सपने में टिहरी

Submitted by Hindi on Fri, 12/04/2015 - 15:51
Source
‘एक थी टिहरी’ पुस्तक से साभार, युगवाणी प्रेस, देहरादून 2010

बरगी बांधबरगी बांधस्वप्न देखने को यों तो युवावस्था की पहचान माना गया है परन्तु स्वप्न वर्तमान से भविष्य को जोड़ने की कड़ी भी है। वास्तविकता में जो वस्तुएँ व स्थान व्यक्ति की पहुँच से बाहर होते हैं स्वप्नावस्था में वह उन सब चीजों को प्राप्त कर सकता है। टिहरी शहर को डूबे एक लम्बी अवधि बीत चुकी है। सैलानी और पर्यटक झील को देखने के लिये आते हैं। अपने कुछ परिचित लोगों के साथ मुझे भी झील देखने का अवसर मिला। वहाँ पहुँचकर मेरा झील देखने का दृष्टिकोण ही बदल जाता है। मैं सोचती हूँ कि उस समतल जलराशि में टिहरी के विभिन्न स्थान (कॉलेज, बाजार और अठूर, राजमहल और घंटाघर) कहाँ पर डूबे हो सकते हैं? इस बात का अनुमान लगाना बड़ा मुश्किल है। मैं देखती हूँ कि टिहरी और आस-पास के गाँव धीरे-धीरे झील से ऊपर आने लगे हैं। कारागार का दृश्य देखकर पच्चीस जुलाई को सुमन दिवस की वह घटना अचानक ताजा हो उठती है जब एक बार सुमन दिवस के दिन माँ और पिताजी हमें टिहरी जेल स्थित सुमन कोठरी दिखाने ले गये थे। वह सुमन कोठरी जिससे टिहरी की जनता की कटु स्मृतियाँ जुड़ीं जो कभी टिहरी को राजतन्त्र ने दी थीं।

अट्ठाइस साल के युवा क्रान्तिकारी श्रीदेव सुमन को इसी कोठरी में पैंतीस किलो की हथिकड़ियाँ और बेड़ियाँ पहनाकर रखा गया था तथा इसी कुटिया में श्रीदेव सुमन ने चौरासी दिन का आमरण अनशन किया था तथा पच्चीस जुलाई उन्नीस सौ चवालीस को शहीद हो गये थे। कालान्तर में पच्चीस जुलाई को सुमन दिवस घोषित कर दिया गया तथा टिहरी जेल में बनी सुमन कुटिया व उन पैंतीस किलो की हथकड़ी व बेड़ियों को आम जनता के दर्शनार्थ रखा जाता है। धीरे-धीरे उसी जेल के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए मैं भिलंगना के उस भंवर के नजदीक पहुँची जिसके विषय में कहा जाता है कि श्रीदेव सुमन के मृत शरीर को बोरे में बाँधकर राजा के कर्मचारियों ने जेल के निकट वाली ढालदार पहाड़ी से उस भंवर में लुढ़का दिया था। मैं देखती हूँ कि टिहरी शहर मेरे मस्तिष्क में धीरे-धीरे झील से बाहर आ रहा है।

भिलंगना और भागीरथी के संगम पर मकर संक्रान्ति के दिन मेला लगा हुआ है। गाँव-गाँव से लोग विशेषकर महिलाएँ रंग-बिरंगे परिधानों से सुसज्जित व नयुली, बुलाक से लकदक होकर संगम पर आ रहे हैं। वहाँ स्नान करने वालों की भारी भीड़ लगी है। गंगाजल के स्नान से तरोताजा होकर महिलाएँ विभिन्न मंदिरों में जाकर पूजा करती हैं और उनमें बाजार की दोनों ओर सजी हुई दुकानों से चूड़ियाँ व अन्य प्रसाधन सामग्री खरीदने की होड़ लगी है। पत्ते में लिपटी हुई सिंगोरी, शुद्ध खोया के पेड़े और देशी घी में बनी हुई गरम-गरम जलेबियों का लोग आनन्द उठा रहे हैं। सुमन चौक में चरखी व झूला झूलने वालों की कतार लगी हुई है। आस-पास के गाँवों के लोग नहाने के लिये टिहरी आने की तैयारी बहुत पहले से शुरू कर देते हैं। उनका उत्साह, उमंग और कोलाहल देखते ही बनता है। पोलो ग्राउन्ड में उत्तम नस्ल के पशुओं और विभिन्न प्रजाति के कृषि उत्पादों की प्रदर्शनी लगी हुई है। मैं देखती हूँ कि वहाँ पर लौकी के बराबर की भिन्डी, छः फीट लम्बी लौकी, कद्दू जैसा टमाटर और पैंसठ किलो का कद्दू प्रदर्शनी में रखें हैं।

इनके उत्पादकों को प्रशासन की ओर से पुरस्कृत किया जा रहा है। चाँदी के सींगों और रंग-बिरंगे झालरों से सुसज्जित उत्तम नस्ल के बैल, गाय और भैंस भी प्रदर्शनी में लाये गये हैं। गाँवों के अलावा टिहरीवासी भी उस प्रदर्शनी में बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं। टिहरी और अठूर में रामलीलाओं का मंचन किया जा रहा है। अठूर के रंग कर्मी जुलूस लेकर बाजार आ रहे हैं और जब बाजार में रामलीला होती है तब बाजार के लोग जुलूस में अठूर जा रहे हैं। जहाँ विभिन्न अवसरों पर उनके द्वारा एक दूसरे का भव्य स्वागत किया जा रहा है। हनुमान का पात्र अपने से अधिक स्वस्थ व भारी राम-लक्ष्मण के पात्रों को कन्धों में उठाकर मंच पर ला रहा है। लक्ष्मण शक्ति लगने पर लक्ष्मण का पात्र सचमुच बेहोश हो जाता है। रामलीलाओं का यह उत्सव मात्र नाटक ही नहीं है अपितु लोगों को राममय करने का एक धार्मिक उत्सव भी है। अठूर में सेठ मुरलीधर कुटिया में स्वामी रामतीर्थ ने भी निवास किया था।

मेरी नानी कहती थी कि नानी की दादी उनको एक किस्सा सुनाती थी। इस प्रकार है- नानी के पास पत्थर की दो बड़ी कटोरियाँ विद्यमान हैं। जिन पर स्वामी राम के दोनों बेटे खाना खाते थे। नानी ने अपनी दादी से सुना था कि स्वामी राम जब लाहौर से टिहरी आये, तो उनका पीछा करते हुए उनकी पत्नी भी अपने दो बेटों के साथ टिहरी पहुँच गयी। उसने स्वामी राम से कहा कि मुझे भी सन्यासिन बना दो। स्वामी राम ने उससे समस्त स्वर्णाभूषण, धन और कीमती वस्त्र नदी में प्रवाहित करने को कहा। यह कार्य उसने खुशी-खुशी कर दिया, किन्तु जब स्वामी ने दोनों बेटों को नदी में प्रवाहित करने के लिये कहा तब उनकी पत्नी दोनों बेटों को गोद में उठा कर नानी की दादी के पास आ गयी और रोते-रोते उक्त घटना सुनायी। कुछ दिनों बाद वह यहाँ से वापस लाहौर चली गयी और कभी सन्यास लेने के विषय में नहीं सोचा। मुझे अठूर के समतल खेत भी दिखने शुरू हो गये हैं।

जिनमें कभी मंडवा झंगोरा पैदा किया जाता था किन्तु नहर बन जाने से कहाँ धान की फसल भी लहलहाने लगी है। उधर मालीदेवल में उत्तरवाहिनी भागीरथी अब उत्तरवाहिनी नहीं दिखती क्योंकि वहाँ अब झील बन चुकी है। भागीरथी की दुर्दशा पर एक महिला बाँध बनाने वालों को कोस रही है- ‘‘गंगा माता किसी किशोरी बालिका की भान्ति दौड़ती हुई कल-कल, छल-छल का निनाद करती थी किन्तु अब ऐसे लगता है मानों उसका गला दबा दिया गया हो और उसके दम घुटने की आवाज आ रही है। जिस प्रकार गंगा मैया का दम घोंटा है उसी प्रकार इन दुष्टों के दम भी घुट जाएँ।’’

टिहरी बाँध निर्माण का विरोध करने वाले जुलूस-प्रदर्शन व सभायें आयोजित कर रहे हैं तो कवि जीवानन्द श्रीयाल टिप्पणी कर रहे हैं- विरोध करके अब क्या हो सकता है? अब तो गंगा जी ‘दुली घुसी गे’ अर्थात सुरंग में प्रवाहित कर दी गयी हैं। मुझे एक बार फिर झील के दोनों तरफ के गाँव और उनके सीढ़ीनुमा खेत दिखाई पड़ रहे हैं जो मुक्त हवा में साँस ले रहे हैं। कौशल दरबार और घंटाघर का कुछ हिस्सा भी मुझे दिखाई दे रहा है। पुराना दरबार के टीले पर एक विशालकाय सांड भी प्रकट हो गया है। यह सांड टिहरी डूबने के समय सचमुच में वहाँ पर प्रकट हुआ था और किसी को भी अपने निकट नहीं आने दे रहा था। तब प्रशासन द्वारा उसे ट्रिंकुलाइजर गन से बेहोश करके नाव पर रखकर झील से बाहर लाया गया था। वह सांड टिहरी छोड़ने वाला अंतिम प्राणी था।

सचमुच वह भोले शंकर का गण भैरव है जो अपने नियत स्थान पर वास करता है। लोगों की इस प्रकार की चर्चा में कुछ अंश वास्तविकता का हो सकता है। महाराजा सुदर्शन शाह को भैरव बाबा ने ही सपने में आकर भागीरथी भिलंगना के संगम पर टिहरी नगर की स्थापना करने का आदेश दिया था। लोग कहते हैं कि वही भैरव बाबा सांड के रूप में प्रकट हुए हैं। बसंत पंचमी का त्यौहार धूम-धाम से मनाया जा रहा है। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई प्रत्येक टिहरीवासी अपना एक वस्त्र पीले रंग में रंगते हुए दिखाई दे रहा है। इस दिन भी टिहरी में मेला लगा हुआ है। रानीबाग और मोतीबाग में आम के पेड़ उग आये हैं और लोगों को सुस्वादु फल दे रहे हैं। खच्चर चालक अपने खच्चरों पर बाजार से विभिन्न गाँवों को खाद्य सामग्री लादकर ले जा रहे हैं। श्रीचंद की चौंरी मोटर अड्डा प्रकट हो गया है जिसमें गंगोतरी, यमुनोतरी, उत्तरकाशी, बूढ़ाकेदार को बसें आवागमन कर रही हैं।

स्कूल और कॉलेज के छात्र-छात्रायें अपने-अपने कॉलेजों को जाने लगे हैं। पूरे बाजार की रौनक लौट आयी है। मंदिरों की घंटियाँ, मुल्ला जी की इबादतें और गुरुद्वारे की गुरुवाणी के स्वर सुनाई देने लगे हैं। राजमाता के नरेन्द्र महिला विद्यालय का भवन दिखाई देने लगा है। भवन की छत से बाहर आया हुआ एक पेड़ देखकर हम बच्चे चर्चा किया करते थे कि राजमाता जी ने अपने कमरों के अंदर पेड़ उगा रखे हैं क्योंकि वह पेड़ों को गर्मी-सर्दी और वर्षा से बचाना चाहती थीं। आज वह पेड़ पुनः छत से बाहर निकला मस्ती से झूम रहा है। टिहरी बाँध निर्माण की खबर सुनकर टिहरीवासी प्रसन्न हुए थे उन्हें लगा था कि कोई जादू की छड़ी घूमकर हमारा कायाकल्प करके हमें विकास के शिखर पर पहुँचा देगी किन्तु अब भाई-भाई बिछुड़ गये हैं और अपनी जन्मभूमि से उखड़ गये हैं।

ससुराल गयी हुई बेटियाँ और अन्यत्र विस्थापित किये गये ग्रामवासी, नगरवासी अपने खेत-खलिहान, धारा और (पन्यारा) बाग-बगीचों की एक झलक देखने के लिये तरस गये हैं। मैं देखती हूँ कि रामलीला के मंच पर रामू भाई (विश्वेश्वरानन्द सकलानी) ने एक प्रहसन के द्वारा आज की वास्तविक स्थिति का चित्र खींच दिया है, किन्तु लोग उनका ही उपहास कर रहे हैं तभी झील से ऊपर आकर टिहरी कहती है- तुमने मेरे लिये क्या किया? अब जब मैं डूब गई हूँ तब मेरी दुर्दशा देखकर मनोरंजन कर रहे हो। इसके बाद एक भयानक आवाज के साथ अथाह जलराशि में एक कम्पन होता है और टिहरी पुनः झील में समा जाती है। इस दृश्य के साथ मेरी आँखें खुलती है और मुझे मेरे सपने के टूटने का अहसास होता है। यह स्वप्न मैं नींद में देख रही थी यह एक जाग्रत-स्वप्न था पता नहीं पर डूबी हुई टिहरी को एक बार पुनः देखकर मन प्रसन्न हो रहा था।

 

एक थी टिहरी  

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

डूबे हुए शहर में तैरते हुए लोग

2

बाल-सखा कुँवर प्रसून और मैं

3

टिहरी-शूल से व्यथित थे भवानी भाई

4

टिहरी की कविताओं के विविध रंग

5

मेरी प्यारी टिहरी

6

जब टिहरी में पहला रेडियो आया

7

टिहरी बाँध के विस्थापित

8

एक हठी सर्वोदयी की मौन विदाई

9

जीरो प्वाइन्ट पर टिहरी

10

अपनी धरती की सुगन्ध

11

आचार्य चिरंजी लाल असवाल

12

गद्य लेखन में टिहरी

13

पितरों की स्मृति में

14

श्रीदेव सुमन के लिये

15

सपने में टिहरी

16

मेरी टीरी

 

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