रिसर्च : भूजल में फ्लोराइड : समस्या एवं निवारण

Submitted by Hindi on Fri, 12/04/2015 - 12:48
Source
राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की, पाँचवीं राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 19-20 नवम्बर, 2015

सारांश


भारत जैसे विकासशील देश में भूजल जीवन का एक आवश्यक प्राकृतिक स्रोत है। चूँकि लगभग 80 प्रतिशत पीने के पानी की व्यवस्था भूजल से की जाती है। भूजल को सतही जल से शुद्ध माना जाता है और आज भी ग्रामीण व कई शहरी क्षेत्रों में इसे बिना शुद्धिकरण के उपयोग में लाया जाता है। मानवीय क्रियाकलापों के अलावा कुछ प्राकृतिक कारण भी भूजल प्रदूषण के लिये उत्तरदायी हैं। इसमें से एक फ्लोराइड समस्या है जो प्राकृतिक जनित है। भूजल में फ्लोराइड मुख्यतः फ्लोराइड युक्त चट्टानों के धीरे-धीरे रिसाव से आता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पीने के पानी में फ्लोराइड की अधिकतम मात्रा 1.0 पी.पी.एम. निर्धारित की है। भारत में लगभग सभी राज्य भूजल में अधिक फ्लोराइड की समस्या से ग्रस्त हैं। भूजल में फ्लोराइड की मात्रा अधिकतम सीमा से कई गुना तक पाई गयी है। भूजल के अतिरिक्त अन्य खाद्य पदार्थों में भी फ्लोराइड पाया जाता है। परन्तु भूजल द्वारा फ्लोराइड ग्रहण ही मुख्यतः कारण है। फ्लोराइड युक्त पानी के लगातार सेवन से फ्लोराइड शरीर में उपस्थित कैल्शियम को विस्थापित कर दाँत व हड्डियों में विकृति उत्पन्न कर देता है व साथ ही शरीर की अन्य एन्जाइमी क्रियाओं में बाधा उत्पन्न करता है जिसका कारण फ्लोराइड की अधिक विद्युतऋणता है।

पानी में से फ्लोराइड निष्कासन की कई विधियाँ विकसित की गयी हैं जिनमें अवक्षेपण, आयन-विनिमय, अधिशोषण, नैनो फिल्टरेशन व विपरीत परासण इत्यादि हैं। इनमें से अधिशोषण तकनीक सर्वाधिक सरल व सस्ती है और इसमें न ही अधिक देख-रेख की आवश्यकता है। चूँकि अधिकतर फ्लोराइड पीड़ित क्षेत्र ग्रामीण व गरीब हैं जो अधिक महँगी व जटिल तकनीक का उपयोग नहीं कर सकते।

इसी क्रम में लेखक ने आसानी से उपलब्ध भूजल का उपयोग कर 90 प्रतिशत तक फ्लोराइड निष्कासन में सफलता प्राप्त की है। साथ ही यह तकनीक पानी में कैल्शियम व मैग्नीशियम जैसे तत्वों को बढ़ाकर उसे और उपयोगी बनाती है।

कुँजी शब्द: भूजल, फ्लोराइड, फ्लोराइड निष्कासन

Abstract
Groundwater is an essential natural resource in many developing countries like India. It caters to 80% of the total drinking water requirement. Groundwater is supposes to more pure than surface water and being consumed in rural as well as urban areas without any purification. Other than human activities some natural factors are responsible for groundwater pollution. Fluoride problem is one of them which mainly natural in origin. Fluoride enters the groundwater through weathering of fluoride containing rocks. The maximum permissible limit of fluoride in drinking water is 1.0 ppm as per World Health Organisation. Fluoride concentration has reported in many times higher than permissible limit in many parts of our country. Some food materials also contain fluoride. But groundwater is a potential source of fluoride intake. Continuous consumption of fluoride rich water replaces calcium in bones and teeth. Fluoride being highly electronegative element, it can also disturb different enzymatic activities in the body.

Several defluoridation techniques have developed which include precipitation, ion-exchange, adsorption, nano-filteration and reverse osmosis etc. adsorption is a most simple and cheap technique which requires no regular maintenance. Mostly affected people belong to rural and poor community and cannot afford costly and complicated techniques.

In this continuity the author developed a defluoridation technique which is simple, safe and cheap. The suggested technique makes water more healthy and useful by increasing calcium and magnesium elements.

प्रस्तावना


भूजल में अलग-अलग रूपों में पाया जाने वाला फ्लोराइड एक जाना-माना ऋणायन है।1 भूजल में इसकी सान्द्रता के लिये वातावरणीय व मानवीय दोनों ही कारक उत्तरदायी हैं।2 क्रिस्टलीय व सेडीमेन्ट्री चट्टानों जैसे-ग्रेनाइट, माइका, बेसाल्ट, लाईमस्टोन, सैन्डस्टोन, फॉस्फोराइट आदि में उच्च मात्रा में फ्लोराइड पाया जाता है जो धीरे-धीरे रिसाव से भूजल में प्रवेश करता है।3 पानी में अत्यधिक फ्लोराइड एक विश्व स्तर पर जन स्वास्थ्य समस्या बन गया है। विश्व के विभिन्न देशों जैसे भारत, पाकिस्तान, चीन, श्रीलंका, मंगोलिया, स्पेन, पोलैण्ड, इटली, मैक्सिको, थाईलैण्ड, अफ्रीका आदि में उच्च फ्लोराइड स्तर पाया गया है। खेतों में उपयोग किये जा रहे कीटनाशकों व उर्वरकों में भी फ्लोराइड पाया जाता है जो मृदा में रिसकर अन्ततः भूजल में प्रवेश करता है। विकासशील देश इस समस्या से अत्यधिक ग्रस्त हैं चूँकि भूजल ही पीने के पानी का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। लगातार बढ़ती जनसंख्या व प्रदूषण ने और गहरे स्रोत बनाने पर दबाव बनाया है और गहराई बढ़ने से फ्लोराइड सान्द्रता और बढ़ जाती है। 4

पीने का पानी फ्लोराइड का एक प्रमुख स्रोत है। यद्यपि कुछ दवाईयों, भोजन, टूथपेस्ट, चाय में भी फ्लोराइड पाया जाता है। शरीर में प्रवेश करने के बाद फ्लोराइड का 99 प्रतिशत हड्डियों व दाँतों में जमा हो जाता है। फ्लोराइड आयन की कैल्शियम के प्रति अत्यधिक बंधुता है जिससे यह दाँतों व हड्डियों के कैल्शियम को विस्थापित कर फ्लोरोसिस बीमारी को बढ़ाता है।5 जिसमें हड्डियाँ तिरछी व भंगुर हो जाती है और दाँतों पर गहरे धब्बे हो जाते हैं। बच्चे इसके प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं चूँकि उनके शरीर में हड्डी व दाँत बनने की प्रक्रिया में होते हैं।6 फ्लोराइड के घातक प्रभाव किडनी, फेफड़े, थाइराईड व एन्जाइम पर भी ज्ञात किये गये हैं।7

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पीने के पानी में अधिकतम फ्लोराइड 1.5 पी.पी.एम. निर्धारित की है। यद्यपि भारत में 1990 में यह घटाकर 1.0 पी.पी.एम. कर दी थी। यद्यपि पानी से फ्लोराइड निष्कासन की अनेक विधियाँ जैसे-अधिशोषण, आयन विनिमय, अवक्षेपण, नैनो फिल्टरेशन, रिवर्स ऑस्मोसिस, दोनेन डायलाईसिस है लेकिन कमियाँ भी हैं।8 नैनो फिल्टरेशन, रिवर्स ऑस्मोसिस व डोनेन डायलॉसिस तकनीक अत्यधिक महँगी है व लगातार रख-रखाव की जरूरत रहती है। अधिशोषण, आयन-विनिमय व अवक्षेपण विधियाँ सरल हैं जिनमें विभिन्न कैल्सियम व एल्यूमिनियम यौगिकों (कार्बन, क्ले, जियोलाइट, बायो पदार्थ, नैनो पदार्थ) का उपयोग कर फ्लोराइड निकाला जाता है।9 इनमें से कुछ अम्लीय पीएच पर कार्य करती है जो पीने के पानी के लिये अनुपयुक्त है जबकि कुछ हैवी मेटल व लैन्थेनाइड को उपयेाग करते हैं जो पीने के पानी में इनकी सान्द्रता बढ़ा देते हैं और बायो पदार्थ के उपयोग से पानी में बैक्टीरिया व फंगस की शिकायत रहती है। सक्रिय ऐलूमिना की अच्छी फ्लोराइड निष्कासन प्रवृत्ति है परन्तु यह भी अम्लीय पी.एच. पर सफल है और पानी में ऐल्यूमिनियम की सान्द्रता बढ़ाता है जो एल्जाइमर बीमारी का कारण भी है।10

फ्लोराइड एक विश्वव्यापी समस्या है जिससे 200 मिलियन लोग और लगभग 25 देश ग्रस्त हैं। एक सरल, सस्ती, सुरक्षित तकनीक अवश्य ही विश्व पटल पर रूचिकर होगी। इस सन्दर्भ में हमने ताप सक्रिय, जियो पदार्थ उपयोग कर फ्लोराइड निष्कासन का आयन किया है।

सामग्री एवं विधि


पदार्थ- डोलोमाइट पत्थर को पाउडर में बदला गया है और 150µm छलनी से छानकर मफल फरनेस में 200, 400, 600 व 800 डिग्री सेन्टीग्रेड पर 2 घंटे गर्म किया गया और एयर टाईट बोतल में बंद कर दिया गया।

रसायन - सभी रसायन ई. मर्क लिमिटेड, भारत के उपयोग किये गये। 1000 पीपीएम फ्लोराइड स्टोक विलियन को 2.21 ग्राम सोडियम फ्लोराइड को 1 ली. मिल. क्यू. पानी में घोला गया। पीएच. के लिये 0.5 M NaOH o 0-5 M HNO3 उपयोग किया गया।

उपकरण- मायन सैल्विटिव इलैक्ट्रोड (ISE) विधि HI-98172 ISE मीटर द्वारा फ्लोराइड आकलन किया गया।

विधि- विभिन्न बैच प्रक्रिया द्वारा फ्लोराइड निष्कासन पर पीएच, मात्रा, समय व प्रारम्भिक फ्लोराइड सान्द्रता का अध्ययन किया गया। सभी प्रक्रिया दो बार की गई। प्रयोग के लिये 50 मि.ली. 500 पीपीएम प्रारम्भिक फ्लोराइड सान्द्रता को 250 मि.ली. पोलीप्रोपाइलीन फ्लास्क में लिया गया। सभी प्रयोग स्थिर व गतिक दोनों अवस्थाओं में किये गये।

परिणाम एवं संवाद


डोलोमाइट एक सेडीमेन्ट्री रॉक मिनरल है। जिसमें कार्बोनेट आयन की सतह एकान्तर क्रम में कैल्शियम व मैग्नीशियम आयन से अलग रहती है। 800 डिग्री सेन्टीग्रेड ताप पर गर्म करने से इसमें आंशिक विघटन हो जाता है और इसका सतही क्षेत्रफल भी 6-7 गुना बढ़ गया। साथ ही छिद्रों का आकार व आयतन भी बढ़ गया। एक्स आर डी बनावट में भी इसकी पुष्टि हो गयी।

फ्लोराइड निष्कासन प्रक्रिया में प्रारम्भिक एफ सान्द्रता 500 पीपीएम व मात्रा 2 ग्राम/लीटर व 12 घंटे समय तथा 6-10 पीएच पर ली गई। इस प्रक्रिया में अधिकतम निष्कासन पीएच 7 पर पाया। टर्नर11 ने भी कैल्साइट द्वारा फ्लोराइड निष्कासन अम्लीय पीएच पर पीएच 7 पाया।

डोलोमाइट की घुलनशीलता व क्षारीय पीएच पर हाइड्रो-आक्साइड आयनों की प्रतिस्पर्धा से कम परिणाम प्राप्त हुए। स्थैतिक व गतिक अवस्थाओं में तुलनात्मक अध्ययन से पाया गया कि गतिक अवस्था में 5 मिनट में 98.87 प्रतिशत फ्लोराइड निष्कासन पाया गया। फान12 में विभिन्न जियो मैटेरियल द्वारा फ्लोराइड निष्कासन भी बहुत ही कम समय में ज्ञात किया गया।

गतिकी का अध्ययन करने पर पता चलता है कि अभिक्रिया द्वितीय कोटि की है। साथ ही अभिक्रिया लैंगम्योर व फैंडलिच अधिशोषण आइसोधर्म का भी पालन करती है। फ्लोराइड निष्कासन प्रक्रिया का अवलोकन करने पर प्रयोग के बाद पीएच बढ़ जाती है जो कार्बोनेट आयन के कारण है अर्थात हमारे अध्ययन में आयन-विनिमय प्रक्रिया से फ्लोराइड का निष्कासन पाया गया। दूसरे अध्ययनों से तुलनात्मक अध्ययन करने पर इस प्रयोग की उपयोगिता सिद्ध होती है। जैसा कि तालिका -1 में दिखाया गया है।

तालिका-1 विभिन्न पदार्थों द्वारा फ्लोराइड की निष्कासन क्षमता एवं समयसन्दर्भ-

1. एमीनी, मूलर, एवेस्पोर, रोजनबर्ग, एफ्यूनी, मोलर, सार एवं जोहनसन। स्टेटिसाटिकल मॉडलिंग ऑफ ग्लोबल जियोजेनिक फ्लोराइड कंटामिनेशन इन ग्राउंड वाटर्स। एन्वायर्नमेंटल साइंस एंड टैक्नोलॉजी, 2008, 42, 3632-3638
2. एपम्बायर, बोचली एवं माइकल। जियोकेमेस्ट्री, जेनेसिस एण्ड हेल्थ इम्प्लीकेशन्स ऑफ फ्लोरिफेरस ग्राउंड वाटर्स इन द अपर रिजन ऑफ घाना। एन्वायरन्मेंटल जियोलॉजी, 1997, 33, 13-24
3. राइट। द हाइड्रोजियोलॉजी ऑफ क्रिस्टेलाइन बेसमेंट एक्वीफर्स इन अफ्रीका, जियोलॉजी, 1992, 66, 1-27
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5. शौलिस मोरे डकबर्थ, स्टडीज ऑन द केरियोस्टेटिक मैकानिज्म ऑफ फ्लोराइड, इन्टरनेशनल जनरल ऑफ डेंटिस्ट्री, 1994, 44, 263-273
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18. विजया, पोपुरी, रेड्डी एवं कृष्णाह। सिन्थेसिस एण्ड केरेकटराइजेशन ऑफ ग्लूटरेल्डिहाइड क्रॉस लिंग्ड कैल्शियम एल्जीनेट फॉर फ्लोराइड रिमूवल फ्रॉम एक्व्यस सोल्यूशन्स। जनरल ऑफ एप्लाइड पॉलीमर साइंस, 2011, 120, 3443-3452
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21. मालीचेक्कल, अंशुप, एंटनी एवं प्रदीप। हाई चील्ड कमब्शन सिंथेसिस ऑफ नैनोमैग्नेशिया एण्ड इट्स एप्लीकेशन फॉर फ्लोराइड रिमूवल। साइंस ऑफ टोटल एन्वायरन्मेंट, 2010, 408, 2273-2282
22. वू, झांग, दोउ एवं योंग। फ्लोराइड रिमूवल परफॉरमेंस ऑफ ए नोवेल ट्राईमेटल ऑक्साइड एडजोरबेंट, कीमोस्फीयर, 2007, 69, 1758-1764

रसायन विज्ञान विभाग सी.एस.एस.एस.पी.जी. कॉलेज, माछरा, मेरठ

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