रिसर्च : बदलता परिवेश और जल संसाधनों के प्रबन्धन में उपयोगी जन भागीदारी

Submitted by Hindi on Fri, 12/04/2015 - 11:41
Source
राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की, पाँचवीं राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 19-20 नवम्बर, 2015

सारांश


मानव एक सामाजिक प्राणी है। इस जगत में जल, थल, एवं वायु में विचरण करने वाले सभी प्राणियों हेतु जल ही जीवन है। इस लेख का उद्देश्य यह है कि हमारे लिये वर्तमान बदलते परिवेश में जल की एक-एक बूँद महत्त्वपूर्ण है। हमें समय रहते उसके उचित प्रबन्धन की व्यवस्था कर लेनी चाहिए अन्यथा यह समस्या सम्पूर्ण जगत में विकराल रूप धारण कर सकती है। प्रकृति ने हमें इस धरातल पर स्वछंद विचरण की जो स्वीकृति प्रदान की है, हमें उसका गलत फायदा नहीं उठाना चाहिए अपितु अहसानमंद होकर उसे नमन करना चाहिए। भविष्य में यदि किसी भी मानव, जलचर, नभचर या अन्य जीव को अपना अस्तित्व बनाए रखना है तो उसे जल के महत्व को समझते हुए उसके उचित प्रबन्धन का प्रयत्न करते हुए उपलब्ध जलस्रोतों को बचाए रखना होगा।

बदलता परिवेश हमें इस पुनीत कार्य हेतु नित्य बाध्य कर रहा है क्योंकि हो सकता है कि इस दुनिया में अगला विश्व युद्ध जल के लिये ही हो जाए। देश के विभिन्न भागों में हम निरन्तर यह खबर पढ़ते-सुनते रहते हैं कि अमूक स्थान पर पानी को एकत्र करते समय दो घड़ों में घमासान लड़ाई हुई जिसमें इतने लोगों की जान चली गई। अतः दिन प्रतिदिन विकराल रूप धारण करती जा रही इस समस्या के निदान के लिये हमें जल प्रबन्धन में जनता की भागीदारी को सुनिश्चित करना ही होगा। जनता जनार्दन होती है।

यदि उसकी समझ में एक बार यह बात आ जाए कि प्रकृति ने हमें जो हवाएँ पानी व अन्य चीजें मुफ्त में उपलब्ध कराई हैं तो वह इनके संचयन के नवीन तरीकों पर गौर करते हुए कुछ उपयोगी सुझावों को अपनाने में देर नहीं लगाएगी। प्लेटों के शब्दों में ‘कोई भी किसी को आसानी से नुकसान पहुँचा सकता है, लेकिन हर व्यक्ति दूसरों के साथ अच्छा नहीं कर सकता है।’ क्लाडियस टॉलमी के मतानुसार ‘भूगोल पृथ्वी की झलक को स्वर्ग में देखने वाला आभामय विज्ञान है।’ स्ट्रैबो के विचारानुसार “भूगोल एक ऐसा स्वतन्त्र विषय है, जिसका उद्देश्य लोगों को इस विश्व का आकाशीय पिण्डों का स्थल महासागर जीव जन्तुओं वनस्पतियों फलों तथा भू-धरातल के क्षेत्रों मे देखी जाने वाली प्रत्येक अन्य वस्तु का ज्ञान प्राप्त कराना है।” प्रकृति द्वारा उपलब्ध जल की तीन अवस्थाएँ हैं - आसमान से प्राप्त जल, समुद्री जल तथा भू-स्तह से निकाला गया जल। ‘बिन पानी जग सूना’ यथार्थ में सटीक बैठता है। जल हमारी कृषि, औद्योगिक प्रतिष्ठान, घरेलू आवश्यकताएँ, मनोरंजन के साधनों एवं पर्यावरण हेतु परमावश्यक है।

प्रकृति द्वारा प्रदत्त इस धरोहर को हमें संजोकर रखना ही होगा। अन्यथा इसके भयंकर परिणाम हमारे सामने उभरकर आते देर नहीं लगेगी। पानी के बिना हमारा जीवन नीरस हो जाएगा। इसके उचित प्रबन्धन के तौर-तरीकों को अपनाकर ही हम अपनी धरोहर को सम्भालेंगे तो ही हमारी अगली पीढ़ी यहाँ सजीव रह पाएगी अन्यथा यह जीवन नीरस हो जाएगा। नभ, जल, थल व अन्यत्र जीवन-यापन का मार्ग सभी जीवों व प्राणियों के लिये निरर्थक सिद्ध हो जाएगा। जहाँ एक ओर वर्षाजल में निरन्तर कमी आ रही है वहीं दूसरी ओर नदी व नालों का पानी भी कम होता जा रहा है।

गुजरात सरकार ने इस बात को बहुत पहले ही भाँप लिया था और सौराष्ट्र जैसे सूखे क्षेत्रों में जल प्रबन्धन के उचित तरीकों को अपनाकर इस समस्या से काफी हद तक निदान पा लिया है। फिर भी यह देश व दुनिया के सभी क्षेत्रों में वहाँ की परिस्थिति अनुसार फेरबदल कर अपनाया जा सकता है और उन्नत तकनीकों का लाभ उठाकर ही जल की एक-एक बूँद का संचय किया जा सकता है। सबका साथ सबका विकास सदैव अपेक्षित रहता है। इसलिये बदलती परिस्थितियों में हमें जल संरक्षण प्रबन्धन में जनता को हर स्तर पर भागीदार बनाना होगा। जनता जनार्दन को हर स्तर पर उसके हित में उसकी जिम्मेदारियों का अहसास कराते रहना होगा।

जिस दिन जनता को यह समझ आ जाएगा कि यह कार्य उसके हित में है तो फिर वह इसे स्वेच्छा से अपनाएगी। वर्षाजल संचयन हेतु भवन की छत से एक पाइप लगाकर उसे नीचे भूमि में किसी गड्ढे या कुँए में जोड़ दिया जाता है। इस तकनीक द्वारा वर्षाजल भूमि के अंदर पहुँचा दिया जाता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से भूमिगत जलस्तर को बढ़ाया जा सकता है। भविष्य में वह दिन दूर नहीं होगा जब विश्व के अनेक देश भारत का उदाहरण देते हुए इसकी उन्नत प्रौद्योगिकियों को अपनाकर लाभ उठाएँगे। इससे जहाँ एक ओर हमारा ‘मेक इन इंडिया’ का सपना साकार होगा वहीं दूसरी ओर विश्व में भारत की एक निर्मल छवि भी बन सकती है ।

Abstract
Man is a social creature. Water is life for all creatures who is living in water, land, air etc. in this world. The purpose of this article is that a single drop of water for us in the current changing environment is important. We should arrange in time the proper management otherwise this problem may become worse in the entire world. Absolute variance us on the ground of the nature of which is approved, we should not take advantage of his wrong but should appreciate and salute him. In the future, if any human, aquatic or other organism to maintain its existence, he understands the importance of water and its proper management will strive to preserve the available water sources. This sacred work we continually changing environment is bound to be the next war in the world only to be burned. In different parts of the country, we continue to hear the news, reading the various places when water collects in two faction’s fierce battle in which so many lives were lost. So going to become worse day by day to fix the problem, we must ensure public participation in water management. There is canaille. Pluto's says, “nobody can damage easily, but everyone is getting along with others can not.” According to Cladious tolmy” Geography Earth Sciences Abamay viewing habits that are reflected in heaven.” As considered by Strabo ”Geography is an independent subject, aimed at the world of people, objects of aakishay pinds, place, ocean, creatures and animals, plants, fruits, and land surface in the areas visited to gain knowledge of each other object.” There are three stages of water provided by nature & from the sky, seawater and undergroud water. water, the world is empty' reality fits in. The water in our agricultural, industrial, household necessities, entertainment resources and environment is critical for us. Nature provided us cherish this heritage will have to. Otherwise it will not be long coming horrible consequences emerged before us. Our lives will become monotonous without water. The appropriate management practices by adopting this, then we will take our heritage, our next generation will be living here, otherwise it would be boring life. Sky, land, water and living elsewhere route will prove to be useless for all organisms and creatures. Where the rain water in a continuous, while declining river and drainage water is becoming less. The Gujarat government had already sensed this and adopted the water management technologies which were implemented for very dry areas such as Saurashth. Surasht adopting appropriate methods of diagnosing the problem to occur is blunted. However, in all regions of the country and the world, there may be adopted altering the circumstances and take advantage of the advanced technologies of the water can be an accumulation of a drop. The growth is always required for all the people who are living in this world. Therefore, water conservation management in the changing circumstances, we will make public participation at every level. Canaille at every level in the interests of his responsibilities will be spread. The day people will come to understand that this work is in its interest, and then they would adopt it voluntarily. Harvesting rainwater from the roof of the building by putting a pipe in the ground is added in a pit or underground water tank. The technology of rain water inside the ground is reached. Through this process can be extended to the water table. In the future it will not be long when many countries of the world, citing the adoption of advanced technologies will benefit. On one hand it is our in India' dream will come true on the other hand a clear image of India in the world can become popular.

प्रस्तावना


जल ही जीवन है। यह पुरातन सत्य है। प्रकृति ने हमें स्वछंद विचरण की अनुमति दी है तो इसके लिये हमें उसका अहसानमंद होना चाहिए। इस भूमि पर यदि किसी भी मानव जलचर, नभचर या अन्य जीव को अपना अस्तित्व बनाए रखना है तो उसे पानी के महत्व को अवश्य समझना होगा। जल संसाधन में पानी के वह स्रोत होने चाहिए जिससे कि वह सबके लिये उपयोगी सिद्ध हो सके। बदलता परिवेश हमें इस बात की ओर निरन्तर बाध्य करता जा रहा है कि हमें जल प्रबन्धन में जनता की भागीदारी को सुनिश्चित करना चाहिए।

जल को परिभाषित करते हुए कुछ विद्वानों व प्रबुद्ध वैज्ञानिकों ने इसे इस तरह परिभाषित किया है। महान दार्शनिक प्लेटो के शब्दों में ‘कोई भी किसी को आसानी से नुकसान पहुँचा सकता है लेकिन हर व्यक्ति दूसरों के साथ अच्छा नहीं कर सकता है।’ प्रसिद्ध वैज्ञानिक क्लाडियस टॉलमी के रूप में ‘भूगोल पृथ्वी की झलक को स्वर्ग में देखने वाला आभामय विज्ञान है।’ इसी तरह स्ट्रैबो के विचारा अनुसार ‘‘भूगोल एक ऐसा स्वतन्त्र विषय है जिसका उद्देश्य लोगों को इस विश्व का आकाशीय पिण्डों का स्थल महासागर जीव व जन्तुओं वनस्पतियों फलों तथा भू-धरातल के क्षेत्रों में देखी जाने वाली प्रत्येक अन्य वस्तु का ज्ञान प्राप्त कराना है।’’

प्रकृति ने इस बात का सभी के लिये विशेष ध्यान रखा है कि उन तक जल निश्चित मात्रा में उपलब्ध अवश्य रहे। यही कारण है कि इस धरातल पर साँस लेने वाले प्राणियों को जिन्दा बनाए रखने के लिये पानी को तीन अवस्थाओं में उपलब्ध कराया है अर्थात इस भूमि पर सामान्यतः जल हमें तीन अवस्थाओं में पाया जाता है। पहला आसमान से प्राप्त जल जोकि वाष्पीकरण की क्रिया से तथा मेघों या बादलों द्वारा वर्षा के माध्यम से हम तक पहुँचता है। दूसरा हमें समुद्र से मिलने वाला जल है जिसे हम समुद्री जल के नाम से जानते हैं। यह हमें कभी हिमशैल के रूप में तो कभी पहाड़ों में हिमनद और वहाँ से बहकर आने वाली नदियों के माध्यम से प्राप्त होता है। तीसरे रूप में वह जल आता है जोकि भूमि की सतह से निकालकर हम तक उपलब्ध हो पाता है। आज की परिस्थितियों पर यदि ध्यान दिया जाए तो हम यह कह सकते हैं कि ‘बिन पानी जग सूना’ अर्थात पानी के बगैर आदमी जिन्दा नहीं रह सकता है। बिना जल के यह संसार सबके लिये नीरस सिद्ध होता है। पानी के कुछ महत्त्वपूर्ण क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ हम निरन्तर उससे समीपता बनाए रखते हैं। उदाहरण के लिये कृषि औद्योगिक प्रतिष्ठान घरेलू कार्य मनोरंजन साधनों तथा पर्यावरण को बनाए रखने के लिये उसकी दैनिक गतिविधियों हेतु इसका उपयोग परमावश्यक है। ये ऐसे स्थल हैं जहाँ हमें निरन्तर ताजे पानी की निरन्तर आवश्यकता बनी रहती है।

किसी भी क्षेत्र का जल संसाधन वहाँ के सामाजिक राजनीतिक एवं आर्थिक विकास के सम्बन्ध के महत्त्वपूर्ण सूचकों को प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त जल गुणवत्ता सूचकांक उस क्षेत्र के जल संसाधन के निरन्तर उपयोग को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों को व्यक्त करता है। भारत जैसे विशाल देश में जहाँ कहीं न कहीं पानी की कमी सदैव बनी रहती है वहाँ जल की उपलब्धता एवं गुणवत्ता उस क्षेत्र की भूमि वायु एवं जल के पारस्परिक उपयोग को दर्शाती है। क्षेत्रीय जल प्रबन्धन में उस क्षेत्र के सभी तत्वों को उद्भाषित करना चाहिए जो जल स्रोत के साथ-साथ उपभोक्ता पर पड़ने वाले प्रभाव को इंगित करता है। एकीकृत क्षेत्र प्रबन्धन भौगोलिक वातावरण में पूर्ण समझ एवं अविरल प्रबन्धन हेतु दिशा प्रदान करता है जो जल स्रोत की उपलब्धता एवं गुणवत्ता आधारित होता है। यदि हम कोई संरचनात्मक ढाँचा तैयार करते हैं तो फिर हमें यह अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि किसी भी भौगौलिक क्षेत्र के झील के जल संसाधन प्रबंधक अंततः उस क्षेत्र के जन समुदाय के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक मूल्यों एवं समृद्धि के लिये जिम्मेदार है। झील संसाधन प्रबन्धन के दौरान हमें किसी भी क्षेत्र के सामाजिक एवं राजनीतिक लक्ष्य को इंगित कर देना चाहिए। इन सामाजिक एवं राजनितिक लक्ष्य को परिभाषित करने का दायित्व सरकार के जल संसाधन मन्त्रालय के ऊपर रहता है। वर्तमान समय में इन दायित्वों का निर्वाह केन्द्र एवं राज्य सरकार के विभिन्न कार्यालयों में अनेक स्तरों पर किया जा रहा है। जिसमें विभिन्न गैर सरकारी संगठन भी अपनी विशेष भूमिका अदा कर रहे हैं।

विश्व अर्थव्यवस्था में जल एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है क्योंकि यह रासायनिक पदार्थों की एक विस्तृत श्रृंखला हेतु विलायक के रूप में कार्य करता है। यह उद्योग धन्धों और परिवहन व्यवस्था को सुगम बनाता है। प्रायः यह पाया गया है कि उपलब्ध मीठे जल की लगभग सत्तर प्रतिशत मात्रा की खपत हमारे कृषि कार्यों में होती है। साफ और ताजा पेयजल मानव और अन्य प्राणी जीवन के लिये आवश्यक है। यदि देखा जाए तो जल लगातार एक चक्र मे घूमता रहता है जिसे हम लोग जलचक्र कहते हैं। इस प्रक्रिया में जल वाष्पीकरण क्रिया द्वारा भाप बनकर उड़ जाता है तथा दूसरी ओर वर्षाऋतु के दौरान अधिकांश जल बहकर नदियों के माध्यम से विशाल समुद्र में समा जाता है। हवा, जल, वाष्प को स्थल के ऊपर से उड़ा ले जाती है जिस गति से यह बहकर सागर में पहुँचता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि पृथ्वी पर जल की एक बहुत छोटी मात्रा पानी की टंकियों जैविक निकायों विनिर्मित उत्पादों के भीतर और खाद्य भंडारों मे निहित है। बर्फीली चोटियों हिमनद एक्वीफर या झीलों का जल कई बार धरती पर जीवन के लिये साफ जल उपलब्ध कराता आया है। दुनिया के कई भागों में खासकर विकासशील देशों में आजकल भयंकर जलसंकट छाया हुआ है। आरम्भिक तौर पर यह अनुमान लगाया गया था कि वर्ष 2025 तक इस संसार की आधी से भी अधिक जनसंख्या को जल संकट की समस्या से निरन्तर रूबरू होते रहना पड़ेगा। इसलिये समय रहते कुछ प्रबंध करना नितांत आवश्यक है।

यदि प्राकृतिक और पारिस्थितिकी प्रणालियों को हानि पहुँचाए बिना ही हम एक निश्चित सामाजिक इतिहास और विज्ञान व प्रौद्योगिकी के विकास के चरण में ही सही कार्य करते हैं तो इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जल संसाधनों की क्षमता पानी को ही लगातार संदर्भित करती रहती है । कृषि कार्यों हेतु अधिकतम पानी की क्षमता का उपयोग किया जाता है। हमारे उद्योग धन्धों में इसके बिना कार्य करना नामुमकिन है। दिन ब दिन बढ़ती ग्रामीण व शहरी आबादी की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सामाजिक आर्थिक वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास और परिवर्तन की क्षमता को बनाए रखने के लिये इसका निरन्तर उपयोग किया जाता है।

भारत की केन्द्र सरकार ने समय की नजाकत को पहचानते हुए जल गुणवत्ता मूल्यांकन प्राधिकरण के लिये कार्य आरम्भ किया और राष्ट्रीय जल संसाधनों के सम्बन्ध में प्रदूषण से जुड़ी समस्याओं को मद्देनजर रखते हुए पर्यावरण एवं वन मन्त्रालय ने 22 जून 2001 को एक अधिसूचना जारी करते हुए कहा कि मामले की गम्भीरता को ध्यान में रखते हुए 29 मई 2001 से जल संसाधन मन्त्रालय के अन्तर्गत जल गुणवत्ता मूल्यांकन प्राधिकरण का गठन किया गया। केन्द्र और राज्य एजेन्सियों के बीच समन्वय क्रिया में सुधार लाने हेतु तथा जल संसाधनों की गुणवत्ता में उन्नति लाने हेतु यह कार्य आरम्भ किया गया था जिसका मुख्य कार्य शुरू की जाने वाली योजनाओं या स्कीमों की समीक्षा व मूल्यांकन करना था। इसके साथ ही साथ समस्याग्रस्त क्षेत्रों की पहचान के लिये जल गुणवत्ता सम्बन्धी आँकड़ों के विवरण के अर्थों की समीक्षा तथा स्थाई आधार पर गुणवत्ता सुधारने के लिये और कार्य योजनाएँ तैयार करने की भी जिम्मेदारी इसे सौंपी गई थी।

इसके अतिरिक्त इस प्राधिकरण के लिये निगरानी व मूल्यांकन के लिये उपयुक्त स्थानों की पहचान और समयानुसार जल गुणवत्ता से सम्बन्धित विभिन्न मुद्दों को देखने के लिये राज्यों में जल गुणवत्ता समीक्षा समितियाँ गठित की गई हैं। विशेषज्ञ समिति और कार्य दल की सिफारिशों के आधार पर जून 2005 में सभी जल गुणवत्ता निगरानी एजेंसियों द्वारा अपनाए जाने के लिये एक समान निगरानी प्रक्रिया सम्बन्धी एक गजट अधिसूचना जारी की गई थी। उपनदी प्रणालियों में न्यूनतम बहाव के मसलों को देखने के लिये प्राधिकरण द्वारा एक कार्यदल भी गठित किया गया था। इस कार्य समूह से प्राप्त प्रारूप रिपोर्ट पर चर्चा जल गुणवत्ता मूल्यांकन प्राधिकरण की 23 मई 2008 को आयोजित बैठक में इस बात पर सहमति बनी थी कि समूह को कुछ और अध्ययन करने तथा पहले से लागू न्यायालयीन निर्देशों पर ध्यान देने की जरूरत है जिनका अनुपालन न करने पर कानूनी समस्या उत्पन्न हो सकती है।

जल गुणवत्ता मूल्यांकन प्राधिकरण के निर्णयों के अनुसार इसकी सहायता के लिये जल गुणवत्ता निगरानी समिति का गठन किया गया। जल गुणवत्ता मूल्यांकन प्राधिकरण और जल गुणवत्ता निगरानी समिति के कार्यों की प्रगति की निरन्तर समीक्षा की गई। विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा जल गुणवत्ता प्रबन्धन योजना तैयार की गई। राज्य जल गुणवत्ता समीक्षा समितियों को अधिक प्रभावी बनाने तथा जल गुणवत्ता निगरानी के लिये काम कर रही विभिन्न संस्थाओं के मध्य समन्वयन के लिये राष्ट्रीय स्तर पर एक तथा राज्य स्तर पर अनेक संगोष्ठियाँ आयोजित की गईं। राज्य स्तरीय जल गुणवत्ता समीक्षा समितियों के लिये जल गुणवत्ता प्रबन्धन योजना के विकास पर केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड ने एक राष्ट्रीय कार्यशाला भी आयोजित की थी। ये सभी सूचनाएँ विषय वस्तु प्रबन्धन दल के राष्ट्रीय पोर्टल पर प्रदर्शित की गई समीक्षा रिपोर्ट के स्रोतों से प्राप्त सूचना के आधार पर उपलब्ध कराई जा रही है। इतना कुछ होने पर भी यदि आज की परिस्थितियों पर नजर दौड़ाई जाए तो उपलब्ध जल का जितना प्रयोग हो रहा है उससे अधिक जल तो प्रदूषित हो रहा है। यहाँ तक कि अधिकांश जल व्यर्थ बहकर बर्बाद हो रहा है। इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हमें आज जल प्रबन्धन की महती आवश्यकता महसूस की जा रही है।

भारत जैसे विशाल देश में जल संसाधनों के प्रबन्धन हेतु किए जा रहे प्रयासों का विवरणः
अ. केन्द्रीय जल आयोग भारत सरकार नई दिल्ली के अन्तर्गत वर्ष 1984 में जल संसाधन प्रबन्धन एवं प्रशिक्षण योजना के सम्बन्ध में सिंचाई अनुसंधान एवं प्रबन्ध संगठन की स्थापना की गई। इसका मुख्य उद्देश्य जहाँ एक ओर सिंचाई प्रणालियों में सुधार करना था वहीं दूसरी और सिंचाई से जुड़ी संस्थाओं को कुशल बनाना और उनका रख-रखाव करना था।

आ. राष्ट्रीय स्तर पर एक जल प्रबन्धन योजना बनाने के लिये एक परियोजना के रूप में वर्ष 1986 में विश्व बैंक के सहयोग से भारत सरकार की ओर से राष्ट्रीय जल प्रबन्धन परियोजना शुरू की गई थी। इस परियोजना को आरम्भ करने का मूल उद्देश्य देश के कृषि जन्य क्षेत्र का विकास करना था।

इ. केन्द्र सरकार की नीतियों को क्रियान्वित करने हेतु केन्द्रीय जल आयोग ने राज्यों के प्रतिनिधियों हेतु एक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का कार्यक्रम आरम्भ किया जिसके अन्तर्गत राज्यों से आए प्रतिनिधियों को कार्यशाला के आयोजन सेमिनार श्रम इंजीनियर के अनुभवों का आदान प्रदान करने जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से देश के विभिन्न राज्यों के पदाधिकारियों में प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण कराना आरम्भ किया गया।

ई. भारत सरकार ने एक अधोभौमिक जल संसाधन योजना भी आरम्भ की थी। यह योजना केन्द्रीय जल आयोग के माध्यम से उन क्षेत्रों में आरम्भ की गई जहाँ अधोभौमिक जल उपयोग के क्षेत्र में अधिक कार्य नहीं हुआ था। उदाहरण के रूप में भारत के पूर्वी क्षेत्रों में नलकूप निर्माण और उन नलकूपों को क्रियाशील बनाने के लिये केन्द्रीय योजना तैयार की गई थी।

उ. इसी अनुक्रम में भारत सरकार ने मार्च 31 2002 से एक नवीन जल नीति लागू की थी। इस नीति के अनुसार ही जल संरक्षण की प्रक्रिया को अगली पंचवर्षीय योजना तैयार करते समय एक मुख्य विषय में शामिल किया गया था।

ऊ. वर्तमान भारत सरकार ने देश की नदियों को जोड़ने के लिये विशेष कदम उठाए हैं जिनका परिणाम हमें निकट भविष्य में शीघ्र ही उपलब्ध हो जाएगा।

जल के प्रबन्धन व संरक्षण हेतु कुछ सदाबहार एवं बहुलाभकारी प्रणालियाँ


जल प्रबन्धन प्रणालियों के रूप में जिन क्षेत्रों में ढाल अधिक नहीं होती है वहाँ पर मंटुआर बंध नामक पुश्ते लगाए जा सकते हैं। इनके माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में किसान आपसी सहयोग से यदि यह पुश्ता लगा ले तो उनके खेत में जब भी पानी भर जाएगा तो शेष बचा अतिरिक्त पानी नीचे के खेत में जाकर भरने लगेगा। ऐसा करने से निचले किसान को भी उसका लाभ मिल सकेगा। गैर मॉनसून के महीनों में भूमिगत नालियों के जल को नदी के चैनलों में जाने से रोकने के लिये हमें ऐसे भूमिगत बाँधों का निर्माण करना चाहिए ताकि नदी के जल को प्रदूषित होने से रोका जा सके। छोटे और बड़े पोखरों और तालाबों का निरन्तर प्रक्रिया के दौरान निर्माण किया जाना चाहिए। ये सभी दस मीटर तक गहरे होने चाहिए।

जिन क्षेत्रों में वर्षा कम होती है उन क्षेत्रों में ऐसे आधे हेक्टेयर क्षेत्रफल के तालाबों में जल ग्रहण की क्षमता पचास हेक्टेयर तक रखी जाए तो उसका परिणाम बेहतर सिद्ध हो सकता है। सुदूर क्षेत्रों के भूभागीय क्षेत्रों में फैले विशेष प्रकार के तालाब बनाए जाने चाहिए जिससे कि उनमें पानी का निरन्तर रिसाव होता रहे। यह प्रक्रिया सतही परिस्रवण ताल भी कहलाती है। किसी क्षेत्र के कुएँ या कूपों का जलस्तर घट रहा हो तो उनमें पम्प की सहायता से नदी का जल कुँओं में भर देना चाहिए। यदि किन्हीं क्षेत्रों में बड़ी और विशाल नदियाँ हैं तथा उनमें प्रतिवर्ष बाढ़ की समस्या का हमें निरन्तर सामना करना पड़ता है तो ऐसी अवस्था में इन क्षेत्रों में नदियों की बाढ़ को उन क्षेत्रों में मोड़ देना चाहिए, जिन क्षेत्रों में कुँए और तालाब हों।

देश के शिक्षित और अशिक्षित तथा लघु एवं सीमान्त किसानों को यह बात समझा दी जानी चाहिए कि बारिश के समय में यदि वर्षाजल उनके खेतों में भर जाता है तो ऐसी अवस्था में उस जल में समाहित मिनरलों को खेतों से बाहर बहकर जाने से रोकने का हरसम्भव उपाय उन्हें स्वयं करना होगा। समय की नजाकत को पहचानते हुए गाँव और शहरों की निकास नालियों को नदी के सम्पर्क से दूर रखने के लिये सभी वर्ग के लोगों को जागरूक करने की योजना को तुरन्त अमली जामा पहनाया जाना चाहिए जिससे कि हमें इसका तत्काल लाभ प्राप्त हो सके। बढ़ती आबादी और भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण देश के अनेक क्षेत्रों में ग्रीष्म काल के समय में भयंकर पेयजल संकट उत्पन्न हो जाता है।

यदि देखा जाए तो प्रतिवर्ष भूमि पर गिरने वाले वर्षाजल का अधिकांश भाग उन्नत तकनीकों के अभाव में व्यर्थ ही बहकर चला जाता है। ऐसी अवस्थाओं में हमें अपने घरों की छतों पर एकत्रित होने वाले वर्षाजल संरक्षण के सम्बन्ध में जारी की गई विभिन्न नवीनतम व प्राचीन तकनीकियों को अपनाकर उसकी कीमती बूँदों का संचयन करना चाहिए। सरकारी योजनाओं को अमली जामा पहनाने का कार्य आखिर जनता जनार्दन का ही है क्योंकि उसकी सक्षम भागीदारी से ही यह कार्य पूरा किया जा सकता है। गुजरात सरकार के मॉडल को वहाँ की जनता ने दिल से अपनाया और भरपूर लाभ पाया। हमें भी अपने क्षेत्र की परिस्थितिनुसार उसे अपनाना चाहिए। सबका साथ सबका विकास सदैव अपेक्षित रहता है। वैसे भी यदि देखा जाए तो आजकल किसी भी भवन या मकान की छतों को बनाने हेतु आधुनिक सामग्रियों का प्रयोग किया जा रहा है। यह इसलिये किया जाता है ताकि छत पर वर्षाजल का प्रभाव न पड़े।

आजकल ऊपरी छत से वर्षाजल के संरक्षण हेतु भवन की छत से पाइप लगा दिया जाता है। नीचे भूमि पर पाइप द्वारा छत वाले पाइप को जोड़ दिया जाता है। इस प्रकार जहाँ एक ओर पाइप का एक छोर वर्षाजल को प्राप्त करने के लिये छत से जुड़ा होता है, वहीं उसका दूसरा सिरा भवन से कुछ आगे एक कुएँ से जुड़ा होता है। यदि कुँआ न हो तो पिट या गड्ढा भी खोद दिया जाता है या पुनर्भरण हेतु एक खाई खोद दी जाती है। इस तकनीक द्वारा वर्षाजल भूमि के अंदर पहुँचा दिया जाता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से अर्थात वर्षाजल के समुचित उपयोग करने से भूमिगत जलस्तर को बढ़ाया जा सकता है। इस प्रक्रिया को विभिन्न शहरी क्षेत्रों में अपनाया गया है जिसके बहुत ही लाभकारी परिणाम हमारे सामने आए हैं। इन उन्नत तकनीकों का अधिकाधिक लाभ प्राप्त करते हुए हमें भूमि के पाइप वाले सिरे की निरन्तर सफाई करनी होगी ताकि वह बंद न होने पाए। इसलिये यदि निरन्तर सफाई प्रक्रिया को ध्यान में रखा जाए तो फिर हमें इसके लाभ ही लाभ देखने में आएँगे।

अन्त में हम कह सकते हैं कि बदलती परिस्थितियों में हमें जल संरक्षण प्रबन्धन में जनता को हर स्तर पर भागीदार बनाना होगा। जनता जनार्दन को हर स्तर पर उसके हित में उसकी जिम्मेदारियों का अहसास कराते रहना होगा। जिस दिन जनता को यह समझ आ जाएगा कि यह कार्य उसके हित में है तो फिर वह इसे स्वेच्छा से अपनाएगी । वह दिन दूर नहीं होगा जब विश्व के अन्य देश भारत का उदाहरण देते हुए इसकी उन्नत प्रौद्योगिकियों को अपनाकर लाभ उठाएँगे। इससे हमारा ‘मेक इन इंडिया’ का सपना भी साकार हो सकता है।

सन्दर्भ
इंटरनेट व अन्य सन्दर्भों से प्राप्त सामग्री।
केन्द्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान, संतोष नगर, हैदराबाद-500059 (तेलंगाना राज्य), ई-मेलःsryadav1220@gmail.com, sryadav@crida.in

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