9 नदियाँ, 99 नाले और पाल....

Submitted by Hindi on Sat, 10/24/2015 - 11:17
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‘मध्य प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा’ किताब से साभार

 

नर्मदा नदीनदियों पर बाँध बनाकर जल संरक्षण की दो तस्वीर- जो हमने देखीं...।

एक-नर्मदा नदी पर बनने वाला सरदार सरोवर का मुख्य बाँध स्थल- केवड़िया (गुजरात)! अत्याधुनिक साधनों से सुसज्जित निर्माण की प्रक्रिया। रात और दिन अनगिनत डम्परों का आना-जाना- न जाने कितने लोग- और सीमेंट का तो मानो यहीं पूरा कारखाना चल रहा हो.....! सन-1991!

कुछ सालों में भारत का सबसे बड़ा बाँध (इसकी नहरों के नेटवर्किंग के आधार पर) बनकर तैयार!

दो-हम वक्त की सुइयों को सदियों पहले ले चलते हैं- आज के मुकाबले साधनों का अभाव-जग जाहिर......। पत्थरों की दीवार बनाकर अनेक नदियों, नालों का पानी रोक दिया- स्थल चयन भी तकनीकी दृष्टि से उत्तम। एक नदी को डायवर्ट कर दिया। ....संकल्प सफल हुआ- भारत ही नहीं, बल्कि एशिया का सबसे विशाल सरोवर तैयार...... जिसने एक कहावत को जन्म दे दिया! समय- आज से लगभग एक हजार साल पहले....! स्थान भोजपुर (मध्य प्रदेश)।

बाँध निर्माण में मध्य प्रदेश के भोजपुर में मौजूद परम्परा- देश की प्राचीनतम जल संचय प्रणालियों का भाग रही है- मांडवगढ़ की सात सौ सीढ़ियाँ, उज्जैन का कालियादेह महल, और भोपाल के पास इस्लामनगर किले के पास बाँधों से पानी रोकने के प्रयास- इसके बाद की लघु परम्पराएँ मानी जा सकती हैं।

भोपाल से 25 कि.मी. दूर बसा है- भोजपुर। यहाँ भगवान शंकर का विशाल मंदिर है- भोजेश्वर मंदिर। इसमें शिवलिंग 24 फीट ऊँचा व 16 फीट मोटा है। मंदिर का प्रवेश द्वार भी विशाल। पूरा मंदिर एक खास शैली में बना हुआ। इस मंदिर का निर्माण परमारकालीन धार के राजा भोज ने (सन 1010-1055) में बनवाया था। मंदिर के पास स्थित है- भारत के पारम्परिक जल संरक्षण तकनीक की एक उत्कृष्ट मिसाल....!

यहाँ बने बाँध का स्थल चयन खास तकनीक से किया गया था- जो आज के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी- एक हजार साल पहले के ‘इंजीनियरों’ के निर्णय को एकदम उचित ठहराती है। सरदार सरोवर के मुख्य बाँध स्थल केवड़िया की भाँति यहाँ भी दो पहाड़ों ने काफी हद तक प्राकृतिक दीवार का काम किया। बाँध खास तरह के एक जैसे बने चट्टानी पत्थरों से बनाया गया था। ये पत्थर लगभग एक-आकार के कारण भी खास आकर्षण का केन्द्र हैं। ये 4 फुट लम्बे, 3 फुट चौड़े और ढाई फुट मोटे हैं। बाँध की दीवार का आश्चर्यजनक पहलू यह भी है कि चूना, मिट्टी, रेत आदि के मिश्रण वाली जुड़ाई भी नहीं की गई थी। बाँध की तीन स्तरीय दीवार बनाई गई ताकि पानी के बहाव के दबाव का झटका बाँध की मजबूती को नहीं लगे। इसकी विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह 6500 वर्ग कि.मी. के बड़े क्षेत्र में फैला हुआ था। एशिया का सबसे बड़ा बाँध माना जाता था। इसी बाँध की वजह से इस कहावत ने जन्म लिया-

‘तालों में ताल भोपाल का बाकी सब तलैया....’

यहाँ के पुराने लोगों का कहना है कि इस बाँध की वजह से भीमबेटका, सीहोर तक पानी ही पानी था। वर्तमान भोपाल भी इसी के तहत था। मंडीद्वीप एक पहाड़ी थी, जो पानी से घिरी होने के कारण ‘द्वीप’ के रूप में पहचानी जाती थी। कुछ और पहाड़ियाँ भी थीं, जो पानी के बीच सुन्दर दिखती थीं।

मालवा के सुल्तान होशंगशाह (1405-1435) ने इसे सन 1430 में इसे तुड़वा दिया। कहते हैं, इसे तोड़ने के लिए तीन महीने तक सेना जुटी रही। तीन साल तक का वक्त पानी को खाली होने में लगा। तीस साल तक जमीन खेती के काम नहीं आ सकी थी। मालवा के सुल्तान होशंगशाह ने इस बाँध को क्यों तुड़वाया- इसको लेकर अनेक किंवदंतियाँ हैं, लेकिन यह तय है कि एक बड़े भू-भाग की उपजाऊ जमीन अब समाज के पास है। यहाँ बेहतर खेती हो रही है। 60-70 फुट पर पानी निकल आता है।

....यहाँ एक बाँध तो तोड़ दिया गया, लेकिन एक अन्य बाँध इसी तरह पत्थरों से दो पहाड़ों के बीच खाली जगह को भरकर बनाया गया था- आज भी अपने मूल स्वरूप में मजबूती के साथ खड़ा है। यहाँ आने वाली कालियासोत नदी को डायवर्ट कर इस बाँध वाली बेतवा नदी में डाला गया था!

....नदी को डायवर्ट करना और बाँध बनवाने के पीछे आखिर कारण क्या था?

.....इसके पीछे मुख्य रूप से दो किंवदंतियाँ प्रचलित हैं- बाँध की कहानी के लिए इन्हें भी जानना जरूरी है।

भोजपुर में प्रचलित किंवदंती- यहाँ के मूल निवासी बाँध स्थल के पास रहने वाले श्री हरिओम के मुताबिक- राजा भोज ने पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए विद्वानों को बुलाया और उनके विचार जाने। राजा को कहा गया कि आप उस स्थान पर तालाब बनवा दें- जहाँ 9 नदियाँ और 99 नाले मिलते हों। वहीं भगवान शंकर का भी मंदिर बनवा दें। दोनों पति-पत्नी यहाँ स्नान कर भगवान शंकर का अभिषेक करेंगे तो उन्हें संतान प्राप्ति हो जाएगी। इसके लिए राजा ने प्रयास शुरू किये। गंगा-जमुना में भी कोशिश की गई- लेकिन वहाँ तो सैकड़ों नदियाँ मिलती हैं। 9 का आँकड़ा नहीं मिल पाया। ढूँढने के बाद भोजपुर का यह स्थान तय कर लिया गया। यहाँ बाँध बनाया गया। एक नदी कम पड़ रही थी। चामुण्डा माता मंदिर के स्थान पर आ रही कालियासोत नदी को दीवार उठाकर रोका और इस तरफ डायवर्ट कर इस संगम में उसे भी मिला दिया।

स्थानीय लोगों ने 9 नदियों में शामिल सात नाम इस प्रकार बताए- बेतवा, कालियासोन, अजनार, भुंसी, गोदर, केरवा, सनोटी आदि! रत्न की प्राप्ति हुई कहते हैं, बाँध के निर्माण के बाद राजा-रानी ने स्नान किया और भोज दम्पत्ति के यहाँ राजा विक्रम भोज के रूप में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। जबकि ख्यात इतिहास और पुरातत्वविद डब्ल्यू, किनकैड ने इस बाँध का व्यापक सर्वेक्षण करने के बाद उनकी जानकारी में आई किंवदंती का उल्लेख यूँ किया- राजा भोज एक बार बहुत बीमार पड़ गए और वैद्य लोग उनका इलाज न कर पाए। एक साधु ने भविष्यवाणी की कि अगर राजा भारत वर्ष में ऐसा सबसे बड़ा तालाब बनाते हैं, जिसमें 365 झरनों का पानी जमा होता है तो वे इस रोग से मुक्ति पा लेंगे अन्यथा उनकी मृत्यु भी हो सकती है.....!

राजा ने अपने कर्मचारियों से क्षेत्र का व्यापक सर्वे कराया। अंततः भोजपुर के पहाड़ी क्षेत्र में ऐसा स्थान मिला। लेकिन यहाँ 356 झरनों का ही पानी बह रहा था। सब लोग परेशान हो गए गौंड सरदार कालिया ने राय सुझाई कि एक लुप्त नदी है, जिसकी सहायक नदियाँ- अपेक्षित संख्या को पूरा करती हैं। दरअसल, यह नदी थोड़ी दूर ही बह रही थी। इसका नाम ही कालियासोत रख दिया। इसे ही डाइवर्ट कर लाया गया और तब जाकर यह संख्या पूरी हुई।

पुरातन समाज में व्याप्त किंवदंतियाँ अपवादों को छोड़कर प्रायः प्रेरणास्पद संदेश ही देती हैं- यह भी सम्भव हो- तत्कालीन समय के राजाओं ने भी अपनी सूझबूझ के साथ बेहतर निर्णय लिए हों- और कालान्तर में ये किंवदंती के रूप में समाज के सामने आए हों! लेकिन राजा भोज ने तो ‘पाल’ बनाकर कमाल कर दिया था- इसी दीवार को ‘भोजपाल’ नाम दिया गया।.... और भोजपाल की वजह से ही मध्य प्रदेश की राजधानी का नाम ‘भोपाल’ पड़ गया...! यह खुशी की बात है कि पहाड़ियों में बसे खूबसूरत शहर- भोपाल के तालाब- इस शहर की खास पहचान बने हुए हैं- जो यहाँ की सदियों पुरानी तालाब परम्परा के वाहक हैं।

.......‘भोजपाल’ की टूटी दीवार-खण्डहरों के रूप में आज भी मौजूद है और पानी संचय की दृष्टि से देखने जाने वाले समाज से ‘बतियाती’ है। मानो.... वह कहती है.... सदियों पहले, आज के मुकाबले कोई अत्याधुनिक सुविधा न होने के बावजूद तत्कालीन राजा, समाज और ‘निपुण इंजीनियरों’ ने मुझे बनाया। क्या आज यह चमत्कार नहीं लगता है....! तब कौन-से इंजीनियरिंग काॅलेज थे और कौन सी किताबें थी- था तो केवल अपने परिवेश से प्यार और पानी संरक्षण का ईश्वर द्वारा दिया वही परम्परागत ज्ञान जो आज भी आम आदमी के भीतर है, भले ही छिपा हुआ..!

....यहाँ आने के बाद संकल्प ले सकते हैं कि उन अनजान अनेक ‘बाँध-निर्माताओं’ को प्रणाम.... हमें पानी संरक्षण की परम्परा को कायम रखने की सद्बुद्धि दें..!!
 

 

मध्य  प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

जहाज महल सार्थक

2

बूँदों का भूमिगत ‘ताजमहल’

3

पानी की जिंदा किंवदंती

4

महल में नदी

5

पाट का परचम

6

चौपड़ों की छावनी

7

माता टेकरी का प्रसाद

8

मोरी वाले तालाब

9

कुण्डियों का गढ़

10

पानी के छिपे खजाने

11

पानी के बड़ले

12

9 नदियाँ, 99 नाले और पाल 56

13

किले के डोयले

14

रामभजलो और कृत्रिम नदी

15

बूँदों की बौद्ध परम्परा

16

डग-डग डबरी

17

नालों की मनुहार

18

बावड़ियों का शहर

18

जल सुरंगों की नगरी

20

पानी की हवेलियाँ

21

बाँध, बँधिया और चूड़ी

22

बूँदों का अद्भुत आतिथ्य

23

मोघा से झरता जीवन

24

छह हजार जल खजाने

25

बावन किले, बावन बावड़ियाँ

26

गट्टा, ओटा और ‘डॉक्टर साहब’

 

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