जलवायु परिवर्तन और आतंकवाद में पिसती दुनिया

Submitted by Hindi on Fri, 11/20/2015 - 14:17
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डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट, 20 नवम्बर 2015

जलवायु परिवर्तन के चलते मानव जीवन कई प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, बेमौसम बारिश, सूखा, समुद्री तूफान आदि की बढ़ी हुई आवृत्ति से जहाँ खतरे में है, वहीं आतंकवाद के चलते दुनिया में खौफनाक मंजर और दहशत का माहौल हावी है। पेरिस में हुए ताजा आतंकी हमले से विश्व के देश क्रोधित होने के साथ खौफजदा भी हैं, जबकि इसी माह की 30 तारीख को आतंक से लहूलुहान पेरिस में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन होना है। फ्रांस ने साफ किया है कि तय समय पर ही सम्मेलन होगा। यह उसकी जिंदादिली ही कही जाएगी...

इन दिनों विश्व दो गम्भीर समस्याओं से जूझ रहा है, एक जलवायु परिवर्तन से जो अस्तित्व और विकास के लिये गम्भीर समस्या बनी हुई है, जिसकी रोकथाम में विश्वभर के देश 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध से ही लगे हुए हैं। दूसरी समस्या आतंकवाद की है जो विगत कुछ दशकों से मानवता को हाशिए पर धकेलते हुए हिंसा और तबाही का रूप अख्तियार किए हुए है। जलवायु परिवर्तन के चलते मानव जीवन कई प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, बेमौसम बारिश, सूखा, समुद्री तूफान आदि की बढ़ी हुई आवृत्ति से जहाँ खतरे में है, वहीं आतंकवाद के चलते दुनिया में खौफनाक मंजर और दहशत का माहौल हावी है। ताजा घटनाक्रम में फ्रांस की राजधानी पेरिस आतंकी हमले की शिकार हुई है।

सैकड़ों की तादाद में लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा है। 13/11 की पेरिस घटना 26/11 के मुंबई आतंकी हमले की याद भी ताजा कर देती है। बीते जनवरी में भी पेरिस आतंकी हमले झेल चुका है, जब ‘शार्ली आब्दो कार्टून पत्रिका’ के कार्यालय पर आतंकी कहर टूटा था। आतंक की बढ़ी हुई स्थिति को देखते हुए वैश्विक स्तर पर चिन्ता होना इसलिए भी लाजमी है, क्योंकि यह पौध लगातार वृद्धि कर रही है। आतंक के खतरनाक रूप से अफगानिस्तान 1980-81 और भारत 1990-91 में, जबकि अमेरिका 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले से न केवल रूबरू हुआ, बल्कि इसके कसैलेपन को भी महसूस किया।

शुरुआती दौर में यह कहीं अधिक क्षेत्रीय स्वरूप में था और इसे समाप्त किया जाना भी तुलनात्मक आसान था, पर अब बात इतनी आसान नहीं रही, क्योंकि आतंकवाद के आकाओं के पास अब हथियार, गोला-बारूद आदि के साथ वित्तीय मजबूती और व्यापक नेटवर्क है। सिलसिलेवार तरीके से इंग्लैंड, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया सहित क्या विकसित, क्या विकासशील सभी देश इसकी जद में न केवल आए, बल्कि क्षेत्रीय और छोटे आतंकी संगठन वर्तमान में तबाही के बड़े वैश्विक संजाल बन गए। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद से विश्व भर के देशों ने सभ्य समाज और समतामूलक जीवन को लेकर तेजी से कदम बढ़ाने का काम किया।

यही कारण है कि दो विश्व युद्ध दो दशक के अन्तराल पर होने के बावजूद वैश्विक स्तर पर ऐसी कोई परिस्थिति पिछले सात दशक से नहीं बनी। समूह बने पर विकास के लिये, संगठन बने पर दूसरों की मदद के लिये, परन्तु आतंकी संगठन कब किस रूप में इस भयावहता को जन्म देने लगे, शेष विश्व को शायद ठीक से पता ही नहीं चला। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के आतंकी संगठन जो एक स्कूल की तरह हिंसा के पर्याय थे और भारत जैसे देश पिछले तीन दशकों से इसकी जद में लगातार आते रहे। अलकायदा जैसे संगठनों ने आतंक का अतंरराष्ट्रीयकरण करके वैश्विक स्तर पर इस बीमारी को परिलक्षित किया, पर परेशानी इलाज को बढ़े हुए रोग की तुलना में समय से न किए जाने की है।

आईएसआईएस जैसे संगठन आज एक कॉरपोरेट सेक्टर के तौर पर जीती-जागती तबाही के संस्थान हैं। इन्हें समाप्त करने के लिये उन तमाम ताकतों को फिलहाल इकट्ठा करना कहीं अधिक जरूरी हो गया है, ताकि पृथ्वी पर फैले इनके कसैलेपन को न केवल समाप्त किया जाए, बल्कि आने वाली पीढ़ी को इनकी दहशत से मुक्त किया जाए। वर्तमान विश्व की एकता ऐसी मुहिम के खिलाफ है, जो किसी की अपेक्षाओं में शायद ही शुमार रहा हो। एक ओर आतंक की पीड़ा से कराहने वाला सभ्य समाज तो दूसरी ओर खौफनाक मंजर के जिम्मेदार आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन हैं।

इसमें कोई दोराय नहीं कि इन्हें नेस्तनाबूद करना वर्तमान की प्राथमिकता है, पर यह कैसे सम्भव होगा, इस पर पूरा और पक्का होमवर्क होना अभी शायद बाकी है। पेरिस में हुए ताजा आतंकी हमले से विश्व के देश क्रोधित होने के साथ खौफजदा भी हैं, जबकि इसी माह की 30 तारीख को आतंक से लहूलुहान पेरिस में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन होना है। फ्रांस ने साफ किया है कि तय समय पर ही सम्मेलन होगा। यह उसकी जिंदादिली ही कही जाएगी। इस सम्मेलन में करीब दो सौ देश शामिल हो रहे हैं। दो हफ्ते तक चलने वाले इस सम्मेलन में 70 हजार से अधिक लोगों का जमावड़ा लगेगा।

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात जलवायु परिवर्तन को लेकर वैश्विक स्तर पर चर्चा जोर मारने लगी थी। 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में इस पर पहला सम्मेलन आयोजित किया गया, यहीं से तय हुआ कि हर देश जलवायु परिवर्तन से निपटने हेतु घरेलू नियम बनाएँ। इसकी पुष्टि करने के लिये इसी वर्ष संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का भी गठन किया गया और नैरोबी इसका मुख्यालय बनाया गया। दो दशक के पश्चात ब्राजील के रियो डि जेनेरो में संबद्ध राष्ट्र के प्रतिनिधि एक बार पुन: जुटे।

जलवायु परिवर्तन से सम्बन्धित कार्य योजना को लेकर चर्चा हुई। क्रमिक तौर पर देखें तो जापान में क्योटो सम्मेलन 1997, पृथ्वी सम्मेलन 2002, इंडोनेशिया के बाली में सम्मेलन 2007, दक्षिण अफ्रीका के डरबन में 2011 और पेरू की राजधानी लीमा में वर्ष 2014 में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन हो चुके हैं। भले ही सम्मेलनों में चर्चा को लेकर विविधता रही हो पर पृथ्वी कैसे सम्भाली जाए, कैसे जलवायु परिवर्तन की परिस्थिति को संजोया जाए आदि पर एकाकीपन देखा जा सकता है। यदि जलवायु परिवर्तन पर एक सुदृढ़ वैज्ञानिक पहलू विस्तार नहीं लेता है तो इसके साइड इफेक्ट कहीं अधिक तबाही वाले सिद्ध होंगे। वर्तमान परिदृश्य में मौसम में हुए त्वरित बदलाव को देखें तो यह पृथ्वी विनाश का संकेत देती है।

तापमान में हो रही वृद्धि, कार्बन उत्सर्जन, अनियंत्रित औद्योगिक नीतियों को बढ़ावा देना, प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करना, बड़े पैमाने पर जंगलों का कटान और कई प्रकार के अवशिष्ट जलवायु परिवर्तन में अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग के चलते विश्वभर में प्रकृति का सन्तुलन बिगड़ने लगा है। इसके अपने दूरगामी प्रभाव हैं, सबसे पहले क्षेत्र विशेष की प्रजातियाँ इससे प्रभावित होती हैं। बिगड़ता प्राकृतिक सन्तुलन विश्व की वर्तमान चिन्ता है, जिसे लेकर पेरिस में हो रहा ‘क्लाइमेट चेंज समिट’ सालाना पर्यावरण महासम्मेलनों की कतार में तो 21वां होगा, परन्तु इसका महत्व इस समय सर्वाधिक इसलिए भी है, क्योंकि एक ओर सभी देशों को बताना है कि ग्लोबल वार्मिंग से बचने के लिये आने वाले वर्षों में क्या पुख्ता कदम उठाएंगे।

दूसरी ओर खून की होली खेलने वाले आतंकियों को यह संदेश भी भेजना है कि तुम्हारी नीयत कितनी भी तबाही से भरी क्यों न हो, कितनी भी ताकत से हमला क्यों न किया गया हो, पर हम पृथ्वी और यहाँ की सभ्यता को लेकर न तो कोई समझौता कर सकते हैं और न ही 30 नवंबर को पेरिस सम्मेलन को पीछे धकेल सकते हैं। जो चुनौती आतंकियों ने खड़ी की, उसे देखते हुए जलवायु परिवर्तन के इस पेरिस सम्मेलन को विश्व में एक नई पहचान मिलेगी।

140 से अधिक राष्ट्राध्यक्षों की यहाँ उपस्थिति होना इसकी महत्ता को प्रदर्शित करता है। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी इसमें शिरकत करेंगे। संयुक्त राष्ट्र महासचिव ‘बान की मून’ भी इस सम्मेलन में रहेंगे। यह बेहतर अवसर होगा कि पेरिस सम्मेलन में वर्तमान विश्व की दोनों समस्याओं पर ऐतिहासिक चर्चा के साथ निदान के बड़े कदम उठाए जाएं। आतंकवाद के प्रति न केवल एकजुटता बल्कि खात्मे की नई सोच और नई तरकीब भी विकसित कर ली जाए, साथ ही सम्मेलन के असली मर्म जलवायु परिवर्तन को लेकर वे तमाम संविदाएं भी प्रत्यक्ष हों, जिससे दुनिया का मोल बरकरार होता हो।

ईमेल- sushilksingh589@gmail.com

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