फ्लोराइड समस्या और समाज

Submitted by RuralWater on Tue, 11/24/2015 - 11:25


.पानी में फ्लोराइड की समस्या विश्वव्यापी है। दुनिया के 25 देश, जिसमें विकसित देश भी सम्मिलित हैं, के भूजल में फ्लोराइड पाया जाता है। भारत, भी इस समस्या से अछूता नहीं है। उसके 20 राज्यों के भूजल में फ्लोराइड पाया जाता है। भारत में अधिकांश पेयजल योजनाओं में भूजल का उपयोग होता है इसलिये फ्लोराइड युक्त पानी पीने के कारण लोगों की सेहत पर फ्लोराइड के कारण होने वाली बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है।

इसके अलावा, हमारे देश में गर्मी के दिनों में पानी की खपत बढ़ जाती है। खपत बढ़ने के कारण अधिक मात्रा में फ्लोराइड मानव शरीर में जाता है और अपना असर दिखाता है। अनुमान है कि पूरी दुनिया में फ्लोराइड जनित बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों की संख्या लगभग 20 करोड़ है।

एक लीटर पानी में 0.6 मिलीग्राम फ्लोराइड को दाँतों और हड्डियों की मज़बूती के लिये आवश्यक माना जाता है।

यदि किसी स्रोत के एक लीटर पानी में फ्लोराइड की मात्रा 0.6 मिलीग्राम से कम और 1.5 मिलीग्राम से अधिक हो तो वह पानी, मानवीय स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है। यह अद्भुत स्थिति है। भारतीय पेयजल मानक भी इसे मान्यता देता है।

यदि एक लीटर पानी में 1.5 मिलीग्राम से अधिक फ्लोराइड है तो उस पानी को, लम्बे समय तक पीने से दाँतों की सुरक्षा परत नष्ट हो जाती है, उनका रंग पीला या भूरा हो जाता है, उनमें गड्ढे बन जाते हैं और वे हमेशा-हमेशा के लिये बदरंग हो जाते हैं।

वयस्क व्यक्तियों की हड्डियों में स्थायी विकार पैदा हो जाता है। वे कमजोर, भुरभुरी और आड़ी-तिरछी हो जाती हैं। उनके टूटने का खतरा बढ़ जाता है। उनमें दर्द होता है। फ्लोराइड के कारण होने वाली उपर्युक्त बीमारियाँ लाइलाज हैं इसलिये उससे बचाव ही असली सुरक्षा है।

पीने के पानी के अलावा, मानव शरीर में फ्लोराइड का प्रवेश भोजन, पेय पदार्थों और फ्लोराइड वाले दंत मंजन से होता है। पानी की दैनिक खपत भी उसके असर को कम या अधिक कर सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि सामान्य व्यक्ति एक दिन में लगभग दो लीटर पानी पीता है। इस आधार पर मानव शरीर में प्रतिदिन लगभग तीन मिलीग्राम फ्लोराइड पहुँचता है। इसी आधार पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पानी में फ्लोराइड की सुरक्षित मात्रा तय की है। भारत जैसे देश जहाँ बहुत गर्मी पड़ती है, सामान्य व्यक्ति, प्रतिदिन दो लीटर से अधिक पानी पीता है।

धार में फ्लोराइडडॉक्टर भी अधिक-से-अधिक पानी पीने की सलाह देते हैं। इस आधार पर कहा जा सकता है कि प्रभावित इलाकों में पानी, पेय पदार्थों और भोजन इत्यादि के माध्यम से मानव शरीर में सुरक्षित सीमा से अधिक फ्लोराइड पहुँचता है और वही कालान्तर में बीमारी का कारण बनता है।

फ्लोराइड का भूजल में प्रवेश प्राकृतिक तथा मानवीय गतिविधियों के कारण होता है। आग्नेय तथा कायान्तरित चट्टानों में अल्प मात्रा में, ऐपेटाइट, फ्लूराइट, बायोटाइट और हार्नब्लेंड खनिज पाये जाते हैं। बरसाती पानी, उपर्युक्त खनिजों में मौजूद फ्लोराइड को घोलता है।

फ्लोराइड युक्त पानी धीरे-धीरे रिसकर भूजल भण्डारों को मिलता है। भूजल का सतत प्रवाह उसे निचले इलाकों और जलस्रोतों में पहुँचा देता है। फ्लोराइड का दूसरा प्राकृतिक स्रोत ज्वालामुखियों की राख है।

यह राख, हवा के साथ चलकर बहुत बड़े इलाके में फैल जाती है। बरसात उसे धरती पर और रिसाव उसे भूजल भण्डारों में पहुँचा देता है। यह काम कुदरत करती है। चूँकि कुदरत के काम में दखल दे पाना सरल नहीं है इस कारण फ्लोराइड के खराब असर को कम करने के लिये मानवीय गतिविधियों एवं अनुसंधानों में ही निदान खोजना होगा।

मानवीय गतिविधियों के कारण मिट्टी और भूजल में फ्लोराइड की मात्रा में बढ़ोत्तरी हो रही है। खेती में सुपर-फास्फेट, एन.पी.के. जैसे फर्टीलाइजरों के उपयोग के कारण मिट्टी और भूजल में फ्लोराइड की मात्रा लगातर बढ़ रही है।

विदित हो एक किलो सुपर-फास्फेट में 10 मिलीग्राम और एक किलोग्राम एन.पी.के. में फ्लोराइड की मात्रा 1675 मिलीग्राम तक होती है। फ्लोराइड का दूसरा प्रमुख स्रोत कोयला है। कोयले का उपयोग बिजली पैदा करने, कारखानों, चूना भट्टियों, लोहा उत्पादन जैसे सैकड़ों कामों में होता है। उसे जलाने से फ्लोराइड युक्त राख पैदा होती है जो अन्ततः वातावरण में मिल जाती है।

एक किलो कोयले की राख में फ्लोराइड की मात्रा 40 से 295 मिलीग्राम तक होती है। कालान्तर में वह वर्षाजल के साथ धरती पर और रिसकर भूजल को प्रदूषित करती है। उपर्युक्त कारणों और उचित कदमों की कमी के कारण, अनेक इलाकों के भूजल और मिट्टी में फ्लोराइड की मात्रा लगातार बढ़ रही है। इसके कारण प्रभावित इलाकों में फ्लोराइड जनित बीमारियों में वृद्धि हो रही है।

जलस्रोतों के पानी को देखकर फ्लोराइड की मौजूदगी या उसकी मात्रा का अनुमान लगाना सम्भव नहीं है। उसकी उपस्थिति को जानने के लिये कुशल रसायनशास्त्री द्वारा अत्यन्त सूक्ष्म रासायनिक जाँच करना आवश्यक होता है। यह जाँच मुख्यतः कैलारीमीट्रिक विधियों से की जाती है।

दूसरा तरीका मानवीय शरीर पर होने वाला प्रतिकूल असर है। दाँतों या हड्डियों में पनपते विकारों या असर को देखकर पानी में फ्लोराइड की मौजूदगी को समझा जा सकता है।

समाज की रुचि फ्लोराइड के बुरे प्रभाव से बचने और सरकार की ज़िम्मेदारी समाज को उसके बुरे असर से बचाने में है। इस कारण सरकार को उन विधियों या तकनीकी समाधानों के बारे में कदम उठाना होता है जिनको अपनाने से पानी और मिट्टी में फ्लोराइड की मात्रा को निरापद सीमा में लाया जा सके।

चूँकि फ्लोराइड पानी में घुलनशील है इसलिये फ्लोराइड युक्त अशुद्ध या हानिकारक पानी में साफ पानी मिलाकर उसकी मात्रा को निरापद बनाया जा सकता है। ऐसा करने के लिये प्रभावित इलाकों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इसके अलावा, ग्राउंड वाटर रीचार्ज कार्यक्रमों को बड़े पैमाने पर लिया जाना चाहिए।

कोयला द्वारा फ्लोराइडऐसा कर पानी की गुणवत्ता सुधारी जा सकती है। घरों की छत पर बरसे पानी और फ्लोराइड युक्त पानी को उचित अनुपात में मिलाकर उपयोग में लाया जा सकता है। कई बार एक ही गाँव में अलग-अलग जलस्रोतों के पानी में फ्लोराइड की मात्रा में अन्तर पाया जाता है।

ऐसी स्थिति में निरापद स्रोत का पानी काम में लेना चाहिए। इसके अलावा, भोजन की आदतों में बदलाव कर उसके कुप्रभाव से किसी हद तक बचा जा सकता है। लोगों को भोजन में कैल्शियम, आयरन, विटामिन सी और ई एवं एंटी ऑक्सीडेन्ट पदार्थों का अधिक-से-अधिक सेवन करना चाहिए।

ये पदार्थ, फ्लोराइड से रासायनिक क्रिया करते हैं इस कारण मानव शरीर पर प्रतिक्रिया के लिये बहुत कम फ्लोराइड बचता है और हानि की सम्भावना घट जाती है। विदित हो, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने उन जलस्रोतों को जिनके पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक है पर चेतावनी के बोर्ड लगाए हैं और उन्हें चिन्हित किया है।

तकनीकी या उच्च प्रौद्योगिकी विधियाँ भी फ्लोराइड के निराकरण में सक्रिय हैं इसलिये बाजार में अनेक उपकरण उपलब्ध हैं जो फ्लोराइड युक्त पानी को निरापद बनाते हैं। इन उपकरणों के निर्माण का सिद्धान्त फ्लोराइड को सतह पर एकत्रित कर, आयन-एक्सचेंज, रिवर्स-आस्मोसिस, इलेक्ट्रोलिसिस, अवक्षेपण या थक्कों में बदलकर हटाया जाता है।

इन विधियों के प्रयोग से साफ किये पानी में फ्लोराइड की मात्रा कम हो निरापद हो जाती है। इनमें से कुछ विधियों का उपयोग छोटे पैमाने पर तो कुछ का स्थानीय स्तर पर किया जा सकता है।

कुछ समय पहले तक फ्लोराइड युक्त दंत मंजन का बहुत प्रचार हो रहा था। लोग, स्थानीय जलस्रोतों के पानी में फ्लोराइड की मात्रा की अनदेखी कर, उसके उपयोग की अनुशंसा कर रहे थे। विज्ञापनों में महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों को दिखाया जाता था। अब माहौल बदल गया है।

ज्वालामुखी द्वारा फ्लोराइडसमाज और व्यवस्था द्वारा फ्लोराइड प्रभावित इलाकों में फ्लोराइड युक्त दंत मंजन के उपयोग को प्रतिबन्धित किया जाना चाहिए। चूँकि नए-नए इलाकों में फ्लोराइड की उपस्थिति दर्ज हो रही है इसलिये परिस्थितियों के अनुसार सावधानी अपनाना और उसकी निरन्तर मॉनीटरिंग आवश्यक होती जा रही है।
 

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About the author

.कृष्ण गोपाल व्यास जन्म – 1 मार्च 1940 होशंगाबाद (मध्य प्रदेश)। शिक्षा – एम.एससी.

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