घर-घर के आगे ‘डॉक्टर’

Submitted by RuralWater on Thu, 10/01/2015 - 16:29
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बूँदों की मनुहार ‘पुस्तक’

स्वच्छता दिवस, 02 अक्टूबर 2015 पर विशेष


. बेगम साहिबा गुलारा की याद में बनाए महल और पास में ही उतावली नदी। मध्य प्रदेश के खंडवा जिले की बुरहानपुर तहसील से 25 किलोमीटर दूर बंजारों का गाँव सांडस। यहाँ सामाजिक-आर्थिक बदलाव की नई इबारत लिखी जा रही है। तहसील के सांडस जैसे 22 गाँव में आहिस्ता-आहिस्ता महिलाओं के चेहरे से पर्दा हट रहा है।

शराब के जाम पहले जैसी महफिल नहीं जमा पा रहे हैं। लड़ाई-झगड़ों में कमी आ रही है। सांडस गाँव की खास बात है कि यहाँ पर हर घर के सामने 24 घंटे एक ‘डॉक्टर साहब’ रहते हैं। तब भला कोई कैसे बीमार पड़ सकता है? गाँव वाले किसी दार्शनिक की भाँति जिन्दगी, भगवान, श्रम पर चर्चा करते हैं।

गाँव में अमृतालय के नाम से एक मन्दिर भी। और जनाब, गाँव के ज़मीर का क्या कहिए, किसी बंजारे के बच्चे के हाथ में 1-2 रुपए का नोट रखने की जुर्ररत तो कीजिए...। आप को किसी एक्शन फिल्म के ‘बाल-नायक’ की तर्ज पर बच्चा-बच्चा जवाब दे देगा... ‘हम बिना श्रम किये पैसा नहीं लेते हैं।’

रास्तों से गुजरना होता है। इन्हें दुलारा बेगम की याद में बादशाह खुर्रम ने तैयार करवाए थे। क्षेत्र में बंजारे बसते हैं, अपनी कुप्रथाओं से जूझते, गरीबी, जहालत के वायरस के साथ इनके हाथ ‘स्वाध्याय’ लग गया। इस विचारधारा के प्रवाह के प्रेरणास्रोत दुनिया के महानतम व्यक्तियों में से एक टेम्पलटन अवार्ड से सम्मानित श्री पांडुरंग आठवले ‘दादाजी’ के साथ जुड़े स्वाध्यायियों ने क्षेत्र के 55 में से करीब 22 गाँवों में स्वाध्याय शैली को जीवन का अंग बना दिया है।

गाँव के बुजुर्ग व पूर्व सरपंच जगराम के सामने चौबीसों घंटे ‘डॉक्टर साहब’ खड़े रहते हैं। गाँव के बुजुर्ग व पूर्व सरपंच जगराम भाई और एक मथुरादास हमसे ऐसे मुखातिब होते हैं- मानो वर्षों पुराना कोई रिश्ता हो। वे कहते हैं- गाँव वालों ने अपने श्रम से घर-घर के सामने सोख गड्ढा तैयार किया है।

घर में उपयोग हुआ पानी गाँव की गलियों में फैलकर गंदगी व कीचड़ फैलाता था। इससे गाँव में बीमारियाँ फैलती थीं, कई बार इस पानी के किसी दूसरे के घर के सामने जाने से बड़े-बड़े लड़ाई-झगड़े की नौबत तक आ जाती थी, स्वाध्याय प्रवाह के बाद हमने इस समस्या को दूर करने की ठानी। चार-चार फीट के गड्ढे खोदकर उपयोग किये गए पानी की निकासी इसमें कर दी।

गड्ढों को गोल पत्थरों से भर दिया गया, अब सारे गाँव का पानी बाहर फालतू ना बहते हुए इसमें जमा हो जाता है, गाँव का पानी अब गाँव का भोजन का स्तर बढ़ा रहा है। इस कारण नलकूपों से गर्मी में पानी नहीं आने का संकट समाप्त हो गया है। पानी रोकने के साथ-साथ स्वाध्याय प्रवाह ने सम्पूर्ण दृष्टि में ही चौंकाने वाला बदलाव ला दिया है।

जगराम व मथुरादास बताते हैं- बंजारा समाज के अन्य गाँवों में रहने वाले लोगों ने एक तरफ से शुरुआत में सांडस और आस-पास के गाँव का समाज में बहिष्कार शुरू कर दिया था। इससे गाँवों के बंजारे इस बात से सख्त नाराज थे कि ये लोग स्वाध्यायियों के कहने से हमारी प्रथाओं को क्यों तोड़ रहे हैं।

जगराम व मथुरादास ने बताया- ‘हम लोगों ने परम्परागत रूप से चली आ रही बली प्रथा को बन्द कर दिया। पहले गाँव में किसी के यहाँ भी कोई बीमारी का प्रकोप होता था, तो उसे माता का प्रकोप मानकर झाड़ फूँक करने वालों को बताया जाता था। गाँव ओझा हर छोटी-मोटी बात पर बलि दिलवाता था। कई बार तो आस-पास के गाँव वालों तक को भोजन कराना पड़ता था। परिवारजन बीमारी का इलाज कराने के साथ-साथ इन सब कामों में लगाए धन के कारण सदैव कर्ज में डूबे रहते थे, लेकिन स्वाध्याय प्रवाह के बाद सोख गड्ढे तो बने ही करीब 45 गाँवों में बली प्रथा पर लगभग रोक सी लग गई। इसके अलावा पहले शराब में डूबे रहना गाँव के पुरुषों की प्रमुख दिनचर्या रहा करती थी। शराब के कारण गाँव में सदैव तनाव बना रहता था, शराब गायब होते ही न घर में लड़ाई न पड़ोसियों से संघर्ष। चेतना के कारण आर्थिक हालात बदली, सो अलग।’ इसके अलावा गाँवों में आपसी सहयोग का नया प्लेटफॉर्म तैयार किया गया- ‘योगेश्वर कृषि’।

इसके माध्यम से प्रभु के लिये कृति भक्ति की जाती है। एक खेत में नित अवधि के लिये गाँव के हर परिवार का सदस्य अपनी सेवा देता है। घर में महिलाओं को बराबरी का स्थान दिया जाने लगा है। इनका हाथ भर की घूँघट हटकर अब वे बंजारा पुरुषों के हमकदम हो रही हैं।

घर में उपयोग हुआ पानी गाँव की गलियों में फैलकर गंदगी व कीचड़ फैलाता था। इससे गाँव में बीमारियाँ फैलती थीं, कई बार इस पानी के किसी दूसरे के घर के सामने जाने से बड़े-बड़े लड़ाई-झगड़े की नौबत तक आ जाती थी, स्वाध्याय प्रवाह के बाद हमने इस समस्या को दूर करने की ठानी। चार-चार फीट के गड्ढे खोदकर उपयोग किये गए पानी की निकासी इसमें कर दी। गड्ढों को गोल पत्थरों से भर दिया गया, अब सारे गाँव का पानी बाहर फालतू ना बहते हुए इसमें जमा हो जाता है, गाँव का पानी अब गाँव का भोजन का स्तर बढ़ा रहा है।

बंजारों के इन गाँवों में हुई इस मौन क्रान्ति के पीछे श्री पांडुरंग शास्त्री आठवले जी का दर्शन है- ‘सिर्फ पानी के लिये मत सोचिए। पानी का कहीं संकट है और प्रेस व टीवी वालों ने हो-हल्ला मचाया तो क्या पानी मिल सकता है। लेकिन उस भगवान का विचार करिए जो सबका पिता है और यह पानी हम सब को देता है। वह समुद्र का पानी 100 डिग्री सेल्सियस पर भाप बनाकर फिर से मीठे पानी में बदल कर हमें देता है। गृहणी दूध तपाकर सहेज कर रखती है, लेकिन वह गिर जाये या बर्बाद हो जाये तो वह परेशान होती है। क्योंकि उसमें उसकी मेहनत लगी होती है। इसी तरह जिस भगवान ने समुद्र के पानी को तपाया, भाप में बदला और मीठे पानी के रूप में हमें देने की मेहनत की उसकी परवाह नहीं करते हुए हमने पानी को बर्बाद किया। बेकार बह जाने दिया तो भगवान भी परेशान होंगे। इसलिये जरूरी है कि “घर का पानी घर में और गाँव का पानी गाँव में” संचित रहे।’

गाँवों में इस बड़े बदलाव को मार्गदर्शन दे रहे स्वाध्याय परिवार के मध्य प्रदेश क्षेत्र के ‘बड़े भाई’ श्री जगदीश भाई शाह जो मुम्बई के ख्यात चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, कहते हैं- ‘दादाजी (श्री आठवले) ने बहुत पहले ही कह दिया था कि आने वाली 21वीं सदी में पानी सारी दुनिया के सोच के लिये एक प्रमुख मुद्दा रहेगा। इसके लिये उन्होंने ग्यारह प्रयोगों को क्रियान्वित करवाने के प्रयास शुरू कर दिये थे। सौराष्ट्र में बिना किसी सरकारी आर्थिक सहायता या अनुदान के स्थानीय समाज में श्रम शक्ति से 99670 ट्यूबवेल पुनः पानी से लबालब कर दिये। गुजरात सरकार ने इसका उल्लेख करते हुए कहा है कि सरकार का 350 करोड़ रुपया बचा है, जो भूजल 300 से 400 फीट नीचे चला गया था, वह पुनः 100 से 50 फीट तक आ गया है।’

सांडस में ही भक्ति कार्य में लिप्त इंदौर के स्वाध्यायी श्री शिवाकांत वाजपेयी व श्री महेंद्र दुबे कहते हैं- ‘सोख गड्ढे को स्वाध्याय की भाषा में ‘डॉक्टर’ कहाँ जाता है। इस प्रयोग में गाँव के प्रत्येक परिवार द्वारा अपने घरों के सामने श्रमशक्ति से एक 4x4 का छह फिट का गहरा गड्ढा खोद दिया जाता है। जिसमें दो फुट कोयला दो, फुट रेती, दो फुट पत्थर डालकर ऊपर से एक फर्शी का ढक्कन कर दिया जाता है। घरों के सभी प्रकार के पानी का निकास एक पाइप द्वारा इस गड्ढे में कर दिया जाता है।

इस पानी को कच्चा बनावट के कारण यह गड्ढा अवशोषित करता रहता है। रेती, कोयला पत्थरों की परत फिल्टर का काम करती है’
बकौल वाजपेयी- ‘यदि यह है तो फिर बाहरी डॉक्टर के आने की सम्भावनाएँ काफी कम हो जाती हैं। स्वाध्याय समाज ने हमें इन नए ‘डॉक्टर साहब’ से रुबरु करा दिया।’ दरअसल इस समाज का मूल मंत्र है- ‘भक्ति एक सामाजिक शक्ति है और भारत के कई हिस्सों में खासकर गुजरात व महाराष्ट्र में सरकारें इस सामाजिक शक्ति को मुँह फाड़कर अवाक हो देख रही हैं।’

सांडस के बंजारे ‘जय योगेश्वर!!’ के उद्घोष के साथ हमें हाथ जोड़कर विदा कर रहे थे- तब उनका एक अबोला सन्देश हमें सुनाई दे रहा था- ‘सरकारों को अब खुदा हाफ़िज़! हम समाज मिलकर एक नई बयार लाएँगे...!!’

 

बूँदों की मनुहार


(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

आदाब, गौतम

2

बूँदों का सरताज : भानपुरा

3

फुलजी बा की दूसरी लड़ाई

4

डेढ़ हजार में जिंदा नदी

5

बालोदा लक्खा का जिन्दा समाज

6

दसवीं पास ‘इंजीनियर’

7

हजारों आत्माओं का पुनर्जन्म

8

नेगड़िया की संत बूँदें

9

बूँद-बूँद में नर्मदे हर

10

आधी करोड़पति बूँदें

11

पानी के मन्दिर

12

घर-घर के आगे डॉक्टर

13

बूँदों की अड़जी-पड़जी

14

धन्यवाद, मवड़ी नाला

15

वह यादगार रसीद

16

पुनोबा : एक विश्वविद्यालय

17

बूँदों की रियासत

18

खुश हो गये खेत

18

लक्ष्य पूर्ति की हांडी के चावल

20

बूँदें, नर्मदा घाटी और विस्थापन

21

बूँदों का रुकना, गुल्लक का भरना

22

लिफ्ट से पहले

23

रुक जाओ, रेगिस्तान

24

जीवन दायिनी

25

सुरंगी रुत आई म्हारा देस

26

बूँदों की पूजा

 


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About the author

.पत्रकार और लेखक क्रांति चतुर्वेदी का जल पर लेखन से गहरा नाता है। पानी पर आज कई अध्ययन यात्राएँ कर चुके हैं। जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन पर पाँच पुस्तकें भी लिख चुके हैं। मध्य प्रदेश के सन्दर्भ ग्रन्थ ‘हार्ट ऑफ इण्डिया’ के सम्पादक भी रह चुके हैं। पानी की पत्रकारिता के लिये भारतीय पत्रकारिता जग

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