मूर्ति विसर्जन और पर्यावरणीय सुरक्षा के प्रयास

Submitted by RuralWater on Mon, 10/19/2015 - 10:33

नवरात्र विशेष


. भारत जैसे संस्कारित देश में लगभग सभी प्रमुख धर्मों को मानने वाले लोग निवास करते हैं। अपने-अपने धर्म के अनुसार उनके तीज-त्योहार, उत्सव, पर्व, कर्मकाण्ड और आस्थाएँ हैं। धार्मिक विविधता के कारण देश भर में लगभग साल भर धार्मिक अनुष्ठान एवं कार्यक्रम चलते रहते हैं।

धार्मिक कार्यक्रमों में हिन्दुओं का गणेश उत्सव और दुर्गापूजा तथा मुसलमानों का ताजिया ऐसे सार्वजनिक कार्यक्रम हैं जिनका आयोजन सार्वजनिक और व्यापक होता है। लाखों लोग पूरी श्रद्धा-भक्ति से उनमें भागीदारी करते हैं। अनुमान है कि अकेले मुम्बई में 1.5 लाख से अधिक गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन होता है।

इसी तरह कोलकाता की हुबली नदी में ही 15,000 से अधिक दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। अनुमान है कि विसर्जित होने वाली प्रतिमाओं में से अधिकांश 20 से 40 फुट ऊँची होती हैं। इस साल बनी दुर्गाजी की सबसे ऊँची प्रतिमा लगभग 88 फुट की है। यह रिकार्ड ऊँचाई है।

ग़ौरतलब है कि हर साल विसर्जित होने वाली मूर्तियों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। देश में ऐसा एक भी जलस्रोत नहीं है जिसमें धार्मिक सामग्री का विसर्जन नहीं होता हो। समुद्र के किनारे बसे नगरों में, अमूनन, उसका विसर्जन समुद्र में होता है।

गणेश तथा दुर्गा प्रतिमाओं और ताजियों के विसर्जन का समय लगभग तय जैसा है। गणेश तथा दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन की अवधि मानसून के थोड़े दिन बाद आती है इसलिये जल स्रोतों में सामान्यतः पर्याप्त पानी होता है। उसकी गुणवत्ता निरापद होती है। वह जीव-जन्तुओं और जलीय वनस्पतियों के लिये भी निरापद होता है।

प्रतिमाओं का निर्माण यदि बायोडिग्रेडेबल (नष्ट होने वाले) पदार्थों से होता है तो उनके विसर्जन से जलस्रोत के पानी की गुणवत्ता पर बुरा असर नहीं पड़ता। यह कई साल पहले होता था पर अब प्रतिमाओं के निर्माण में प्लास्टर आफ पेरिस, प्लास्टिक, सीमेंट, सिन्थेटिक विविध रंग, थर्मोकोल, लोहे की छड़, घास-फूस, पुआल, क्ले इत्यादि का उपयोग होता है।

दुर्गाजी की मूर्ति पर बड़ी मात्रा में सिन्दूर चढ़ाया जाता है। भव्य बनाने के लिये उन पर पेंट लगाया जाता है और बहुत सुन्दर तरीके से अलंकृत किया जाता है। यही सब गणेश प्रतिमा बनाने में किया जाता है।

रंग बिरंगे आयल पेंटों में नुकसान करने वाले घातक रसायन मिले होते हैं इसलिये जब मूर्तियों का विसर्जन होता है तो भले ही बायोडिग्रेडेबल सामग्री नष्ट हो जाती है पर प्लास्टर आफ पेरिस और पेंट के घातक रसायन पानी में मिल जाते हैं और अन्ततोगत्वा पानी जहरीला हो जाता है। उसका असर जलीय वनस्पतियों, जीव-जन्तुओं के अलावा मनुष्यों की सेहत पर भी पड़ता है।

वैज्ञानिकों ने देश के अनेक भागों में जल स्रोतों (नदी, तालाब, झील और समुद्र) के पानी पर प्रतिमाओं के विसर्जन के प्रभाव का अध्ययन किया है। इन अध्ययनों के परिणाम, मोटे तौर पर दर्शाते हैं कि मूर्तियों के विसर्जन से पानी की गुणवत्ता में काफी अन्तर आता है।

पानी की कठोरता और बीओडी (Biological oxygen demand) बढ़ जाती है। कैल्शियम और मैग्नीशियम की भी मात्रा बढ़ जाते हैं। मूर्तियों को आकर्षक दिखाने की होड़ में चूँकि कई रंगों का आयल पेंट प्रयुक्त होता है इसलिये जब मूर्ति पानी में विसर्जित होती है तो आयल पेंट में मौजूद भारी धातुएँ यथा ताँबा, जस्ता, क्रोमियम, कैडमियम, सीसा, लोहा, आर्सेनिक और पारा जल स्रोतों के पानी में मिल जाते हैं।

चूँकि धातुएँ नष्ट नहीं होतीं इसलिये वे धीरे-धीरे भोजन शृंखला का हिस्सा बन अनेक बीमारियों यथा मस्तिष्क किडनी और कैंसर का कारण बनती हैं। जलाशयों पर किया अध्ययन बताता है कि कहीं-कहीं उपर्युक्त धातुओं के अलावा निकल और मैंगनीज भी पाया गया है। मुम्बई में हुए अध्ययनों से पता चलता है कि विसर्जन के तुरन्त बाद साफ पानी के लगभग सभी पैरामीटर (सकल घुलित ठोस, गन्दलापन, कठोरता, कुल ठोस, पी-एच मान इत्यादि) बढ़ जाते हैं लेकिन समुद्री पानी में विसर्जन के समय वे बढ़ते हैं लेकिन कुछ समय बाद घटकर लगभग पूर्ववत हो जाते हैं।

कुछ समय पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण फैसले में गंगा और यमुना नदी में मूर्तियों के विसर्जन पर रोक लगाई थी और उत्तर प्रदेश सरकार के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (State Pollution Control Board) को निर्देश दिये थे कि वह एक साल की अवधि में गंगा और यमुना नदी में मूर्तियों के विसर्जन पर लगाई रोक की पालना सुनिश्चित करे। लोग भी सहमत हो रहे हैं। पूरे देश में धीरे धीरे जागरुकता बढ़ रही है पर वास्तविक लक्ष्य हासिल करने के लिये मीलों चलना होगा। इसके लिये समुद्र के पानी की विपुल मात्रा और लहरों की गतिविधि जिम्मेदार है। ग़ौरतलब है कि विसर्जन से पानी की गुणवत्ता का बदलाव सीमित समय के लिये होता है पर मूर्तियों के बनाने में प्रयुक्त मिट्टी और नष्ट नहीं होने वाली सामग्री विसर्जन स्थल पर साल-दर-साल जमा होती रहती है।

कहा जा सकता है कि विसर्जन के कारण होने वाला प्रदूषण, कल-कारखानों तथा सीवर इत्यादि के कारण होने वाले सालाना प्रदूषण के उलट, बेहद कम और सीमित समय के लिये होता है। उसके द्वारा पूरे देश में जमा मिट्टी, समग्र रूप से भले ही कुछ हजार टन हो, चूँकि वह सामान्यतः जल स्रोत के किनारे होती है इसलिये उसे मशीनों की मदद से हटाना सम्भव होता है।

भारत सरकार के केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने मूर्तियों के विसर्जन के कारण नदियों तथा जलाशयों में भारी धातुओं तथा प्लास्टर आफ पेरिस इत्यादि के कारण होने वाले प्रदूषण की रोकथाम के लिये मार्गदर्शिका जारी की है। मार्गदर्शिका के प्राधानों के अनुसार नगरीय निकायों की जिम्मेदारी है कि वे मूर्ति विसर्जन के लिये पृथक स्थान तय करें।

तय स्थानों पर, भूजल को प्रदूषित होने से बचाने के लिये जलस्रोत की तली में रिसाव रोकने वाली सिन्थेटिक परत बिछाएँ। इसके अलावा, 48 घंटों के अन्दर विसर्जित मूर्तियों और अन्य सामग्री को बाहर निकालकर उनका सुरक्षित निपटान कराएँ। इसके अलावा राज्य सरकारों से कहा गया है कि वे प्रभावित जलस्रोतों के पानी के प्रदूषण की त्रिस्तरीय मानीटरिंग करें।

इन नियम कायदों के कारण अनेक स्थानों पर सकारात्मक प्रयास किये गए हैं। गुजरात सरकार ने प्लास्टर आफ पेरिस और अन्य खतरनाक रसायनों के उपयोग पर रोक लगाई है और जिला प्रशासन को निर्देशित किया है कि वह मूर्तियों का विसर्जन नदियों और तालाबों के निकट कृत्रिम जलस्रोतों में करवाएँ।

कर्नाटक सरकार ने लोगों के घरों के पास विसर्जन की कृत्रिम व्यवस्था कराई है। इनमें विसर्जित मूर्तियों का निपटान ठोस अपशिष्ट निपटान नियमों के अनुसार किया जाएगा। इसके अलावा, लोगों से अपील की है कि वे नष्ट होने वाली सामग्री (बायोडिग्रेडेबल) से बनी मूर्ति ही उपयोग में लाएँ। नागपुर, इन्दौर, कोलकाता इत्यादि नगरों में जलस्रोतों को सम्भावित हानि से बचाने के लिये अनेक प्रयास प्रारम्भ किये गए हैं।

ग़ौरतलब है कि नदी विज्ञानी और पर्यावरण प्रेमी पिछले एक दशक से भी अधिक समय से जल स्रोतों में मूर्ति विसर्जन के द्वारा होने वाले नुकसान के विरुद्ध अभियान चला रहे हैं। न्यायालयों द्वारा भी प्रदूषण की रोकथाम के लिये समय-समय पर फैसले सुनाए हैं। एनजीटी भी काफी सक्रिय है।

कुछ समय पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण फैसले में गंगा और यमुना नदी में मूर्तियों के विसर्जन पर रोक लगाई थी और उत्तर प्रदेश सरकार के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (State Pollution Control Board) को निर्देश दिये थे कि वह एक साल की अवधि में गंगा और यमुना नदी में मूर्तियों के विसर्जन पर लगाई रोक की पालना सुनिश्चित करे। लोग भी सहमत हो रहे हैं। पूरे देश में धीरे धीरे जागरुकता बढ़ रही है पर वास्तविक लक्ष्य हासिल करने के लिये मीलों चलना होगा।

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