वन महकमा और वनाधिकार अधिनियम 2006 में टकराव

Submitted by Hindi on Fri, 10/30/2015 - 08:51

कानून की विफलताओं पर संगठन मुकर्रर वन पंचायत संघर्ष मोर्चा, अखिल भारतीय वन श्रमजीवी मंच जैसे संगठनों का मानना है कि वनाधिकार अधिनियम 2006 के अन्तर्गत किसी भी गाँव की भूमि का गैर कृषि एवं गैरवानिकी का उपयोग करने के लिये ग्रामसभा से अनुमति लेनी आवश्यक होती है। जिसका अर्थ यह हुआ कि बाँध, खनन, वानिकी परियोजना जैसी योजनाओं को चलाने से पूर्व ग्राम सभाओं की अनुमति लेनी आवश्यक हो जाती है।

वर्ष 2006 में केन्द्र सरकार के द्वारा वनों पर जीवनयापन के लिये निर्भर समुदायों को उनके भूमि एवं वनाधिकार प्रदान करने के लिये वनाधिकार कानून लागू किया था। इस कानून के भीतर केन्द्र सरकार ने इस तथ्य को भी स्वीकार किया था कि वनों के भीतर रहने वाले लोगों के साथ ऐतिहासिक रूप से अन्याय किया गया है। अर्थात इस ऐतिहासिक अन्याय के परिमार्जन के लिये ही कानून का प्रावधान किया गया है। वनाधिकार कानून 2006 के अन्तर्गत वनों के भीतर रहने वाले एवं वनों पर आजीविका के लिये निर्भर समुदायों को दो तरह के अधिकार दिये गये हैं।

इस अधिनियम में बताया गया कि भूमि पर मालिकाना अधिकार इसके अन्तर्गत चार हेक्टेयर तक की भूमि पर उपरोक्त परिवार को मालिकाना हक मिलने का प्रावधान है। वहीं सामुदायिक हक के अन्तर्गत प्रत्येक ‘दावा धारी’ गाँव को उसके नजदीक के किसी भी प्रकार के जंगल में (सिविल, रिजर्व, संरक्षित, सेंचुरी पार्क आदि) वन उपज के दोहन, विक्रय एवं वन के प्रबन्धन का अधिकार दिया गया है। इस तरह से यह कानून अपने सम्पूर्ण रूप में ग्रामवासियों को जंगल का मालिक बना देता है। उधर इस कानून के तहत इस कानून का लाभ लेते हुए देश के अन्य राज्यों में अभी तक लाखों लोगों ने व्यक्तिगत एवं हजारों गाँवों ने सामूहिक वनाधिकार प्राप्त किये। उतराखण्ड में इस कानून को लागू हुए सात वर्ष हो चुके हैं परन्तु वन ग्रामों में रहने वाले सात लोगों को उनकी भूमि का मालिकाना हक अब तक नहीं मिल पाया है।

बता दें कि उत्तराखण्ड राज्य के लिये यह कानून अत्यधिक महत्त्वपूर्ण था। क्योंकि उत्तराखण्ड में वन अधिनियम 1980 के प्राविधानों के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कों, पेयजल, स्कूल, अस्पताल, विद्युत जैसे आधारभूत सुविधाओं का निर्माण भूमि उपलब्ध न होने के कारण रुका हुआ था। इस अधिनियम के अन्तगर्त एक हेक्टेयर तक की भूमि का इस्तेमाल ढाँचागत विकास कार्याें के लिये बगैर किसी केन्द्रीय अनुमति के किया जा सकता था। ऐसी योजनाओं को इस कानून के दायरे में लाकर पर्वतीय क्षेत्र की कई समस्याओं का समाधान खोजा जा सकता था।

उल्लेखनीय हो कि प्रदेश में 200 से अधिक वन ग्राम है जोकि किसी भी प्रकार की आधारभूत सुविधाओं से वंचित है। यहाँ तक कि इन गाँवों को मतदान का भी अधिकार नहीं है। वनाधिकार अधिकार अधिनियम 2006 जैसा कानून न कि सिर्फ ऐसे गाँवों को भूमि पर हक प्रदान करने की बात करता है वरन इसमें वन ग्राम को राजस्व गाँव में परिवर्तन करने के लिये भी आदेश जारी हुए हैं।

काबिलेगौर तो यह है कि आजादी के बाद से विशेष तौर पर भूमिहीन दलित समुदाय को भूमि पर हक देने के लिये ‘हरीनगर ग्रामों’ का निर्माण किया गया था। जिसके अन्तर्गत वनभूमि में उपरोक्त गाँवों का निर्माण किया गया। परन्तु इतने वर्षों के पश्चात भी उपरोक्त गाँवों में लोगों को भूमि पर ‘भूमिधरी अधिकार’ नहीं मिला है। जबकि वनाधिकार अधिनियम 2006 के प्राविधानों के अन्तर्गत उपरोक्त गाँवों को राजस्व गाँव में बदला जा सकता है।

ऐसी स्थिति में राज्य में राजी, थारू, बोक्सा, भोटिया व जौनसारी जैसी सभी जनजातियों को मिले हुए परम्परागत ‘वन हकों’ एवं भूमि अधिकारों को भी इस कानून के अन्तर्गत वैधानिक बनाया जा सकता है।

देशभर के अलावा उत्तराखण्ड में वन पंचायत जैसी अनूठी परम्परा राज्य के उधमसिंह नगर व हरिद्वार जिले को छोड़कर अन्य जिलों में वनों के प्रबन्धन की प्रणाली मौजूद है। इधर सरकारी व्यवस्था ने वर्तमान में ‘वन पंचायतों’ के सभी अधिकार वन विभाग को दे दिये। फलस्वरूप इसके वन पंचायतों की स्वायत्तता समाप्त हो गयी है।

जबकि वनाधिकार अधिनियम 2006 के अन्तर्गत वन पंचायते न सिर्फ अपने परम्परागत वन हकों को पुनः प्राप्त कर सकती थी बल्कि वन पंचायतों के क्षेत्रफल को भी इस कानून के दायरे में बढ़ाया जा सकता है। हालात ऐ दस्तूर यह है कि उत्तराखण्ड के कुल वन क्षेत्र का लगभग 28 प्रतिशत हिस्सा किसी प्रकार के संरक्षित क्षेत्र के दायरे में आ चुका है।

जिसका अर्थ है कि वन क्षेत्र के 28 प्रतिशत हिस्से में लोगों को किसी भी तरह के वनाधिकार प्राप्त नहीं हो पा रहे हैं। यहाँ तक कि वन कानून 1927 के अन्तर्गत अधिकारों को दर्ज करने की प्रक्रिया होने के बावजूद उपरोक्त क्षेत्रों में लोग अपने परम्परागत वन हक हकूकों से महरूम है। इस कानून का लाभ लेते हुए संरक्षित क्षेत्र में भी लोगों के वन हकों की बहाली की जा सकती है। आश्चर्य यह है कि उत्तराखण्ड जैसे वनाच्छादित राज्य में जहाँ इस कानून को लागू करने की सर्वाधिक सम्भावनाएँ थी तो वहीं वर्तमान में इस कानून की प्रगति राज्य में बिल्कुल शून्य है।

वनाधिकार अधिनियम 2006 के क्रियान्वयन के लिये जो ग्राम, जनपद व ब्लाॅक स्तर पर ग्राम वन समिति बनी है वह सिर्फ कागजी खानापूर्ति के लिये है और निष्क्रय है। इस अधिनियम के क्रियान्वयन की जिस विभाग की जिम्मेदारी है उसे कानून की ना तो जानकारी है और ना ही विभाग कानून का प्रचार-प्रसार कर रहा है। राज्य में अब तक 20 हजार लोगों ने व्यक्तिगत दावा फार्म भरे हैं और 500 गाँवों ने सामूहिक दावा फार्म भरा है। ताज्जुब हो कि एक भी दावा फार्म पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। कार्बेट रिजर्व पार्क रामनगर के मोहम्मद सफी बताते हैं कि उनके गाँव को ‘वन विभाग’ ने चार माह पूर्व उजाड़ दिया है। नैनीताल के आमडाण्डा खते के मोहन थपलियाल कहते हैं कि उन्होंने मानव अधिकार आयोग, जनजाति आयोग, राज्य सरकार को अपने गाँव में आधारभूत सुविधाओं को बहाल करने बाबत ज्ञापन देकर माँग की है मगर उनकी माँग पर अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई। वे बताते हैं कि उनके गाँवों को अभी तक वोट देने तक का अधिकार नहीं है।

अभियान के लिये प्रशिक्षण


वनाधिकार अधिनियम 2006 के क्रियान्वयन को लेकर राज्य सरकार की विफलतायें दिखने लग गयी है। राज्य में विभिन्न संगठन इस कानून के क्रियान्वयन पर हो रही हिलाहवाली को लेकर सरकार की खूब भर्तसना कर रहे हैं। हाल ही में देहरादून स्थित वनाधिकार अधिनियम 2006 के क्रियान्वयन को लेकर दो दिवसीय ‘विमर्श एवं प्रशिक्षण’ का आयोजन उत्तराखण्ड वन पंचायत संघर्ष मोर्चा के तत्वाधान में हुआ।

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