मूर्ति विसर्जन पर एक चिट्ठी, धर्माचार्यों के नाम

Submitted by RuralWater on Sun, 10/18/2015 - 15:16
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नवरात्र विशेष


धर्म जगत के सभी आचार्यों को प्रणाम।
मूर्ति विसर्जन पर एक विनम्र निवेदन प्रस्तुत कर रहा हूँ।
उचित लगे, तो स्वीकारें और अनुचित लगे, तो मुझे सुधारें।
खुशी होगी।


आचार्यवर!
.आम धारणा है कि मुख्य रूप से उद्योग, सीवेज और शहरी ठोस कचरा मिलकर हमारी नदियों को प्रदूषित करते हैं। इसीलिये प्रदूषण के दूसरे स्रोत, कभी किसी बड़े प्रदूषण विरोधी आन्दोलन का निशाना नहीं बने। समाज ने खेती में प्रयोग होने वाले रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों को नदी के लिये कभी बड़ा खतरा नहीं माना।

संस्कार व दूसरे धार्मिक कर्मकाण्डों में प्रयोग होने वाली सामग्रियों के कारण नदियों का कुुछ नुकसान होने की बात का विरोध ही हुआ। देखने में यही लगता है कि धूप, दीप, कपूर, सिंदूर, रोली-मोली, माला, माचिस की छोटी सी तीली, और पूजा के शेष अवशेष मिलकर भी क्या नुकसान करेंगे इतनी बड़ी नदी का। इसी सोच के कारण हम अपनी आस्था को आगे पाते हैं और नदी की सेहत को पीछे।

इसी बिना पर राष्ट्रीय हरित पंचाट द्वारा लगाई रोक के बावजूद, दिल्ली की यमुना में पहले विश्वकर्मा और फिर गणेश मूर्तियों का बेरोकटोक विसर्जन हुआ। पहले और अभी हाल में कई धर्माचार्यों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा गंगा-यमुना में मूर्ति विसर्जन पर लगाई रोक को उचित नहीं माना। इसके पीछे कितना बवाल हुआ!

मानने वालों ने इसे दलपरस्त राजनीति भी माना; जबकि जिस ‘इको ग्लोबल ऑर्गेनाइजेशन’ की याचिका पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने मूर्ति विसर्जन पर रोक लगाई है, स्वयं स्वामी श्री चिदानंद सरस्वती मुनि और स्वामी श्री आनंद गिरि जैसे धर्माचार्य उसके तथा उससे सम्बद्ध पत्रिका ‘ग्लोबल ग्रीन्स’ के संरक्षक हैं। जाहिर है कि मूर्ति विसर्जन पर रोक को इन धर्माचार्यों का तो समर्थन प्राप्त है ही।

क्या विरोधाभासी नहीं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी का रुख?


मुझे ताज्जुब है कि रोक को अनुचित मानने वाले धर्माचार्यों की नेतृत्त्वकारी भूमिका में इस बार विद्यामठ, वाराणसी के स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी भी शामिल थे। ताज्जुब, स्वामी जी के बयान पर भी है। बयान का लब्बो लुआब यह है कि गंगा जी में सैकड़ों नाले गिरते हैं; उन पर तो सरकार रोक लगा नहीं पाती; क्या सारी रोक गणेश जी के भक्तों के लिये ही है? क्या यह वही रवैया नहीं है, जैसे आजकल भाजपा के प्रवक्ता अपनी पार्टी नेताओं की अनैतिकता को कांग्रेसी नेताओं की अनैतिकता से कमतर बताकर, अनैतिकता के आरोपों से अपना बचाव कर रहे हैं?

ताज्जुब इसलिये भी, चूँकि स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद जी, जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी के संरक्षण में संचालित ‘गंगा सेवा अभियानम्’ के विश्व प्रमुख हैं। स्वामी जी, शंकराचार्य के शिष्य प्रतिनिधि भी हैं। इस नाते उनकी जिम्मेदारी और भी महत्त्वपूर्ण है।

स्वामी जी, गंगा सेवा अभियानम् द्वारा पिछले हरिद्वार कुम्भ में स्नान घाटों को गन्दगी मुक्त बनाये रखने के लिये तैनात ‘गंगा सेना’ की मुस्तैदी का प्रशंसनीय चित्र अभी मैं भूला नहीं हूँ। ‘सिर्फ स्नान नहीं है कुम्भ’ पुस्तक में छपा आपका सन्देश, इस लेख को लिखते वक्त मेरे सामने है- “यह हमारा ही अपराध है कि गंगा जल की जिन बूँदों को मृत्यु और जन्म के समय मुँह में डालने की लालसा सभी को होती है, वे आज स्नान करने लायक तो दूर, आचमन योग्य भी नहीं बची।..... अतः गंगा सेवा अभियान अब विशाल भारत की सभी सकारात्मक शक्तियों को जोड़कर गंगा को अमृतधारा बनाने को कृत संकल्प है। गंगा को जीवन्त बनाए बगैर भारत की संस्कृति और समृद्धि ज्यादा दिन टिक नहीं सकती।’’

ऐसे संकल्प और मान्यता वाले माननीय धर्माचार्य का मूर्ति विर्सजन पर रोक से विरोध क्या स्वयंमेव विरोधाभासी नहीं? बेहतरी के लिये हम मुर्दा चीजों में भी बदलाव करते हैं; संस्कृति तो जीवन्त होती है। क्या बेहतरी के लिये बदलाव ही सांस्कृतिक विकास नहीं?

क्या गंगा में मूर्ति विसर्जन पर रोक, गंगा को जीवन्त बनाए रखने में सहयोगी नहीं; खासकर ऐसी मूर्तियों का जो प्लास्टर ऑफ पेरिस, प्लास्टिक और लेड आधारित नुकसानदायक रंग-रोगन से बनाई जाती हैं? क्या हमें तय नहीं करना चाहिए कि मृत्यु पूर्व दो बूँद गंगाजल की लालसा की पूर्ति ज्यादा महत्त्वपूर्ण है या नदियों में मूर्तियों का विसर्जन? आइये, तय करें।

आदेश


उल्लेखनीय है कि इको ग्लोबल ऑर्गेनाइजेशन (याचिका संख्या-41310) नामक एक स्थानीय संगठन ने वर्ष 2010 में यमुना के इलाहाबाद स्थित सरस्वती घाट पर मूर्ति विसर्जन पर रोक का अनुरोध किया था। हाईकोर्ट ने इलाहाबाद में गंगा और यमुना.. दोनों में मूर्ति विसर्जन पर वर्ष-2012 में ही रोक लगा दी थी।

उसने इलाहाबाद प्रशासन और विकास प्राधिकरण की जिम्मेदारी सुनिश्चित की थी कि वह वैकल्पिक स्थान की व्यवस्था कर कोर्ट को सूचित करे। प्रशासन ने समय की कमी का रोना रोते हुए दो वर्ष पूर्व यह छूट हासिल की थी कि वह अगले वर्ष वैकल्पिक व्यवस्था कर लेगा।

गत् वर्ष उसने स्थानीय खुफिया रिपोर्ट के आधार पर कानून-व्यवस्था बिगड़ने का डर दिखाकर कोर्ट से फिर छूट हासिल कर ली। याद कीजिए कि कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि वर्ष 2014 से गंगा-यमुना में मूर्ति विसर्जन पर यह रोक पूरे उत्तर प्रदेश में लागू हो जाएगी। इसके लिये उसने गंगा-यमुना प्रवाह मार्ग के जिलाधिकारियों को आवश्यक निर्देश व आवश्यक धन जारी करने का निर्देश भी उ.प्र. शासन को दे दिया गया था।

इस वर्ष शासन-प्रशासन ने कोशिश की, तो बनारस का बवाल हुआ। हालांकि यह रोक देश में पहली नहीं थी। अंधश्रृद्धा निर्मूलन समिति की आपत्ति पर यह रोक महाराष्ट्र के नागपुर में भी लगाई गई थी। इस दृष्टि यह रोक क्या अब और भी जरूरी नहीं हो गई है?

क्यों जरूरी यह रोक?


सच यह है कि जब तक नदियों में खूब प्रवाह था; अविरलता थीं; कचरे को खा जाने वाले जीवों की बड़ी संख्या थी, तब तक नदियों में खुद को साफ कर लेने की क्षमता थी। नदियाँ बिना इटीपी और एसटीपी कचरे को खुद साफ कर लेती थी।

अब प्रवाह की मात्रा व अविरलता के अभाव में अब नदियाँ यह क्षमता खो बैठी हैं। अब नजारा बदल गया है। अतः हमें भी अब अपनी नजर और नज़रिया बदलना होगा। नजारा यह है कि आज भारत के पास बतौर नजीर बताने के लिये भी एक ऐसी नदी नहीं, जो किसी शहर से गुजरती हो और उसका पानी पीने लायक हो।

जयपुर और दिल्ली ने तो अपनी स्थानीय नदियों के नाम बदलकर क्रमशः अमानीशाह और नजफगढ़ नाला रख दिया है। इस उपेक्षा का ही नतीजा है कि दुनिया की सबसे पवित्र कही जाने वाली हमारी गंगा, दुनिया की उन प्रथम 10 नदियों में शुमार हो गई है, जिनके खुद के अस्तित्व पर खतरा मँडरा रहा है।

यमुना में यदि 80 फीसदी प्रदूषण देश की राजधानी दिल्ली का है, तो गंगा में 48 फीसदी अकेले उत्तर प्रदेश का। गंगा में औद्योगिक प्रदूषण का आँकड़ा कुल प्रदूषण का मात्र 17 प्रतिशत है, किन्तु इसका विषैलापन इतना अधिक है कि 80 प्रतिशत सीवेज प्रदूषण इसके आगे कहीं नहीं ठहरता। खेती आदि अन्य स्रोतों से प्राप्त शेष तीन प्रतिशत प्रदूषण को भी आप खतरनाक श्रेणी में रख सकते है। मूर्ति विसर्जन इन अन्य स्रोतों में से एक है।

कैसे प्रदूषक नई सामग्री?


ध्यान करने की बात है कि परम्परागत तौर पर बनने वाली मूर्तियाँ मिट्टी, रुई, बाँस की खप्पचियाँ, और प्राकृतिक रंगों से बनाई जाती थीं। आज इनकी जगह प्लास्टर ऑफ पेरिस, लोहे की सलाखों, पॉलीस्टर कपड़ों, प्लास्टिक, सिंथेटिक पेंट और कई अन्य सजावटी-दिखावटी सामानों ने ले ली है।

मूर्तियों की बढ़ती संख्या और उन्हें ज्यादा-से-ज्यादा सुन्दर दिखाने के लिहाज से ऐसा हुआ है। जल्दी सूखने की क्षमता के कारण प्लास्टर ऑफ पेरिस का इस्तेमाल बढ़ा है।

प्लास्टर ऑफ पेरिस, जिप्सम को 300 डिग्री फारनेहाइट पर गर्म करके बनाया जाता है। बंजर भूमि का उपजाऊ बनाने में जिप्सम का प्रयोग बहुतायत में होने के कारण यह भ्रम स्वाभाविक है कि जिप्सम लाभप्रद रसायन है, तो प्लास्टर ऑफ पेरिस नुकसानदेह कैसे हो सकता है।

इस नवमी से पहले एक संकल्प


आइए! इस नवमी से पूर्व ही संकल्पित हों। अपने संस्कार और नदी का व्यवहार वापस लौटाएँ। निवेदन है कि धर्माचार्य और नदी आस्था के मार्गदर्शक, बेहतरी का पथ प्रशस्त करें। मूर्ति निर्माता, प्रदूषक सामग्री से परहेज करें और भक्तगण, प्रदूषक सामग्रीयुक्त मूर्तियों से। विसर्जनकर्ता, मूर्तियों का नदी विसर्जन करने की बजाय, विसर्जन से पूर्व एक नए पवित्र तालाब की रचना करें। उसमें विसर्जन करें। विसर्जन पश्चात् शेष सामग्री का उचित निष्पादन करें। भूमि विसर्जन, सर्वश्रेष्ठ विकल्प है ही। इससे नदी माँ को बचाने में भी हमारा योगदान होगा और आस्था भी अक्षुण्ण रहेगी। इस नवमी को नदी माताओं को अपनी सन्तानों और प्रकृति का प्रतिनिधित्व करने वालों से यही उम्मीद है। क्या हम माँ की उम्मीद पूरी करेंगे?
आईआईटी, मुम्बई के सेंटर फॉर एन्वायरमेंट साइंस एंड इंजीनियरिंग के प्रो. श्याम असोलकर का अध्ययन बताता है कि मिट्टी 45 मिनट के अन्दर नदी के पानी में घुल जाती है। अधिक पानी के सम्पर्क में आने पर प्लास्टर ऑफ पेरिस और सख्त हो जाता है। इस गुण के कारण इसे घुलने में महीनों लग जाते हैं।

सिंथेटिक पेंट के साथ मिलकर इसका दुष्प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। इसी बिना पर गुजरात सरकार ने 23 जनवरी, 2012 में मूर्ति निर्माण में प्लास्टर ऑफ पेरिस और सिंथेटिक पेंट के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। हालांकि राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने रोक को राज्य सरकार का अधिकार न बताते हुए कानूनी कारणों से हटा दिया, पर सत्य यही है कि मूर्ति निर्माण की नई सामग्री खतरनाक है।

दुष्प्रभाव प्रमाणित करते अध्ययन


2007 के एक अध्ययन ने भोपाल की ऊपरी झील में मूर्ति विसर्जन के बाद भारी धातु की सान्द्रता में 750 प्रतिशत अधिक बढ़ा हुआ पाया। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की बंगलुरु शहर रिपोर्ट ने धातु की सान्द्रता 10 गुनी और तांबा की 200 से 300 गुना अधिक पाई।

ऐसे अलग-अलग हुए अध्ययनों में मूर्ति विसर्जन के बात सम्बन्धित स्थान व स्रोत की जैविक-रासायनिक ऑक्सीजन माँग, सुचालकता, भारीपन के अलावा नाइट्रेट, क्रोमियम और सीसा का प्रतिशत बढ़ा हुआ पाया गया। सीसा यानी सिंदूर। महाराष्ट्र का एक अध्ययन प्रमाण है कि मूर्ति विसर्जन के बाद मछलियों के मरने की संख्या बढ़ जाती है। प्रदूषण के विष से मरी ऐसी मछलियों को खाने से लोगों के शरीर में खतरनाक बीमारियों का जन्म स्वाभाविक है।

नदी प्रदूषण के जो अन्य नुकसान हैं, सो अलग। गंगा की डॉल्फिन दुनिया की उन प्रजातियों में हैं, जो स्वच्छ पानी में ही रहती हैं। अतः प्रदूषण से उनकी मौत का खतरा भी कम नहीं। भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद ने अपनी एक रिपोर्ट में पाया कि देश के अन्य इलाकों की तुलना में उ.प्र., बिहार और प. बंगाल में नदियों के किनारे रहने वाले लोग ज्यादा आसानी से कैंसर की गिरफ्त में आ जाते हैं।

बढ़ती मूर्तियाँ : बढ़ता संकट


उक्त अध्ययनों के साथ यदि इस आँकड़े को जोड़ दें कि अकेले गंगा में एक साल में कुल सात करोड़, 90 लाख लोगों ने स्नान किया। अकेले महाराष्ट्र में गत् वर्ष डेढ करोड़ गणेश मूर्तियों का विसर्जन हुआ। ऐसे में बनने वाली मूर्तियों की संख्या, साल में दस करोड़ का आँकड़ा छूती हो, तो कोई ताज्जुब नहीं। दुर्गा पूजा, गणेश चतुर्थी, विश्वकर्मा पूजा और ताजिया : नदी में विसर्जन के ये चार मौके होते हैं।

भारतीयों के दुनिया भर में फैलने के साथ यह पर्व भी अब दुनिया भर में मनाए जाते हैं। आप चीन में भी दुर्गा पूजा का नजारा देख सकते हैं। जाहिर है कि मूर्तियों की बढ़ती संख्या, मूर्ति निर्माण के व्यावसायीकरण का यह एक बड़ा कारण है। इस कारण ही मूर्ति निर्माण का तरीका व इसका विसर्जन, आज नदियों, तालाबों और अन्ततः हमारे जी का जंजाल बन गए हैं।

प्रदूषण नियंत्रण के मार्गदर्शी निर्देश


इसी को ध्यान में रखते हुए केेन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 2010 में ही अलग-अलग प्रकार की जलसंरचनाओं में मूर्ति विसर्जन के लिये अलग-अलग मार्गदर्शी सिद्धान्त जारी कर दिये थे। इन निर्देशों के मुताबिक मूर्ति विसर्जन से पहले मूर्ति से उतारकर जैविक-अजैविक पदार्थों को अलग-अलग कर अलग-अलग ड्रमों में रखना।

वस्त्रों का उतारकर अनाथालयों में पहुँचाना तथा सिंथेटिक पेंट के स्थान पर प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करना शामिल है। मूर्ति विसर्जन से पूर्व विसर्जन स्थल पर एक जाल बिछाया जाना चाहिए, ताकि उसके अवशेषों को तुरन्त बाहर निकाला जा सके। मूर्ति के अवशेषों को मौके से हटाने की अवधि अलग-अलग जलसंरचनाओं के लिये 24 से 48 घंटे निर्धारित की गई है।

कहा गया है कि मूर्ति विसर्जन के स्थान आदि निर्णयों की बाबत् नदी प्राधिकरण, जलबोर्ड, सिंचाई विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, स्थानीय स्वयंसेवी संगठन आदि से पूछा जाना चाहिए। इन्हेें शामिल कर कमेटी गठित करने का भी निर्देश है। मूर्ति विसर्जन के मार्गदर्शी सिद्धान्तों को लागू कराने के लिये जागृति की जिम्मेदारी राज्य व जिला प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इकाइयों को सौंपी गई है।

चेतावनी कायम है


हालांकि इन निर्देशों को सबसे पहले प. बंगाल ने अपनाया। तत्पश्चात् 2011 में महाराष्ट्र ने और 2012 में कर्नाटक ने भी इन्हें लागू किया। अब उड़ीसा ने भी इस बाबत् निर्देश जारी किये हैं। महाराष्ट्र के कई नगर निगमों ने प्राकृतिक झील आदि में मूर्ति विसर्जन पर रोक भी लगाई है। यह रोक 100 फीसदी लागू भले ही न हो सके हों, लेकिन जागृति बढ़ी है।

कई इलाकों में मूर्तियों के भूसमाधि के भी उदाहरण सामने आये हैं। किन्तु दुर्भाग्य है कि अन्य राज्यों ने इस पर अभी तक गौर नहीं किया है। हर साल मूर्तियों की बढ़ती संख्या एक गम्भीर चेतावनी है।

देश में पानी के प्रदूषण का बढ़ता ग्राफ स्वयंमेव गम्भीर चेतावनी है ही। क्या यह उत्तर प्रदेश के शासन, प्रशासन, समाज और धर्माचार्यों के चेतने का विषय नहीं है? क्या जरूरी नहीं है कि इस रोक का दायरा धीरे-धीरे बढ़ाकर, सभी नदियों को शामिल करें? अन्ततः मिलती तो सभी गंगा में ही हैं।

आस्था टूटने की बात बेमानी


मालूम नहीं, नदी में विसर्जन को जरूरी बताने वाला कोई उल्लेख शास्त्रों में कहीं है भी या नहीं? किन्तु इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि भारतीय संस्कृति की आस्था नदी के साथ माँ जैसे व्यवहार व संस्कार में थी; तद्नुसार नदी में मल-मूत्र त्याग, मुँह धोना, दातुन-कुल्ला करना, माला फेंकना, कुश्ती लड़ना, बदन मलना, रतिक्रीड़ा करना, तेल मलकर या मैले बदन प्रवेश करना, पहने हुए वस्त्र छोड़ना व जल पर आघात करना पाप है।

‘गंगा रक्षा सूत्र’ गंगा किनारे झूठ बोलना, बकवाद करना तथा कुदृष्टि डालने को भी पाप मानता है। हमने ये संस्कार छोड़ दिये; परिणामस्वरूप नदियों ने भी अपना व्यवहार छोड़ दिया है। क्या यह सच नहीं कि मूतियों का विसर्जन नदियों में रोक देने से हमारी आस्था प्रभावित हो न हो, लेकिन नदियों की बीमार होने से हम बीमार, बेकार और लाचार जरूर हो जाएँगे। क्या इस सच को नकार दें?

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

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स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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