पानी के निजीकरण का खंडवा मॉडल फेल

Submitted by RuralWater on Fri, 12/04/2015 - 13:05
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.पूरे देश के साथ-साथ अब मध्य प्रदेश में भी पानी के निजीकरण का मॉडल फेल होने की कगार पर पहुँच गया है। खंडवा शहर में नर्मदा नदी से पानी लाकर लोगों के घरों तक पहुँचाने के लिये प्रदेश सरकार ने एक निजी कम्पनी विश्वा से अनुबन्ध किया है। इसमें एक अरब छह करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी अब तक लोगों को साफ़ और समुचित मात्रा में पानी नहीं मिल पा रहा है।

उच्च न्यायालय में इसके खिलाफ जनहित याचिका भी दायर की गई है। यहाँ के लोग खासे नाराज़ हैं। लोगों का विरोध बढ़ा तो सूबे के मुख्यमंत्री को सार्वजनिक मंच से निजीकरण नहीं करने की घोषणा करनी पड़ी।

खंडवा में पीने के पानी की किल्लत के चलते यहाँ प्रदेश का पहला पानी के निजीकरण का मॉडल शुरू किया गया था लेकिन अभी शुरुआत से ही भारी–भरकम खर्च के बाद भी शहर को इसका अपेक्षित फायदा नहीं मिल पा रहा है। लोगों को बरसात के दिनों में मटमैला पानी पीना पड़ा।

चौबीस घंटे पानी उपलब्ध कराने की बात थी पर बमुश्किल एक घंटा भी नल नहीं चल पा रहे हैं बार–बार पाइप लाइन फूट रही है तो कहीं ऊँचाई तक चढ़ने के लिये प्रेशर नहीं बन रहा है। निजीकरण की योजना बनाते समय यहाँ के लोगों से जन प्रतिनिधियों ने बहुत बड़े–बड़े दावे किये थे लेकिन अभी से ही इन दावों के ढोल की पोल उजागर हो गई है।

यहाँ लोग इस योजना से उम्मीद पाले बैठे थे कि बरसों से पानी की किल्लत झेलने के बाद अब उन्हें निजी ही सही पर चौबीसों घंटे पानी 12 मीटर की ऊँचाई तक मिल सकेगा लेकिन शुरुआती दौर में ही यह साफ़ हो चुका है कि यह योजना भी उनके लिये छलावा ही साबित हुई है।

एक अरब छह करोड़ रुपए खर्च करने के बाद दो दिन छोड़कर महज एक घंटे पानी, वह भी 2 मीटर से ज्यादा ऊँचाई तक नहीं चढ़ पा रहा है। योजना में कई तकनीकी खामियाँ भी मिली हैं। इस योजना से पहले यहाँ लोगों को नगर निगम को 50 रुपए मासिक जलकर देना पड़ता था, जो अब चार गुना बढ़ाकर 200 रुपए कर दिया गया है।

पत्रकार विनोद कारपेंटर बताते हैं कि योजना में जो सपने दिखाए गए थे वे हकीक़त में कहीं भी पूरे होते नजर नहीं आ रहे हैं। शहर के करीब 15 वार्डों के लोग अब भी पानी के लिये तरस रहे हैं। यहाँ तक कि शहर के दूधतलाई और पडावा इलाके में तो लोगों को आधी रात पानी भरना पड़ रहा है। सिंघाड़ तलाई क्षेत्र में तो कई बार रात दो बजे पानी दिया जाता है।

हर दिन करीब एक लाख गैलन पानी पुरानी पाइप लाइनों से होकर व्यर्थ बह जाता है। परियोजना में करीब 60 किमी नई वितरण पाइप लाइन डाले जाने का प्रस्ताव है पर अब तक 50 साल पुरानी पाइप लाइनों से ही जल प्रदाय किया जा रहा है। योजना को सितम्बर 11 तक पूरा होना था लेकिन आज तक भी काम पूरा नहीं हो सका है, लिहाजा नगर निगम को पानी के लिये दोहरे इन्तजाम करना पड़ रहे है।योजना की बड़ी गड़बड़ियों में शहर से 52 किमी दूर फिल्टर प्लांट बनाए जाना प्रमुख है। यहाँ से 800 एमएम की जीआई लाइन से पानी आ रहा है, जो कई बार फूट चुकी है। वितरण लाइन पुरानी होने से कई जगह लीकेज है, जहाँ से बारिश का गन्दा पानी मिलता रहता है। वहीं प्री सेटलिंग टैंक नहीं होने से बारिश में नदी का बैकवाटर का गन्दा मटमैला पानी आता है।

बताया जाता है कि इस तकनीकी योजना में नियम कायदों को परे रखकर मनमाने बदलाव किये गए। निगम आयुक्त ने बिना एमआईसी की सहमति निविदा शर्तों में फेरबदल कर दिया। वहीं राज्य स्तरीय तकनीकी समिति ने भी पाइप लाइन मटेरियल बदलने की सहमती दी और इंटेक वेल के पास ही फिल्टर प्लांट बनाने पर आपत्ति नहीं की।

नगर निगम में पूर्व नेता प्रतिपक्ष नारायण नागर बताते हैं कि इस योजना के मूल स्वरूप को ही बदल दिया गया, इसीलिये यह असफल साबित हो रही है। न तो ठीक ढंग से सर्वे किया गया और न ही तकनीकी मानकों का ध्यान रखा गया। आज तक चौबीस घंटे पानी देने के लिये कोई टेस्टिंग तक नहीं की गई है। यही वजह है कि मैंने इसके खिलाफ उच्च न्यायालय में जनहित याचिका लगाई है।

यह योजना सरकार और नगर निगम दोनों ही के लिये परेशानी का सबब बनी हुई है। इससे एक तरफ सरकार के भारी खर्च के बाद भी लोगों के सामने वही समस्या होने से सरकार की प्रामाणिकता दाँव पर है, वहीं दूसरी तरफ निर्माण कम्पनी अब इसके लिये सरकार को ही कटघरे में खड़ा कर रही है कि अधिसूचना और फंड देरी से मिलने से काम समय पर नहीं हो पा रहा है।

हालत यह हो गई है कि कुछ दिनों पहले चुनावी दौरे पर खंडवा पहुँचे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दो टूक कह दिया कि यहाँ पानी का निजीकरण नहीं करेंगे। अब नगर निगम की समस्या यह है कि वह इस योजना का संचालन करने में भी खुद को अक्षम पा रहा है।

पुरानी पाइप लाइनों को सुधारने की उसके पास कोई व्यवस्था नहीं है। उधर कम्पनी का दावा है कि अधिसूचना प्रकाशन नहीं हो सका है। उसके बाद ही कम्पनी घर-घर मीटर लगा सकेगी। पर्याप्त पानी की स्थिति में तो कम्पनी भी नहीं है।

लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के पूर्व एसडीओ सुरेश गुप्ता भी मानते हैं तकनीकी मानकों का पालन नहीं होने से ही यह हालत बने हैं। वे बताते हैं कि निगम में कोई भी तकनीकी विशेषज्ञ नहीं होने पर शासन स्तर से इसमें पीएचई के विशेषज्ञ इंजीनियर की मदद ली जानी थी। पर ऐसा कुछ नहीं किया गया।

महापौर सुभाष कोठारी बताते हैं कि अभी इसका कुछ काम बचा हुआ है। अभी अमृत योजना में 50 करोड़ रुपए का प्रस्ताव पाइप लाइन के लिये भेजा है। वितरण लाइन में परेशानी को दूर करने की कोशिश की जा रही है। कम्पनी के परियोजना प्रबन्धक प्रवीण कुमार बताते हैं कि अभी तक राज्य स्तर पर इसके लिये गजट नोटिफिकेशन ही नहीं हो सका है। वहीं निगम ने ड्राईंग पास करने में भी काफी समय लगा दिया। समुचित ढंग से समय पर पैसा भी नहीं मिल पा रहा है। हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि लीकेज खत्म किये जा सकें।

पानी के निजीकरण पर लम्बे समय से काम कर रहे मंथन अध्ययन केन्द्र बड़वानी के रहमत बताते हैं कि योजना ही गलत ढंग से बनाई गई है और इसमें लोगों की सीधे तौर पर कोई भागीदारी नहीं है और न ही योजना बनाने से पहले जनप्रतिनिधियों या अफसरों ने उनसे कोई राय मशविरा किया है। वे बताते हैं कि यहाँ इस योजना की कोई जरूरत ही नहीं थी। शहर को पानी देने के लिये निगम को ही सक्षम बनाया जा सकता था। यहाँ केवल 14.50 एमएलडी पानी की ही जरूरत है लेकिन कृत्रिम रूप से जल संकट पैदा किया गया और फिर सात साल पहले यह योजना लागू की गई।

देश में इससे पहले भी जहाँ–जहाँ पानी वितरण के निजीकरण की कोशिशें की गई हैं सभी जगह असफल ही हुए हैं। प्रदेश के ही शिवपुरी में भी राष्ट्रीय अभयारण्य के लिये पाइप लाइन बिछाने का काम बीते दो सालों से अटका पड़ा है। मैसूर, मेंगलूर और हुबली में भी पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है। बंगलुरु में भी कुछ हिस्सों में शुरू हुआ था लेकिन पूरी तरह अमल नहीं हो सका। इसी तरह मुम्बई के ईस्ट इलाके में योजना का लोगों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा और औरंगाबाद में सरकार और कम्पनी के बीच ही तालमेल नहीं बन सका। यहाँ बाद में करार ही रद्द कर दिया गया।

इन बानगियों और खंडवा के ताज़ा अनुभवों से साफ़ है कि जनता द्वारा चुनी हुई स्थानीय नगर संस्थाएँ ही अपने नागरिकों के लिये पर्याप्त और साफ़ पानी का इन्तजाम करे। इन्हें कहीं भी और किसी भी रूप में निजी हाथों में सौंपना न तो सरकारों, निकायों और न ही आम लोगों के हक़ में है। इससे उलट कई निकाय संस्थाओं ने अपने तईं किये प्रयासों से शहरों में जल वितरण को सुगम किया है। जरूरत है थोडी सी संकल्प शक्ति की और जिम्मेदारी समझने की।
 

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ से ज़्यादा आलेख लिखे हैं। वे नव भारत तथा देशबन्धु के प्रथम पृष्ठ के लिये मुद्दों पर आधारित अ

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