दीवाली की मूल भावना को भी समझो

Submitted by RuralWater on Sat, 11/07/2015 - 14:19
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दीपावली विशेष


.उत्तर वैदिक काल में शुरू हुई आकाश दीप की परम्परा को कलयुग में दीवाली के रूप में मनाया जाता है। श्राद्ध पक्ष में भारत में अपने पुरखों को याद करने के बाद जब वे वापस अपने लोकों को लौटते थे तो उनके मार्ग को आलोकित करने के लिये लम्बे-लम्बे बाँसों पर कंदील जलाने की परम्परा बेहद प्राचीन रही है। फिर त्रेता युग में राजा राम लंका विजय के बाद अयोध्या लौटे तो नगरवासियों ने अपने-अपने घर के दरवाजों पर दीप जलाकर उनका स्वागत किया। हो सकता है कि किसी सैनिक परिवार ने कुछ आग्नेय अस्त्र-शस्त्र चलाए हों, लेकिन दीपावली पर आतिशबाजी चलाने की परम्परा के बहुत पुराना होने के कोई प्रमाण मिलते नहीं हैं।

हालांकि अब तो देश की सर्वोच्च अदालत ने भी कह दिया कि पूर्व में घोषित दिशा-निर्देशों के अनुरूप आतिशबाजी चलाने पर कोई पाबन्दी लगाई नहीं जा सकती। लेकिन यह भी जानना जरूरी है कि समाज व संस्कृति का संचालन कानून या अदालतों से नहीं बल्कि लोक कल्याण की व्यापक भावना से होता रहा है और यही इसके सतत पालन व अक्षुण्ण रहे का कारक भी है।

दीपावली की असल भावना को लेकर कई मान्यताएँ हैं और कई धार्मिक आख्यान भी। यदि सभी का अध्ययन करें तो उनकी मूल भावना भारतीय समाज का पर्व-प्रेम, उल्लास और सहअस्तित्व की अनिवार्यता है। विडम्बना है कि आज की दीपावली दिखावे, परपीड़न, परम्पराओं की मूल भावनाओं के हनन और भविष्य के लिये खतरा खड़ा करने की संवेदनशील औजार बन गई है।

अभी दीपावली से दस दिन पहले ही देश की राजधानी दिल्ली की आबोहवा इतनी जहरीली हो गई है कि हज़ारों ऐसे लोग जो साँस की बीमारियों से पीड़ित हैं, उन्हें मजबूरी में शहर छोड़कर जाना पड़ रहा है, हालांकि अभी आतिशबाजी शुरू नहीं हुई है। अभी तो बदलते मौसम में भारी होती हवा, वाहनों के प्रदूषण, धूल व कचरे को जलाने से उत्पन्न धुएँ के घातक परिणाम ही सामने आये हैं।

भारत का लोक गर्मियों में खुले में छत पर सोता था। किसान की फसल तैयार होती थी तो वह खेत में होता था। दीपावली ठंड के दिनों की शुरूआत होता है। यानि लोक को अब अपने घर के भीतर सोना शुरू करना होता था। पहले बिजली-रोशनी तो थी नहीं। घरों में साँप-बिच्छू या अन्य कीट-मकोड़े होना आम बात थी। सो दीपावली के पहले घरों की सफाई की जाती थी व घर के कूड़े को दूर ले जाकर जलाया जाता था।

उस काल में घर के कूड़े में काष्ठ, कपड़ा या पुराना अनाज ही होता था। जबकि आज के घर कागज, प्लास्टिक, धातु व और ना जाने कितने किस्म के जहरीले पदार्थों के कबाड़े से भरे होते हैं। दीवारों पर लगाया गया इनेमल-पैंट भी रसायन ही होता है। इसकी गर्द हवा को जबरदस्त तरीके से दूषित करती है। सनद रहे कि दीपावली से पहले शहर की हवा विषैली होने के लिये दिल्ली का उदाहरण तो बानगी है, ठीक यही हालात देश के सभी महानगरों, से लेकर कस्बों तक के हैं।

दुखद है कि हम साल में एक दिन बिजली बन्द कर ‘पृथ्वी दिवस’ मानते हैं व उस दौरान धरती में घुलने से बचाए गए कार्बन की मात्रा का कई सौ गुणा महज दीपावली के चन्द घंटों में प्रकृति में जोड़ देते हैं। हम जितनी बिजली बेवजह फूँकते हैं, उसके उत्पादन में प्राकृतिक ईंधन तथा उसके इस्तेमाल से निकली ऊर्जा उतना ही कार्बन प्रकृति में उड़ेल देता है। कार्बन की बढ़ती मात्रा के कारण जलवायु चक्र परिवर्तन, धरती का तापमान बढ़ना जैसी कई बड़ी दिक्कतें समाने आ रही हैं। काश हम दीपावली पर बिजली के बनिस्पत दीयों को ही प्राथमिकता दें। इससे कई लोगों को रोज़गार मिलता है, प्रदूषण कम होता है और पर्व की मूल भावना जीवन्त रहती है।

दीपावली में सबसे ज्यादा जानलेवा भूमिका होती है आतिशबाजी या पटाखों की। खासतौर पर चीनी पटाखों में तो बेहद खतरनाक रसायन होते हैं जो साँस लेने की दिक्कत के साथ-साथ फेफड़ों के रोग दीर्घकालिक हो सकते हैं। दीवाली पर आतिशबाजी के कारण होने वाले वायु प्रदूषण को लेकर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टरों का यह खुलासा चौंकाने वाला है कि इससे न केवल साँस की बीमारी बढ़ती है, बल्कि गठिया व हड्डियों के दर्द में भी इजाफा हो जाता है।

संस्थान द्वारा इस बार शोध किया जाएगा कि दीपावली पर आतिशबाजी जलाने के कारण हवा में प्रदूषण का जो जहर घुलता है, उसका गठिया व हड्डी के मरीजों पर कितना असर पड़ता है। एम्स के विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक हुए शोध में यह पाया गया है कि वातावरण में पार्टिकुलेट मैटर 2.5 का स्तर अधिक होने पर गठिया के मरीजों की हालत ज्यादा खराब हो जाती है। चूँकि दीपावली में आतिशबाजी के कारण प्रदूषण का स्तर बहुत बढ़ जाता है, लिहाजा इस बार गठिया के मरीजों पर दीपावली में होने वाले प्रदूषण के असर पर शोध किया जाएगा।

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण भी गठिया की बीमारी के लिये जिम्मेदार कारक है। इस मामले में पिछले दो वर्षों से शोध चल रहा है। केन्द्र सरकार के विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग की मदद से किये जा रहे देश में अपनी तरह के इस अनूठे शोध के तहत गठिया के 400 व 500 सामान्य व्यक्तियों पर अध्ययन किया जा रहा है। यह शोध रिपोर्ट वर्ष 2016 तक आएगी।

दिल्ली में दीपावली सबसे ज्यादा धूमधाम से मनाई जाती है। इस त्योहार पर राजधानी सचमुच किसी दुल्हन की तरह सजाई-सँवारी जाती है। लेकिन इस साज-सज्जा का एक स्याह पक्ष यह भी है कि दीपों के त्योहार के इस मौके पर दिल्ली में इतनी ज्यादा आतिशबाजी होती है कि कई बार तो दीवाली के अगले दिन तक पूरे वातावरण में प्रदूषण की धुंध सी छाई रहती है। यह प्रदूषण बीमार लोगों के लिये तो मुसीबत खड़ा करता ही है, स्वस्थ व्यक्ति को बीमार बना देता है।

हम साल में एक दिन बिजली बन्द कर ‘पृथ्वी दिवस’ मानते हैं व उस दौरान धरती में घुलने से बचाए गए कार्बन की मात्रा का कई सौ गुणा महज दीपावली के चन्द घंटों में प्रकृति में जोड़ देते हैं। हम जितनी बिजली बेवजह फूँकते हैं, उसके उत्पादन में प्राकृतिक ईंधन तथा उसके इस्तेमाल से निकली ऊर्जा उतना ही कार्बन प्रकृति में उड़ेल देता है। कार्बन की बढ़ती मात्रा के कारण जलवायु चक्र परिवर्तन, धरती का तापमान बढ़ना जैसी कई बड़ी दिक्कतें समाने आ रही हैं। काश हम दीपावली पर बिजली के बनिस्पत दीयों को ही प्राथमिकता दें। इससे कई लोगों को रोज़गार मिलता है, प्रदूषण कम होता है और पर्व की मूल भावना जीवन्त रहती है।

आतिशबाजी के धुएँ, आग, आवाज के शिकार इंसान तो होते ही हैं, पशु-पक्षी, पेड़, जलस्रोत भी इसके कुप्रभाव से कई महीनों तक हताश-परेशान रहते हैं। विडम्बना है कि आज पढ़ा-लिखा व आर्थिक रूप से सम्पन्न समाज महज दिखावे के लिये हजारों-हजार करोड़ की आतिशबाजी फूँक रहा है। इससे पैसे की बर्बादी तो होती ही है, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचता है पर्यावरण को। ध्वनि और वायु प्रदूषण दीपावली पर बेतहाशा बढ़ जाता है। जो कई बीमारियों का कारण है।

दीवाली के बाद अस्पतालों में अचानक 20 से 25 प्रतिशत ऐसे मरीजों की संख्या में वृद्धि हो जाती है जिसमें अधिकतर लोग साँस सम्बन्धी व अस्थमा जैसी समस्या से पीड़ित होते हैं। हर साल विश्व में 2 से 4 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण की वजह से होती है। वातावरण में धूल व धुएँ के रूप में अतिसूक्ष्म पदार्थ मुक्त तत्वों का हिस्सा होता है, जिसका व्यास 10 माइक्रोमीटर होता है, यही वजह है कि यह नाक के छेद में आसानी से प्रवेश कर जाता है, जो सीधे मानव शरीर के श्वसन प्रणाली, हृदय, फेफड़े को प्रभावित करता है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव छोटे बच्चे और अस्थमा के मरीजों पर होता है।

धुंध (स्मॉग) की वजह से शारीरिक परिवर्तन से लेकर साँस फूलना, घबराहट, खाँसी, हृदय व फेफड़ा सम्बन्धी दिक्कतें, आँखों में संक्रमण, दमा का अटैक, गले में संक्रमण आदि की परेशानी होती है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार दिल्ली में पटाखों के कारण दीपावली के बाद वायु प्रदूषण छह से दस गुना और आवाज का स्तर 15 डेसिबल तक बढ़ जाता है। इससे सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

तेज आवाज वाले पटाखों का सबसे ज्यादा असर बच्चों, गर्भवती महिलाओं तथा दिल और साँस के मरीजों पर पड़ता है। मनुष्य के लिये 60 डेसिबल की आवाज सामान्य होती है। इससे 10 डेसिबल अधिक आवाज की तीव्रता दोगुनी हो जाती है, जो मनुष्य के स्वास्थ्य के लिये घातक होती है।

दुनिया के कई देशों में रंगारंग आतिशबाजी करने की परम्परा है। आकाश को जगमग करने के लिये बनाए जाने वाले पटाखों में कम-से-कम 21 तरह के रसायन मिलाए जाते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि 20 मिनट की आतिशबाजी पर्यावरण को एक लाख कारों से ज्यादा नुकसान पहुँचाती है।

जाहिर है कि दीपावली का मौजूदा स्वरूप ना तो शास्त्र सम्मत है और ना ही लोक परम्पराओं के अनुरूप और ना ही प्रकृति, इंसान व जीवजगत के लिये कल्याणाकरी, तो फिर क्यों ना दीपावली पर लक्ष्मी को घर बुलाएँ, सरस्वती का स्थायी वास कराएँ ओर एकदंत देव की रिद्धी-सिद्धी का आह्वान करें- दीपावली दीयों के साथ, अपनों के साथ, मुस्कान के साथ आतिशबाजी रहित ही मनाएँ।

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पंकज चतुर्वेदीपंकज चतुर्वेदीपंकज चतुर्वेदी
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