राजस्थान में पशुपालन व्यवसाय

Submitted by Hindi on Tue, 11/10/2015 - 12:05
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Source
योजना, अप्रैल 1998

दशा और दिशा


राजस्थान में देश के कुल पशुधन का लगभग 11.5 प्रतिशत मौजूद है। यहाँ पशुपालन रोजगार का प्रमुख स्रोत है। इस व्यवसाय से राज्य की अर्थव्यवस्था अनेक प्रकार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष घटकों से लाभान्वित होती है। लेखक का कहना है कि राज्य में पशुओं की उत्पादकता बढ़ाने के लिये जहाँ एक ओर पशुपालकों को शिक्षित करते हुये उन्हें आधुनिक पद्धतियों का प्रशिक्षण देना जरूरी है वहीं दूसरी ओर सभी क्षेत्रों में पशुओं की नस्ल सुधार योजनाओं को और प्रभावी ढंग से लागू करना अति आवश्यक है।

राजस्थान की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में पशुपालन व्यवसाय का विशेष महत्व है। राजस्थानवासियों के लिये पशुपालन न केवल जीविकोपार्जन का आधार है, बल्कि यह उनके लिये रोजगार और आय प्राप्ति का सुदृढ़ तथा सहज स्रोत भी है। राज्य के मरुस्थलीय और पर्वतीय क्षेत्रों में भौगोलिक और प्राकृतिक परिस्थितियों का सामना करने के लिये एकमात्र विकल्प पशुपालन व्यवसाय ही रह जाता है। राज्य में जहाँ एक ओर वर्षाभाव के कारण कृषि से जीविकोपार्जन करना कठिन होता है, वहीं दूसरी ओर औद्योगिक रोजगार के अवसर भी नगण्य हैं। ऐसी स्थिति में ग्रामीण लोगों ने पशुपालन को ही जीवन शैली के रूप में अपना रखा है। पशुपालन व्यवसाय से राज्य की अर्थव्यवस्था अनेक प्रकार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष घटकों से लाभान्वित होती है।

पशुधन की बहुलता


पशुसम्पदा की दृष्टि से राजस्थान एक समृद्ध राज्य है। यहाँ भारत के कुल पशुधन का लगभग 11.5 प्रतिशत मौजूद है। क्षेत्रफल की दृष्टि से पशुओं का औसत घनत्व 120 पशु प्रति वर्ग किलोमीटर है जो सम्पूर्ण भारत के औसत घनत्व (112 पशु प्रति वर्ग किलोमीटर) से अधिक है। राज्य में 1988 में पशुओं की कुल संख्या 409 लाख थी जो बढ़कर 1992 में 492.67 लाख तथा 1996 में 568.19 लाख तक पहुँच गई। पशुओं की बढ़ती हुई संख्या अकाल और सूखे से पीड़ित राजस्थान के लिये वर्दान सिद्ध हो रही है। आज राज्य की शुद्ध घरेलू उत्पत्ति का लगभग 15 प्रतिशत भाग पशु सम्पदा से ही प्राप्त हो रहा है। सम्पूर्ण भारत के सन्दर्भ में राजस्थान का योगदान ऊन उत्पादन में 45 प्रतिशत, पशुओं की माल वाहक क्षमता में 35 प्रतिशत और दूध उत्पादन में 10 प्रतिशत है।

वर्तमान समय में राज्य में पशुपालन की दृष्टि से गाय-बैल, भैंस-बकरियाँ, ऊँट, घोड़े, टट्टू एवं गधे हैं। भेड़ों तथा ऊँटों की संख्या की दृष्टि से राजस्थान का देशभर में प्रथम स्थान है। यूँ तो राज्य के लगभग सभी जिलों में न्यूनाधिक पशुपालन का कार्य किया जाता है परन्तु व्यवसाय के रूप में मुख्य रूप से मरुस्थलीय, शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में यह कार्य किया जाता है। पशुपालन से न केवल ग्रामीण लोगों को स्थायी रोजगार मिलता है, बल्कि पशुओं पर आधारित उद्योगों के विकास का मार्ग भी प्रशस्त होता है। अकाल एवं सूखे की स्थिति में पशुपालन ही एक सहारा बचता है। इस व्यवसाय से पौष्टिक आहार-घी, मक्खन, छाछ, दही आदि की प्राप्ति के साथ-साथ डेयरी, ऊन, परिवहन, चमड़ा चारा आदि उद्योगों के विकास को प्रोत्साहन मिलता है। इसके अलावा बड़े पैमाने पर मांस प्राप्ति के साथ-साथ चमड़ा और हड्डियाँ भी प्राप्त होती हैं, जिनका विदेशों से निर्यात किया जाता है।

पशुधन विकास


अर्थव्यवस्था में व्यवसाय की उपादेयता को देखते हुये राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर यथोचित प्रयास किये जाते रहे हैं। प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में पशुधन विकास पर किये जाने वाले व्यय की राशि उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। हालाँकि प्रथम योजनावधि में यह राज्य अपने एकीकरण की समस्याओं से जूझ रहा था और पशुधन विकास व्यय कृषि विकास के साथ ही शामिल था परन्तु द्वितीय पंचवर्षीय योजना में पशुधन विकास पर 1.25 करोड़ रुपये व्यय किये गये थे। जो सातवीं योजना में 37.6 करोड़ रुपये तथा आठवीं योजना में 87.3 करोड़ रुपये हो गये। नौवीं योजनावधि में राज्य में पशुधन विकास के लिये लगभग 109.34 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। राज्य में पशुओं की बढ़ती संख्या को ध्यान में रखते हुये उनकी चिकित्सा सुविधाओं का भी निरन्तर विस्तार किया जा रहा है। 1951 में राज्य में पशु चिकित्सालयों और स्वास्थ्य केन्द्रों की संख्या केवल 147 थी, जो 1984-85 में 1106 तथा 1993-94 में 1457 हो गई। इनके साथ-साथ 55 चल चिकित्सालय, 8 जिला पशु चिकित्सालय तथा 13 रिण्डरपेस्ट नियन्त्रण केन्द्र भी चलाये जा रहे हैं।

विभिन्न पशुओं के नस्ल सुधार, रोग नियन्त्रण और पौष्टिक आहार उपलब्धता की दृष्टि से भी अनेक कार्यक्रम चलाये गये हैं। बकरी पालकों की सहायतार्थ स्विट्जरलैण्ड सरकार के सहयोग से जहाँ अजमेर, भीलवाड़ा और सिरोही जिलों में बकरी विकास एवं चारा उत्पादन योजना शुरू की गई है, वहीं दूसरी ओर ऊँटों में हाने वाले सर्रा रोग पर नियन्त्रण पाने के लिये अनेक सर्रा नियन्त्रण इकाईयों की स्थापना की गई है। इसी प्रकार अलवर और भरतपुर जिलों में सूअर पालन व्यवसाय को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से सूअर विकास फार्म खोला गया है। इसी प्रकार गायों की नस्ल सुधारने और उनके संरक्षण के उद्देश्य से लगभग 280 गौशालाएँ चलाई जा रही हैं। कुछ गौशालाओं को केन्द्र सरकार की ओर से आर्थिक अनुदान मिलता है और बाकी अधिकांश शालाएँ राजस्थान गौ सेवा संघ के संरक्षण तथा निर्देशन से संचालित की जा रही हैं। गायों एवं बैलों की नस्ल सुधारने के लिये 58 गौ-संवर्द्धन शाखाएँ कार्य कर रही हैं।

राजस्थान में पशुपालन व्यवसाय को समुन्नत बनाकर ग्रामीण विकास को गति देने के लिये ग्रामाधार योजना का शुभारम्भ भी किया गया है। जिसके अन्तर्गत उन्नत नस्ल के पशुओं की संख्या बढ़ाने के लिये वैज्ञानिक प्रजनन पर अधिक बल दिया जा रहा है। दूसरी ओर सन्तुलित पशु आहार तथा चारा उत्पादन व्यवस्था को विकसित करने के साथ-साथ पशुओं को संक्रामक रोगों से बचाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। इसके अलावा ग्रामीणों को पशुपालन की वैज्ञानिक विधियों का प्रशिक्षण देने तथा उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने हेतु समुचित विपणन व्यवस्था करने के साथ-साथ कृत्रिम गर्भाधान और चारा विकास केन्द्रों के विस्तार के लिये भी प्रयास किये जा रहे हैं।

पशुपालकों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने के उद्देश्य से राज्य में 1989-90 से गोपाल योजना का भी क्रियान्वयन किया गया है। इस योजना में ग्रामीण क्षेत्रों के बेरोजगार शिक्षित युवकों को कृत्रिम गर्भाधान, रोग निरोधक दवाओं के उपयोग, बाँझपन निवारण, सन्तुलित आहार, पशुओं की आधुनिक ढंग से देखभाल आदि कार्यों के लिये प्रशिक्षण दिया जाता है। अभी तक यह योजना दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के 12 जिलों की 45 पंचायत समितियों में चलाई जा चुकी है।

समस्याएँ और बाधाएँ


पशुपालन व्यवसाय के विकास एवं विस्तार के इन उपायों के बावजूद कुछ आधारभूत एवं संरचनात्मक समस्याओं के कारण पशुधन का आशानुकूल विकास नहीं हो पा रहा है। पशुपालकों के अशिक्षित होने के कारण उन्हें आधुनिक विधियों का प्रशिक्षण देने में अनेक कठिनाइयाँ सामने आ रही हैं। पशुपालक अपनी निर्धनता के कारण पशुओं को पौष्टिक आहार नहीं दे पाते हैं और न ही उनके रोगों का निदान करा पाते हैं। कई बार समय पर इलाज न हो पाने के कारण सैकड़ों पशुओं के एक साथ मरने से पशुपालक गम्भीर आर्थिक संकट में फंस जाते हैं।

ज्यादातर पशुपालकों के पास कमजोर और घटिया नस्ल के पशु हैं। इसके अतिरिक्त अधिकांश लोगों की आजीविका का आधार कृषि होने के कारण चारागाहों के लिये पर्याप्त भूमि शेष नहीं रह पाती है। फलतः पशुओं को सूखे पत्तों और डंठलों आदि पर ही निर्भर रहना पड़ता है। कृषि उत्पादन पूर्णतः वर्षा पर निर्भर करता है, किन्तु वर्षा की अपर्याप्ता के कारण यहाँ हर तीन-चार साल बाद पूर्ण या आंशिक अकाल की छाया बनी रहती है। जिससे अधिकांश पशु अकाल की चपेट में आ जाते हैं। और पशुपालक कठिनाई में पड़ जाते हैं। अधिकांश पशुपालक परम्परागत तथा रूढ़िवादी तरीकों से ही पशुपालन का कार्य करते हैं। इन सब कारणों से उनमें आज भी पशुपालन के प्रति व्यावसायिक दृष्टिकोण विकसित नहीं हो पाया है।

सुझाव


राज्य के पशुओं की उत्पादकता बढ़ाने के लिये जहाँ एक ओर पशुपालकों को शिक्षित करते हुये उन्हें आधुनिक पद्धतियों का प्रशिक्षण देना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर सभी क्षेत्रों में पशुओं की नस्ल सुधार योजनाओं को और प्रभावी ढंग से लागू करना अति आवश्यक है। सरकार को पशुओं के संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिये चिकित्सा सुविधाओं का भी शीघ्रातिशीघ्र विस्तार करना चाहिये।

पशुपालकों को जागरुक बनाकर पशु संवर्द्धन कार्यक्रमों और योजनाओं को सफल बनाने का प्रयास करना चाहिये। पशुपालकों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिये उन्हें सरल और कम ब्याज दरों पर संस्थागत ऋण मिलने चाहिये तथा अकाल एवं सूखे की दशा में पशुपालकों को पूर्ण संरक्षण दिया जाना चाहिये। वर्षभर चारा उपलब्ध होने वाले चारागाहों का विकास करना भी बहुत जरूरी है। पशु बीमा योजना का अधिकाधिक प्रचार-प्रसार करना चाहिये और उसे राज्य के सभी क्षेत्रों में कारगर ढंग से क्रियान्वित किया जाना चाहिये।

सभी जिलों में दूध के विक्रय की भाँति पशुओं से प्राप्त अन्य पदार्थों के विक्रय के लिये भी सहकारी समितियों की स्थापना की जानी चाहिये। अनुत्पादक पशुओं की संख्या के आधार पर पशुपालकों को सरकार से आर्थिक एवं चारा अनुदान मिलना चाहिये। पशुपालन के प्रति जीविकोपार्जन के स्थान पर व्यावसायिक दृष्टिकोण विकसित करने का प्रयास करना चाहिये ताकि पशुपालन व्यवसाय को सम्पूर्ण व्यवसाय का रूप दिया जा सके। राज्य के पशुपालन व्यवसाय को समृद्ध बनाने के लिये यह भी आवश्यक है कि यहाँ पशु आधारित उद्योगों का विकास किया जाए। ऐसा करने से न केवल राज्य के पशुपालकों की आय में वृद्धि होगी बल्कि राज्य के औद्योगिक विकास को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

(लेखक द्वय राजस्थान के व्यावसायिक प्रशासन विभाग में क्रमशः विभागाध्यक्ष एवं सहायक प्रोफेसर हैं।)

Comments

Submitted by Anil (not verified) on Sun, 10/29/2017 - 11:28

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We make a new dairy farm with only rajshani deshi cow. We don't law and govt. Rule in their. Pls guide us.

Submitted by Anil (not verified) on Sun, 10/29/2017 - 11:29

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Submitted by Kamlesh Kumar … (not verified) on Wed, 01/17/2018 - 10:06

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Sir, good morning, I want purchase buffalo for mini dairy products so I want loanThank you!

Submitted by Deep chand (not verified) on Thu, 04/12/2018 - 09:38

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सर मै राजसथान का निवासी हु मुझै भैस खरीदनै कै लिए लोन की आवशयकता है

Submitted by बाबूलाल मीना (not verified) on Sun, 05/13/2018 - 20:20

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Shreeman ji मेंरे पास 2भैस और 2बछडी हैं 2भैस और लेना चाहता हूँ लेकिन मेरे पास पैसा नहीं है और मै ऐक गरीब परिवार से हू. कृपा कर के मुझे लोन देने की कृपा करे, अापकी अति कृपा होगी. धन्यवाद मैं बाबूलाल मीना

Submitted by Dharm singh yadav (not verified) on Fri, 05/18/2018 - 06:47

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आधुनिक भैंस पालन की जानकारी दीजिए ।लोन लेने की जानकारी दीजिए मै आधुनिक तकनीक से लैस भैंस पालन फार्म हाउस खोलना चाहता हु। इसके लिए आवश्यक जानकारी दीजिए । राजस्थान

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