रिसर्च : बदलते वन परिदृश्य में वनीय-जल विज्ञान के क्षेत्र में शोध आवश्यकताएँ

Submitted by Hindi on Sun, 11/29/2015 - 16:35
Source
राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की, पाँचवी राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 19-20 नवम्बर, 2015

सारांश


वनाच्छादित क्षेत्र अक्सर अनेकों वृहत्त नदियों के शीर्ष जल आवाह क्षेत्र को निर्मित करते हैं। अतः सरिता प्रवाह वनों से होने वाले सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बहिः प्रवाह में से एक है। यह एक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक सत्य है कि वनों के प्रकार एवं उनकी प्रबन्धन पद्धतियाँ विभिन्न जल विज्ञानीय प्रक्रियाओं उदाहरणतः अवरोधन, वाष्पोत्सर्जन, मृदा अन्तःस्यंदन तथा अपवाह में उपलब्ध पोषकों एवं अवसाद की मात्रा को प्रभावित करते हैं, जिसके कारण कैचमेन्ट में प्रवाहित होने वाले जल की मात्रा, गुणवत्ता एवं समय में भी परिवर्तन होता है। वनों एवं उनके द्वारा प्राप्त होने वाले जल पर जलवायु परिवर्तन के अनिश्चित प्रभाव भी हाल के वर्षों में चिन्ता का विषय बने हैं। वनीय-जलविज्ञान वन एवं जल के मध्य पारस्परिक सम्बन्ध को समझने में सहायक है, अतः विकास की बदलती परिस्थितियों में जलवायु परिवर्तन एवं वनाग्नि सहित आज की जटिलताओं के जल विज्ञानीय प्रभाव समझने के लिये वनीय-जलविज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी प्रयासों की आवश्यकता है।

प्रस्तुत प्रपत्र में वनीय-जलविज्ञान के सामान्य सिद्धान्तों एवं वनीय-जल विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान आवश्यकताओं को प्रस्तुत किया गया है, जिनके अध्ययन द्वारा वन एवं जल प्रबन्धन से सम्बन्धित विभिन्न निर्णयों पर पहुँचने में सहायता प्राप्त होगी।

Abstract
Forested areas often constitute head water catchments for many large rivers. As such, stream flow is one of the most important ouputs of forests. There is a broad scientific agreement that type of forests and their management practices have the potential to alter quantity, quality and timing of water moving through catchments by altering the interception, evapotranspiratin, soil infiltration, nutrient and sediment load of runoff etc. In recent years, concern has also grown of the potentially large but uncertain effects of climate change on forests and their water output. Forest hydrology can help illuminate the connections between forests and water, but it must advance if it is to deal with today’s complexities, including climate change, wildfires, and changing patterns of development. This paper presents the general principles of forest hydrology and the research needs in the area of forest hydrology science that would help support forest and water management decisions in many ways.

1.0 प्रस्तावना


वन, जल एवं जनमानस के मध्य एक दृढ़ पारस्परिक सम्बन्ध है। यद्यपि वनों का प्रबन्धन इमारती लकड़ी को प्राप्त करने, वनीय जीवों के आवास एवं मनोरंजन सम्बन्धी उद्देश्यों के लिये किया जाता है, तथापि तार्किक रूप में वनों से प्राप्त होने वाला सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उत्पादन जल है। वर्षाजल का कुछ भाग वनों एवं मृदा चक्र द्वारा सरिता प्रवाह के रूप में जल पिंडों को प्राप्त होता है। शीर्ष वनीय क्षेत्रों में परिवर्तन उनसे बहने वाले जल की मात्रा और गुणवत्ता को भी प्रभावित करते हैं। (एंडर्सन एवं अन्य 1976; आइस एवं स्टैडनिक 2004)।

देश में जल की माँग में निरन्तर वृद्धि हो रही है। परिणामतः वन प्रबन्धकों को जल की उच्च मात्रा एवं गुणवत्ता प्रदान करने हेतु प्रयास करने की आवश्यकता है। मानव आबादी में बदलाव, भू-उपयोग में परिवर्तन एवं जलवायु परिवर्तन की गतिशीलता के साथ जल की इस बढ़ती माँग को पूरा करने के लिये वन एवं जल के बीच प्रतिस्पर्धा तनाव का भी कारण बनी है। वनीय-जल विज्ञान के अन्तर्गत वनों का जल संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन उपरोक्त तनाव को दूर करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रदान करता है। वनीय-जलविज्ञान के विश्लेषणों द्वारा, वनाग्नि, कीट एवं रोग, सड़क तन्त्र एवं पेड़ों की कटाई सहित वन क्षेत्रों में बदलाव का जल प्रवाह पर पड़ने वाले प्रभाव का पता लगाया जा सकता है। प्रस्तुत प्रपत्र में वनीय-जलविज्ञान के सामान्य सिद्धान्त एवं वनों से जल की अविरल पूर्ति हेतु भविष्य में अनुसंधान एवं प्रबन्धन की दिशा को प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया है।

2.0 वनीय-जल विज्ञान के सामान्य सिद्धान्त


वनीय-जलविज्ञान के सामान्य सिद्धान्तों के आधार पर वन प्रबन्धन के जल विज्ञानीय प्रभावों का आकलन किया जा सकता है। ये सिद्धान्त प्लाट के अध्ययन, प्रक्रिया अध्ययन एवं वाटरशेड प्रयोगों से व्युत्पन्न हैं। संक्षेप में इन सिद्धान्तों को निम्न खण्डों में दिया गया है।

2.1 वन संरचना में परिवर्तन की जलविज्ञानीय प्रतिक्रिया का सिद्धान्तः


1. इस सिद्धान्त के अनुसार वनाच्छादन क्षेत्र के आंशिक या पूर्णतः निवारण से जल अवरोधन (वृक्षों की पत्तियों एवं शाखाओं द्वारा अवशोषित अवक्षेपण) में कमी एवं मृदा सतह तक पहुँचने वाले परिणामी अवक्षेपण में वृद्धि होती है (वैरी, 1976)।
2. वनाच्छान क्षेत्र के आंशिक या पूर्णतः निवारण से वृक्षों द्वारा होने वाले वाष्पोत्सर्जन में कमी होती है।
3. जल अवरोधन एवं वाष्पोत्सर्जन में कमी से मृदा आर्द्रता, वनस्पति के लिये जल उपलब्धता एवं जल उपलब्धि में वृद्धि होती है (हैल्वी 1971, जोन्स एवं पोस्ट 2004, ब्राउन एवं अन्य 2005)।
4. मृदा आर्द्रता में वृद्धि एवं जड़ शक्ति का ह्रास भूमि की ढ़लान स्थिरता को कम कर देता है।
5. वन कटान के पश्चात जल उपलब्धि में सामयिक वृद्धि होती है जो समय के साथ वन के पुनः विकसित होने पर कम होती जाती है (ट्रोयन्डल एवं किंग 1985, जोन्स 2000)।
6. जब उच्च अवरोधक या उच्च वार्षिक वाष्पोत्सर्जन वाले वन को निम्न अवरोधक या निम्न वाष्पोत्सर्जन वाले वनों से प्रतिस्थापित किया जाता है तो नवीन वन के परिपक्वता तक विकसित होने के परिणामस्वरूप जल उपलब्धि में कमी पाई जाती है।

2.2 मृदा एवं उपमृदा में जल प्रवाह मार्ग में परिवर्तन की जल विज्ञानीय प्रतिक्रिया का सिद्धान्त


1. अपारगम्य सतह (जैसे सड़क एवं मार्ग), एवं पर्वतीय ढ़ाल में बदलाव के कारण जल प्रवाह मार्गों में बदलाव आता है। ये बदलाव स्थलीय भूमि प्रवाह में वृद्धि कर देते हैं तथा स्थलीय भूमि प्रवाह को सीधे सरिताओं से जोड़ देते हैं।
2. अपरागम्य सतह मृदा कटान में वृद्धि करती हैं (ड्यून एवं लियोपोल्ड 1978)।
3. सड़क के किनारे परिवर्तित पर्वतीय ढाल एवं परिवर्तित जल मार्ग भूस्खलन में वृद्धि करते हैं।

2.3 रसायनों के अनुप्रयोगों की जल विज्ञानीय प्रतिक्रिया का सिद्धान्त


1. वन रसायनों का जल पिंडों या आर्द्र मृदा पर प्रत्यक्ष प्रयोग, जलीय जीव तन्त्र पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
2. वन रसायन (जैसे उर्वरक, कीटनाशक एवं तृणनाशक) अपनी विषाक्तता मृदा एवं जल में उपस्थित अपनी दृढ़ता के आधार पर जल गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।
3. नाइट्रोजन एवं सल्फर के वायुमंडलीय एकत्रीकरण के कारण वनीय मृदा की अम्लीयता में वृद्धि, मृदा पोषकों में कमी, वन स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव एवं जल गुणवत्ता में ह्रास होता है जिसका जलीय जीवों पर विषैला प्रभाव पड़ता है।

3.0 भारत में वनीय-जलविज्ञान


वनीय-जलविज्ञान के अध्ययन द्वारा वनों से प्राप्त होने वाले जल से सम्बन्धित प्राथमिक प्रश्नों का समाधान निकाला जाता है जैसे, वनों में जल प्रवाह मार्ग व जल संचयन, वनों में बदलाव के कारण जल प्रवाह मार्ग, जल संचयन, जल-मात्रा तथा जल गुणवत्ता पर पड़ने वाले प्रभाव आदि। वनीय-जलविज्ञान जलवायु परिवर्तन, वन में होने वाली बाधाओं, वन प्रजातियों एवं वन संरचना में परिवर्तन तथा वनों के एकीकरण सहित वन तन्त्र को प्रभावित करने वाले अनेकों घटकों के परिणामस्वरूप जल प्रवाह में घटित होने वाले परिर्वतनों के अध्ययन में सहायता करता है।

वनों में परिवर्तन का जल प्रवाह पर प्रभाव समझने के लिये अनुसंधानकर्ताओं द्वारा ‘युग्मन जल विभाजक’ अध्ययन से प्राप्त आँकड़ों का प्रयोग किया जाता है। इस पद्धति के प्रयोग में समान आकार, भूमि उपयोग, भूमि आच्छादन एवं अन्य समान विशिष्टताओं वाले दो जल विभाजकों का चयन किया जाता है। एक जलविभाजक को नियन्त्रित रखा जाता है जबकि दूसरे को वन कटान, सड़क निर्माण, अग्नि इत्यादि द्वारा उपचारित किया जाता है। दोनों जल विभाजकों के सरिता प्रवाह एवं जल गुणवत्ता में तुलनात्मक परिवर्तन, वन उपचार एवं विकास के प्रभावों को दर्शाते हैं। युग्मन जलविभाजक अध्ययन, प्रक्रिया मापन, प्लाट-स्केल अध्ययन एवं जल विज्ञानीय निदर्शन, वनीय-जलविज्ञान के महत्त्वपूर्ण तत्व हैं। सामान्यतः प्लाट अध्ययन एवं युग्मन जलविभाजक अध्ययन लघु एवं समान क्षेत्रों में अल्पविधि के लिये ही किये गये हैं।

सम्पूर्ण विश्व में वनीय-जलविज्ञान अनुसंधान के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। वर्तमान में अनुसंधान अध्ययन पुनः वनीकरण, वृहत स्केल जल विभाजक, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव एवं जलविज्ञानीय निदर्शों के अनुप्रयोग विषयों पर केन्द्रित हैं। परन्तु भारत में वनीय-जलविज्ञान अध्ययन लघु पैमाने पर ही किये जा रहे हैं तथा ये लघु जलविभाजकों तक ही सीमित हैं। भारत में वनीय-जलविज्ञान अभी भी शैशविक अवस्था में है, क्योंकि इस विषय पर किये गये अधिकांश अध्ययन प्रकीर्ण अवस्था में हैं। किसी विशिष्ट प्रकार के वन के लिये सम्पूर्ण जलविज्ञानीय चक्र एवं जल बजट को परिभाषित करने के लिये सम्बन्धित सूचना अभी भी उपलब्ध नहीं है। इसके अतिरिक्त अधिकांश अध्ययन लघु जल विभाजक स्तर पर किये गये हैं तथा अध्ययन की अवधि एक वर्ष से लेकर कुछ वर्ष तक ही है।

4.0 वनीय-जलविज्ञान में उभरते मुद्दे


वनीय-जलविज्ञान वनों के माध्यम से बहने वाले जल के सामान्य सिद्धान्तों को समझने में सहायक सिद्ध हुआ है। ये सिद्धान्त लघु वन क्षेत्रों एवं लघु समय में होने वाले परिवर्तन के फलस्वरूप सामान्य जल विज्ञानीय प्रतिक्रियाओं पर आधारित हैं। निस्संदेह, लघु जलविभाजक आधारित अनुसंधान विभिन्न जलविज्ञानीय प्रक्रियाओं पर वनों के प्रभाव का अध्ययन करने में एवं सूक्ष्म स्तर पर जलविज्ञानीय व्यवहार को समझने में बहुत उपयोगी साबित हुए हैं। लेकिन आजकल जलवायु परिवर्तन, वन में उत्पन्न विभिन्न बाधाएँ, वन प्रजातियों एवं संरचना में परिवर्तन तथा भू-विकास एवं स्वामित्व सहित अनेकों कारक वनों को प्रभावित कर रहे हैं और वनों को छोटे-छोटे भागों में विभाजित कर रहे हैं। इसलिए वर्तमान में वन एवं जल प्रबन्धकों द्वारा वनीय-जलविज्ञान की सहायता से वृहत्त वन क्षेत्रों में इन कारकों द्वारा दीर्घावधि में जल मात्रा एवं गुणवत्ता पर पड़ने वाले प्रभाव को समझने एवं उनकी भविष्यवाणी करने की आवश्यकता है। आज वनीय-जलविज्ञान का मुख्य अनसुलझा मुद्दा छोटे एवं समान जल-विभाजकों में विकसित किये गये निष्कर्षों के आधार पर बड़े, विषम वाटरशेड एंव भू-परिदृश्य में लम्बी अवधि के लिये जलविज्ञानीय प्रतिक्रियाओं की भविष्यवाणी करना है। वृहत्त क्षेत्रों में वन एवं जल सम्बन्धों का विश्लेषण, संचयी जलविभाजक प्रभाव, जलवायु परिवर्तन एवं वन प्रबन्धन पद्धतियों सहित वर्तमान एवं भविष्य की सम्भावित समस्याओं का समाधान करने मे सहायक सिद्ध होगा।

5.0 अनुसंधान आवश्यकताएँ


विभिन्न स्थानिक एवं कालिक पैमाने पर जलविज्ञानीय अवयवों के मात्रात्मक विशिष्टीकरण के लिये भविष्य में किया जाने वाला अनुसंधान, निम्नलिखित पहलुओं पर केन्द्रित होना चाहिए।

5.1 संचयी जलविभाजक प्रभाव


जलविभाजक में समय के साथ बहु-भूमि उपयोग गतिविधियों के फलस्वरूप होने वाले जलविज्ञानीय प्रभाव, संचयी जलविभाजक प्रभाव कहलाते हैं। चरम अवक्षेपण घटनाओं से अक्सर संचयी जल विभाजक प्रभावों का पता चलता है जो शीर्ष वनीय क्षत्रों में भूमि उपयोग तथा बाढ़ एवं इसके अन्य प्रभावों के परस्पर सबन्धों का उजागर कर जन-जागृति में सहायक हैं। संचयी जल विभाजक प्रभावों के आकलन हेतु, भौतिक, रासायनिक एवं जीवविज्ञानीय प्रक्रियाओं को समझने की आवश्यकता होती है जो ढलानों और शीर्ष सरिताओं से अनुप्रवाह क्षेत्रों तक जल, अवसाद, प्रदूषक एवं अन्य सामग्रियों का निर्गमन करते हैं। इस क्षेत्र में भविष्य में किये जाने वाले अनुसंधानों द्वारा वृहत्त, स्थानिक एवं दीर्घकालिक पैमाने पर वन, जल प्रवाह मार्ग, गुणवत्ता एवं जलविभाजक में भूमि उपयोग के सम्बन्धों को स्पष्ट करने के लिये प्रयास करना चाहिए।

5.2 जलवायु परिवर्तन


जलवायु परिवर्तन के वनों एवं जल पर स्पष्ट प्रभाव देखे जा सकते हैं तथा भविष्य में वनीय-जलविज्ञान पर इन प्रभावों के और भी बढ़ने की सम्भावना है। वन एवं जलविज्ञान पर जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष प्रभावों जैसे हिमगलन अपवाह के समय में परिवर्तन एवं वनाग्नि में वृद्धि आदि का आकलन तो किया जा रहा है परन्तु इसके अप्रत्यक्ष प्रभावों जैसे, वनों एवं वन प्रबन्धन में होने वाले परिवर्तन तथा इनके जलविज्ञानीय प्रक्रियाओं पर प्रभाव का आकलन करने के लिये और अधिक अनुसंधान की आवश्यकता है।

5.3 वन प्रबन्धन


वन प्रबन्धन पद्धतियाँ समय के साथ विकसित हो रही हैं। वनों में संशोधन के कारण वन प्रबन्धकों द्वारा आज नई व श्रेष्ठ वन प्रबन्धन पद्धतियाँ अपनायी जा रही हैं। लेकिन इन पद्धतियों, जैसे ईंधन कम करने के लिये पेड़ों की छँटाई एवं अन्य श्रेष्ठ प्रबन्धन पद्धतियों के जलविज्ञानीय प्रभावों का मूल्यांकन अभी तक नहीं किया गया है। इन समकालीन प्रबन्धन पद्धतियों के जलविज्ञानीय प्रभावों को दीर्घकालिक एवं वृहत स्थानिक पैमानों पर समझने की आवश्यकता है।

6.0 वैज्ञानिकों, प्रबन्धकों एवं नागरिकों की भूमिका


वनों से प्राप्त जल संसाधनों को सतत रूप में बनाये रखने के लिये वनीय-जलविज्ञान के क्षेत्र में कार्यरत् वैज्ञानिक, वन एवं जल प्रबन्धक, एवं नागरिक गण एक अहम भूमिका निभा सकते हैं। व्यक्तिगत एवं सामूहिक प्रयासों के माध्यम से वे इस क्षेत्र में वर्तमान स्थिति और अनुसंधान की आवश्यकता के आधार पर निम्न संस्तुतियों के अनुसार कार्य कर सकते हैं।

6.1 वैज्ञानिक


वन क्षेत्र से जुड़े पानी के महत्त्वपूर्ण मुद्दों को सम्बोधित करने के लिये वैज्ञानिकों को नवीनतम शोध दृष्टिकोण को अपनाना होगा एवं वर्तमान शोध में विस्तार करना होगा। वैज्ञानिकों के लिये कुछ सुझाव निम्न प्रकार हैं।

1. वर्तमान में छोटे वाटरशैड्स में चल रहे अनुसंधानों को जारी रखना चाहिए और जहाँ अनुसंधान कार्य बन्द कर दिया गया हो, वहाँ इन्हें पुनः स्थापित करना चाहिए।
2. ऐतिहासिक एवं नवीन जलविज्ञानीय आँकड़ों की सूची तैयार करनी चाहिए।
3. बड़े, स्थानिक एवं दीर्घकालिक पैमाने पर वनीय बाधाओं की जलविज्ञानीय प्रतिक्रियाओं को बेहतर ढंग सेे समझने के लिये, युग्मन वाटरशैड आंकड़ो के सम्पूर्ण पिन्ड को ‘‘मेटा डाटा’’ के रूप में प्रयोग करना चाहिए।
4. भौगोलिक सूचना प्रणाली GIS सुदूर संवेदन, सैंसर नेटवर्क एवं आधुनिक निदर्शों के द्वारा बड़े वाटरशैड में जलविज्ञानीय प्रतिक्रियाओं की कल्पना एवं भविष्यवाणी के लिये क्षमताओं में विस्तार किया जाना चाहिए।
5. वनों से प्राप्त जल संसाधनों के मूल्य को समझने एवं उसमें सुधार के लिये अर्थशास्त्रियों एवं सामाजिक वैज्ञानिकों के साथ कार्य करना चाहिए।

6.1 प्रबन्धक


वन एवं वनों की जलवायु तथा सामाजिक पहलू परिवर्तनीय हैं। अतः वन प्रबन्धन पद्धतियों को समय-समय पर एक अनुकूल प्रबन्धन पद्धति के दृष्टिकोण से नवीनीकृत किया जाना चाहिए। प्रबन्धकों को श्रेष्ठ प्रबन्धन पद्धतियों के आकलन के आधार पर वर्तमान पद्धतियों को नवीनीकृत करना चाहिए। ऐसा करने के लिये कुछ निम्न सुझाव हैं।

1. व्यक्तिगत या संस्थागत श्रेष्ठ प्रबन्धन पद्धतियों के डिजाइन, उद्देश्य तथा उपयोग को सूचीबद्ध कर इसे राष्ट्रीय स्तर पर उपयोग करना चाहिए तथा इन सूचनाओं को जनमानस के लिये उपलब्ध कराना चाहिए।
2. वनों की श्रेष्ठ प्रबन्धन पद्धतियों के प्रभाव का तुलनात्मक विश्लेषण तथा इससे प्राप्त आँकड़ों एवं परिणामों का उपयोग एक अनुकूल प्रबन्धन पद्धति विकसित करने के लिये करना चाहिए।

6.2 नागरिक


वन एवं जल प्रबन्धन में स्थानीय, क्षेत्रीय या जलविभाजक स्तर पर नागरिकों द्वारा एक अहम भूमिका निभायी जा सकती है। वाटरशेड काउंसिल एवं नागरिकों द्वारा निम्न कार्य किये जा सकते हैं।
1. एकीकृत वाटरशैड प्रबन्धन के कई उद्देश्यों की पूर्ति हेतु, वाटरशैड काउंसिलों का प्रयोग किया जा सकता है।
2. वाटरशैड काउंसिलों में भागीदारी करके सामुदायिक स्तर पर वाटरशेड के विकास और उनके प्रभाव बढ़ाने में सहायता करनी चाहिए।

7.0 निष्कर्ष


वनीय-जलग्रहण क्षेत्र घरेलू, कृषि, औद्योगिक एवं पारिस्थितिकीय आवश्यकताओं के लिये जल की उच्च अनुपात में आपूर्ति करते हैं। वनीय बाधाएँ एवं वन प्रबन्धन गतिविधियाँ जलविज्ञानीय प्रक्रियाओं में काफी परिवर्तन कर सकती हैं। ये परिवर्तन सतही कटाव, ढ़लान स्थिरता, पोषक तत्व चक्र, चैनल आकृति, जलीय जीवन, जल की मात्रा एवं गुणवत्ता सहित वन पारिस्थितिकी तन्त्र के लगभग समस्त घटकों को प्रभावित कर सकते हैं। आज, वन एवं जल प्रबन्धकों के सामने प्रमुख चुनौतियों में से एक जल संसाधनों एवं पारिस्थितिकी तन्त्र को हानि पहुँचाये बिना वनों के बहु आयामी लाभों में वृद्धि करना है। वनों से अविरल जल संसाधन बनाये रखने की इस चुनौती को पूरा करने हेतु वन एवं जल के मध्य पारस्परिक सम्बन्धों को आधुनिक तकनीकों एवं अन्वेषणों द्वारा समझने की प्रमुख आवश्यकता है।

सन्दर्भ


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