माता टेकरी का प्रसाद

Submitted by Hindi on Tue, 10/27/2015 - 11:14
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‘मध्य प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा’ किताब से साभार

बुजुर्ग लोग कहते हैं, “पहले हम टेकरी से हमारे घरों के कुओं तक आने वाले पानी को माता टेकरी के पानी प्रसाद के नाम से जानते थे.....।” कोई भी शहर या समाज टेकरियों के इस ‘प्रसाद’ को पाने के प्रबंध में गड़बड़ करेगा, तो संकट तो आएगा ही।

......हमारे सामने देवास शहर की दो तस्वीरें हैं.....। एक- हरा-भरा देवास। टेकरी के कुण्डों से लगाकर तो तालाब, बावड़ियाँ और कुएँ तक रियासतकालीन जल प्रबंधन की एक के बाद एक मिसाल। एक बार कोई आ जाए तो वापस जाने का नाम न ले। ......इसी प्राकृतिक कारण की वजह से भारत के ख्यात शास्त्रीय गायक स्व. कुमार गंधर्व देवास के होकर रह गए.......।

दो- भयंकर जल संकट। कई उद्योग बंद। हाहाकार की स्थितियाँ। पूरे देश में इसलिए चर्चित कि यहाँ पानी ट्रेन से लाना पड़ता है।

आईए.... माता टेकरी के पानी प्रसाद को उस काल में जाकर जानें, ‘दास्तान-ए-देवास’।

मध्यप्रदेश के नक्शे पर देवास एक ऐसा शहर है, जो जल संकट के नाम पर पूरे देश में पहचाना जाता है। शहर को ऊपर से देखें तो लगता है कि कोई टूरिस्ट प्लेस हो या फिर कोई हिल स्टेशन, लेकिन जमीनी हकीकत को देखा जाए तो हालात एकदम विपरीत हैं। आजादी के पहले रियासतकाल में इस शहर की टोपोग्राफी में जल प्रबंधन कुछ इस तरह समायोजित था कि बारहों महीने यहाँ के कुएँ, कुण्डियाँ, बावड़ियाँ और तालाब कभी रीते नहीं होते। पनघट पर बर्तनों की खनक और तालाब में उठती पानी की हिलोरें अब तक एक किस्सा बन चुकी हैं।

देवास के जल प्रबंधन की कहानी माता टेकरी से शुरू होती है, जो अपने आप में रोमांचक है। ऐसा नहीं कि इस जल प्रबंधन में कोई वैज्ञानिक तथ्य नहीं हो। आज के जमाने में मध्यप्रदेश का मालवा और खासकर देवास जैसा शहर बूँद-बूँद के लिए तरस रहा हो, वहीं बड़े-बड़े वैज्ञानिकों, पानी पर काम करने वाले शोधकर्ताओं द्वारा नए तरीकों को सामने लाया जा रहा है, ऐसे में देवास के प्राकृतिक जल प्रबंधन को गौर से देखा जाए तो इसमें आज के तमाम नुस्खे और फार्मूले भी नजर आते हैं। अचरज की बात है कि समाज ने इसे नजर अंदाज कर दिया और अब इन्हीं फार्मूलों के इर्द-गिर्द हम फिर प्रयास कर रहे हैं। रियासतकाल के वाटर मैनेजमेंट को नेस्तनाबूद कर सीमेंट का जंगल खड़ा कर लिया और अब उसे सींचने के लिए पानी की तलाश में सैकड़ों फुट गहरे धँसते जा रहे हैं। हर आदमी जमीनी पानी को उलीचने के लिए बेताब है, मगर इस बात पर कोई जोर नहीं देता कि आखिर जमीनी पानी को कब तक उलीचते रहेंगे.....?

आज देवास का नाम एक ऐसे शहर के रूप में जाना जाता है, जहाँ गर्मी शुरू होते ही एक-एक बाल्टी पानी के लिए कोहराम मचने लगता है। यहाँ के लोगों की प्यास बुझाने के लिए गर्मियों के दिनों में रेलगाड़ी से पानी लाया जाता है तो कभी 12 कि.मी. दूर शिप्रा या राजानल तालाब से पानी लाना पड़ता है। यहाँ का नगर निगम तीन-चार दिनों से लेकर पाँच-सात दिनों में एक बार ही जल प्रदाय कर पाता है। यहाँ का जल स्तर सैकड़ों फीट नीचे चला गया है। जिससे तमाम बोरिंग बारिश के कुछ महीनों बाद ही दम तोड़ देते हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले ऐसा नहीं था। मालवा की तबियत की तरह ही देवास भी बहुत खुशनुमा हुआ करता था। यहाँ की आबोहवा और मीठा पानी दूर-दूर तक मशहूर था, मुंबई और पूना तक के लोग अपनी सेहत के लिए देवास की तफरीह करते थे। मोहल्ले-मोहल्ले बने कुएँ, कुण्डियाँ और बावड़ियाँ बारहों महीने छलकते रहते थे। माता टेकरी से रिसने वाला पानी झरने के रूप में यहाँ वहाँ से पौष से मार्गशीर्ष महीने तक छलछल कलकल करता था। इतने पेड़ पौधे थे कि यह किसी हिल स्टेशन से कम नहीं लगाता था।

फिर आखिर बीते बीस-पच्चीस सालों में क्या हुआ कि देवास के लोग एक-एक घड़े पानी को मोहताज हो गए, क्या खता हुई यहाँ के समाज से कि पानी की बरकत ही उड़ गई। बुजुर्गों की पनीली आँखों में एक बार फिर पानीदार देवास की चमक कौंध गई। लोगों का कहना है कि गलती कुदरत की नहीं है, यह तो हमारे समाज की है कि हमने सारे के सारे ‘पुरानों’ को दरकिनार कर दिया। नए और अव्यवस्थित विकास की दौड़ में हमने अपने ही हाथों, अपना ही खजाना लूट लिया।

80 साल के साहित्यकार मदन मोहन व्यास बताते हैं कि रियासतकाल के दौरान यहाँ सैकड़ों साल पुरानी पानी सहेजने और उसे रिसते हुए धरती के अंदर तक पहुँचाने की एक भरी-पूरी परम्परा थी, जिसे बाद के सालों में खत्म कर दिया गया। यहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार बारिश के पानी को थामने, फिर सहेजने और फिर उसे धरती में अंदर तक पहुँचाने के लिए बकायदा एक पूरा सिस्टम था। तब के जमाने में आज के विकसित विज्ञान की सुविधाएँ नहीं होने के बावजूद यह सौ फीसदी वैज्ञानिक था। बुजुर्गों से बात करें या देवास रियासत के पुराने दस्तावेजों को खंगालें तो इस प्रणाली को समझा जा सकता है।

देवास शहर के सबसे ऊपरी हिस्से, यानी माता टेकरी के ऊपर दमदमे से शुरू होती है यह दास्तां। एक छोटी तलाई अब भी मिलती है, जो बरसाती पानी को इकट्ठा करती है। यहाँ पानी रिसकर अंदर तक पहुँचता था और इससे ओवर-फ्लो होकर बहने वाला पानी यहाँ बने लगभग दो दर्जन से अधिक प्राकृतिक झरनों से होता हुआ माता मंदिरों के आस-पास प्राकृतिक रूप से बने लगभग 7 कुण्डों में इकट्ठा होता था। यहाँ भी वही प्रक्रिया होती थी और ओवर-फ्लो होने वाला पानी यहाँ से नीचे की ओर बह निकलता था। नीचे की पहाड़ी में भी छोटे-बड़े लगभग 3 से 4 दर्जन तक झरने और गड्ढेनुमा आकृतियाँ थीं। तेज बारिश में जब आठ-आठ दिन की झड़ियाँ लगती थी तो ये सारे झरने एक सात बहते रहते थे।

इस पूरे सिस्टम से हर साल हजारों गैलन पानी सहेजा और रिसाया जाता था। इन सबके बावजूद ओवर-फ्लो होने वाले पानी को भी व्यर्थ बहने नहीं दिया जाता था। दो रियासतों में बँटा यह कस्बा पानी के मामले में एकजुट था। देवास के अतीत में जाएँ तो पता लगता है कि देवास के बसने से पहले पड़ोसी गाँव नागदा बड़ा नगर हुआ करता था। लगभग 5-6 सौ साल पहले तक देवास की माता टेकरी तो थी, पर यहाँ बस्ती नहीं थी। पेड़-पौधों के झुरमुट के बीच टेकरी तक पहुँच पाना भी दिन के उजाले और हथियारों के बिना सम्भव नहीं था। यहाँ जंगली जानवरों और लुटेरों का आतंक था। बाद में पवार घराने ने जब यहाँ बस्ती बसाना शुरू किया तो उसी के साथ जल प्रबंधन भी लागू किया गया। बाद में जब एक से दो रियासतें हुईं तो भी यह बदस्तूर जारी रहा।

टेकरी से ओवर-फ्लो होकर आने वाले पानी को जूनियर रियासत देवी सागर तालाब में सहेजती थी तो सीनियर रियासत भवानी सागर तालाब में। नाम भले ही अलग-अलग हों, लेकिन लक्ष्य एक ही था, पानी की बूँद-बूँद को बचाना। भवानी सागर तालाब के आउटलेट से जुड़ा था मीठा तालाब, जो बस्ती के बाहर था और इधर देवीसागर तालाब के आउटलेट से जुड़ा था मेंढ़की तालाब। जो पानी तालाब के भर जाने के बाद बचता था वह इन तालाबों में इकट्ठा हो जाया करता था। इसके अलावा सैकड़ों कुएँ-कुण्डियाँ और चौपड़े-बावड़ियाँ थे। यही कारण था कि देवास में बरसने वाला पानी यहीं का होकर रह जाता था। 85 वर्षीय पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष गोपनीथ पटवर्धन बताते हैं कि उन दिनों की बात अलग थी। उन्होंने अपने बुजुर्गों से सुना है कि इसी सिस्टम के चलते यहाँ कभी पानी की समस्या तो हुई ही नहीं, यहाँ का वातावरण भी काफी खुशगवार था।

कुमार गंधर्व जैसे लोग यहाँ के खुशगवार मौसम की वजह से ही दूर पूना से यहाँ तक पहुँचे थे। वे बताते हैं कि ध्यान से देखें तो रियासतकाल की पूरी बस्ती में बरसाती पानी के निकास की भी बहुत अच्छी व्यवस्था थी। बड़ी-बड़ी नालियों के जरिए पानी या तो तालाबों में पहुँचता था या फिर नालों से जुड़कर शिप्रा नदी में मिल जाया करता था। यहाँ पेड़-पौधे इतने थे कि बरसाती पानी का एक बड़ा हिस्सा वे अपनी जड़ों के जरिए जमीन तक पहुँचाते थे। देवास के इतिहास और पर्यावरण को लेकर शिद्दत और गम्भीरता से लिखने वाले लेखक जीवनसिंह ठाकुर बताते हैं कि बीते सालों में हमने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की तरह अपने खुशनुमा माहौल को खुद ही नेस्तनाबूद कर डाला है। विकास के नाम पर जो सीमेंट के जंगल उगाए गए हैं, उन्होंने यहाँ की आबोहवा को बर्बाद कर दिया।

लोगों ने पानी उलीचना तो सीखा, लेकिन धरती के अंदर पानी रिसाना भूल गए। यह भूल इतनी अक्षम्य थी कि पानी सैकड़ों फीट नीचे चला गया, लेकिन समाज का लालच कम नहीं हुआ। लोगों ने धरती के सीने को छलनी करते हुए सैकड़ों फीट नीचे तक से पानी उलीचना शुरू कर दिया। इससे पानी और नीचे जाता गया। हालात यहाँ तक पहुँच गए कि देवास के लोगों को एक-एक बाल्टी पानी के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं। जब पेयजल संकट तेज होता है तो यहाँ ट्रेन के डिब्बे पानी लेकर आते हैं, फिलहाल यहाँ के लोग 12 कि.मी. दूर शिप्रा नदी और राजानल तालाब से अपनी प्यास बुझा रहे हैं तो 36 कि.मी. दूर इंदौर शहर से हर दिन 10 लाख गैलन नर्मदा का पानी मंगवाना पड़ रहा है। कई मोहल्लों में तो आठ दिनों में एक बार नल आता है।

कुएँ-कुण्डियों में कूड़ा-कचरा भरकर उन्हें धीरे-धीरे पाट दिया गया। चौपड़े, बावड़ियों की तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया और वे धीरे-धीरे खत्म हो गईं। देवीसागर तालाब में धीरे-धीरे सीमेंट का जंगल खड़ा हो गया और अब तालाब तो दूर एक गड्ढा तक नहीं बचा। भवानी सागर तालाब का भी यह हश्र हुआ। मेंढ़की तालाब भी धीरे-धीरे सिकुड़ गया। अब ले-देकर बचा है तो केवल मीठा तालाब।

इस तरह एक बस्ती के भरे-पूरे जल प्रबंधन को तहस-नहस कर यह स्थिति आ गई है कि कभी पानीदार रहने वाली यह बस्ती अब एक-एक घड़े पानी के लिए मोहताज है। यहाँ के लोग हर दिन घंटों कतारों में लगकर अपने उपयोग का पानी बटोरते हैं। ..... बुजुर्ग लोग कहते हैं, “पहले हम टेकरी से हमारे घरों के कुओं तक आने वाले पानी को माता टेकरी के पानी प्रसाद के नाम से जानते थे.....।” कोई भी शहर या समाज टेकरियों के इस ‘प्रसाद’ को पाने के प्रबंध में गड़बड़ करेगा, तो संकट तो आएगा ही।

 

मध्य  प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

जहाज महल सार्थक

2

बूँदों का भूमिगत ‘ताजमहल’

3

पानी की जिंदा किंवदंती

4

महल में नदी

5

पाट का परचम

6

चौपड़ों की छावनी

7

माता टेकरी का प्रसाद

8

मोरी वाले तालाब

9

कुण्डियों का गढ़

10

पानी के छिपे खजाने

11

पानी के बड़ले

12

9 नदियाँ, 99 नाले और पाल 56

13

किले के डोयले

14

रामभजलो और कृत्रिम नदी

15

बूँदों की बौद्ध परम्परा

16

डग-डग डबरी

17

नालों की मनुहार

18

बावड़ियों का शहर

18

जल सुरंगों की नगरी

20

पानी की हवेलियाँ

21

बाँध, बँधिया और चूड़ी

22

बूँदों का अद्भुत आतिथ्य

23

मोघा से झरता जीवन

24

छह हजार जल खजाने

25

बावन किले, बावन बावड़ियाँ

26

गट्टा, ओटा और ‘डॉक्टर साहब’

 

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About the author

.पत्रकार और लेखक क्रांति चतुर्वेदी का जल पर लेखन से गहरा नाता है। पानी पर आज कई अध्ययन यात्राएँ कर चुके हैं। जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन पर पाँच पुस्तकें भी लिख चुके हैं। मध्य प्रदेश के सन्दर्भ ग्रन्थ ‘हार्ट ऑफ इण्डिया’ के सम्पादक भी रह चुके हैं। पानी की पत्रकारिता के लिये भारतीय पत्रकारिता जगत की प्रतिष्ठित के.के.

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