हार की कगार पर गंगा

Submitted by Hindi on Thu, 11/05/2015 - 12:28

भारत की राष्ट्रीय और पवित्र नदी गंगा अब बिना सेनापति के करीब-करीब हारा हुआ युद्ध लड़ रही है। गंगा बेसिन की नदियों में पानी को निर्मल रखने में सबसे बड़ी भूमिका गंगा की सेनापति कही जाने वाली डॉल्फिन की है। गंगा को खत्म होने से बचाने की कोशिश में डॉल्फिन खत्म हो रही है, डॉल्फिन का जाना संकेत है कि गंगा जाने वाली है।

क्या किसी सेना के सेनापति के मारे जाने के बाद युद्ध जीता जा सकता है? सामान्यतः नहीं। भारत की राष्ट्रीय और पवित्र नदी गंगा अब बिना सेनापति के करीब-करीब हारा हुआ युद्ध लड़ रही है। गंगा डॉल्फिन जिसे स्थानीय भाषा में ‘सूंस’ भी कहा जाता है, गंगा की सेनापति है। कैसे? डॉल्फिन का शरीर हैवी मैटल से भरा होता है। उसे खाया नहीं जाता और वह जिन मछलियों या जल-जीवों को खाती है उन्हें इन्सान नहीं खाता। इस तरह डॉल्फिन नदियों से गन्दगी को हटाती है। कुल मिलाकर गंगा बेसिन की नदियों में पानी को निर्मल रखने में सबसे बड़ी भूमिका डॉल्फिन निभाती आई है। जिस तरह जंगल की भोजन शृंखला में शेर शीर्ष पर होता है, उसी तरह नदी की भोजन शृंखला में डॉल्फिन शीर्ष पर होती है। अब शेर के दाँत हैं वो अपने अस्तित्व की लड़ाई खुद लड़ रहा है, सरकार भी साथ दे रही है। लेकिन डॉल्फिन यहाँ असहाय है।

पिछले दिनों वन्य जीवों पर काम करने वाली संस्था डब्ल्यू. डब्ल्यू.एफ ने उत्तर प्रदेश सरकार के साथ मिलकर प्रदेश की गंगा बेसिन की नदियों पर सर्वे किया। सर्वे में बताया गया कि करीब साढ़े तीन हजार किलोमीटर नदी क्षेत्र में मात्र 1263 डॉल्फिन बची हैं। जहाँ हर किलोमीटर पर 100-50 डॉल्फिन पाई जाती थी, वहाँ हर 2 किलोमीटर पर एक डॉल्फिन भी नहीं है। गन्दे पानी में भी रहने में सक्षम डॉल्फिन जब उत्तर प्रदेश से इस तरह गायब हो गई तो अंदाज लगाइये पानी की गुणवत्ता का स्तर क्या होगा। उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, बंगाल और उत्तर-पूर्व के आँकड़े भी जोड़ लें तो कुल मिलाकर डॉल्फिन की संख्या 2800 से 3000 के बीच बैठेगी। ये आँकड़ा तकरीबन वैसा ही है जैसा कुछ साल पहले बाघों के सम्बन्ध में था, कि मात्र दो हजार बाघ बचे हैं भारत में। इस आँकड़े ने सरकारों और समाज के पैरोकारों को झकझोरा और बाघ को बचाने के लिये हर स्तर पर प्रयास हुये, कानून भी सख्त किया गया, लेकिन क्या डॉल्फिन के लिये ऐसा कुछ किया जायेगा? 5 अक्टूबर, 2009 को डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया था। यह उसी तरह की कोरी घोषणा है जैसे गंगा राष्ट्रीय नदी है।

सर्वेक्षण करीब-करीब पूरे उत्तर प्रदेश में किया गया। इसमें बिजनौर, नरौरा से लेकर इलाहाबाद तक की गंगा को शामिल किया गया। इसके अलावा दादरी, हमीरपुर, बरेह से लेकर नेपाल सीमा तक के क्षेत्र में सर्वे हुआ। साथ ही वन्य जीव अभ्यारण्य के क्षेत्र जैसे- कार्टनियाघाट, सीतापुर, बाराबंकी, फैजाबाद और ओरछा जैसे इलाके भी शामिल थे। गंगा बेसिन की अमूमन सभी नदियाँ रामगंगा, यमुना, चम्बल, केन, बेतवा, सोन, शारदा, गेरूवा, घाघरा, गंडक और राप्ती की एक-एक डॉल्फिन को गिनने के लिये सैकड़ों स्वयंसेवी कार्यकर्ता लगाये गये थे। प्रदेश में गंगा की सहायक और प्रबल धारा वाली नदी मानी जाने वाली रामगंगा में एक भी डॉल्फिन नहीं मिली।

गंगा की डॉल्फिन समुद्र की डॉल्फिन से एकदम अलग होती है। समुद्र की डॉल्फिन थोड़ी फिल्मी होती है, वह ऊपर तक छलांग लगा सकती है जबकि गंगा डॉल्फिन सिर्फ साँस लेने के लिये बाहर आती है। समुद्र की डॉल्फिन की तरह यह देखने में भी सक्षम नहीं है। सूंस तकरीबन अंधी होती है क्योंकि इसकी आँखों में एक झिल्ली होती है जिसकी वजह से इसकी देखने की क्षमता बेहद कम होती है। अत्यधिक संवेदनशील यह प्राणी नाव या जाल से टकराते ही अचेत हो जाता है या मर भी जाता है।

संकट में गांगेय डॉल्फिनवाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट में डॉल्फिन को मारने और खाने पर रोक है, लेकिन इससे बात नहीं बनेगी। डॉल्फिन को मारने पर सजा कड़ी करनी होगी। लोगों को जागरूक करना होगा कि डॉल्फिन के तेल से गठिया ठीक नहीं होता और सबसे बढ़कर डॉल्फिन प्रजनन की दिशा में काम करना होगा। सुल्तानगंज से कहलगाँव के बीच का 55 किलोमीटर का क्षेत्र डॉल्फिन अभ्यारण्य घोषित किया गया है। हालाँकि यहाँ डॉल्फिन को लेकर अध्ययन-अध्यापन पर ही ज्यादा जोर दिया जा रहा है जबकि जमीनी स्तर पर काम करने की जरूरत है। यही हाल गंगा में पाये जाने वाले कछुओं का भी है। बंग्लादेश की सीमा डॉल्फिन और कछुओं के अंगों की तस्करी का मुख्य ठिकाना है। सरकार के नाक के नीचे हो रही इन गतिविधियों पर मारक चोट किये जाने की जरूरत है।

गंगा को खत्म होने से बचाने की कोशिश में डॉल्फिन खत्म हो रही है। डॉल्फिन का जाना संकेत है कि गंगा जाने वाली है। अब समाज और सरकार के हाथ में है कि बिना देरी किये गंगा के इस सेनापति को संजीवनी दी जाए।

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