यूनियन कार्बाइड के कचरे से प्रदूषित भूजल

Submitted by RuralWater on Sun, 11/29/2015 - 12:33

भोपाल गैस कांड पर विशेष


.आज से 31 साल पहले दुनिया की सबसे भीषणतम औद्योगिक दुर्घटना (भोपाल गैस कांड) में हजारों लोगों की मौतें हुई थीं और हजारों लोग जिन्दगी भर पीछा न छोड़ने वाली बीमारियों से पीड़ित हो गए लेकिन अब भी हालात नहीं सुधरे हैं।

यूनियन कार्बाइड कारखाने में जमा कई टन कचरे की वजह से आसपास (करीब चार किमी की परिधि) में रहने वाले लोगों के जिन्दगी पर अब भी इसका बुरा साया बरकरार है। कचरे के जमीन में रिसने से यहाँ का भूजल इतनी बुरी तरह प्रदूषित हो चुका है कि यहाँ हर दिन एक व्यक्ति गम्भीर बीमारियों की चपेट में आ रहा है।

यहाँ के पानी की जाँच में खतरनाक तत्व मिले हैं और यह पानी प्रतिबन्धित भी कर दिया है लेकिन वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होने से लोगों को यही पानी पीने को मजबूर होना पड़ रहा है।

पता चला कि आज भी कई टन जहरीला कचरा फ़ैक्टरी परिसर में रखा हुआ है। 10 टन कचरा जुलाई 2015 में पीथमपुर शिफ्ट किया जा चुका है। बाकी कचरा बरसाती पानी में सड़कर ज़मीन के भीतर उतर रहा है।

पड़ताल करने पर पता चला कि 84 से पहले कम्पनी के तीन बड़े-बड़े तालाबनुमा सोलर इवापोरेशन पोंड, जिनमें जहरीले केमिकल को छोड़ा जाता था, उसकी मल्टीपल पॉली लेयर हादसे के कुछ साल पहले ही डैमेज हो गई थी और खतरनाक रसायन का रिसाव ज़मीन के भीतर होने लगा था।

तभी से यहाँ का पानी प्रदूषित होने लगा। हैरानी की बात यह है कि हमारी पड़ताल के दौरान टेलेक्स के वो दस्तावेज़ भी हमारे हाथ लग गए जिनके जरिए कम्पनी ने अपने अमेरिका स्थित हेड ऑफ़िस को भी इस लीकेज के खतरे से आगाह किया था।

सालों पुरानी अखबार में छपी इस हादसे की धुँधली तस्वीर से धुंध अब शायद ही हट सके। वो महज अखबार में छपी मूक तस्वीरें थी..... अब ना वो मंजर है, ना ही वो तस्वीरें.....लेकिन स्मृतियों में जो तस्वीरों का कोलाज अब भी घुमड़ रहा है, वह अब भी उस खौफनाक घड़ी की कल्पना भर से मुझे विचलित कर देता है। आज भी लोग इसका बुरा असर झेलने को मजबूर हैं। अब फर्क सिर्फ इतना है कि उस वक्त लाशों के ढेर थे और अब जिन्दा लाशों की भीड़ है।

दुनिया की भीषणतम मानव निर्मित इस औद्योगिक त्रासदी का दंश भोपाल के लोग आज भी झेल रहे हैं। मुझे खबर मिली कि आज भी यूनियन कार्बाइड का जहर लोगों को लील रहा है। यहाँ जहर इस कदर फैला हुआ है कि हर दिन एक व्यक्ति गम्भीर बीमारी का शिकार हो रहा है।

पहले बीमारी और फिर मौत आने का लम्बा इन्तजार.....बाकी का वक्त बीमारी के दर्द की इंतिहा.......हर दिन एक मरीज का ये आँकड़ा गैस पीड़ित लोगों के स्वास्थ्य के लिये काम करने वाली संस्था सम्भावना का है।

दरअसल यूनियन कार्बाइड कारखाने से चार किलोमीटर के दायरे का भूजल बुरी तरह प्रदूषित हो चुका है। मूलत: ओड़िशा के रहने वाले सम्भावना ट्रस्ट के सतीनाथ षडंगी एमटेक हैं। वो 31 साल पहले थोड़े दिनों के लिये भोपाल गैस कांड पर काम करने यहाँ आये थे लेकिन यहीं के होकर रह गए और आज तक पीड़ितों की सेवा में जुटे हुए हैं।

तांबे के जग से पानी पीते हुए षडंगी बताते हैं कि इस इलाके का ज़मीनी पानी बुरी तरह प्रदूषित हो चुका है। इसमें खतरनाक जहरीले तत्व हैं। यह प्रदूषण यूनियन कार्बाइड कारखाने की ही देन है। उन्होंने इसी साल इस इलाके के अलग-अलग जगहों से पानी के 25 सैम्पल लिये थे। पीएचई की लैब में इसकी जाँच कराई।

आप यह जानकर चौंक जाएँगे कि इसकी जाँच रिपोर्ट में आर्गेनो क्लोरिन, डाइक्लोरो बेंजिन और ट्राइक्लोरो बेंजिन जैसे खतरनाक तत्व इन सैम्पलों में मौजूद मिले हैं। इन रसायनों से खून का कैंसर, लीवर, गुर्दे, ब्रेन और जन्मजात कई सारी बीमारियाँ पनपती हैं।

सम्भावना ट्रस्ट के क्लिनिक में भी ऐसे कई लोग आते हैं जिन्हें इस तरह की बीमारियाँ हैं। गैस तो हवा में फैली थी तो फिर ज़मीन के भीतर इसका असर कैसे हो सकता है। इसी जिज्ञासा ने हमें अपनी तहकीकात के लिये मजबूर किया।

पता चला कि आज भी कई टन जहरीला कचरा फ़ैक्टरी परिसर में रखा हुआ है। 10 टन कचरा जुलाई 2015 में पीथमपुर शिफ्ट किया जा चुका है। बाकी कचरा बरसाती पानी में सड़कर जमीन के भीतर उतर रहा है।

पड़ताल करने पर पता चला कि 84 से पहले कम्पनी ने तीन बड़े-बड़े तालाबनुमा सोलर इवापोरेशन पोंड बनाकर उनमें जहरीले केमिकल को छोड़ दिया था ताकि भाप बनाकर उसे खत्म किया जा सके। यह खतरनाक रसायन जमीन के भीतर ना पहुँच सके इसके लिये मल्टीपल पॉली लेयर बिछाई गई थी।

यूनियन कार्बाइड से सटे कैंची छोला इलाके के घासीराम अहिरवार का तो बस नहीं चला नहीं तो वो हमें सरकार के आदमी समझ कर एक-दो रसीद भी कर देते। उन्हें किसी तरह समझाया गया कि ये सरकार के लोग नहीं हैं ये तो हमारी आवाज उनके तक पहुँचाने वाले हैं। तब कही मामला थोड़ा शान्त हुआ, फिर भी घासीराम जी ने सुनाने में कोई गुरेज नहीं किया। हमने बस उनसे इतना भर पूछ लिया कि इस नलकूप पर तो ताकीद लिख रखी है कि पानी पीने लायक नहीं है तो क्यों पीते हो.....इतना पूछना था कि वो तमतमा कर बोले- तो क्या मर जाएँ। प्यासे मरने से तो अच्छा है कि गन्दा ही सही पानी पीकर तो मरें। लेकिन यह लेयर वक्त के साथ-साथ हादसे के कुछ साल पहले ही डैमेज हो गई और खतरनाक रसायन का रिसाव ज़मीन के भीतर होने लगा। तभी से यहाँ का पानी प्रदूषित होने लगा।

हैरानी की बात यह है कि हमारी पड़ताल के दौरान टेलेक्स के वो दस्तावेज़ भी हमारे हाथ लग गए जिनके जरिए कम्पनी ने अपने अमेरिका स्थित हेड ऑफ़िस को भी इस लीकेज के खतरे से आगाह किया था। साथ ही यह भी बताया था कि हिन्दुस्तान में अभी अमेरिका जैसे सख्त कानून नहीं है, यदि ऐसे कानून भविष्य में यहाँ बन गए तो मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

यूनियन कार्बाइड की लापरवाही का ये नमूना साबित करता है कि हादसे के पहले से किस तरह फ़ैक्टरी लोगों की जान के साथ खिलवाड़ करती रही है।

इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च, लखनऊ के ताजा आँकड़ों के मुताबिक यूनियन कार्बाइड कारखाने से 3 किलोमीटर के दायरे में बसी 22 बस्तियों के 10 हजार से ज्यादा लोग प्रदूषित पानी से प्रभावित हैं। चिन्ता की बात यह है कि यह प्रदूषण भीतर-ही-भीतर ज़मीन में लगातार फैलता जा रहा है। हर दिन यहाँ मरीज़ों के आँकड़ों में बढ़ोत्तरी हो रही है।

हम जब प्रभावित इलाके में पहुँचे तो लोगों का गुस्सा हम पर ही फूट पड़ा। यूनियन कार्बाइड से सटे कैंची छोला इलाके के घासीराम अहिरवार का तो बस नहीं चला नहीं तो वो हमें सरकार के आदमी समझ कर एक-दो रसीद (चांटा) भी कर देते। उन्हें किसी तरह समझाया गया कि ये सरकार के लोग नहीं हैं ये तो हमारी आवाज उनके तक पहुँचाने वाले हैं। तब कही मामला थोड़ा शान्त हुआ, फिर भी घासीराम जी ने सुनाने में कोई गुरेज नहीं किया।

हमने बस उनसे इतना भर पूछ लिया कि इस नलकूप पर तो ताकीद लिख रखी है कि पानी पीने लायक नहीं है तो क्यों पीते हो.....इतना पूछना था कि वो तमतमा कर बोले- तो क्या मर जाएँ। प्यासे मरने से तो अच्छा है कि गन्दा ही सही पानी पीकर तो मरें।

इसी मोहल्ले की अंगूरी बाई कहती हैं पानी से बदबू आती है। दो साल से नर्मदा का नल तो है लेकिन पानी हफ्तों तक नहीं आता। क्या करें इसी पानी को पीते हैं। अंगूरी की बच्ची की गर्दन जन्मजात टेढ़ी है। महेश कुमार बताते हैं कि मोहल्ले के हर घर में गन्दा पानी पीने के लिये मजबूर हैं। ऐसा कोई घर नहीं जहाँ बीमार नहीं है।

शिवशक्ति नगर में रहने वाले प्रीतम सिंह चंदेल 20 साल से यहाँ का पानी पीते रहे हैं। डॉक्टरों ने उन्हें कैंसर बताया है। वो कहते हैं तीस साल तक घुट-घुट कर जीते रहे अब मरने का इन्तजार कर रहे हैं।

सरकार तीस सालों के बाद आज भी गैस राहत और पुनर्वास जैसा भारी-भरकम दफ्तर खोलकर बैठी है। सरकार ने मुआवजा बाँटना बन्द कर दिया। सरकार नहीं मानती कि अब गैस कांड का कोई असर बचा है।

बड़ा सवाल यह है कि जब गैस कांड का कोई काम बचा ही नहीं तो फिर विभाग और उसका मंत्रालय क्यों है। दूसरा पहलू यह भी है कि अगर विभाग और मंत्रालय अस्तित्व में हैं तो क्या हम तीन दशकों के बाद अब तक एक त्रासदी के पीड़ितों को न्याय नहीं दिला पाये, उनका पुनर्वास नहीं कर पाये।

गैस राहत एवं पुनर्वास विभाग के एक बड़े अफ़सर ने तो इस बात को सिरे से ही नकारते हुए कहा कि क्या तीस साल तक किसी जहरीले रसायन का असर बरकरार होगा। ये महाशय तो यहाँ तक दावा करते हैं कि बीमारी की वजह बहुत सी होती हैं सिर्फ गन्दा पानी ही नहीं......सीएम साहब भले ही संवेदनशील होने का चोला ओढ़े हों लेकिन उनके नौकरशाह एक के बाद एक असंवेदनशीलता की बड़ी इबारत खड़ी कर रहे हैं। वाह सरकार वाह........

भूजल को प्रदूषित करता युनियन कार्बाइड का कचरा गैस त्रासदी के ताजा जख्मों ने तीस साल पहले मेरे जिस मासूम दिलों-दिमाग पर उन तस्वीरों की छाप छोड़ी थी आज वो उससे भी कहीं ज्यादा खौफनाक तरीके से मेरे अन्दर तक धँसती जा रही है।

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ स

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