रिसर्च: भारत में बाँध

Submitted by Hindi on Sat, 11/28/2015 - 11:18
Source
राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की, पाँचवी राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 19-20 नवम्बर, 2015

सारांश
जलाशय, उपलब्ध संसाधनों को उपयोगी संसाधनों में परिवर्तित करने में सहायता करते हैं। जलाशय में एकत्रित जल का उपयोग जल शक्ति उत्पादन, सिंचाई, घरेलू उपयोग, नौकायन आदि विभिन्न उपयोगों के लिये किया जा सकता है। देश के लिये यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है कि, आवश्यक जल संचयन स्थान में वृद्धि की जाए, जिससे पर्याप्त मात्रा में जल को संचयित करके उसे उपयोगी संसाधन में परिवर्तित किया जा सके। केन्द्रीय जल आयोग से उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार वर्तमान (2015) में देश में कुल निर्मित एवं निर्माणाधीन वृहत बाँधों में से लगभग 50 बाँधों की आयु 100 वर्ष से भी अधिक है।

भारत में जल हमें मुख्यतः वर्षा ऋतु के चार महीनों, जून से सितम्बर के मध्य होने वाली वर्षा से प्राप्त होता है। देश में उपलब्ध सीमित जल को वर्षा ऋतु में संचित करना एवं शुष्क ऋतुओं में इसके प्रयोग द्वारा मानव की जल आवश्यकताओं की पूर्ति करना, देश में उपलब्ध जल संसाधनों का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है वर्तमान में जल संसाधनों की उपलब्धता एवं देश की तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या के साथ-2 भविष्य में आने वाली संभावित समस्याओं को ध्यान में रखते हुए जल की बढ़ती माँगों को पूर्ण करने के लिये संचयन परियोजनाओं का निर्माण, जल संसाधन प्रबंधन के लिये नितांत आवश्यक है। सामान्यतः नदी में उपलब्ध वार्षिक प्रवाह का अधिकांश भाग वर्षा ऋतु के कुछ महीनों में ही उपलब्ध होता है। अतः यह आवश्यक है कि वर्षा ऋतु में उपलब्ध अतिरिक्त जल को एकत्रित करके इसका उपयोग उस अवस्था में किया जाये, जब नदी में उपलब्ध प्राकृतिक प्रवाह जनमानस की माँगों को पूर्ण करने में असमर्थ हो। देश के जलाशयों के लिये इष्टतम प्रचालन नीतियाँ विकसित करना आवश्यक है।

प्रस्तुत प्रपत्र में देश में संचयन जलाशयों की आवश्यकता, वृहत बाँधों की उपलब्धता लघु जलाशयों की तुलना में उनकी उपयोगिता एवं जलाशयों के इष्टतम प्रचालन से होने वाले लाभों का अध्ययन किया गया है।

Abstract
Reservoir helps to transform the available resource into utilizable- Water stored in the reservoirs can be used for hydroelectric generation irrigation, domestic use, navigation etc. Thus it is of paramount importance for India to create needed storage space so that adequate quantity of water can be stored and converted to utilizable resource- Based on available records with Central water Commission, out of total constructed and under construction dams available in the country till 2015, the age of about 50 dams is more than 100 years.

In India, most of the water receives in four rainy months between June to September. The principal function of a reservoir is regulation of natural streamflow by storing surplus water in the high flow season to control floods and releasing the stored water in the dry season to meet various demands. Considering the availability of water resources and growth in population with consequent escalation of demands for food grain production, the country needs many more dams for harnessing the water resources. Generally, the major annual discharge available in the river receives in monsoon months only therefore it is essential to store the excess water in the rainy months so that it can be used when the natural stream flow is not sufficient to meet the demand. Further, It is also essential to develop the optimum regulation policies for all the reservoirs in the country.

In the present paper, need of storage dams, availability of large dams and their comparison for importance with small dams have been discussed. In addition, gains from optimum regulation of reservoirs have also been discussed in the paper.

संचयन जलाशयों की आवश्यकता:


भारतवर्ष में संचयन परियोजनाओं की आवश्यकता के अनेकों कारण हैं। इसमें मुख्यतः जलाशय का नियमन इस प्रकार करना है जिससे नदी में अधिक प्रवाह की उपलब्धता की अवस्था में नदी में उपलब्ध अतिरिक्त जल को जलाशय में संचित करके अनुप्रवाह (down stream) क्षेत्र का बाढ़ से बचाव करना एवं इस एकत्रित जल का उपयोग शुष्क ऋतु में विभिन्न माँगों की पूर्ति हेतु करना है। नदी में वर्षा ऋतु के अतिरिक्त अन्य महीनों में वार्षिक प्रवाह की उपलब्धता में कमी एवं देश में पूरे वर्ष जल की माँग को ध्यान में रखते हुए यह आवश्यक है कि वर्षा ऋतु में उपलब्ध अतिरिक्त जल का संचयन करके इसका प्रयोग उस अवस्था में किया जाये जब नदी में उपलब्ध प्राकृतिक प्रवाह जनमानस की माँगों को पूर्ण करने में असमर्थ हो। जलाशय में एकत्रित जल को नहरों या पाइपों की सहायता से आवश्यकतानुसार दूरस्थ स्थलों तक ले जाया जाता है। जल के इस स्थानांतरण के परिणामस्वरूप जल उपलब्धता में स्थानिक परिवर्तन होते हैं। संक्षेप में, जलाशय का उद्देश्य जल की स्थानिक एवं कालिक माँगों की आपूर्ति करना है। इस प्रकार किसी विशिष्ट समय पर प्राकृतिक प्रवाह एवं माँगों की मात्रा को ध्यान में रखकर जलाशय में या तो जल का संचयन किया जाता है अन्यथा संचयित जल की आपूर्ति की जाती है।

जलाशय उपलब्ध संसाधनों को उपयोगी संसाधनों में परिवर्तित करने में सहायता करते हैं। यद्यपि देश में वृहत, मध्यम एवं लघु बाँधों के द्वारा लगभग 1400 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई संभाव्यता उपलब्ध है, तथापि देश के अधिकांश नदी बेसिनों में जल की उपलब्धता न्यूनतम है। एक उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2010 तक देश में उपलब्ध जल संसाधनों के पूर्णतः विकास के बावजूद लगभग 35% कृषि भूमि को सुनिश्चित सिंचाई प्राप्त हो पाती है। वर्तमान में पेनीनसुलर भारत में स्थित विशाल कृषि भूमि वर्षा पर पूर्णतः निर्भर है। डेल्टा क्षेत्रों के अधिकांश नदी तंत्र प्राचीन सिंचाई तंत्रों द्वारा संरक्षित किए जा रहे हैं। इन प्राचीन परियोजनाओं में से अधिकांश परियोजनाओं का पुनरुद्धार एवं आधुनिकीकरण किया जा चुका है।

संचयित जल के परिणामस्वरूप जलाशय को एक उच्च जल स्तर प्राप्त होता है, जिसका प्रयोग विद्युत शक्ति को जनित करने के लिये किया जा सकता है। जलाशय चरम अंतःप्रवाह के आधुनिकीकरण के लिये रिक्त संचयन स्थान भी प्रदान करता है। जलाशय में उपलब्ध जल स्तर, जल परिवहन, जलीय जीवों एवं मनोरंजन एवं क्रीड़ा के लिये आवश्यक ताल भी प्रदान करता है। यह क्षेत्रीय सौन्दर्य में वृद्धि, अत्यधिक वृक्षारोपण एवं वन जीवों के लिये आवास स्थल की वृद्धि में सहायता प्रदान करता है। अतः देश के लिये यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है कि जल संचयन क्षमता में वृद्धि की जाये, जिससे पर्याप्त मात्रा में जल को संचयित करके उसे उपयोगी संसाधन में परिवर्तित किया जा सके।

जलाशयों की आवश्यकता को इस तथ्य के साथ भी जाना जा सकता है कि मुंबई, पुणे, हैदराबाद, भोपाल एवं वारंगल शहरों की जल आपूर्ति वैतरणा, तांसा, भातसा, खड़कवासला, पंचेट, माजरा, कोलार, सिंगु एवं श्रीरामसागर इत्यादि जलाशयों पर निर्भर है। भाखड़ा, चंबल घाटी परियोजना, उज्जैनी, तुंगभद्रा, अलमाटी आदि अनेकों बाँध कृषि सिंचाई के लिये आवश्यक जल प्रदान कर रहे हैं तथा खाद्य सुरक्षा के लिये आवश्यक है। भाखड़ा, पोंग, श्रीशैलम एवं बालिमेला आदि बाँध अत्यधिक न्यूनतम मूल्यों पर विद्युत उत्पादन कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में स्थित सुपर शक्ति गृह जल आपूर्ति के लिये रिहंद बाँध जलाशय के जल संचयन पर पूर्णतया निर्भर है।

प्रत्येक परियोजना से लाभ एवं हानियों का स्वतंत्र एवं निष्पक्ष विश्लेषण किये बिना बाँधों के निर्माण का विरोध करना उचित नहीं है। बाँधों के निर्माण के बिना भारत जैसे देश की भौगोलिक एवं जलवायु परिस्थितियों में ऊर्जा एवं औद्योगिक क्षेत्रों के लिये जल आपूर्ति करना एवं खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना असम्भव है। जलवायु परिवर्तन के कारण देश में वर्षा की अनिमियतता में परिवर्तन होने पर जलाशयों के निर्माण से वर्षा पर हमारी निर्भरता में कमी आएगी। अतः यह उपयुक्त होगा कि हम उपलब्ध जल संसाधनों का श्रेष्ठतम उपयोग कर सकें।

भारतवर्ष में बाँध


भारतवर्ष में बाँधों का निर्माण मुख्यतः सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण, घरेलू जल आपूर्ति के लिये किया जाता है। प्रथम पंचवर्षीय योजना (1950-51) के प्रारम्भ में देश में लगभग 370 बाँध थे। इसके पश्चात देश में बाँध निर्माण में तेजी आई एवं वर्ष 1970 में देश में बाँधों की कुल संख्या 1200 तक तथा वर्ष 1990 में 3650 तक पहुँच गई थी। देश की अर्थव्यवस्था के विकास में कमी, सामाजिक, आर्थिक एवं अन्य कारणों से वर्ष 1990 के पश्चात बाँध निर्माण कार्य में क्रमशः कमी आई है। वर्ष 1990 से 2015 के मध्य देश में लगभग 1000 बाँधों का निर्माण ही सम्भव हो सका है। केन्द्रीय जल आयोग से उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार वर्तमान में देश में कुल निर्मित वृहत बाँधों की संख्या 4857 एवं निर्माणाधीन वृहत बाँधों की संख्या 314 है। इसके अतिरिक्त वर्ष 2003 तक के उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार देश में बाँधों के अतिरिक्त उपलब्ध बैराजों की संख्या लगभग 250 है। भारत में आयु के आधार पर राज्यवार वृहत बाँधों के वितरण को सारणी 1 में दर्शाया गया है।

प्रतिशत के आधार पर बाँधों की संख्या पर दृष्टिपात करने पर ज्ञात होता है की इस श्रेणी में प्रथम स्थान महाराष्ट्र का है जहाँ केन्द्रीय जल आयोग द्वारा वर्ष 2015 के आँकड़ों के अनुसार निर्मित वृहत बाँधों की संख्या 1693 (34.857%) एवं निर्माणाधीन वृहत बाँधों की संख्या लगभग 152 है। इस श्रेणी में मध्यप्रदेश द्वितीय स्थान पर आता है जहाँ निर्मित एवं निर्माणाधीन वृहत बाँधों की संख्या क्रमशः 898 (18.489%) एवं 8 है।

चित्र 1 में बाँधों की आयु को दर्शाया गया है जो दर्शाता है कि हमारे बाँध पुराने हो रहे हैं। लगभग 50 बाँधों की आयु 100 वर्ष से भी अधिक है। आयु बढ़ने के साथ इन बाँधों में से कुछ के पुनर्निर्माण की आवश्यकता होगी अन्यथा अवसंरचना के रखाव में समय के साथ वृद्धि होगी। बाँधों का पुनर्निर्माण एक कठिन कार्य होने के कारण यह ज्ञात करने की आवश्यकता है कि उपलब्ध अवसंरचना का अधिक समय तक कैसे उपयोग किया जा सकता है।

सारणी-2 में देश में निर्मित, निर्माणाधीन एवं प्रस्तावित विभिन्न नदी बेसिन परियोजनाओं के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान की गई है। सारणी 2 से स्पष्ट है कि गंगा बेसिन से प्राप्त उपयोगी संचयन क्षमता सर्वाधिक है। वास्तव में यह क्षमता सहायक नदियों पर निर्मित बाँधों से प्राप्त होती है क्योंकि मुख्य नदी पर वर्तमान में निर्मित टिहरी बाँध के अतिरिक्त पूर्णतः निर्मित जल अन्य जल संचयन परियोजना नहीं है। गंगा नदी के बाद कृष्णा नदी की संचयन क्षमता दूसरे स्थान पर है।

भारत के विभिन्न राज्यों में विचाराधीन परियोजनाओं एवं चयनित संचयन क्षमता पर दृष्टि डालने पर यह ज्ञात होता है कि देश में जनित कुल संचयन क्षमता (लगभग 250 वर्ग किलोमीटर) का लगभग 14% आंध्र प्रदेश में, 12.7% महाराष्ट्र में एवं 16% मध्य प्रदेश में उपलब्ध है।

देश में एक बड़ी संख्या में टैंक उपलब्ध हैं जिनमें संचित जल का प्रयोग सामाजिक आवश्यकताओं एवं सिंचाई उपयोगों के लिये किया जाता है। तुलनात्मक दृष्टि से दक्षिण भारत में उपलब्ध टैंकों की संख्या देश के अन्य भागों की तुलना में सर्वाधिक है। सारणी-3 में देश के विभिन्न राज्यों में वृहत, माध्यम एवं कुल संचयन टैंकों को दर्शाया गया है। अध्ययन से यह ज्ञात होता है, की टैंकों की उपलब्धता तमिलनाडु में सर्वाधिक है जबकि कर्नाटक द्वितीय स्थान पर आता है।

आयु के आधार पर राज्यवार वृहत्त का वितरण भारत में निर्मित बाँधों में से 92% का उपयोग मुख्यतः सिंचाई उपयोगों के लिये, 2.2% का उपयोग मुख्यतः जलविद्युत उपयोगों के लिये, तथा 1% से कम का उपयोग मुख्यतः घरेलू जल आपूर्ति के लिये किया जाता है। 35% से कम संख्या में उपलब्ध जलाशयों का उपयोग बहुउद्देशीय प्रायोजनों जैसे सिंचाई, जलविद्युत एवं घरेलू जल आपूर्ति के लिये किया जाता है। बाँध की ऊँचाई के परिप्रेक्ष्य में यदि देखा जाये तो देश में उपलब्ध बाँधों में से 20 बाँधों की ऊँचाई 100 मीटर या उससे अधिक है। देश में उपलब्ध 34 जलाशयों की उपयोगी क्षमता 1 बी.सी.एम. से अधिक है।

चित्र 2 में भारत के जलाशयों में प्रति व्यक्ति संचयन का अन्य देशों के साथ तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। अध्ययन के परिणाम दर्शाते हैं कि भारत वर्ष के जलाशयों में जल संचयन स्थल अन्य देशों के जलाशयों की तुलना में बहुत कम है। भारत के निर्मित एवं निर्माणाधीन परियोजनाओं के अन्तर्गत कुल संचयन स्थल संभावी स्थल का लगभग 50% है। विभिन्न पर्यावरणीय आपत्तियों एवं अन्य कारणों के कारण देश में 400 घन किलोमीटर तक प्रस्तावित संचयन स्थल की उपलब्धता भी संदेहास्पद है।

लघु एवं वृहत बाँधों की तुलना


बाँधों के सम्बन्ध में यह एक विचारणीय प्रश्न है कि छोटे बाँध एवं वृहत बाँधों में से कौन से बाँध अधिक उपयुक्त हैं। जैसा की सर्वविदित है कि जल को भू-जलदायकों, मृदा क्षेत्र एवं सतही जलाशयों में एकत्रित किया जा सकता है। मृदा क्षेत्र में एकत्रित किया गया जल कृषि के लिये महत्त्वपूर्ण होता है, परन्तु मृदा स्तर में सीमित जल की मात्रा को लघु अवधि के लिये एकत्रित किया जा सकता है। अतः जल को मुख्यतः भू-जलदायकों, एवं सतही जलाशयों में ही संचयित करना सम्भव है। भूजल, लघु एवं वृहत जलाशयों से लाभ, उनकी सीमाएँ एवं मुख्य विषयों का तुलनात्मक अध्ययन सारणी-4 में किया गया है।

भारत वर्ष में वृहत बाँधों के सम्बन्ध में यह तर्क दिया जाता है की वृहत बाँधों का जलमग्न क्षेत्र लघु जलाशयों की तुलना में बहुत अधिक होता है। वास्तव में कोई भी बाँध, बड़ा हो या छोटा, उसके निर्माण के लिये एक उपयुक्त स्थल की आवश्यकता होती है। यदि एक वृहत बाँध के स्थान पर कई छोटे-छोटे बाँध बनाए जाये तो उनके लिये एक ही नदी पर अनेकों उपयुक्त स्थलों की आवश्यकता होगी। इसके अतिरिक्त नदी के अनुप्रवाह के भागों में समतल भूमि होने के कारण बाँध के निर्माण में अधिक क्षेत्र जलमग्न होगा तथा अधिक जनसंख्या का विस्थापन करना पड़ेगा। जिसके कारण यह उपयुक्त होगा कि वृहत बाँध बनाकर अधिक लाभ प्राप्त किए जा सकें।

भारत के नदी बेसिनों पर संचयन परियोजनाएं
भारत के जलाशों में प्रति व्यक्ति संचयन का अन्य देशों के साथ तुलनात्मक अध्ययन
यद्यपि जलमग्न क्षेत्र का सामाजिक एवं पर्यावरणीय समस्याओं के साथ सीधा सम्बन्ध नहीं है, तथापि इस दृष्टि से भी अधिक संख्या में लघु जलाशय स्वीकार्य नहीं हैं। अर्थशास्त्री भी अधिक संख्या में लघु जलाशय स्थलों के स्थापन, अधिक स्पिल्वे, जल मार्ग परिवर्तन, एवं बर्हिप्रवाह कार्यों का समर्थन नहीं कर सकते। वृहत जलाशय में अवसादन हानियाँ भी लघु जलाशयों की अपेक्षा कम होंगी। अमेरिका के कृषि विभाग के अनुसंधान के अनुसार 10 एकड़ फीट से छोटे जलाशयों में अवसाद दर लगभग 3.5% प्रतिवर्ष, 100 एकड़ फीट से छोटे जलाशयों में अवसाद दर लगभग 2.7% प्रतिवर्ष एवं 10 लाख एकड़ फीट से छोटे जलाशयों में अवसाद दर लगभग 0.16% प्रतिवर्ष पाई गई है। इस अनुसंधान के परिणाम लघु जलाशयों के विपरीत एवं वृहत जलाशयों के पक्ष में एक शक्तिशाली तर्क है।

किसी विशाल जलाशय के विनियमन की श्रेणी एवं विश्वसनीयता किसी लघु जलाशय से प्राप्त होना सम्भव नहीं है। छोटे जलाशयों का सतही क्षेत्रफल अधिक होने के कारण सूखे की अवस्था में इन जलाशयों का जल तीव्रता से सूख जाता है। इस अवस्था में वृहत एवं मध्यम बाँध जल आपूर्ति को पूर्ण करने में सक्षम होते हैं। सूखा प्रभावित एवं शुष्क क्षेत्रों में बाँध परियोजना की योजना बनाते समय इन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है, कि बाँध निर्माण के समय बड़े या छोटे बाँध के विवाद पर ध्यान देने के स्थान पर बाँध के इष्टतम आकार पर ध्यान देना आवश्यक है ।

जलाशय प्रचालन


जलाशय में जल संचयन के पश्चात, जलाशय की क्षमता के आधार पर उससे अधिकतम इष्टतम लाभ प्राप्त किया जाना महत्त्वपूर्ण है। जलाशय में वृहत मूल्यों पर एकत्रित जल एक बहुमूल्य संसाधन है तथा यह आवश्यक है कि इसका इष्टतम उपयोग किया जाए। भारत वर्ष के अधिकांश जलाशयों में जलाशय प्रचालन हेतु वैज्ञानिक पद्धतियाँ उपलब्ध नहीं हैं। यह आवश्यक है कि देश के सभी महत्त्वपूर्ण जलाशयों के लिये इष्टतम प्रचालन पद्धतियाँ विकसित की जाएँ।

जलाशय प्रचालन से सम्बन्धित द्वितीय विषय है कि जिन बाँधों के लिये प्रचालन मैनुअली किया जाता है, वे दीर्घावधी पूर्व तैयार किए गए थे। समय के साथ होने वाले परिवर्तनों, जैसे प्रतिप्रवाह उपयोग, बाँध के उद्देश्य में परिवर्तन, जल माँगों में परिवर्तन आदि कारणों से, पूर्व में तैयार किए गए मैनुअलों की सहायता से वर्तमान में बाँधों का प्रचालन इष्टतम नहीं है। इसके अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन एवं अन्य कारणों से बेसिन के जलविज्ञान में भी परिवर्तन सम्भव है। अतः यह आवश्यक है कि जलाशयों की प्रचालन पद्धतियों का एक निश्चित अन्तराल पर पुनरीक्षण कराया जाए।

नदियों में बाढ़ से होने वाली हानियों को कम करने हेतु बाढ़ प्रबंधन हेतु जलाशयों का प्रचालन अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में जल को बाँध के प्रतिप्रवाह में निर्मित जलाशयों में एकत्रित किया जाता है। जिसकी लागत बहुत अधिक होती है। इस बहूमूल्य संसाधन को बिना उपयोग के तब तक व्यर्थ में नष्ट नहीं किया जाना चाहिए, जब तक जलाशय के पुनः पूरण की श्रेष्ठ सम्भावनाएँ न हों।

भूजल, लघु एवं वृहत जलाशयों से लाभ, उनकी सीमाएँ एवं मुख्य समस्याएँ का तुलनात्मक
दूसरी ओर भारत के अधिकांश जलाशयों के स्पिल्वे द्वारा पूर्ण जलाशय स्तर (FRL) पर विचारणीय निस्सरण क्षमता पाई जाती है। यह क्षमता 100 वर्ष की वापसी अवधि बाढ़ से सम्भावी अधिकतम बाढ़ के मध्य होती है तथा इसका मान जलाशय के पूर्ण जलाशय स्तर (FRL) एवं अधिकतम जलाशय स्तर (MWL) के मध्य उपलब्ध संचयन क्षमता पर निर्भर होता है। अतः स्पिल्वे द्वारों के प्रचालन में मानवीय त्रुटि जलाशय के अनुप्रवाह के क्षेत्रों में अत्यधिक बाढ़ का कारण हो सकती है।

उपरोक्त दोनों स्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह आवश्यक है कि जलाशय के स्पिल्वे द्वारों का इष्टतम प्रचालन किया जाये, जिसके लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि जलाशय के प्रतिप्रवाह क्षेत्रों से जलाशय में आने वाली बाढ़ की जानकारी पर्याप्त समय पूर्व उपलब्ध हो।

बाढ़ को नियन्त्रित करने की विभिन्न विधियों में प्रमुख है कि बाढ़ के अतिरिक्त जल को बाँध से निर्मित जालाशय में संचयित कर लिया जाये। उदाहरण के लिये महानदी पर निर्मित हीराकुंड बाँध ने महानदी डेल्टा की जल समस्याओं को पूर्णतः समाप्त कर वहाँ की भूमि को उपजाऊ बना दिया है। इसी प्रकार दामोदर बेसिन में निर्मित बाँधों की श्रृंखला का मुख्य उद्देश्य बाढ़ नियन्त्रण था तथा इन बाँधों के निर्माण से दामोदर बेसिन की बाढ़ समस्याएँ लगभग समाप्त हो गई हैं। पंजाब में सतलुज नदी पर निर्मित भाखड़ा बाँध एवं गुजरात में साबरमती नदी पर निर्मित उकाई बाँध, बाढ़ प्रबंधन के अद्वितीय उदाहरण हैं।

बाँधों के निर्माण में प्रमुख समस्याएँ


किसी वृहत बहुद्देशीय परियोजना के निर्माण में लगभग 10-12 वर्ष के समय की आवश्यकता होती है। इसके साथ-साथ इन परियोजनाओं के निर्माण में बहुत अधिक धन की भी आवश्यकता होती है। नवीन जल संसाधन परियोजनाओं का निर्माण समय के साथ-साथ कठिन होता जा रहा है। भविष्य में जल संसाधनों का विकास अधिक जटिल एवं महँगा होगा। इसके अतिरिक्त जल संसाधन परियोजनाओं के निर्माण में अनेकों बाधाओं का सामना भी करना पड़ता है। जल संसाधन परियोजनाओं के निर्माण में लगने वाले अत्यधिक समय, धन एवं अन्य समस्याओं के प्रमुख कारण निम्न हैं।

1. जलाशय अभिकल्पन हेतु आवश्यक वर्षा, निस्सरण, इत्यादि आंकड़े पर्याप्त रूप में उपलब्ध न होने के कारण परियोजना के उपयुक्त अभिकल्पन में समस्या का सामना करना पड़ता है।

2. अधिकांश भारतीय नदियाँ अन्तरराज्यीय हैं। इन नदियों पर परियोजना के निर्माण में सम्बन्धित राज्यों के मध्य मतभेद पाये जाते हैं जिसके परिणाम स्वरूप परियोजना निर्माण में विलम्ब होता है। केन्द्र सरकार को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर सम्बन्धित राज्यों में समन्वयन स्थापित करने की आवश्यकता होगी।

3. देश की अधिकांश उत्तर भारतीय नदियाँ अन्तरराष्ट्रीय हैं अतः इन नदियों पर परियोजना के निर्माण हेतु पड़ोसी राज्यों की सहमति आवश्यक है। पड़ोसी राज्यों विशेष रूप से चीन एवं पाकिस्तान के साथ समन्वय स्थापित करना एक प्रमुख समस्या है।

4. जलाशय निर्माण के कारण डूब क्षेत्र में आने वाले वनों एवं पर्यावरण के साथ-साथ क्षेत्र में निवास करने वाले जनमानस का विस्थापन एवं पुनर्वास एक प्रमुख समस्या है जिसमें बहुत अधिक समय एवं धन की आवश्यकता होगी।

5. परियोजना हेतु धन के आवंटन में कमी के कारण परियोजना निर्माण में समस्या का सामना करना पड़ता है। साथ ही साथ विभिन्न अप्रत्याशित कारणों से परियोजना निर्माण में होने वाले विलम्ब के कारण परियोजना की लागत में वृद्धि हो जाती है जिसके परिणाम स्वरूप समस्या का सामना करना पड़ता है।

6. नदी के साथ बहकर आने वाले अवसाद के जलाशय में एकत्रित होने के कारण जलाशय की जल संचयन क्षमता में धीरे-धीरे कमी होती जाती है तथा एक अवधि के बाद जलाशय उपयुक्त सेवा प्रदान करने में पूर्णतः अयोग्य हो जाता है।

निष्कर्ष


संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि बाँधों का निर्माण जल संसाधन विकास के लिये अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। बढ़ती जनसंख्या तथा औद्योगिक विकास के कारण देश में घरेलू उपयोगों, खाद्यान्न उपलब्धता आदि के कारण जल की माँग में निरन्तर वृद्धि हो रही है। यद्यपि हमारे देश में उपलब्ध जल संसाधन पर्याप्त हैं, परन्तु प्रस्तुत प्रपत्र में वर्णित विभिन्न समस्याओं के परिणामस्वरूप हम उपलब्ध जल संसाधनों का पूर्णतः उपयोग करने में सक्षम नहीं हैं। इन समस्याओं के समाधान हेतु उपयुक्त समाधान की आवश्यकता है। साथ ही यह आवश्यक है कि अलग-अलग जल संसाधन परियोजना के विकास में आने वाली समस्या भिन्न हो, जिसके लिये समस्या को ध्यान में रखकर ही उसका समाधान किया जा सकता है। यह भी सम्भव है कि किसी एक समस्या के लिये बहु-समाधान उपलब्ध हों। अतः यह आवश्यक है कि समस्या को ध्यान में रखकर श्रेष्ठतम समाधान का चयन किया जाये।

परियोजना की योजना बनाते समय उपलब्ध समस्त विकल्पों पर ध्यान देना चाहिए तथा समस्त विकल्प खुले रखने चाहिए, जिससे किसी एक विकल्प के कारण आने वाली समस्या का समाधान अन्य विकल्प द्वारा किया जा सके। जल संसाधनों के विकास की परियोजनाओं की योजना बनाते समय अन्य देशों के अनुभवों को भी ध्यान में रखना चाहिए। यह सम्भव है कि अन्य राज्यों में जल संसाधनों की स्थिति हमारे देश से भिन्न हो, अतः उनके अनुभवों का उपयोग करते समय अपने देश की स्थिति एवं अन्य देशों की स्थिति का परस्पर तुलनात्मक अध्ययन किया जाना आवश्यक है।

प्रस्तुत अध्ययन से यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि उपलब्ध जल संसाधनों का अविरत विकास देश की उन्नति के लिये अत्यधिक आवश्यक है। यह अत्यन्त आवश्यक है कि हम उपलब्ध जल संसाधनों का इष्टतम प्रयोग कर सकें जिसके लिये हमें बाँधों का निर्माण कर उपलब्ध जल संचयन क्षमता में वृद्धि करनी होगी।

सन्दर्भ


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