जलवायु परिवर्तन से निपटने में पनबिजली एक 'झूठा समाधान'

Submitted by RuralWater on Mon, 11/16/2015 - 12:47
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सन्दर्भ : कोप 21


.पनबिजली परियोजनाओं के लिये बनने वाले बड़े बाँधों से निकलने वाली मीथेन समस्या ने पिछले 15 सालों के दौरान अन्तरराष्ट्रीय खबरों में हालांकि थोड़ी-बहुत जगह जरूर बनाई है। पर इसके ठीक उलट ‘कोप’ या अन्य पर्यावरण की नई चर्चाओं में मज़बूती से पनबिजली को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये हल के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है जिससे बड़े बाँधों से मीथेन उत्सर्जन और पर्यावरणीय प्रभाव की बहस को बेमानी कर दिया गया है।

इससे अब चिन्ता का मुद्दा यह निकलता है कि पनबिजली जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये वाकई एक हल है या सिर्फ भ्रम? क्या जलवायु परिवर्तन कम करने के लिये पनबिजली परियोजनाओं की तरफ बढ़ना क्या सही है?

अमेरिका के एक महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय संगठन ‘इंटरनेशनल रीवर्स’ ने पनबिजली परियोजनाओं के मिथक के बारे में लोगों को जागरूक और शिक्षित करने के साथ- साथ पैरवी का भी काम किया है। इसके साथ ही कुछ वैज्ञानिक पत्र-पत्रिकाएँ भी जल-विद्युत के क्लीन एनर्जी के मिथक के बारे में जागरूक करने का काम कर रही हैं।

जल-विद्युत अपने आप में मीथेन गैस की एक फैक्टरी है या यूँ कहें कि यह एक मीथेन बम है। पनबिजली बाँधों से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन जैसे मुद्दों पर कभी भी व्यवस्थित अध्ययन नहीं किया गया। साथ ही कोप जैसी पर्यावरण वार्ताओं में जल-विद्युत से होने वाले ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के मुद्दे को प्रायः वार्ताओं में नजरअन्दाज किया जाता रहा है।

मीथेन उत्सर्जन विभिन्न जलवायु में अलग-अलग


इस सम्बन्ध में किये गए अनेकानेक वैज्ञानिक अध्ययन इस बात को पुख्ता करते हैं कि जल-विद्युत बाँधों से और जलाशयों से निकलने वाली मीथेन गैस की मात्रा अलग-अलग जलवायु में अलग-अलग हो सकती है।

उत्तरी सब-आर्कटिक जलवायु में मीथेन से होने वाले ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन की मात्रा कोयला-तापीय विद्युत संयंत्र से होने वाले ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन की मात्रा से कम आँकी गई है।

पर समशीतोष्ण जलवायु वाले इलाकों जैसे अमरीका और यूरोप के कई हिस्सों में भी विभिन्न जलवायु होने की वजह से मीथेन उत्सर्जन की मात्रा भी अलग-अलग देखी गई है जो न केवल जलवायु बल्कि जलाशय के आकार और हरियाली की मौजूदगी पर भी निर्भर है लेकिन कोयला तापीय विद्युतीय संयंत्रों से होने वाले ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की तुलना में कहीं कम तो कहीं ज्यादा है।

जबकि ऊष्णकटिबन्धीय जलवायु वाले इलाकों में पनबिजली से निकलने वाली मीथेन से होने वाला ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन, उतनी ही ऊर्जा पैदा करने वाले कोयला तापीय विद्युत संयंत्र से होने वाले उत्सर्जन की मात्रा का दोगुने से भी ज्यादा है।

एक जानकारी के अनुसार ‘क्लीन एनर्जी’ के प्रतीक दुनिया के बड़े बाँध 10 करोड़ टन से ज्यादा मीथेन वायुमंडल में छोड़ रहे हैं और भारत के बाँध कुल सालाना तीन करोड़ 35 लाख टन मीथेन वायुमंडल में छोड़ रहे हैं।

हालांकि ‘इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज’ (आईपीसीसी) ने पनबिजली के लिये बाँधों आदि से निकलने वाली मीथेन के आकलन के लिये कुछ दिशा-निर्देश निर्धारित किये हैं लेकिन यह भी सच है कि ये दिशा-निर्देश मात्र कागजी कार्यवाही बनकर रह गए हैं। पनबिजली परियोजनाओं से निकलने वाली मीथेन का आकलन शायद ही किया गया हो।

ब्राजील के एक वैज्ञानिक का अनुमान है कि दुनिया भर में कुल मानव उत्सर्जित मीथेन का लगभग 23 फीसदी हिस्सा मौजूदा पनबिजली परियोजनाओं की वजह से है। जैसे-जैसे पनबिजली परियोजनाएँ बढ़ेंगी मीथेन की मात्रा भी बढ़ेगी।

पनबिजली को अक्सर ग्रीन इनर्जी यानी इको फ्रैंडली का चोगा पहना दिया जाता है और “क्लीन एनर्जी” एवं “कार्बन-मुक्त एनर्जी” बताकर लोगों और सरकारों को बेचा जाता है।

हालांकि आईपीसीसी ने भी जल-विद्युत को ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के एक स्रोत के रूप में अंकित किया है इतना ही नहीं विज्ञान ने भी जल-विद्युत को क्लीन एनर्जी होने की क्लीन चिट नहीं दी है फिर भी क्योटो प्रोटोकोल के क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज़्म में पनबिजली को एक ‘कार्बन फ्री एनर्जी’ के रूप में शामिल किया गया है।

इसको जलवायु परिवर्तन से निपटने के एक साधन के रूप में देखा जा रहा है इसे लागू करने में ज्यादातर वही देश शामिल हैं जो पेरिस में कोप-21 में इकट्ठा हो रहे हैं। इससे भी बढ़कर बुरा तो यह है कि विश्व बैंक जैसी संस्था ने भी इसे क्लीन इनर्जी की लिस्ट में शामिल किया है और इसमें पैसा लगाकर इसकी बढ़ोत्तरी को भी बढ़ावा दे रही है।

इतना ही नहीं लगभग सभी देश इसी सोच के साथ पनबिजली परियोजनाओं को बढ़ावा देने में लगे हैं। यहाँ तक कि अमरीका की सरकार भी विज्ञान के खिलाफ जाकर ‘क्लीन एनर्जी’ के इस फ़रेब को बढ़ावा देने में लगी है।

कोप-21 में देशों का वादा क्या और कितना?


कोप-21 से ठीक पहले भागीदार देशों ने संयुक्त राष्ट्र को अपना-अपना ‘इंटेन्डिड नेशनली डेटरमाइण्ड कंट्रीब्यूशन्स’ (आईएनडीसी) भेजा है। आईएनडीसी का मतलब- योजना का एक मसौदा जिसमें इस बात का विवरण दिया गया है कि वे अपने राष्ट्रीय स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिये क्या करने वाले हैं और किस तरह तथा कितना कटौती करेंगे?

आइए अब संयुक्त राष्ट्र को भेजे गए 181 आईएनडीसी में से कुछ उदाहरणों पर एक नजर डालते हैंः

पनबिजली को अक्सर ग्रीन इनर्जी यानी इको फ्रैंडली का चोगा पहना दिया जाता है और “क्लीन एनर्जी” एवं “कार्बन-मुक्त एनर्जी” बताकर लोगों और सरकारों को बेचा जाता है। हालांकि आईपीसीसी ने भी जल-विद्युत को ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के एक स्रोत के रूप में अंकित किया है इतना ही नहीं विज्ञान ने भी जल-विद्युत को क्लीन एनर्जी होने की क्लीन चिट नहीं दी है फिर भी क्योटो प्रोटोकोल के क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज़्म में पनबिजली को एक ‘कार्बन फ्री एनर्जी’ के रूप में शामिल किया गया है। चीन हर साल दर्जनों पनबिजली संयंत्र लगा रहा है, यहाँ तक कि दुनिया का सबसे बड़ा पनबिजली संयंत्र भी इसमें शामिल है। अपने आईएनडीसी में चीन का कहना हैः “पारिस्थितिकी व पर्यावरण संरक्षण और साथ ही स्थानीय बाशिन्दों की पुनर्बहाली के मद्देनज़र हम आगे बढ़कर पनबिजली परियोजनाओं को बढ़ावा देंगे।”

भारत अपने कार्बन उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य तक पहुँचने के लिये पनबिजली परियोजनाओं का सहारा लेगा। भारत का कहना हैः “देश की जल सम्पदा में विकास की अपार सम्भावनाएँ हैं इसलिये 100 गीगावाट से भी अधिक क्षमता वाली पनबिजली परियोजनाओं के लिये हम न केवल बहुत से नीतिगत फैसले ले रहे हैं बल्कि जमीनी काम भी कर रहे हैं।”

जापान ने आईएनडीसी में कहा है कि यह अपने कार्बन उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य को धीरे-धीरे टुकड़ों में पूरा करेगा और यह लक्ष्य 2030 तक 9 फीसदी पनबिजली परियोजनाओं से करेगा। जापान में मौजूदा समय में दर्जनों पनबिजली संयंत्र काम कर रहे हैं और दर्जनों परियोजनाओं की योजना पर काम चल रहा है।

कनाडा ने आईएनडीसी में भी साफ तौर पर कहा है कि पनबिजली के जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी खतरे कम हैं इसलिये वह इस अक्षय ऊर्जा से बिजली उत्पादन को बढ़ावा देने के लिये निवेश में बढ़ोत्तरी करेगा। कनाडा में दर्जनों नए पनबिजली बाँधों पर काम चल रहा है और उनमें से कुछ अगर सुदूरवर्ती इलाके में है तो उसे कम कार्बन प्रभाव वाला माना जाता है।

कोस्टारिका के आईएनडीसी के अनुसार : “कोस्टारिका का पनबिजली उत्पादन, संरक्षण और खासतौर पर जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी मामलों पर नवीकरण का एक पारम्परिक और लम्बा अनुभव है।” कोस्टारिका अपने को एक कार्बन-मुक्त ऊर्जा व्यवस्था वाला देश कहकर बाजार में उतार रहा है, इस कार्बन-मुक्त ऊर्जा का 80 फीसदी पनबिजली से है। आईएनडीसी में पनबिजली से निकलने वाली मीथेन को बिल्कुल दरकिनार कर दिया गया है-इतना ही नहीं यह मध्य अमरीका में सबसे बड़े पनबिजली बाँध के निर्माण कार्य को हाल ही में पूरा करने वाला है।

आलम यह है कि बहुत से देश पनबिजली परियोजनाओं को अंजाम दे रहे हैं लेकिन अपने आईएनडीसी में इसका जिक्र तक नही कर रहे हैं। ऊपर से कहते हैं कि वें नेशनल ग्रीन हाउस गैस इंवेन्ट्रीज़ के लिये बनाए गए 2006 आईपीसीसी दिशानिर्देशों का ही पालन कर रहे हैं और इस के आधार पर ही वे ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों को अपनाकर अपने कार्बन उत्सर्जन में कमी और कमी का आकलन कर रहे हैं।

इंडोनेशिया को एक उदाहरण के तौर पर लेते हैं। इंडोनेशिया ने न केवल दर्जनों पनबिजली बाँध बनाए हैं बल्कि लगातार बनाने में जुटा हुआ है। जबकि अपने आईएनडीसी में इसने पनबिजली का जिक्र तक नहीं किया है। बल्कि यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि यह 2006 आईपीसीसी दिशानिर्देशों के मुताबिक अपने कार्बन उत्सर्जन में कटौती कर लेगा।

मुझे शक है कि ये देश इन दिशानिर्देशों का ठीक से पालन भी कर रहे हैं या नहीं क्योंकि 2006 के आईपीसीसी दिशानिर्देशों में भी साफ-साफ कहा गया है कि पनबिजली बाँधों और जलाशयों से होने वाले मीथेन उत्सर्जन का भी आकलन किया जाना चाहिए, आईपीसीसी के “सीएच4 (मीथेन) एमिशन्स फ्रॉम फ्लडिड लैण्ड्स” परिशिष्ट के अध्याय 4 में बाँधों के ऊपरी और निचले दोनों हिस्सों पर मीथेन उत्सर्जन के खास आकलन का जिक्र किया गया है।

लेकिन फिर भी मलेशिया, ब्राजील, ग्वाटेमाला, रूस, भारत और यहाँ तक कि अमरीका सरीखे देश जो पनबिजली परियोजनाओं के जरिए अपनी नदियों और पर्यावरण को नष्ट करने पर तुले हैं, उन्होंने भी अपनी आईएनडीसी सूची में पनबिजली को मीथेन उत्सर्जन के एक स्रोत के रूप में एक तो शामिल नहीं किया है उलटे इसे क्लीन एनर्जी के स्रोत में चुना है। या तो इन देशों की समझ का फेर है या फिर जानबूझकर आईपीसीसी दिशानिर्देशों की अनदेखी की जा रही है।

इसका नतीजा क्या हो सकता है; अन्दाजा लगाना भी मुश्किल है। हाल ही में पूर्वी यूरोपीय बाल्कन देशों ने 2700 पनबिजली बाँध परियोजनाओं को अंजाम देने की घोषणा की है उसपे तुर्रा ये कि हरेक का जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये विकल्प के तौर पर स्वच्छ ऊर्जा यानी क्लीन इनर्जी के स्रोत के रूप में बखान किया जा रहा है।

पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों को पूरा यकीन है कि ऐसी सोच के चलते कोप-21 में भी जलवायु वार्ताएँ शायद ही किसी नतीजे पर पहुँचेगी। पनबिजली से निकलने वाली मीथेन के बारे में जानकारी की कमी, आईपीसीसी दिशानिर्देशों को लागू करने की कमी और साथ ही पनबिजली का क्लीन एनर्जी के रूप में बखान करना जैसी अनेकों समस्याएँ कोप वार्ताओं की सफलता में रोड़े बनी हुई हैं।

बाँध बनाने वाले देशों के मानचित्रपनबिजली परियोजनाओं से होने वाले मीथेन उत्सर्जन को नजरअन्दाज करके हम केवल ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन का ही गलत आकलन नहीं करेंगे बल्कि जलवायु परिवर्तन से हमारी धरती को होने वाले खतरों में भी इज़ाफा करेंगे। जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिये जरूरी है कि हर मिथक से पर्दा उठे ताकि हमारी नजर और समझ पूरी तरह से साफ हो और आने वाले खतरे से धरती को बचाने की मुहिम में एकजुट शामिल हों।

# लेखक द्वय सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणीय मुद्दों के लेखक हैं।

सम्पर्कः
Gary@GaryWockner.com,
minakshi@waterkeeper.org.in

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मीनाक्षी अरोरामीनाक्षी अरोराराजनीति शास्त्र से एम.ए.एमफिल के अलावा आपने वकालत की डिग्री भी हासिल की है। पर्या्वरणीय मुद्दों पर रूचि होने के कारण आपने न केवल अच्छे लेखन का कार्य किया है बल्कि फील्ड में कार्य करने वाली संस्थाओं, युवाओं और समुदायों को पानी पर ज्ञान वितरित करने और प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित करने का कार्य भी समय-समय पर करके समाज को जागरूक करने का कार्य कर रही हैं।

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