सूखे में त्यौहार

Submitted by RuralWater on Fri, 11/06/2015 - 12:07
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शुक्रवार 16-31 अक्टूबर 2015

पूरे देश में इस साल अब तक मानसून औसत से 15 फीसद कम रहा है और कर्नाटक समेत देश के कई और राज्यों को मिलाकर कुल 40 फीसद इलाके इससे बहुत प्रभावित हुए हैं। उत्तर कर्नाटक भी उन्हीं इलाकों में शामिल है। राज्य सरकार आँकड़ों के मुताबिक 3,600 करोड़ की खड़ी फसल सूखे के कारण बर्बाद हो चुकी है, जबकि वास्तविक नुकसान सोलह हजार करोड़ से भी ज्यादा का माना जा रहा है, क्योंकि पानी की कमी का असर अगली फसल पर भी पड़ेगा। दसरा शुरू होने के काफी पहले से बंगलुरु से सौ किलोमीटर दूर मैसूर शहर का तैयार होना शुरू हो जाता है, मैसूर कर्नाटक की सांस्कृतिक राजधानी है और यहाँ का ‘दसरा’ राज्य की सांस्कृतिक पहचान। हर साल देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग इस जुलूस को देखने और उसमें शामिल होने आते हैं। लेकिन 78 साल के किसान नेता काडीडल शामन्ना जो बाँसूरी भी बजाते हैं, मुख्यमंत्री सिद्धारम्मैया के आमंत्रण के बावजूद जुलूस में शामिल नहीं होंगे। हालांकि इस साल जुलूस की थीम ‘किसान’ है।

दसरा समारोह में सरकार का बुलावा किसी के लिये भी बहुत सम्मान की बात है कोई और मौका होता तो काडीडल कभी न नहीं कहते लेकिन वो ये जानते हैं कि कर्नाटक में पिछले कुछ महीनों से चार-पाँच किसान रोज आत्महत्या कर रहे हैं। वे सवाल करते हैं ये सब जानते-देखते हुए मैं कैसे दसरा समारोह में शामिल हो सकता हूँ?

राज्य के ताजे सूरते हाल में काडीडल का सवाल बहुत मौजूं है। राज्य पिछले चालीस साल के सबसे ज्यादा सूखे मौसम का सामना कर रहा है, उत्तरी कर्नाटक के कई जिले इस कदर सूखे की चपेट में हैं कि खेती तो दूर पशुओं के खाने लायक चारा भी नहीं हो पा रहा है। कई गाँवों में आठ दिनों में एक बार पीने का पानी मुहैया कराया जा रहा है।

इस साल इन इलाकों में औसत से 34 फीसद कम बारिश हुई है और सितम्बर तक राज्य के 30 जिलों में से 12 जिले में बहुत कम बारिश दर्ज हुई है। कुल मिलाकर 177 ताल्लुके में से 136 सूखे की चपेट में है। कर्नाटक सरकार ने पिछले महीने राज्य के कुल 30 जिलों में 27 जिलों के 127 ताल्लुकों को सूखा प्रभावित घोषित कर दिया है।

हालांकि पूरे देश में इस साल अब तक मानसून औसत से 15 फीसद कम रहा है और कर्नाटक समेत देश के कई और राज्यों को मिलाकर कुल 40 फीसद इलाके इससे बहुत प्रभावित हुए हैं।

उत्तर कर्नाटक भी उन्हीं इलाकों में शामिल है। राज्य सरकार आँकड़ों के मुताबिक 3,600 करोड़ की खड़ी फसल सूखे के कारण बर्बाद हो चुकी है, जबकि वास्तविक नुकसान सोलह हजार करोड़ से भी ज्यादा का माना जा रहा है, क्योंकि पानी की कमी का असर अगली फसल पर भी पड़ेगा।

कुल मिलाकर वर्ष 2015-16 में कर्नाटक में खाद्यान्नों की पैदावार में 45 फीसद की कमी आ सकती है। जाहिर है मुख्यमंत्री सिद्धारम्मैया के लिये आने वाले दिन बहुत मुश्किलों वाले हैं, केन्द्र सरकार किसानों के लिये राहत राशि जारी नहीं कर रही केवल यही दोहराने से न तो किसानों की मुश्किलें हल होंगी और ना ही खुद मुख्यमंत्री की।

इस तरह मुख्यमंत्री की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से कम हो रहा है। चाहे तटीय कर्नाटक में लगातार धार्मिक सामाजिक असहिष्णुता के मामले हों या दक्षिणपंथ का उभार और कलबुर्गी जैसे प्रगतिशील लेखकों, विचारकों, कलाकारों की हत्या और उन्हें मिलने वाली धमकियाँ इन मामलों में जिस तरह की सख्त प्रतिक्रिया और कार्रवाई की उनसे उम्मीद की जा रही थी वो नहीं कर पा रहे हैं। और अब किसानों की रोज की आत्महत्याएँ।

ग़ौरतलब है कि हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण के नतीजे में पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदुरप्पा लोकप्रियता में उनसे काफी आगे चल रहे हैं। कुछ और कसर हाल के राहुल गाँधी के कर्नाटक दौरे से भी पूरी हुई जिसमें वो खासतौर पर किसानों से मिले। लेकिन उनकी सभी के लिये रास्ता बनाने के लिये तीन फुटबॉल के मैदान के बराबर खड़ी फसल काट दी गई।

चारों ओर से आलोचना होने पर कहा गया कि किसान ने खुद राहुल गाँधी के लिये अपनी फसल काट देने का अनुरोध किया और वैसे भी अगले 15 दिनों में उसे काट लिया जाना था।

बहरहाल, जो भी हो लेकिन इस प्रकरण से किसानों की आत्महत्याओं से रोज जूझ रहे राज्य के मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की खेती और किसानों के मसलों के प्रति संजीदगी नहीं बल्कि लापरवाही दिखती है। जबकि एक रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक में इस साल अब तक 400 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं, गुलबर्गा, बीदर, रायचूर और यादगिर जिले के किसानों में ये दर सबसे ज्यादा है।

केवल गुलबर्गा में ही पिछले 2 महीने में 16 किसानों ने आत्महत्या की और सिर्फ जुलाई महीने में राज्य के कुल 158 किसानों ने आत्महत्या कर ली। साल 2003 के बाद से यह संख्या सबसे ज्यादा है। काडीडल सामन्ना कहते हैं कि कर्नाटक में इतनी बड़ी संख्या में किसानों की आत्महत्या एक नया चलन है, लेकिन इसकी वजह सरकार और किसान दोनों को मालूम है।

पिछले 45 साल से उनका संगठन किसानों के लिये संघर्ष कर रहा है लेकिन आज तक उनकी एक भी माँग पूरी नहीं की गई है। किसान फसल बोने से पहले जानते हैं वो अपनी लागत और मेहनत के हिसाब से अपनी उपज की कीमत नहीं तय कर पाएँगे उन्हें अधिकार ही नहीं है। सरकार के निर्धारित समर्थन मूल्य उन्हें तबाही के रास्ते पर ही ले जाने वाले होते हैं।

कर्नाटक राज्य कृषि विभाग की हाल की एक रिपोर्ट में भी कहा गया है कि राज्य का कोई भी जिला ऐसा नहीं है जहाँ किसानों ने आत्महत्याएँ नहीं की हैं। रिपोर्ट के मुताबिक केवल एक अप्रैल से तीन अक्टूबर के बीच 516 किसानों ने आत्महत्या की हैं। मांड्या, हवेरी, तुमकूर और मैसूर जिले में सबसे ज्यादा आत्महत्याएँ दर्ज हुई हैं।

ये भी सामने आया है कि गन्ना, मक्का और कपास की खेती करने वाले किसानों में आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा रही है और मक्का छोड़कर इन दोनों फसलों को बहुत ज्यादा सिंचाई की जरूरत होती है। ऐसे में जिन किसानों के पास कम-कम जमीन है या जिन्होंने लीज पर जमीन लेकर खेती की थी सबसे ज्यादा प्रभावित वही हैं।

दूसरी ओर मुख्यमंत्री के तमाम आश्वासनों के बावजूद सच्चाई ये है कि कर्ज लेने वाले जिन किसानों ने सरकारी मदद का अनुरोध किया उनमें से 42 फीसद दावों को स्थानीय समिति ने खारिज कर दिया।

स्थानीय अखबारों की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले कुछ महीनों में हर्जाने के कुल 233 मामलों में राज्य सरकार ने केवल 134 दावों को ही हर्जाना देने लायक माना, जाहिर है फिर बचे 99 किसानों के पास आत्महत्या या अवसाद में चले जाने के अलावा और क्या विकल्प बचेगा? खैर, ये तो उन किसानों की बात है जो पहले मदद लेने की कोशिश करते हैं उन किसानों का क्या जो सरकारी मदद के लिये किसी तक पहुँचना भी नहीं जानते? लेकिन जिनकी संख्या काफी बड़ी है।

इसके अलावा परेशानी केवल कर्ज माफी और सिंचाई के पानी की ही नहीं है पीने का पानी उससे बड़ी जरूरत है रायचूर जिले की ही बात करें जिसके पाँच ताल्लुकों को अगस्त में राज्य सरकार ने सूखा प्रभावित घोषित किया था। वहाँ के प्रशासनिक अधिकारी के मुताबिक पीने के पानी की कमी इतनी गम्भीर किसानों को राहत देने से पहले पीने के पानी की व्यवस्था करना ज्यादा जरूरी है इसलिये प्रत्येक ताल्लुके में मुख्यमंत्री से हासिल त्वरित आपदा राहत राशि में से पचास लाख रुपए तुरन्त पीने के पानी की परियोजना में लगा दिये गए।

राहत राशि की दूसरी किस्त 45 लाख रुपए भी पीने के पानी की परियोजना में ही खर्च होंगे। जाहिर है ऐसे में किसानों को मदद पहुँचाने के लिये अलग से और तुरन्त बड़ी राशि की जरूरत है जिस पर राजनीति जारी है। मुख्यमंत्री सिद्धारम्मैया ने हालात की गम्भीरता को देखते हुए सूखे से निपटने के लिये प्रधानमंत्री से राष्ट्रीय आपदा कोष से 3,050.7 करोड़ की राहत राशि की माँग की है। लेकिन वो ये भी कह रहे हैं कि केन्द्र सरकार से उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है।

उन्होंने 24 अगस्त को प्रधानमंत्री को मदद के अनुरोध की चिट्ठी लिखी थी, जिसके जवाब में केन्द्र सरकार की ओर से अफसरों की टीम को सूखे का आकलन करने को भेजा गया। टीम के सर्वेक्षण कर लेने और रिपोर्ट सौंप देने के बाद भी अभी तक मदद की कोई राशि प्राप्त नहीं हुई है।

कर्नाटक के कृषि राज्य मंत्री कृष्णा बायरे गौड़ा भी कह रहे हैं केन्द्र से जल्द ही सूखा राहत के पैसे नहीं मिले तो बहुत मुश्किल स्थिति हो सकती है, किसान पहले से ही कर्ज और अवसाद में डूबकर आत्महत्या कर रहे हैं। हालांकि मुख्यमंत्री सिद्धारम्मैया ने फौरी राहत के लिये किसानों के मध्यम और दीर्घ अवधि लोन पर 296 करोड़ के सूद माफी की घोषणा की है, जिससे राज्य के ढाई लाख किसानों को फायदा होगा, लेकिन ये भी वो जानते हैं कि ये नाकाफी है।

इसके अलावा किसानों को तुरन्त मदद पहुँचाने के लिये राज्य सरकार की ओर से हर एक जिले को 2 करोड़ रुपये की राशि भी जारी की गई है, लेकिन अस्सी फीसद से ज्यादा किसानों ने राष्ट्रीय बैंकों से कर्ज लेकर खेती की है। केन्द्र सरकार की पहल से ही इन बैंकों से कर्ज लेकर खेती की है।

केन्द्र सरकार की पहल से ही इन बैंकों से कर्ज माफी का अनुरोध किया जा सकता है। इसके अलावा बहुत से किसानों ने स्थानीय साहूकारों या महाजनों से पैसे उधार लेकर खेती की है सबसे ज्यादा परेशानी इन्हें ही है। इन साहूकारों के वसूली के तौर-तरीकों के कारण अन्ततः उनके पास कर्ज चुकाने या आत्महत्या करने का ही विकल्प बचता है।

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