ग्रामवासियों के जीवन में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

Submitted by Hindi on Wed, 10/07/2015 - 16:05
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योजना, जून 1997

प्रायः देखा गया है कि गंदा पानी गलियों में बहता रहता है, जिसके कारण मच्छर आदि फैलते हैं। इस पानी को निकालने के लिए एक निकाय का विकास किया गया है, जिसमें एक गाद भस्म टैप कक्ष तथा एक भू-वेदन छिद्र (पानी का पता लगाने के लिए) होता है। इस निकाय को 20 गाँवों में लगभग 3500 मकानों लगाया गया है और इसकी लोकप्रियता बड़ी तेजी से बढ़ रही है।

हमारे लाखों गाँवों के लिए विज्ञान अब वरदान सिद्ध हो रहा है। ग्रामों के विकास के लिए अनेक नई विधियाँ विकसित की गई हैं। जल, आवास, खाद्यान्न, ऊर्जा, सफाई, ग्रामोद्योग आदि क्षेत्रों में विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी का सहारा लिया जा रहा है। ग्रामों के लिए वैकल्पिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल हो रहा है। ये ऐसी प्रौद्योगिकी हैं जो गाँवों के लिए ही हैं क्योंकि ये सस्ती तथा टिकाऊ हैं। विज्ञान अब ग्रामवासियों के जीवन का अंग बन रहा है। भारत की स्वतंत्रता के स्वर्णिम जयंती वर्ष में कृषि क्षेत्र में मिली उपलब्धियों पर देश गर्व महसूस कर सकता है। महात्मा गाँधी ने बहुत पहले 1930 में ही कहा था कि भारतीय कृषि की गति तब तक अवरुद्ध रहेगी जब तक कि देहात में बुद्धि और बाहुबल का मिलन नहीं हो जाता।

अब तक गाँवों के विकास तथा फसल उत्पादन बढ़ाने में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का बड़ा योगदान रहा है। इस समय ग्रामों में 261 कृषि विज्ञान केन्द्र और प्रशिक्षक प्रशिक्षण केन्द्र हैं। संस्थान ग्राम सम्पर्क कार्यक्रमों के माध्यम से 34 केन्द्रों में प्रौद्योगिकी कूल्यांकन और सुधार की प्रायोगिक प्रायोजना को कार्यान्वित किया गया है। इन कार्यक्रमों के अन्तर्गत लगभग 22,000 कृषक परिवारों को चुना गया। सुधरी प्रौद्योगिकियों से अवगत कराने के लिए लगभग ढाई लाख किसानों को लाभ पहुँचाने के लिए 10,000 से भी अधिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। अध्ययनों से पता चला कि प्रशिक्षित लोगों की विभिन्न कुशलताओं तथा प्रौद्योगिकियों को 23 से 100 प्रतिशत तक कृषक परिवारों ने अपनाया।

महिला कृषकों के लिए विज्ञान


कृषि कार्यों में महिलाओं की बढ़ती भूमिका तथा सम्बन्धित गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए योजना आयोग द्वारा गठित कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा के कार्यदल ने आठवीं योजना के दौरान एन.आर.सी.डब्ल्यू.ए. स्थापित करने की सिफारिश की। इस संगठन ने अप्रैल, 1996 में कार्य आरम्भ किया। यह संगठन कृषि कार्य से जुड़ी महिलाओं को सूचनाएँ तथा विभिन्न वैज्ञानिक खेती प्रणालियों में प्रशिक्षण दे रहा है।

ग्रामवासियों के लिए कृषि की अनेक वैज्ञानिक विधियाँ ईजाद की गई हैं, जिनसे कृषि उत्पादन निरन्तर बढ़ रहा है। पशु-पालन गाँवों का प्रमुख अंग है। पशु विज्ञान से ग्रामवासियों को लाभ पहुँचाने का प्रयत्न किया गया है। राष्ट्रीय दुग्ध नस्ल ‘फ्रीजवाल’ का विकास करने के लिए एक परियोजना का आरम्भ किया गया है। यह अपने 300 दिन के दुग्ध स्रवण में 4000 कि.ग्रा. दूध उत्पादन में सक्षम है। साथ ही इनमें अच्छा मुनाफा मिलता है। किसानों के सहयोग से बकरियों की नस्ल सुधारने पर बल दिया जा रहा है। अपनाए गए गाँवों में नस्ल सुधार कार्यक्रम के लिए अच्छी नस्ल के बकरे दिए गए। अनुसंधान से सूअरों के 7 जीन प्ररूप उत्पन्न किए गए। पशु आनुवांशिक संसाधनों पर पशुधन की देशी नस्लों के लिए एक ‘डेटर बैंक’ तैयार किया गया जिससे कि उनकी स्टॉक प्रबंधन युक्तियों और उनके भौतिक लक्षणों, प्रदर्शन विशेषकों और प्रजनन फार्मों को अभिलेखित किया जा सके।

कृषि विज्ञान केन्द्रों से गाँवों में क्रान्ति


सारे देश में फैले कृषि विज्ञान केन्द्रों से न केवल कृषि में क्रान्ति आई है बल्कि गाँवों में विज्ञान का प्रकाश भी फैला है। हमारे करोड़ों ग्रामवासियों को विज्ञान का लाभ मिला है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के ये केन्द्र 1974 से कार्य कर रहे हैं। ये खेती करने वाले किसानों, महिलाओं, युवकों तथा विस्तार कार्यकर्ताओं को आवश्यक व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। इनसे ही स्वयं रोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं। फसल उत्पादन, बागवानी, ग्रामशिल्प, गृह विज्ञान तथा पशु विज्ञान आदि में प्रशिक्षण दिया गया है।

ग्रामीण प्रौद्योगिकियाँ


केन्द्रीय वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सी.एस.आई.आर.) ने ग्रामों के लिए अनेक सस्ती तथा ग्रामोन्मुखी प्रौद्योगिकियाँ ईजाद की हैं। ये सब गैर-कृषि क्षेत्र से सम्बन्धित हैं। अनुमान है कि यदि सन 2000 तक हर एक व्यक्ति को रोजगार के राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त करना है तो रोजगार के अवसर बढ़ाने होंगे। ग्रामीण औद्योगीकरण से न केवल रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध होंगे वरन ग्रामीण संसाधनों के बेहतर एवं लाभकारी उपयोग द्वारा उद्यमियों को अधिक लाभ प्राप्त होगा।

परिषद ने ग्रामों में नई तकनीकों के प्रसार के लिए नौ क्षेत्र चुने हैं- (1) खाद्य एवं कृषि पदार्थ (2) लाभकारी पौधे एवं उनका संसाधन (3) चमड़ा एवं पशु अवशेष (4) भवन निर्माण सामग्री (5) सड़कें (6) पीने का पानी (7) पर्यावरण एवं स्वच्छता (8) कारीगरों की दक्षता (9) दोने तथा पत्तल, सिरेमिक पदार्थ, ऊर्जा दक्ष चूल्हें, पवन, पम्प, हस्त-निर्मित कागज आदि।

खाद्य एवं कृषि पदार्थ


भारत की प्राकृतिक सम्पदा अपार है। देश खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। परिषद की प्रयोगशालाओं ने ऐसी तकनीकों का विकास किया है, जिनके द्वारा इस सम्पदा का भण्डारण एवं संरक्षण हो सके तथा ऐसी गुणकारी चीजें बनाई जा सकें जो पौष्टिक भी हों। मैसूर के खाद्य अनुसंधान संस्थान ने विभिन्न पदार्थों के उत्पादन स्थान के आस-पास ही लघु उद्योग स्थापित किए हैं। इन पदार्थों में अनाज, दालें, फल-सब्जियाँ, तिलहन, मसाले तथा माँस-मछली एवं मुर्गियाँ आदि सम्मिलित हैं। इन तकनीकों का प्रयोग करना सरल है तथा गाँवों में छोटे एवं कुटीर स्तर के उद्योग स्थापित करने के लिए इनका उपयोग किया जा सकता है।

कृषि विज्ञान केन्द्रों और प्रशिक्षक प्रशिक्षण केन्द्रों की क्षेत्रवार संख्या

क्षेत्र

राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश

कृषि की संख्या

प्र.प्र. की संख्या

1.

पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, दिल्ली

36

01

2.

बिहार, पश्चिम बंगाल, अंडमान निकोबार द्वीप समूह (केन्द्र शासित)

26

-

3.

असम, उत्तर-पूर्वी राज्य सिक्किम सहित

16

01

4.

उत्तर प्रदेश

29

-

5.

आन्ध्र प्रदेश और महाराष्ट्र

41

01

6.

राजस्थान, गुजरात और केन्द्र शासित प्रदेश दादर और नागर हवेली

43

-

7.

उड़ीसा और मध्य प्रदेश

32

02

8.

केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, गोआ और केन्द्र शासित प्रदेश पांडिचेरी और लक्षद्वीप

38

03

 

कुल

261

08

 


कृषि विज्ञान केन्द्रों की योजनावार संख्या

क्रम संख्या

अवधि

कृषि विज्ञान केन्द्रों की संख्या

1.

पाँचवी योजना तक (1975-76 से 1979-80)

19

2.

छठी योजना (1980-81 से 1984-85)

70

3.

सातवीं योजना (1985-86 से 1989-90)

20

4.

वार्षिक योजनाएँ (1990-91 से 1991-92)

74

5.

आठवीं योजना (1992-93 से 1995-96 तक)

78

 

कुल

261

 


प्रयोगशाला ने एक लघु धान मिल का निर्माण किया है, जिससे धान से चावल जल्दी तथा अधिक मात्रा में प्राप्त होता है। इससे प्राप्त चोकर में भूसा नहीं होता। एक साधारण गेहूँ चक्की विकसित की गई है जिससे आटा और मैदा एक साथ प्राप्त होते हैं। इससे छोटी-छोटी बेकरियों को व्यापार में प्रोत्साहन दिया जा सकता है। इस चक्की में अनाज को साफ करना, पॉलिश द्वारा चोकर हटाना, पीसना और छानना सभी कार्य सम्भव हैं। इससे प्रति घंटे 100 कि.ग्रा. गेहूँ पीसा जा सकता है। इसी तरह मक्का, दाल, अनाज आदि की चक्कियाँ भी बनाई गई हैं। पापड़ बनाने की लघु मशीन बनाई गई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में वहीं उपलब्ध अनाज व दलहनों का प्रयोग करके एक सस्ता माल्टयुक्त ठोस शिशु आहार आसानी से तैयार किया जा सकता है। एक नए प्रकार का पौष्टिक आटा गाँवों में ही तैयार किया जा सकता है।

चमड़ा व चर्मशोधन


अब तक चर्मशोधन के लिए ग्रामीण चर्मकार चर्मशोधक गर्त या थैला पद्धति अपनाते आए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में चर्मशोधन के लिए एक सरल तथा हस्तचालित ड्रम पद्धति विकसित की गई है। इससे एक बार में दो खालों या 20 त्वचाओं का चर्मशोधन किया जा सकता है। निम्न श्रेणी के चमड़े का उन्नयन किया गया है तथा एन्जाइम द्वारा खाल से बाल हटाने की विधि विकसित की गई है। चर्म शिल्पियों के लिए उन्नत मशीनें व औजार बनाए गए हैं। इन्हें शिल्पियों ने अपना लिया है।

भवन निर्माण सामग्री


प्रयोगशालाओं में भवन निर्माण सामग्री, घटक तथा प्रणालियाँ विकसित की हैं। एक सरल हस्तचालित साँचे से युक्त मेज का विकास किया गया है जिसके द्वारा उचित रूप और आकार की ईंटें ढाली जा सकती हैं। विभिन्न सामग्री से ईंटें बनाने की विधियाँ विकसित की गई हैं। छप्पर के मकानों में आग की घटनाओं को रोकने के लिए रुड़की की केन्द्रीय भवन अनुसंधानशाला ने अग्निरोधी छप्पर की छत बनाई है। भूकम्प, आग, बाढ़, चक्रवात और तूफान आदि आपदाओं में पहली आवश्यकता आश्रय की होती है। राहत और पुनर्वास के लिए विकसित ‘तात्कालिक आश्रम स्थल’ एक से नाप और आकार की संरचनाओं के तिकोने फ्रेम के बने होते हैं।

सड़कें
ग्रामीण क्षेत्रों में कम लागत वाली सड़कें बड़ी संख्या में बनाने के लिए कई तकनीकों का विकास किया गया है। ग्रामीण सड़कों का जाल बिछाने के लिए माॅडल बनाया गया है, जिसमें गाँवों को बाजारों या उन वर्तमान मुख्य सड़कों से जो बाजारों से संबद्ध हैं, जोड़ा गया है। क्षेत्रीय आधार पर ग्रामीण सड़कों के मास्टर प्लान तैयार करने के लिए इस पद्धति का कारगर इस्तेमाल किया गया है। सड़कें बनाने के लिए स्थानीय मिट्टी का प्रयोग किया गया है।

पीने का पानी


ग्रामवासियों को पीने का स्वच्छ पानी देने के प्रयत्न किए जा रहे हैं। खराब पानी से अनेक रोग होते हैं। कई प्रयोगशालाओं में पानी के सर्वेक्षण, खोज तथा उपचार से सम्बन्धित प्रौद्योगिकियों का विकास किया गया है। इनमें पानी की खोज, परिशोधन, गुणवत्ता की जाँच तथा भण्डारण शामिल है। जमीन के नीचे पानी की उपस्थिति के सम्बन्ध में हुई वैज्ञानिक ज्ञान वृद्धि से भू-जल स्रोतों से पानी निकालने में काफी सहायता मिली है। गाँवों में जलवाहित संक्रमण एक आम बात है। कच्चे पानी में प्रायः हानिकारक बैक्टीरिया होते हैं। जलछानक श्लाकाओं को पानी भरने के लिए प्रयुक्त घरेलू बर्तनों जिनमें मिट्टी के घड़े भी हो सकते हैं, में लगाने से एक सामान्य परिवार की सुरक्षित पानी की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है। इन श्लाकाओं से छना पानी बैक्टीरिया मुक्त होता है। एक प्रयोगशाला ने ‘अमृत-कुंभ’ नामक यंत्र बनाया है जिसमें फ्लोराइड, सल्फेट, सीसा आदि भी समाप्त हो जाते हैं। देश के विभिन्न भागों में ऐसा पानी मिलता है जिसमें लोहे की काफी मात्रा होती है। इसके लिए एक ‘लौह निष्कासन यंत्र’ बनाया गया है। इसे हैंडपम्प के साथ लगाया जा सकता है।

कुँओं के क्लोरीनीकरण के लिए एक पात्र नीरी प्रयोगशाला ने बनाया है। गाँवों के घरों के लिए एक फिल्टर विकसित किया गया है। खारे पानी को साफ करने के लिए भी फिल्टर बनाया गया है। दस हजार से पचास हजार लीटर पानी को प्रतिदिन शुद्ध करने की क्षमताओं वाले स्थिर संयन्त्र बना लिए गए हैं। वर्षा जल एकत्र करने की विधियों का विकास किया गया है। घरेलू स्तर के लिए तैयार की गई योजना में पानी घरों की छतों, आंगनों तथा छोटे जलग्रहण प्लेटफार्मों से इकट्ठा करके लोहे व सीमेंट की टंकियों में संचित किया जाता है।

पर्यावरण एवं स्वच्छता


लोहे व सीमेंट से बनी जल टंकियाँ बनाई गई हैं। इनकी क्षमता 200 लीटर से 20 हजार लीटर तक है। ये 30 प्रतिशत सस्ती पड़ती हैं। भारत में अनेक स्थानों में इनका प्रयोग किया गया है। इसके अलावा एक ऐसे टैम्पर प्रूफ पानी बचाऊ नल का विकास किया गया है जिसे सार्वजनिक स्थानों पर लगाने से पानी की बर्बादी को रोका जा सकता है।

प्रायः देखा गया है कि गंदा पानी गलियों में बहता रहता है, जिसके कारण मच्छर आदि फैलते हैं। इस पानी को निकालने के लिए एक निकाय का विकास किया गया है, जिसमें एक गाद भस्म टैप कक्ष तथा एक भू-वेदन छिद्र (पानी का पता लगाने के लिए) होता है। इस निकाय को 20 गाँवों में लगभग 3500 मकानों लगाया गया है और इसकी लोकप्रियता बड़ी तेजी से बढ़ रही है।

शोष गर्त (सोकपिट) व्यवस्था द्वारा निकृष्ट पानी का प्रबंधन किया गया है। इससे गंदे पानी का निपटान शोष-गर्त के माध्यम से जहाँ का तहाँ किया जा सकता है। सी.बी.आर.आई. ने सस्ते शौचालयों का निर्माण किया है। गर्त टाइप के शौचालय, जिनमें स्वयं पानी डालना पड़ता है, ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आर्थिक एवं प्रायोगिक दोनों ही दृष्टियों से अधिक उपयोगी पाए गए हैं।

कारीगरों की दक्षता


दैनिक जीवन में रस्सी कई प्रकार से प्रयुक्त की जाती है। यह जूट, सन, सनई, नारियल आदि के रेशों को बाँटकर बनाई जाती है। गाँवों में इसे हाथ द्वारा कड़ी मेहनत से बनाया जाता है। रोजगार के अधिक अवसर प्रदान करने के लिए रस्सी की लड़ें बनाने वाली एक सरल मशीन विकसित की गई है। इस मशीन द्वारा एक व्यक्ति 5-8 किलोग्राम रस्सी तैयार कर सकता है।

इसके अतिरिक्त अनेक ऐसी विधियाँ या प्रौद्योगिकियाँ विकसित की गई हैं, जो गाँवों की स्थानीय परिस्थितियों तथा सामग्री को काम में लाती हैं। इनमें पत्तों के दोने तथा पत्तलें, क्रिस्टल, काँच की वस्तुएँ, बोन चाइना, पोर्सिलेन, सुसज्जित पाटरी, क्राकरी, ब्लैकबोर्ड, प्लास्टिक की स्लेटें, कम झड़ने वाले चाक, इलैक्ट्रॉनिक प्रदर्शन बोर्ड, हस्त/मशीन निर्मित विशिष्ट कागज आदि शामिल हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार)

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