सूक्ष्म पनबिजली एवं सामाजिक बदलाव

Submitted by Hindi on Tue, 10/20/2015 - 13:08
Source
योजना, अप्रैल 2001

सूक्ष्म पनबिजली घर, जो सामुदायिक सहयोग अर्थात रुपया, मेहनत, वस्तु आदि के दान से समुदाय द्वारा स्वयं ही निर्मित एवं संचालित किए जाएँ, दूरदराज के एवं अलग-थलग पड़े क्षेत्रों में विद्युतीकरण के कार्य को गति प्रदान कर सकते हैं एवं कई प्रकार का सामाजिक लाभ देने के साथ-साथ रोजगार का भी सशक्त माध्यम बन सकते हैं। ग्रामीण पुनर्लाभ एवं विकास संघ द्वारा संचालित ऐसे प्रयोग जहाँ ऐसे पनबिजली घर समुदाय द्वारा स्वयं बनाए गए हैं, इस दिशा में पथ-प्रदर्शक का कार्य कर सकते हैं।

भारत जैसे देश में जहाँ बिजली की भारी तंगी है, और पर्वतीय एवं जनजातीय इलाकों में गरीबी-रेखा के नीचे रहने वाले अनेक ऐसे परिवार हैं जिन्हें बिजली उपलब्ध नहीं हैं, वहाँ आवश्यकता इस बात की है कि समुदाय-आधारित पनबिजली निर्माण को प्रोत्साहित किया जाए। विभिन्न राज्य सरकारें भले ही यह दावा पेश करती हों कि उन्होंने गाँवों में शत-प्रतिशत विद्युतीकरण कर दिया है परन्तु वास्तविकता यह है कि बिजली अभी कम ही लोगों तक पहुँच सकी है तथा अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि एवं घरेलू उद्योग बंद होने के कगार पर हैं जिसका प्रमुख कारण है बिजली का महंगा होना एवं उसकी अनियमित आपूर्ति। एक अध्ययन के अनुसार हिमालय क्षेत्र में केवल 30 प्रतिशत घरों में बिजली के कनेक्शन हैं। केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुसार उत्तर-पूर्व में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत राष्ट्रीय औसत के एक-तिहाई से भी कम है। जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, बिहार, पश्चिम बंगाल, सिक्किम एवं केरल में भी यह औसत से बहुत कम है, जबकि हिमाचल प्रदेश, जो पनबिजली का प्रमुख स्रोत है, यह औसत राष्ट्रीय औसत से जरा ही नीचे है। भारत में प्रति व्यक्ति खपत केवल 350 यूनिट है जबकि चीन में यह 687, मलेशिया में 2078 एवं अमेरिका में 11,296 यूनिट है।

देश के पर्वतीय एवं दूरस्थ स्थलों में समस्या केवल बिजली की कमी की ही नहीं अपितु वितरण एवं रख-रखाव की है क्योंकि ये इलाके दुर्गम हैं और फिर वहाँ का मौसम भी अत्यन्त प्रतिकूल है। कुछ राज्यों में ऐसा भी है कि छोटी ग्रामीण बस्तियाँ विद्युतीकरण कार्यक्रम का अंग ही नहीं हैं। कारण यह है कि इन इलाकों तक बिजली पहुँचाना अथवा उन्हें ग्रिड से जोड़ना अत्यन्त खर्चीला है और खपत कम होने के कारण निवेश पर पर्याप्त ‘रिर्टन’ नहीं मिल पाता।

अतः इन क्षेत्रों में बिजली की समस्या से निजात पाने एवं ग्रामीण बस्तियों को लाभ पहुँचाने हेतु गैर-सरकारी क्षेत्र में पनबिजली उत्पादन के अनेक व्यक्तिगत एवं सामूहिक प्रयास किए गए हैं। व्यक्तिगत-स्तर पर पारम्परिक पन-चक्कियों की स्थापना के अतिरिक्त कुछ समुदायों ने सम्पूर्ण पनबिजली इकाइयाँ भी स्थापित की हैं जहाँ दिन में ‘मिलिंग’ यानी पिसाई करके रात के समय घरों को बिजली उपलब्ध कराई जाती है।

वर्ष 1975 में भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान परिषद के अनुसंधानकर्ताओं की एक टीम ने 3500 मीटर की ऊँचाई पर स्थित ‘वैली ऑफ फ्लावर्स’ (फूलों की घाटी) में परिष्कृत चक्की एवं मोटर पार्टस के उपयोग से एक किलोवाट क्षमता की एक पनबिजली इकाई स्थापित की। गैर-सरकारी संगठनों की सहायता से कई समुदायों ने उत्तरांचल के टिहरी एवं चमोली क्षेत्रों में 70 के दशक के उत्तरार्ध में बड़ी पनचक्की-सह-बिजली इकाइयाँ स्थापित कीं। पौड़ी एवं टिहरी जिलों के कुछ व्यक्तियों ने अपनी पनचक्कियों के आधुनिकीकरण द्वारा 5 किलोवाट तक बिजली पैदा की और आस-पास के गाँवों में उपभोगकर्ताओं तक पहुँचाई। इनमें से कई इकाइयाँ अब व्यावसायीकरण एवं प्रबंध कौशल के अभाव में वर्षों से बंद पड़ी हैं। अपनी अतिरिक्त ऊर्जा की बिक्री से ये गहन लाभ कमा सकती थी परन्तु दूरदर्शिता के अभाव में ऐसा नहीं किया जा सका। कई मामलों में डीजल संचालित चक्कियाँ सरकारी सब्सिडी के कारण अधिक लोकप्रिय हो गई क्योंकि ये घरों के नजदीक ही स्थापित की जा सकती थी जबकि पनबिजली इकाइयाँ घरों, ग्रामों से दूर किसी नदी-नहर के निकट ही स्थापित की जा सकती थीं। पनबिजली उत्पादन के इन व्यक्तिगत एवं सामूहिक प्रयासों को सरकारी नीतिगत समर्थन प्राप्त न होने से इन दिग्दर्शक एवं कल्पनाशील प्रयासों को अन्ततः असफलता का मुँह देखना पड़ा। जहाँ तक सरकारी पहल का प्रश्न है, वर्ष 1897 के बाद से कई सूक्ष्म पन-इकाइयों की स्थापना की जाती रही। इनमें से कुछ सफल रही और काफी लम्बे समय तक काम करती रहीं जबकि कुछ अन्य आयातित स्पेयर पार्टस की तंगी एवं राज्य विद्युत बोर्डों की आर्थिक दुर्दशा के कारण बंद हो गईं। स्थानीय लोगों के लिए अत्यन्त लाभदायक होते हुए भी ‘अकेली खड़ी’ ये सूक्ष्म पन-इकाइयाँ राज्य सरकारों के लिए घाटे का सौदा रही हैं। ग्रामीण उद्योग के अभाव में इस बिजली का इस्तेमाल घरों में 4-5 घंटा रोशनी देने के लिए किया जाता है। 20 प्रतिशत से भी नीचा ‘प्लांट लोट फैक्टर’ बिजली घर के रख-रखाव के लिए आवश्यक संसाधन मुहैया नहीं करा पाता और कर्मचारियों का वेतन तक उसमें नहीं निकल पाता। उत्तर प्रदेश सरकार ने इनमें से कुछ बिजलीघर समुदाय के हाथों भी सौंपे परन्तु इससे भी समस्या हल नहीं हो सकी और वे आर्थिक दृष्टि से अलाभदायक ही रहे। स्पष्ट है कि ऐसे ‘अकेले खड़े’ पनबिजली घर तभी सफल हो सकते हैं जब इनके द्वारा विद्युत उत्पादन को विद्युत उत्पादन की एकीकृत योजना के रूप में अंगीकार किया जाए।

पनचक्की


सरकार ने पनचक्कियों के उन्नतिकरण एवं 5 किलोवाट तक विद्युत उत्पादन की सहायता हेतु एक योजना आरम्भ की है। देश भर में लगभग 2,50,000 पनचक्कियाँ हैं और इनमें से अकेले उत्तरांचल में निजी स्वामित्व वाली 70,000 इकाइयाँ हैं। पारम्परिक पनचक्कियाँ 2 से 5 मीटर की ऊँचाई वाले प्रैशर से काम करती हैं और प्रति सेकंड 20 से 200 लीटर पानी का इस्तेमाल करती हैं। अतः इसका उत्पादन पानी की उपलब्धता पर निर्भर है जो हर मौसम में वर्षा-जल के अनुरूप बदलता रहता है। पनचक्की-उन्नतिकरण योजनाओं को जनता का सहयोग न मिल पाने के निम्न कारण हैं:

1. एक पनचक्की में सुधार होने से वह शीघ्रता से कार्य करेगी जिससे दूसरी पनचक्कियाँ काम न मिलने से घाटे में जाने लगेंगी और अंततः बेकार हो जाएँगी।

2. इनमें से अधिकांश पनचक्कियाँ आवास-स्थलों से काफी दूर स्थित हैं और एक बार इनमें बिजली उत्पादन होने लगे तो उसे दूसरी जगह ले जाने के लिए बिजली की लम्बी तारें बिछानी होंगी। फिर कई पनचक्कियों का अर्थ होगा तारों के कई सारे क्रास-कनेक्शन।

3. बहुत थोड़ी पनचक्कियाँ ऐसी हैं जो वर्ष भर बिजली उत्पादन करती हैं और 5 किलोवाट की विद्युत उत्पादन क्षमता रखती हैं।

4. बाढ़-नियन्त्रण, गाद-निकासी, स्वचालित नियन्त्रण कक्ष एवं विद्युत प्रसारण के लिए आवश्यक ढाँचे का निर्माण अत्यन्त महंगा है।

एक विकल्प यह हो सकता है कि एक गाँव में कई छोटी-छोटी इकाइयाँ स्थापित करने के बजाय ‘हाइड्रोलिक हैड’ एवं सभी उपलब्ध पनचक्कियों का इस्तेमाल करते हुए एक बड़ी इकाई स्थापित की जाए। परन्तु यह तभी सम्भव है जब गाँव के सब पनचक्की मालिक और ग्रामीण समुदाय इस मामले में एकमत हों। उदाहरणार्थ आगे उल्लिखित ‘जिनवाली’ परियोजना में ग्रामीण समुदाय तीन पनचक्की मालिकों को अपना स्थान गाँव की इकाई की स्थापना के हक में छोड़ने पर राजी करा सका। दूसरा रास्ता यह हो सकता है कि मिलमालिक क्षेत्र की आर्थिक व्यवहार्यता के अनुरूप अपनी-अपनी बिजली उत्पादन इकाइयाँ लगाएँ और उपभोक्ताओं हेतु एक स्थानीय ग्रिड स्थापित करें।

सामुदायिक प्रयास


सूक्ष्म पनबिजली पर्यावरणसंगत है और इसमें पुनर्स्थापना आदि की समस्याएँ भी नहीं हैं जो कुंड व डैम आदि बनाते समय आड़े आती हैं। सामुदायिक सूक्ष्म पनबिजली इकाइयाँ अधिकतर गाँवों के लिए होती हैं और जमीन एवं पानी की समस्या को समुदाय द्वारा गाँव के भीतर ही सुलझाया जा सकता है। दूरदराज की एवं छोटी इकाइयों के लिए ये प्रभावी सिद्ध हो सकती हैं, परन्तु उन बड़ी इकाइयों का विकल्प नहीं हो सकती जो अधिक जनसंख्या वाले इलाकों एवं बड़ी औद्योगिक इकाइयों के लिए बिजली का उत्पादन करती हैं। 15 से 20 वर्ष के जीवनकाल वाले एवं एक सघन आबादी वाले गाँव को विद्युत पहुँचाने वाले सामुदायिक पनबिजली घर के निर्माण की लागत 50 से 70 हजार रुपये प्रति किलोवाट होगी। प्रक्रियाओं के सरल होने, ऊपरी खर्चे कम होने एवं समुदाय द्वारा स्वसंचालित होने के कारण यह सरकारी इकाई से सस्ती बैठेगी, उनमें अधिक कल्पनाशीलता के समावेश की गुंजाइश होगी एवं स्थानीय गृह-उद्योगों को बढ़ावा देकर उत्पादन मात्रा में भी समन्वय स्थापित किया जा सकेगा। अलग-थलग पड़े एवं निम्न आय वर्ग समूह के लिए यह विद्युत प्राप्ति और क्षेत्रीय विकास का अनुपम साधन बन सकता है।

फाउंडेशन फॉर रूरल रिकवरी एण्ड डेवलपमेंट (फोराड) द्वारा स्थापित 20 किलोवाट क्षमता वाले ऐसे 40 बिजली घरों के निर्माण में समुदाय के गरीब लोगों ने (जो सामान्यतः सरकारी दरों और बिजली कनेक्शन का खर्च सहन नहीं कर सकते) स्वेच्छा से श्रमदान किया और आंशिक रूप से पैसा भी दिया। ‘फोराड’ ने ऐसी दो इकाइयों की स्थापना में सहायता दी है।

1. टिहरी गढ़वाल के बुधकेदारनाथ नामक स्थान पर एक गैर-सरकारी संगठन ‘लोक जीवन विकास भारती’ को 35 लाख रुपये की सहायता, तकनीकी कौशल एवं 5 लाख रुपये के बराबर स्थानीय सहयोग देकर। इस बिजली का उपयोग गरीब छात्रावासों, कुछ घरों एवं कुटीर-उद्योगों में किया जा रहा है। 20 किलोवाट क्षमता वाली यह इकाई डेढ़ वर्ष से चालू है एवं पूरी तरह संस्था द्वारा प्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा संचालित की जा रही है।

2. 7000 फीट की ऊँचाई पर स्थित एवं सड़क मार्ग से 15 कि.मी. दूर अवस्थित टिहरी गढ़वाल जिले के ‘जेनवाली’ गाँव समुदाय की स्थापना में फोराड ने सहायता की। पाँच लाख रुपये, तकनीकी कौशल एवं स्थानीय लोगों द्वारा पर्याप्त श्रम, पूँजी एवं सामान के दान से स्थापित 20 किलोवाट क्षमता वाली इस इकाई का कार्य चालू हो जाने के बाद अब इस गाँव में ऊन, दुग्ध आदि स्थानीय उपजों को संसाधित करने की तैयारियाँ चल रही हैं। साथ ही घरों का विद्युतीकरण भी किया जा रहा है। ‘फोराड’ के अन्तर्गत बिजलीघर स्थापित करने की प्रक्रिया दूसरों से भिन्न है। सर्वप्रथम इकाई के प्रबंधन के लिए एक ग्राम समिति गठित की जाती है। यह समिति आपसी मंत्रणा के पश्चात पनबिजलीघर की स्थापना के लिए सही स्थान का चुनाव करती है जो तकनीकी एवं आर्थिक दोनों दृष्टियों से सुसंगत हो। तदनन्तर उन्हें ‘फोराड’ द्वारा मकानों में तार बिछाने से लेकर फाल्ट (दोष) चैकिंग, अल्टरनेटर्स एवं टरबाइन्स की असेम्बली एवं उनके रख-रखाव के कार्यों का सघन व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता है। तैयार मशीनें खरीदने के बजाय प्रशिक्षणाधीन व्यक्तियों द्वारा ये खुद तैयार की जाती हैं ताकि वे उसकी अंदरूनी रचना से पूर्णतः वाकिफ हों एवं समस्या पैदा होने पर छोटे-मोटे सुधार कार्य स्वयं कर सकें। इस बीच ग्राम समिति सामान के आवागमन एवं निर्माण सामग्री के एकत्रीकरण हेतु स्थानिय श्रमबल को इकट्ठा करती है। जेनवाली गाँव के सन्दर्भ में पाइप टरबाइन अल्टरनेटर, तार, 300 बोरे सीमेंट आदि सामग्री स्वयं ग्रामवासियों द्वारा 15 कि.मी. की दूरी तक ले जाई गई। गाँव वाले स्वयं सब निर्माण एवं व्यवस्थापन कार्य प्रशिक्षित व्यक्तियों की निगरानी में करते हैं। भागीदारी बराबरी के आधार पर होती है। आर्थिक स्थिति एवं अन्य योग्यताओं के मुताबिक नए-नए तरीकों से स्थानीय लोगों की इस कार्य में भागीदारी प्राप्त की जाती है। सम्पन्न व्यक्ति पैसे से सहायता देते हैं। कुछ लोग ऊन अथवा कृषि उत्पाद जैसा सामान देकर हिस्सा लेते हैं। गरीब श्रमदान से अपनी भागीदारी निभाते हैं। शुरू हो जाने के पश्चात इकाई को प्रशिक्षित ग्रामीण कार्यकर्ताओं के हवाले कर दिया जाता है। घरों में बिजली की खपत को प्रोत्साहित करके एवं ग्रामस्तरीय उद्योगों की स्थापना द्वारा ‘प्लांट लोड फैक्टर’ बढ़ाने का अधिकाधिक प्रयास किया जाता है। सबसे पहले तो घरों में प्रकाश करने का प्रयास होता है। तत्पश्चात टेलीविजन, खाद्य प्रसंस्करण एवं मिलों को बिजली देने का और आखिर में खेतों में जानवरों का प्रवेश रोकने हेतु विद्युतीकृत बाढ़, ‘रूम-हीटर्स’, बिजली की आयरन आदि को सुलभ बनाने का प्रयास किया जाता है। बिजली-शुल्क पैसा अथवा प्रकार के रूप में रख-रखाव एवं विकास गतिविधि के विस्तार की जरूरतों के अनुरूप तय किया जाता है। रुपया-पैसा, सामग्री एवं श्रमदान आदि विविध रूपों में योगदान प्राप्त करने की यह लचीली व्यवस्था सरकारी-तंत्र में स्पष्ट कारणों से सम्भव नहीं हो सकती। इस प्रकार की योजनाओं में स्थानीय लोग अधिकाधिक योगदान देने का प्रयास करते हैं क्योंकि यह उनके अपने प्रयासों से स्थापित की जाती है और उसमें कोई बाहरी दखल नहीं होता।

उदाहरणार्थ बुधकेदारनाथ वाली इकाई में आल्टरनेटर खराब हो जाने पर स्थानीय संसाधनों द्वारा बिना ‘फोराड’ की सहायता के ही उसकी मरम्मत का कार्य कर लिया गया।

इस प्रकार के बिजलीघरों की सफलता का रहस्य है सामुदायिक भागीदारी एवं स्थानीय जरूरतों की पूर्ति हेतु उसे जारी रखने की दृढ़ इच्छाशक्ति। राज्यों के विद्युत अधिनियम में जरूरी परिवर्तन कर दिए जाए तो ये अतिरिक्त बिजली राष्ट्रीय ग्रिड को उपलब्ध कराने में भी सफल हो सकती हैं।

हिमालय क्षेत्र एवं अन्य पर्वतीय इलाकों में 50 किलोवाट से निम्न क्षमता वाली सूक्ष्म पनबिजली इकाइयों की स्थापना की पर्याप्त गुंजाईश है। अत्यन्त निम्न क्षमता होने के कारण इन बिजलीघरों का रख-रखाव आसान है। प्रशिक्षण को और व्यापक बनाकर ऐसी इकाइयों को ग्रामीण क्षेत्रों में और प्रोत्साहन दिया जा सकता है। नेपाल के मुकाबले भारत में अधिक तकनीकी मानव क्षमता एवं विकसित औद्योगिक आधार मौजूद हैं। ऐसी इकाइयों के लिए मशीनों का निर्माण सरल है और इस तकनीक का हस्तांतरण भी अपेक्षाकृत आसान है।

दूरदराज के एवं उपेक्षित क्षेत्रों में रोजगार एवं बिजली उपलब्ध कराकर ऐसे निम्नक्षमतायुक्त बिजलीघर वहाँ के लोगों के जीवन में अद्भुत परिवर्तन ला सकते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि राज्य सरकारें इस बात का महत्व समझें। इसमें सन्देह नहीं कि देश की बिजली नियामक संरचना का पुनरावलोकन आवश्यक है।

(लेखक ‘फाउंडेशन फॉर रूरल रिकवरी एंड डेवलपमेंट’ (फोराड) नई दिल्ली में सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं।)

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