पानी के बड़ले

Submitted by Hindi on Sat, 10/24/2015 - 10:53
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‘मध्य प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा’ किताब से साभार


तालाब.......यह कोई एक कहानी नहीं है? ....यह तो कई कहानियों का ‘क्लाइमेस्क’ है। .....रोमांचक! जीवन्त! जिज्ञासा जगाने वाला! पुरातन कालीन समाज के पुरुषार्थ का प्रतीक!...... हमने नीचे से एक पहाड़ देखा! पत्थरों का पहाड़! ऊपर गए तो उसमें एक तालाब मिला! ऊपर देखा तो फिर एक पहाड़! पाए गए तो उसमें भी एक तालाब! नजरें उठाईं तो फिर एक पहाड़! आप तीसरी बार भी आश्चर्य करेंगे- उसमें भी एक तालाब मिला....। ये कहानी उज्जैन जिले के महिदपुर के खजुरिया मंसूर और ठिकरिया की पहाड़ की है। ...लेकिन, इसी जिले के बड़नगर में भी आप दिल थामकर चलिए...! पालसोड़ा के पास बसे गुलाबखेड़ी में करौंदी की झाड़ियों के बीच किसी पहाड़ी की एक बड़ी शृंखला.... जो खत्म होती दिखती नहीं। ....इसी पहाड़ी के बीच बरसों पहले समाज ने बनाई थीं सात तलाइयाँ। ....इन तलाइयों में छिपी कुण्डी। .....और उसमें है, कभी न खत्म होने वाला पानी! ...तो पहले हम महिदपुर क्षेत्र की पहाड़ी पर चढ़ते हैं।

ठिकरिया की इस पहाड़ी को गाँव के लोग न जाने कितने वर्षों से मोटा बड़ला के नाम से जानते हैं। बड़ला यानी पहाड़। इस पहाड़ी का दूसरा नाम ‘ओढ़वा’ भी था। ‘ओढ़’ से मतलब है ‘रोक’। यानी पानी को रोकने वाला। पुराने जमाने से यहाँ कुछ स्थान ऐसे बन गए थे, जहाँ पानी भर जाया करता था। तत्कालीन समाज ने इस पानी के प्रति अपने अनुराग को जीवन्त रखा। जंगल भरपूर था। पानी की इस संरचना ओढ़वा के कारण पहाड़ पर अनेक जगह थोड़ा हल चलाने पर पानी निकल जाया करता था। बुजुर्ग लोग आज भी कहते हैं कि मवेशी चराने वालों को जब भी जरूरत महसूस होती, झिरी खोदकर वे शुद्ध पानी पी लिया करते थे।

पानी के पहाड़ों की ये कहानियाँ वक्त बीतने के साथ किंवदंती बनने लगीं। रियासतों के जमाने की बात गई और ये पहाड़ शनैः-शनैः पत्थरों के पहाड़ बनने लगे। पानी की मनुहार करने के लिए पहली आवश्यकता है- रोक! रोक नहीं रही तो पहाड़ों का पानी फर्राटे वाली गति से निकलता हुआ चला जाने लगा और कभी मनचाहे तब झिरियाँ खोदकर पानी पीने वाला समाज- कुछ और बावड़ियाँ सूखी देखकर अपनी आँखों से पानी बहाने लगा।...

लेकिन, कुछ लोग इस ‘ओढ़वा’ को उसकी पुरानी पहचान दिलाने के लिए आगे आए। लक्ष्य था- बड़लों को फिर से पानी के पहाड़ बनाना। यह कठिन जरूर था, असम्भव नहीं। शायद उन लोगों के लिए इसलिए भी नहीं, जिनकी धमनियों में उनका रक्त बह रहा है- जिन्होंने पानी संचय की इस अद्भुत प्रणाली को जीवन्त किया था....

....समाज ने संकल्प लिया और जुट गया। हम पहली पहाड़ी पर चढ़ते हैं। पानी आन्दोलन के परियोजना अधिकारी एस.सी. गुप्ता और स्थानीय समाज ने मिलकर ‘ओढ़वा’ के स्थान पर पुनः 10 हेक्टेयर का विशाल तालाब बना दिया। रबी मौसम में भी इसमें 20 फीट पानी भरा रहता है। इसमें 2 कुएँ भी हैं, जो तालाब के भीतर ही समाए हुए हैं। तालाब के पास खड़े किसान बाबूराव कहने लगे- ‘हमारे आस-पास के सभी कुएँ लबालब हैं। रबी की सिंचाई हो रही है। इस तालाब के वेस्ट वेअर से नाले में पानी जाता है। इस वजह से नाला भी जिन्दा होने लगा। सीधे मोटर लगाकर भी किसान अब इस नाले से सिंचाई कर रहे हैं।’

कल्पना कीजिए, जल संचय की परम्परागत संरचना ‘ओढ़वा’ के ध्वस्त होने के बाद जब बरसात की बूँदें यहाँ गिरती होंगी तो उन्हें रोकने वाला, दुलार करने वाला, मेजबान की भूमिका अदा करने वाला, उनकी मनुहार करने वाला- भला यहाँ कौन था? कोई नहीं। न वृक्ष, न घास। चारों ओर पत्थर ही पत्थर! इसलिए हमारी जीवनदायिनी बूँदें आतीं और चली जातीं। लेकिन, समाज ने जब संकल्प लिया तो यह पानी का पहाड़ बन गया।

....हम फिर दूसरी पहाड़ी पर चढ़ते हैं। यहाँ पर भी पुनः एक विशाल तालाब बना दिया गया है। इस तालाब की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। ठिकरिया के समाज ने कुछ पत्थर हटाए। ट्रैक्टर का उपयोग किया गया। लगभग दो माह के भीतर ये दोनों तालाब तैयार हो गए। जनरेटरों के साथ हैलोजन लगाकर समाज ने यहाँ सुबह चार-चार बजे तक काम किया। पहली बरसात में पानी भरने के बाद समाज ने खूब उत्सव मनाया। नारियल बदारे गए। पानी की परम्परागत तरीके से पूजा-अर्चना की गई। भजन-कीर्तन भी किए।

पानी आन्दोलन के अध्यक्ष तोलाराम पटेल और उनके साथ कमल, नाथुलाल, दुलेसिंह, पर्वतसिंह, पुरा बा और स्थानीय समाज के अनेक लोगों की टीम साथ में थी। तोलाराम कहते हैं- “पास में पुरानी सरकारी बावड़ी भी रही है। किसी समय उसमें भरपूर पानी था। सम्भवतः ‘ओढ़वा’ की रिसन से वह बावड़ी भी जिन्दा रहती थी, लेकिन अब पुनः पानी रोकने के बाद अनेक जलस्रोत फिर जिन्दा हो गए हैं। ठिकरिया के 50 बीघा में अब इन तालाबों की वजह से रबी की फसल ली जा रही है।” वहीं राधेश्याम भानोया कहने लगे- ‘पास वाले तीन कुँओं पर तो पानी खत्म नहीं होता है।’

...यह तीसरी पहाड़ी है। जल संरक्षण प्रणाली का शिखर!

यहाँ भी पानी का विशाल भण्डार है। रबी के मौसम में भी यहाँ पर्याप्त पानी रहता है। आस-पास के कुँओं पर चौबीस घंटे इंजन चलाओ तो भी पानी खाली नहीं होता है- ‘यह दावा इस संरचना को बनाने वाला समाज कर रहा है।’

पहाड़ियों के तालाब से यहाँ व्यवस्थित जल प्रबंधन किया गया है। पहाड़ी के एक बड़े हिस्से का पानी शिखर वाले तालाब पर एकत्रित होता है। इसके ‘वेस्ट वेयर’ से निकला पानी ठिकरिया के नीचे वाले तालाब में जाता है। इसका ओवर-फ्लो खजुरिया मंसूर के तालाब में जाता है। यहाँ से निकला पानी नीचे के गाँवों की ओर जाता है। यहाँ के नालों में भी रोक बाँध बनाया गया है। इस पूरे बेल्ट में तालाब, तलैया, डबरियां व कुण्डियाँ बनाई गई है। ऊपर से तो पानी रिचार्ज हो रहा है, लेकिन जगह-जगह पानी के ये बेरिकेट्स उसे और रिचार्ज कर रहे हैं। फलस्वरूप भीषण सूखे में भी यहाँ न केवल रबी की फसल ली जा रही है, अपितु रकबा भी बढ़ रहा है। यहाँ की औसत वर्षा 32 इंच मानी जाती है, लेकिन 15 इंच बरसात में इस ‘जल प्रबंधन’ की वजह से फसल उत्पादन बढ़ा है। यह पुराने ‘ओढ़वा’ के फिर जिन्दा होने का कमाल ही तो है!

अब हम बड़नगर के गुलाबखेड़ी की पहाड़ियों पर चलते हैं.....!

कुआँ और कुण्डीयहाँ करीब 70 साल पहले पानी का अकाल पड़ने पर ‘जल प्रबंधन’ की पुख्ता व्यवस्था तत्कालीन समाज ने की थी। गुलाबखेड़ी में गाँव से देखने पर आपको महिदपुर की तरह पहाड़ी भर नजर आती है, लेकिन यहाँ एक शृंखला में बनी हुई सात तलाइयाँ हैं। करौंदों की पहाड़ियों को स्थानीय भाषा में गाँव के लोग ‘मगरा’ बोलते हैं- यहाँ बनी जल संरचनाओं को मगरे की तलाई! मगरे पर चढ़ने के साथ ही पहली तलाई नजर आने लगती है। इस पर बनी मेढ़ के दर्शन आपको अभी भी हो जाएँगे। पहाड़ के एक बड़े हिस्से का पानी इसमें आता है। पिछले सालों में समाज ने इसकी खुदाई कर विस्तार किया है। इसे रिचार्ज पानी गाँव में जलस्रोत जिन्दा करता रहा है और अभी पुनः करने लगा है। हाकमसिंह और भेरूसिंह जैसे किसान इस तलैया की वजह से रबी की फसल लेने की कहानी सुनाते मिल जाएँगे। मगरे पर कुछ दूर चलने के बाद इसी तरह की एक और तलाई मिली। राष्ट्रीय मानव बसाहट एवं पर्यावरण केन्द्र के श्री योगेन्द्र मकवाना ने इन तलाइयों का जीर्णोद्धार समाज को साथ में लेकर करवाया।

इस दूसरी तलाई में रियासतकालीन जल प्रबंधन का एक नायाब तोहफा हाथ लग गया। दूसरी खुदाई के दौरान एक 10 फीट गहरी कुण्डी मिली। यह पानी संचय की सुन्दर संरचना है। इसमें मानो बूँदों का छिपा खजाना हाथ लग गया। तीन साल पहले यहाँ सूखे के दौरान इस कुण्डी ने अपना ‘चमत्कार’ दिखाया। भरी गर्मी में समाज और मवेशी दोनों को यहाँ से राहत मिली। इसकी खास बात यह है कि इसमें से पानी निकालो और थोड़ी देर बाद वह वापस भर जाती है। पहाड़ में छिपी बूँदें रिसन के सहारे इस कुण्डी में आ जाती हैं। गुलाबखेड़ी में पानी आन्दोलन के तकनीकी सलाहकार राकेश बघेल का कहना है- “बरसों पहले कुण्डी बनाने वालों ने यह सोच रखा था कि पहाड़ियों पर लगे जंगल की वजह से इस कुण्डी में सदैव आव बनी रहेगी।- पहाड़ियों पर करौंदों की झाड़ियों की वजह से इस कुण्डी का पानी अकूत है।” गुलाबखेड़ी के बुजुर्गों का मानना है- “बरसों पहले इस पहाड़ी के पास बंजारों ने डेरा डाला था। पानी संचय की तकनीकियों से वाकिफ होने के कारण उन्होंने ही इस कुण्डी को खुदवाया होगा। इसी तरह की सात तलाइयाँ-शृंखलाबद्ध तैयार कराई गई थीं।” जल संचय की इस समृद्ध पुरातनकालीन परंपरा को समाज ने फिर जिन्दा कर दिया। इनकी देखरेख पुनः शुरू कर दी है।

महिदपुर और बड़नगर के ये तालाब हमारे समाज के इस समृद्ध परम्परागत ज्ञान के परिचायक हैं- जिसमें यह भली भाँति जाना और समझा जाता था कि पत्थरों के पहाड़ों को पानी का पहाड़ बना दीजिए। पहाड़ पर जलस्रोत तैयार हो जाएँगे। इनकी रिसन से नीचे के जलस्रोत जिन्दा रहेंगे, खेत जिन्दा रहेंगे, समृद्धि रहेगी।

जिन गाँवों के पहाड़-पानी और जंगल से सराबोर पहाड़ हों, वहाँ जीवन कैसा होगा....?

....बांसुरी से निकलने वाले जिंदादिल सुर की तरह!

.....किसी पत्ती पर फिसलती शबनम की मुस्कुराहट की तरह।

.....रफ्ता-रफ्ता जीवन की तरह आगे बढ़ती नन्हीं बूँदों की गति की तरह!.... या और भी कुछ और....!

....इसकी हकीकत तो पानी वाले मगरों की सैर करके ही जानी जा सकती है!

 

 

मध्य  प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

जहाज महल सार्थक

2

बूँदों का भूमिगत ‘ताजमहल’

3

पानी की जिंदा किंवदंती

4

महल में नदी

5

पाट का परचम

6

चौपड़ों की छावनी

7

माता टेकरी का प्रसाद

8

मोरी वाले तालाब

9

कुण्डियों का गढ़

10

पानी के छिपे खजाने

11

पानी के बड़ले

12

9 नदियाँ, 99 नाले और पाल 56

13

किले के डोयले

14

रामभजलो और कृत्रिम नदी

15

बूँदों की बौद्ध परम्परा

16

डग-डग डबरी

17

नालों की मनुहार

18

बावड़ियों का शहर

18

जल सुरंगों की नगरी

20

पानी की हवेलियाँ

21

बाँध, बँधिया और चूड़ी

22

बूँदों का अद्भुत आतिथ्य

23

मोघा से झरता जीवन

24

छह हजार जल खजाने

25

बावन किले, बावन बावड़ियाँ

26

गट्टा, ओटा और ‘डॉक्टर साहब’

 

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About the author

.पत्रकार और लेखक क्रांति चतुर्वेदी का जल पर लेखन से गहरा नाता है। पानी पर आज कई अध्ययन यात्राएँ कर चुके हैं। जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन पर पाँच पुस्तकें भी लिख चुके हैं। मध्य प्रदेश के सन्दर्भ ग्रन्थ ‘हार्ट ऑफ इण्डिया’ के सम्पादक भी रह चुके हैं। पानी की पत्रकारिता के लिये भारतीय पत्रकारिता जगत की प्रतिष्ठित के.के.

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