यूनियन कार्बाइड के खिलाफ प्रदर्शन करते लोग

Submitted by RuralWater on Thu, 12/03/2015 - 10:18

भोपाल गैस कांड पर विशेष


.आज से 31 वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 2-3 दिसम्बर की रात को एक गैस त्रासदी हुई। जिसमें हजारों लोगों की सोते समय ही मौत हो गई। उनके बचे खुचे परिजन आज भी न्याय की फरियाद करते हुए धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। यूनियन कार्बाइड सत्ता के गलियारों में अपनी पहुँच और दौलत के बदौलत पीड़ित परिजनों के प्रति जिम्मेदारी से बचता रहा है।

भोपाल गैस त्रासदी एक औद्योगिक दुर्घटना थी जो भारत के मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल शहर में घटी थी। भोपाल में यूनियन कार्बाइड कम्पनी का एक कीटनाशक संयंत्र था। कम्पनी में गैस रिसाव पहले से ही हो रहा था। लेकिन कम्पनी के उच्च पदाधिकारियों ने इस पर ध्यान नहीं दिया।

3 दिसम्बर 1984 की आधी रात को कम्पनी के संयंत्र से विषाक्त मिथाइल आइसोसाइनेट गैस और अन्य रसायनों के रिसाव ने भीषण रूप अख्तियार कर लिया। इस रिसाव की चपेट में संयंत्र के आसपास के इलाकों में रहने वाले हजारों लोग तुरन्त मौत के आगोश में आ गए।

हजारों आज तक विकलांगता का दंश झेल रहे हैं। इस घटना का सबसे दुखद पहलू यह है कि दुर्घटना में मृत लोगों का आँकड़ा हर एजेंसी अलग-अलग बताती रही है। राज्य सरकार, केन्द्र सरकार और स्वयंसेवी संगठनों के आँकड़ों में भारी अन्तर है। फिर भी इसमें तत्काल लगभग 5,00,000 लोग आये थे।

पहली आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार तत्काल मरने वालों की संख्या 2259 थी। मध्य प्रदेश सरकार के अनुसार कुल 3787 व्यक्तियों की मृत्यु गैस के रिसाव के परिणामस्वरूप हुई थी। गैर सरकारी अनुमानों के अनुसार 8,000-10,000 व्यक्तियों की मौत गैस रिसाव के 72 घंटे के भीतर हो गई थी और लगभग 25,000 व्यक्ति अब तक गैस से सम्बन्धित बीमारियों से मर चुके हैं।

40,000 से अधिक स्थायी रूप से विकलांग, अंधे और अन्य गैस व्याधियों से ग्रसित हुए थे, सब मिलाकर 5 लाख 21 हजार लोग गैस से प्रभावित हुए। एक रिपोर्ट के मुताबिक नवम्बर 1984 तक कारखाना के कई सुरक्षा उपकरण न तो ठीक हालात में थे और न ही सुरक्षा के अन्य मानकों का पालन किया गया था।

स्थानीय समाचार पत्रों के पत्रकारों की रिपोर्टों के अनुसार कारखाने में सुरक्षा के लिये रखे गये सारे मैनुअल अंग्रेज़ी में थे। जबकि कारखाने में कार्य करने वाले ज्यादातर कर्मचारी को अंग्रेज़ी का बिलकुल ज्ञान नहीं था। साथ ही पाइप की सफाई करने वाले हवा के वेन्ट ने भी काम करना बन्द कर दिया था।

समस्या यह थी कि टैंक संख्या 610 में नियमित रूप से ज्यादा एमआईसी गैस भरी थी तथा गैस का तापमान भी निर्धारित 4.5 डिग्री की जगह 20 डिग्री था। मिक को कूलिंग स्तर पर रखने के लिये बनाया गया फ्रीजिंग प्लांट भी पॉवर का बिल कम करने के लिये बन्द कर दिया गया था।

2-3 दिसम्बर की रात्रि को टैंक इ-610 में पानी का रिसाव हो जाने के कारण अत्यन्त ग्रीष्म व दबाव पैदा हो गया और टैंक का अन्दरुनी तापमान 200 डिग्री के पार पहुँच गया जिसके पश्चात इस विषैली गैस का रिसाव वातावरण मे हो गया। 45-60 मिनट के बीच ही 30 मीट्रिक टन गैस का रिसाव हो गया।

इन विषैली गैसों का प्रवाह भोपाल शहर में दक्षिण पूर्वी दिशा में था। भोपाल के वातावरण में जहरीली गैसीय बादल के प्रभाव की सम्भावनाएँ आज भी चर्चा का विषय बनी हुई हैं। सम्भवत: मिक के उपरान्त गैस के बादल में फोस्जीन, हाइड्रोजन सायनाइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन क्लोराइड आदि के अवशेष पाये गए थे।

इस त्रासदी के उपरान्त भारतीय सरकार ने कारखाने में लोगों के घुसने पर रोक दी, अत: आज भी इस दुर्घटना का कोई पुष्ट कारण एवं तथ्य लोगों के सामने नहीं आ पाया है। शुरुआती दौर मे सीबीआई और सीएसआईआर द्वारा इस दुर्घटना की छानबीन की गई।

यूनियन कार्बाइड संयंत्र में भोपाल में घटी घटना पहली नहीं है। इसके पहले पश्चिम वर्जीनिया में एक सुरंग परियोजना में भी दुर्घटना हुई थी। जिसे हॉक्स नेस्ट सुरंग आपदा के नाम से जाना जाता है। यह दुर्घटना सन् 1927 और 1932 के बीच सुरंग परियोजना में घटी थी, जिसे यूनियन कार्बाइड के नेतृत्व में बनाया जा रहा था।

सुरंग के निर्माण के दौरान श्रमिकों को सिलिका खनिज मिला और उन्हें उसका खनन करने का आदेश मिला। इस सिलिका का प्रयोग इस्पात के वैद्युत प्रसंस्करण में होना था। खनिकों को खनन के दौरान सुरक्षा उपकरण जैसे कि मास्क या श्वसन यंत्र नहीं प्रदान किये गए। सिलिका की धूल के सम्पर्क में आने से कई श्रमिकों को फेफड़ों की बीमारी सिलिकोसिस हो गई।

निर्माण स्थल के एक ऐतिहासिक स्मारकपट्ट के अनुसार, सिलिकोसिस 109 मौतों के लिये जिम्मेदार थी। एक आँकड़े के मुताबिक मरने वालों की संख्या 476 थी। भोपाल गैस त्रासदी को लगातार मानवीय समुदाय और उसके पर्यावास को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाली औद्योगिक दुर्घटनाओं में गिना जाता रहा।

इसीलिये 1993 में भोपाल की इस त्रासदी पर बनाए गए भोपाल-अन्तरराष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को इस त्रासदी के पर्यावरण और मानव समुदाय पर होने वाले दीर्घकालिक प्रभावों को जानने का काम सौंपा गया था।

भोपाल की लगभग 5 लाख 20 हजार लोग इस विषैली गैस से सीधे रूप से प्रभावित हुए। जिसमें 2,00000 लोग 15 वर्ष की आयु से कम थे और 3000 गर्भवती महिलाएँ थीं, उन्हें शुरुआती दौर में तो खाँसी, उल्टी, आँखो में उलझन और घुटन का अनुभव हुआ। 2259 लोगों की इस गैस की चपेट में आ कर आकस्मिक मौत हो गई।

अमेरिकी रसायन कम्पनी यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन (यूनियन कार्बाइड) विश्व में रसायन एवं बहुलक बनाने वाली बड़ी कम्पनियों में से एक है। वर्तमान में इस कम्पनी में चार हजार से अधिक कर्मचारी काम कर रहे हैं।

1984 में कम्पनी के मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित संयंत्र से मिथाइल आइसोसाइनेट नामक गैस के रिसाव को अब तक की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना माना जाता है। इस दुर्घटना का दुखद पहलू यह है कि यूनियन कार्बाइड कम्पनी अपनी ज़िम्मेदारी से बचती रही है। अदालत में भी कम्पनी पीड़ितों को ठगने के लिये बड़े-बड़े वकीलों का सहारा लिया।

सरकार में महत्त्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों से साँठगाँठ की। जिससे कम्पनी की बहुत बदनामी हुई। जाँच में दुर्घटना के लिये कम्पनी की लापरवाही को ज़िम्मेवार पाया गया। लेकिन कम्पनी ने इस त्रासदी के लिये खुद को जिम्मेदार मानने से साफ इनकार कर दिया जिसके परिणामस्वरूप लगभग 15,000 लोगों की मृत्यु हो गई और लगभग 5,00000 व्यक्ति इससे प्रभावित हुए।

6 फरवरी 2001 को यूनियन कार्बाइड, डाउ केमिकल कम्पनी की एक पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कम्पनी बन गई। इसी वर्ष कम्पनी के गैस पीड़ितों के साथ हुए एक समझौते और भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के शुरुआत के साथ भारत में इसका अध्याय समाप्त हो गया। यूनियन कार्बाइड अपने उत्पादों का अधिकांश भाग डाउ केमिकल को बेचती है। यह डाउ जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज का एक पूर्व घटक भी है।

सन् 1920 में, इसके शोधकर्ताओं ने प्राकृतिक गैस द्रवों जैसे कि इथेन और प्रोपेन से इथिलीन बनाने की एक किफायती विधि विकसित की जिसने आधुनिक पेट्रोरसायन उद्योग को जन्म दिया। आज, यूनियन कार्बाइड के पास इस उद्योग से जुड़ी सबसे उन्नत प्रक्रियाएँ और उत्प्रेरक प्रौद्योगिकियाँ हैं और यह विश्व की कुछ सबसे किफायती और बड़े पैमाने की उत्पादन सुविधाओं का प्रचालन करती है।

विनिवेश से पहले विभिन्न उत्पाद जैसे कि एवरेडी और एनर्जाइज़र बैटरीज़, ग्लैड बैग्स एंड रैप्स, सिमोनिज़ कार वैक्स और प्रेस्टोन एंटीफ्रीज़ आदि कम्पनी के स्वामित्व के अधीन थे। डाउ केमिकल कम्पनी द्वारा कम्पनी के अधिग्रहण से पहले इसके इलेक्ट्रॉनिक रसायन, पॉलीयूरेथेन इंटरमीडिएट औद्योगिक गैसों और कार्बन उत्पादों जैसे व्यवसायों का विनिवेश किया गया।
 

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.पत्रकारिता को बदलाव का माध्यम मानने वाले प्रदीप सिंह एक दशक से दिल्ली में रहकर पत्रकारिता और लेखन से जुड़े हैं। दिल्ली से प्रकाशित होने वाले कई अखबारों और पत्रिकाओं से जुड़कर काम किया।

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