीर का रोगनिरोधी तंत्र कमजोर पड़ सकता है। फेफड़ों की कार्यक्षमता कमजोर होने से साँस लेने में कठिनाई हो सकती है।

छाती में दर्द, गले में जलन जैसी समस्याएँ भी हो सकती हैं। आज समय की माँग है कि ओजोन परत को बचाने के लिये हर सम्भव प्रयास किये जाएँ। हमें ज़मीनी या घरेलू स्तर से ही ऐसे कदम उठाने होंगे कि अपनी मूल जरूरतों को पूरा करने के लिये प्राकृतिक संसाधनों का दोहन न कर उन्हें मूलरूप में अपनाना होगा। इससे न केवल वातावरण में फैलने वाली ग्रीन हाउस गैसों का प्रभाव कम होगा, बल्कि वायु प्रदूषण और ओजोन परत को होने वाले नुकसान का खतरा भी कम होगा।

ओजोन परत की सुरक्षा के लिये सौर-ऊर्जा तकनीक अपनाना बेहतर है। अपनी जरूरत के हिसाब से सौर-ऊर्जा पैनल लगाकर बिजली, पानी के अलावा सोलर-कूकर जैसे बर्तन का उपयोग कर सकते हैं। यही नहीं, सोलर-कार का प्रचलन पर्यावरण को स्वच्छ बनाने में कारगर है।

काँच की बोतलें और जार, स्टील और एल्यूमीनियम के डिब्बे, प्लास्टिक की बोतलें और बेकार कागज को कूड़े में फेंकने या जलाने के बजाय रि-साइकिल किया जाना चाहिए। इससे प्रदूषण से बचाव तो होगा ही, रि-साइकिल से ऊर्जा की खपत में भी कमी आएगी। बाजार में ओजोन फ्रेंडली इलेक्ट्रॉनिक उपकरण आ गए हैं जिसमें हानिकारक गैसें नहीं निकलती। सम्भव हो तो इन्हें उपयोग में लाएँ।

ओजोन परत की खोज फ्रांस के भौतिक वैज्ञानिक चार्ल्स फैब्री और हेनरी ने 1913 में की थी। 23 जनवरी, 1995 को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा ने ओजोन परत के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिये 16 सितम्बर को अन्तरराष्ट्रीय ओजोन दिवस या ओजोन परत संरक्षण के रूप में मनाने का प्रस्ताव पारित किया।

जिसे आज पूरे विश्व में मनाया जाता है। आज समय की माँग है कि इस धरती को सूरज की पराबैंगनी किरणों से बचाने के लिये ओजोन परत की सुरक्षा में सभी लोगों की भागीदारी हो।

ईमेल: rajniarora11@gmail.com

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