टिहरी-शूल से व्यथित थे भवानी भाई

Submitted by Hindi on Sat, 11/28/2015 - 15:52
Source
‘एक थी टिहरी’ पुस्तक से साभार, युगवाणी प्रेस, देहरादून 2010

राज्य माँगू नहीं स्वर्ग माँगू नहीं
मुक्ति की नींद में क्या मजा है
दीन के दुःख और भय मिटाया करुँ
दीनबन्धु यही वर मुझे दो।


भवानी भाई का कहना था कि अस्पताल में मुझे कोई समस्या नहीं है। यहाँ टिहरी के लोग समाचार पढ़कर मुझे मिलने आ रहे हैं। मेरा इलाज टिहरी से आए परिचित डॉक्टर ही कर रहे हैं। चेहरे से वे अस्वस्थ नहीं दिखाई पड़ते थे पर शायद उन्हें वर्षों पुरानी बीमारी के अलावा नई बीमारी हो गई थी। जिसका नाम ‘टिहरी शूल’ कह सकते हैं। ऋषिकेश में उन्हें टिहरी की निकटता का अहसास होता था। इसलिए वे देहरादून नहीं जाना चाहते थे।

दीन बन्धु से दीन के दुःख और भय मिटाने का वरदान माँगने वाला सुदर्शन युवक भवानी भाई था। उनके द्वारा यह भजन ठक्कर बापा छात्रावास की सायंकालीन प्रार्थना के बाद सुनाया जाता था। भवानी भाई उस छात्रावास के अधीक्षक थे। उन्हें तरासते समय विधाता जल्दबाजी में नहीं रहे होंगे। तभी तो उनका एक-एक अंग तरास-तरास कर सुडौल, सुकोमल और सुदर्शनीय बना दिया था। उक्त भजन उनका पसंदीदा भजन था।

ठक्कर बापा छात्रावास टिहरी में सामाजिक गतिविधियों का केन्द्र था। निर्धन, दलित और सामाजिक सरोकारों से मतलब रखने वाले छात्र इस छात्रावास में निवास करते थे। अस्पृश्यता निवारण और दलित जागरण इस छात्रावास का मुख्य उद्देश्य था। गाँधी जन्म शताब्दी वर्ष 1969 में पूरे देश में गाँधी जी के अनुयाइयों द्वारा मद्यनिषेध कार्यक्रम चलाये गये थे। टिहरी में भी गाँधी-विनोबा के अनुयायी सुन्दरलाल बहुगुणा और भवानी भाई ने मद्यनिषेध आन्दोलन चलाया। इससे पहले भवानी भाई विनोबा जी की पदयात्राओं और भूदान ग्रामदान आन्दोलन में सक्रिय रहे थे। टिहरी, उत्तरकाशी के सर्वोदय सेवकों ने भूदान आन्दोलन चलाकर जनपद उत्तरकाशी को जिला दान की श्रेणी दिलवाई थी। भवानी भाई रवांई और फतेपर्वत के अनुभव बड़े चाव से सुनाया करते थे।

मैं और कुंवर प्रसून उनके साथ मद्यनिषेध आन्दोलन में जुड़ गये थे। ग्राम सम्पर्क में अक्सर मैं भवानी भाई के साथ जाया करता था। हम लोगों को आठ गाँव अठुर में जन जागरण करने की जिम्मेदारी थी। अठुर के एक गाँव में एक वृद्ध महिला ने हमें भोजन कराया। गाँवों में चाय-पान की बात तो सभी करते थे पर भोजन को कोई नहीं पूछता था। वृद्ध महिला ने भोजन तो कराया पर आंगन की मुंडेर पर। जबकि मेहमान कक्ष, बरामदा, रसोई घर खाली पड़े थे। मेरे लिये यह नया अनुभव था। मैंने भवानी भाई से उस महिला के व्यवहार से नाखुशी जताई और यह भी कहा कि यदि पहले से पता होता कि हमें घर के अन्दर नहीं बुलाया जायेगा तो हम खाने से ही इनकार कर देते। भाई जी ने मुझे समझाया कि हम भूखे प्यासे घूम रहे हैं, पर किसी को हमें भोजन कराने की सुधि नहीं आयी। वह वृद्धा भावनाशील महिला है। यदि हम इनकार करते तो उसकी भावनायें आहत होतीं। यह भी सम्भव होता कि हमारे व्यवहार के कारण आन्दोलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता। मैं भवानी भाई की दूर दृष्टि का कायल हुआ। वह वास्तव में संत प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। तब मैं मन ही मन सोचता रहा कि संवर्णों को जन्म से जो चीजें स्वतः मिली हुई हैं। दलित वर्ग को उनसे वंचित रहने का संवर्णों को अहसास तक नहीं होता।

संवर्ण रसोइया से आर्थिक और राजनीतिक हैसियत में कहीं आगे अनुसूचित जाति का बालक चन्द्र सिंह जब प्रताप इण्टर कॉलेज के छात्रावास में रसोइये से अपमानित होता है तो वह उससे भिड़ जाता है और उसे उसकी हैसियत का अहसास कराता है। इस घटना ने उक्त बालक को आगे चलकर चन्द्र सिंह आई.ए.एस. बना दिया। यही चन्द्र सिंह उत्तर प्रदेश एवं उत्तरांचल में जिलाधिकारी और विभिन्न विभागों में सचिव भी रहे। सवर्ण जाति के दुर्व्यवहार ने चन्द्र सिंह जी के मन में आगे बढ़ने का जज्बा भरा। इधर भवानी भाई संवर्णों को सीधे-सरल और भोला-भाला मानते थे। उनका कहना था कि सवर्णों के मन में अस्पृश्यों के प्रति कोई द्वेष-भाव नहीं होता। बस वे तो सदियों से चली आ रही परिपाटी का पालन करते हैं। उसे तोड़ नहीं सकते। बेचारे संत भवानी भाई।

अठुर सम्पर्क के दौरान हमें एक शराबी मिला। उसने जेब से बोतल निकाल कर हमें दिखाई और कहा, ‘यह मेरा प्राण है, मैं इसके बिना नहीं रह सकता’। मैं उससे बोतल छीनकर उसके सिर या पत्थर पर फोड़ने की सोच ही रहा था कि भवानी भाई ने मुझे रोक दिया और शराबी को जाने दिया। भवानी भाई ने मुझे समझाया कि वह व्यक्ति शराब के बिना वास्तव में नहीं जी सकता। शराब न पीने पर वह काँपने लगता है और हाँपने लगता है। शराब न मिलने पर वह मर सकता है। उसने विश्वास के साथ अपनी मजबूरी हमें बता दी। वह हमारे आन्दोलन का विरोधी नहीं समर्थक है। बात मैं पूरी तरह नहीं समझा पर शिष्टाचार वश चुप रहा। यह बात मेरी समझ में वर्षों बाद तब आई जब कफोलगाँव के रामचन्द्र ने रुआंसा होकर कहा कि बेटा तुम दारू भगाने का काम कर रहे हो पर मैं तो अब इसका गुलाम हो चुका हूँ, चाहते हुए भी नहीं छोड़ सकता। वास्कट की अन्दर वाली जेब से पौआ निकाल कर उसने कहा कि इस ‘प्राण’ को मैंने जेब में ही रखा हुआ है। कुछ दिन बाद वह पीपल डांग में हाँफते-काँपते हुए चल बसा। इस समय उसके पास ‘प्राण’ नहीं था।

टिहरी में मद्यनिषेध चाहने वाले आन्दोलनकारियों की धरपकड़ होने लगी पर भवानी भाई और घनश्याम शैलानी ने पुलिस को नाकों चने चबवा दिए और अन्त में नाटकीय ढंग से गिरफ्तारी दे दी। भवानी भाई मद्यनिषेध आन्दोलन के ‘हीरो’ बन गये थे। चीख-चीख कर नारे लगाने और क्षमता से अधिक भाग-दौड़ करने के कारण भवानी भाई बीमार पड़ गये। डॉक्टरों ने शक्तिशाली एैलोपैथिक दवा उन्हें दी जिसका विपरीत असर पड़ा। बाद में भवानी भाई ने पट्टी कल्याणा (हरियाणा) में प्राकृतिक चिकित्सा करवाई। एक बार शरीर कमजोर हुआ तो कमजोर होता ही चला गया। उनके मुख-मण्डल की लालिमा और मुस्कान को देख कर लगता था कि वे अस्वस्थ नहीं हैं। इसके बाद वे चिपको आन्दोलन, टिहरी बाँध विरोधी जैसे जन-आन्दोलनों में पहले जैसी चुस्ती और फुर्ती के साथ भागीदारी नहीं कर सके।

भवानी भाई न्यायालय और चिकित्सालय परिसरों में नियमित जाया करते थे। चिकित्सालयों में वे मरीजों तथा जरूरतमंद मरीजों की सेवा किया करते थे और साथ में जरूरतमन्द मरीजों की जन-धन से सहायता भी करते थे। वादी प्रतिवादी पक्षों में सुलह कराने का प्रयास भी करते थे। उत्तर-प्रदेश न्यायिक प्राधिकरण में वे सदस्य थे और उच्च न्यायालय द्वारा आहूत बैठकों में लखनऊ जाया करते थे। सायंकाल को वे जन सम्पर्क में निकल पड़ते थे। घण्टाघर में ही इनसे कुछ ही दूरी पर राजनीतिक कार्यकर्ता सरदार प्रेम सिंह रहा करते थे। दोनों में एक समानता अवश्य थी कि दोनों कुंवारे थे। सरदार प्रेम सिंह भी शाम को जन सम्पर्क में निकलते पर भवानी भाई के विपरीत खट-खट घोड़े की चाल चलते हुए आगे निकल पड़ते और परिचितों के आवाज देने पर ही रुकते थे। टिहरी शहर में भवानी के नाम से एक रंग प्रचलित हो गया था। वह रंग गुलाबी, मेहरून, लाल रंग से मिलता जुलता था। वह उसी रंग के कपड़े पहना करते थे। वह रंग उनके चेहरे के रंग से मेल खाता था।

भवानी का रक्त सम्बन्धों वाला एक परिवार था, पर वे इस परिवार को अधिक महत्व नहीं देते थे। कहते थे कि मेरा तो विचारों का परिवार है। जो बड़ा है। बड़ा परिवार छोड़कर मैं क्यों छोटा बनूँ। विवाह के प्रति भवानी भाई उदासीन रहे। निजी परिवार की भाँति वैचारिक परिवार के किसी भी सदस्य ने उन पर शादी के लिये दबाव नहीं डाला। भवानी भाई ने स्वयं का विवाह नहीं किया पर वे युवक-युवतियों का विवाह आयोजित किया करते थे।

एक बार अपनी माँ से मिलने वे अपनी गाँव देवल, पट्टी ओण गये। वहाँ उनका एक भाई परिवार सहित गाँव में ही रहता था। खाना खाते समय बड़े भाई ने कहा ‘देख भवानी हमने सुना है कि तू दारू का बड़ा नेता बन गया है पर हम तो दारू इस प्रकार पीते हैं’। यह कहते हुए भाई ने बोतल थाली पर उड़ेली और पी गया। भवानी भाई एक धीमी मुस्कान भर कर रह गये। इस घटना के बाद भवानी भाई जब कभी गाँव जाते थे, ओणेश्वर महादेव के मन्दिर में ही टिकते थे। वे कभी अपने भाई के घर नहीं गये। गाँव अथवा घर के व्यक्ति उन्हें मिलने मन्दिर में आते थे।

उन्होंने प्रधानाचार्य विद्यादत्त रतूड़ी के साथ मिलकर कन्या बिक्रय और बलि प्रथा का उन्मूलन कराया। उनके गृह क्षेत्र लम्बगाँव प्रताप नगर में ठेकेदारों की संख्या पहले से ही अधिक रही है। ठेकेदार लोग धन के मद में चूर होकर अधिक से अधिक धन दे कर वधु को खरीदते थे। तब वधुओं के उपनाम ‘हजारी बांद’, ‘द्वी हजारी बांद’, ‘दस हजारी बांद’ जैसे नाम पड़ जाते थे। दूसरी तरफ गरीब लोग पैसे के अभाव में विवाह नहीं कर सकते थे और उनके पुत्र कुंवारे रहने के लिये अभिशप्त हो जाते थे। भवानी भाई और रतूड़ी जी ने पुत्री के बदले लिये गये धन को कन्या पक्ष से वापस कराने में अनेक बार सफलता पाई। इस प्रथा का अन्त करने में इन लोगों का बड़ा हाथ है। चैत्र माह में निर्धन-दलित वर्ग के लोग गाँव-गाँव, घर-घर जाकर अपने परिवार की महिलाओं को नचाया करते थे और अपने नृत्य गायन और वादन से सम्पन्न संवर्णों को खुश कर बड़ा से बड़ा इनाम प्राप्त करने की कोशिश करते थे। अन्य लोग भी इन्हें सामर्थ्यानुसार अन्न-धन दे दिया करते थे। यह अभियान केवल चैत्र माह में ही सम्पन्न होता था।

भवानी भाई ने महिलाओं के नाचने की इस प्रथा का विरोध किया। उन्होंने निर्धन दलित वर्ग को भी जागरुक किया। उनके प्रयास से इस कुप्रथा का अन्त हुआ। घर-घर जाकर वादन का कार्य कुछ लोग अब भी करते हैं। पर महिलाओं का नृत्य-गायन करना समाप्त हो गया है। कन्या विक्रय प्रथा और चैत्र-नृत्य की प्रथा दोनों ही महिलाओं के लिये अपमान-जनक प्रथायें थीं। इनमें महिलाओं को निजी सम्पत्ति समझा जाता था। भवानी भाई ने देवताओं को दी जाने वाली पशु बलि प्रथा का भी अंत करवाया। कहीं-कहीं तो वे अड़ जाते थे कि तुम्हारा देवता बलि के बिना नहीं मानता तो तुम मेरी बलि दे दो।

भवानी भाई के द्वारा महिला जागरण का काम सतत चलता रहता था। कस्तूरबा गाँधी के जन्म माह फरवरी में वे महिला जागरण का कार्यक्रम विशेष रूप से आयोजित किया करते थे। लम्बगाँव-प्रतापनगर क्षेत्र में भवानी भाई विद्यादत्त रतूड़ी की जोड़ी मिलकर इन सभी कार्यों को अंजाम देती थी। ठक्कर बापा छात्रावास में भवानी भाई ने कमरों के अन्दर कृत्रिम कमरे बना कर आखिरी छोर पर अपने लिये एक मांद तैयार की थी। जब टिहरी शहर के भवन खण्डहर बना दिये गये। यहाँ तक कि राजमहल को भी नहीं बख्शा गया। तब भवानी भाई अपने छात्रावास को कब तक बचा पाते। छात्रावास भवन के खण्डहर होते ही भवानी भाई अन्तर्ध्यान हो गये। कुछ लोगों ने उन्हें खण्डहरों में खोजा पर वे एक पहेली बन गये। टिहरीवासी के नाम पर नई टिहरी में बाहर के लोग बसे पर भवानी भाई को वहाँ शरण नहीं मिली। वे सच्चे अर्थों में विस्थापित हो चुके थे। उनके विचारों का परिवार बिखर गया था। तब उन्हें रक्त सम्बन्धों के परिवार की शरण लेनी पड़ी। उनके मित्रों और परिचितों ने 60 वर्षों की आयु में उनका अभिनंदन किया और उन्हें एक थैली भेंट की। अखबारों में खबर छपी कि भवानी भाई अस्वस्थ हैं और ऋषिकेश के सरकारी अस्पताल में भर्ती हैं। टिहरी डूबने के बाद कौन कहाँ है और क्या कर रहा है पता ही नहीं चलता था। भवानी भाई का भी यही हाल था। खबर पढ़ने के बाद मैं भवानी भाई से मिला। उन्होंने बताया कि वे अपने बड़े भाई के पौत्र चन्द्रमोहन के साथ रहते हैं, जहाँ मेरे कारण उन्हें परेशानी हो सकती है। उन्होंने मुझसे 3 हजार प्रतिमाह का प्रबन्ध करने के लिये कहा।

भवानी भाई का कहना था कि अस्पताल में मुझे कोई समस्या नहीं है। यहाँ टिहरी के लोग समाचार पढ़कर मुझे मिलने आ रहे हैं। मेरा इलाज टिहरी से आए परिचित डॉक्टर ही कर रहे हैं। चेहरे से वे अस्वस्थ नहीं दिखाई पड़ते थे पर शायद उन्हें वर्षों पुरानी बीमारी के अलावा नई बीमारी हो गई थी। जिसका नाम ‘टिहरी शूल’ कह सकते हैं। ऋषिकेश में उन्हें टिहरी की निकटता का अहसास होता था। इसलिए वे देहरादून नहीं जाना चाहते थे। उन्होंने सुन्दरलाल बहुगुणा से आग्रह किया था कि डॉक्टरों से कहें मुझे यहीं रहने दें देहरादून न भेजें। कुछ दिनों बाद खबर आई कि भवानी भाई मुक्ति की नींद सो गये हैं। डॉक्टर उनकी ‘टिहरी शूल’ नाम की बिमारी नहीं पकड़ सके। यदि वह बीमारी पकड़ में भी आती तो उनके पास इस बीमारी का इलाज नहीं था। उसकी दवा तो ठक्कर बापा छात्रावास में उनके मांदनुमा कमरे में रह गई थी। जो अब झील की अतल गहराई में समा चुका है।

 

एक थी टिहरी  

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

डूबे हुए शहर में तैरते हुए लोग

2

बाल-सखा कुँवर प्रसून और मैं

3

टिहरी-शूल से व्यथित थे भवानी भाई

4

टिहरी की कविताओं के विविध रंग

5

मेरी प्यारी टिहरी

6

जब टिहरी में पहला रेडियो आया

7

टिहरी बाँध के विस्थापित

8

एक हठी सर्वोदयी की मौन विदाई

9

जीरो प्वाइन्ट पर टिहरी

10

अपनी धरती की सुगन्ध

11

आचार्य चिरंजी लाल असवाल

12

गद्य लेखन में टिहरी

13

पितरों की स्मृति में

14

श्रीदेव सुमन के लिये

15

सपने में टिहरी

16

मेरी टीरी

 

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