गंडक क्षेत्र और जल-जमाव का घाव

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.गंडक उत्तर प्रदेश तथा बिहार की एक महत्त्वपूर्ण नदी है जो कि हिमालय पर्वतमाला से नेपाल के भैरवा जिले में त्रिवेणी नाम के कस्बे के पास मैदानों में उतरती है। इसका उद्गम स्थान 7,620 मीटर की ऊँचाई पर धौलागिरि पर्वत पर है। यह नदी पश्चिमी चम्पारण में वाल्मीकि नगर के पास नेपाल से बिहार (भारत) में प्रवेश करती है और 265 किलोमीटर दक्षिण पूर्व दिशा में बहती हुई हाजीपुर के पास गंगा में मिल जाती है।

वाल्मीकि नगर के नीचे लगभग 18.5 किलोमीटर लम्बाई में यह नदी नेपाल बिहार की सीमा के रूप में तथा उसके नीचे प्रायः 80 किलोमीटर लम्बाई में उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा बनाते हुए बहती है। यदि केवल घाटी या जल ग्रहण क्षेत्र की बात की जाय तो इस नदी का विस्तार भारत में बहुत ज्यादा नहीं है।

गंडक का कुल जल ग्रहण क्षेत्र 40,523 वर्ग किलोमीटर है जिसमें से 35,470 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र वाल्मीकि नगर के उत्तर में नेपाल/तिब्बत में पड़ता है। बिहार में इस नदी का जलग्रहण क्षेत्र मात्र 4,188 वर्ग किलोमीटर तथा उत्तर प्रदेश में केवल 865 किलोमीटर है।

नदी के जलग्रहण क्षेत्र के ऊपरी हिस्सों में 2,000 मिलीमीटर तथा निचले हिस्सों में 1,250 मिलीमीटर तक वर्षा होती है। पहाड़ों से मैदानों में उतरने के बाद नदी की घाटी का तल प्रायः सपाट है और 15 सेंटीमीटर प्रति किलोमीटर से लेकर 10 सेंटीमीटर प्रति किलोमीटर तक ही सीमित रहता है।

सतह के कम ढाल तथा अच्छी खासी मात्रा में सिल्ट लाने के कारण गंडक की धारा में परिवर्तन होता रहा है यद्यपि यह धारा परिवर्तन कोसी जैसी नदियों के सामने नगण्य है। पश्चिमी और पूर्वी चम्पारण की 43 चौरों की शृंखला से यह अन्दाज लगता है कि नदी कभी इन चौरों से होकर अवश्य बही होगी।

छोटी-बड़ी नदियों की मौजूदगी, उनका धारा परिवर्तन, जमीन का हलका ढाल आदि कई ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से यहाँ सतही जल के साथ-साथ भूजल भी अच्छी मात्रा में और सुलभ रूप से उपलब्ध रहा करता था।

साठ के दशक में वाल्मीकि नगर और त्रिवेणी (नेपाल) के बीच एक बैराज बनाकर इस नदी से नहरें निकली गईं और इन नहरों से बिहार में 11.53 लाख हेक्टेयर तथा उत्तर प्रदेश में 4.45 लाख हेक्टेयर ज़मीन को सींचने की एक महत्त्वाकांक्षी योजना बनाई गई थी।

इन नहरों की दृष्टि से यदि देखा जाय तो गंडक का क्षेत्र बहुत विशाल हो जाता है जो कि उत्तर प्रदेश के महाराजगंज, गोरखपुर, देवरिया तथा पड़रौना जिलों से लेकर बिहार के गोपालगंज, सिवान, सारण, पश्चिमी चम्पारण, पूर्वी चम्पारण, मुज़फ़्फ़रपुर, समस्तीपुर तथा वैशाली जिलों तक फैला हुआ है।

अब नदियों को ध्यान में रखकर यदि क्षेत्र निर्धारण करें तो पश्चिम में रोहिन, राप्ती तथा घाघरा, दक्षिण में गंगा तथा पूर्व बूढ़ी गंडक के बीच में यह क्षेत्र पड़ता है। उत्तर में नेपाल की सीमा पड़ती है।

आदिकाल से यह क्षेत्र देश के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता चला आया है। गंडक नदी को ही यह सौभाग्य प्राप्त है कि उसके बाएँ किनारे पर मिथिला है तो दाहिने किनारे पर कोसल, और यह नदी इन दोनों प्रान्तों की सीमा रेखा बनाती है। भगवान श्रीकृष्ण भीम के साथ जब हस्तिनापुर से जरासंध की राजधानी राजगृह गए थे तो घाघरा और गंडक पार करके ही गए थे।

इस नदी के चारों ओर कभी जंगल ही जंगल हुआ करते थे। गोरखनाथ का क्षेत्र (गोरखपुर, देवारण्य (देवरिया), सारंग अरण्य (सारण), चम्पक अरण्य (चम्पारण) तथा लिच्छवियों की राजधानी वैशाली के अंश इसके जलग्रहण क्षेत्र में आते थे। वैशाली के बारे में किंवदन्ती है कि वह भगवान महावीर की जन्मस्थली है और भगवान बुद्ध का तो यह इलाका कर्म क्षेत्र रहा ही है।

घने जंगलों और प्रचुर जलस्रोतों के कारण यह क्षेत्र धन धान्य से सम्पन्न था। अधिक वर्षा और जलप्लावन के कारण यह क्षेत्र खरीफ की फसल के लिये तो उपयुक्त था ही पर अगर कभी बाढ़ के कारण फसल बर्बाद हो गई तो रबी की जबर्दस्त फसल बिना मेहनत और सिंचाई के होती थी। थोड़ी बहुत सिंचाई की अगर जरूरत पड़ गई तो आठ दस हाथ गहरे कच्चे कुएँ खोदकर सींच लिया। जीवनधारा बहती रहती थी।

अंग्रेजों के आने के बाद जब उनकी कोठियाँ आबाद हुईं तो उन्होंने अपने तरीके से चीजों को देखना शुरू किया। नील की खेती शुरू हुई। इस विस्तार के पहली चोट जंगलों पर पड़ी और इस तरह की विकसित ज़मीन पर सिंचाई की जरूरत महसूस हुई।

होल्ड्सवर्थ और पीपी नाम के दो अंग्रेजों ने, जिनकी खेती क्रमशः 16,000 हेक्टेयर और 6,000 हेक्टेयर क्षेत्र पर फैली हुई थी, गोरखपुर में कृत्रिम सिंचाई के लिये नहरें और तालाब बनाने की कोशिश की तो बिहार के सारण में सारण कैनाल तथा चम्पारण में तिउर कैनाल का प्रयोग हुआ पर कामयाबी कहीं नहीं मिली क्योंकि इन नहरों का इस्तेमाल कभी भी ठीक से नहीं हो पाया जिसका मुख्य कारण था वर्षा का अनुकूल होना और ज़मीन के नीचे के प्रचुर पानी की उपलब्धि और नहरों का रख-रखाव तो संसाधनों की बर्बादी ही थी।

मगर व्यक्तिगत प्रयासों से अलग हटकर सरकारी तौर पर अंग्रेजों ने चौदहवीं शताब्दी में फिरोज शाह तुगलक की बनाई यमुना नहर का उद्धार कर तथा गंगा नहर पर काम शुरू करके सिंचाई से आमदनी करने का तरीका ढूँढ लिया था और उनमें से कुछ एक को सिंचाई का प्रणेता बनने का शौक हमेशा से रहा।

इसके अलावा 1857 के बाद नहरों के विकास में बड़ी तेजी आई क्योंकि विद्रोह दबाने के बाद अंग्रेज हुक़ूमत यह स्थापित करना चाहती थी कि उसे जन-साधारण की चिन्ता है और फिर अगर लोग खेती-किसानी में उलझे रहे तो कम्पनी बहादुर को सत्ता पर अपना शिकंजा कसने में कोई दिक्कत नहीं होगी।

सन् 1854 से ही गंडक पर उनकी नज़र पड़ चुकी थी और यह आशनाई बिहार में पहले शुरू हुई। उत्तर प्रदेश (उस समय का नॉर्थ वेस्ट प्रॉविन्स) में इंजीनियरों को गंगा, यमुना नहरों और बाद में केन, बेतवा और शारदा आदि पर काम करने के बहुत से अवसर थे इसलिये उन्होंने कभी गंडक में उतनी रुचि नहीं ली। फिर गोरखपुर की आबोहवा भी इनको रास नहीं आती थी।

इसके अलावा प्रस्तावित कमांड क्षेत्रों में भूजलस्तर पहले से ही काफी ऊपर था जो कि नहर बनने से और ऊपर आकर नुकसान करता। इसलिये उन्होंने पूर्वी उत्तर प्रदेश में कृत्रिम नहरों से सिंचाई के सवाल को ज्यादा तूल नहीं दिया। उधर बिहार के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र को ब्रिटिश प्रशासन कभी कृत्रिम सिंचाई के लिये उपयुक्त क्षेत्र मानता ही नहीं था।

यही वजह थी कि बिहार में लेफ्टिनेंट डिकेन्स को सोन नहर का प्रस्ताव मनवाने में कर्नल डिकेन्स बन जाने तक का काफी लम्बा समय लग गया था। फिर भी, बिहार में, जो कि 1911 तक अविभाजित बंगाल का हिस्सा था, कुछ उत्साही लोग बार-बार गंडक से सिंचाई का प्रश्न उठाते रहे और सन् 1854 में उत्तर प्रदेश से एक जेफरी नाम के इंजीनियर को गंडक के सर्वेक्षण के लिये बुला लाये पर किसी कारणवश बात आगे नहीं बढ़ पाई। फिर आने-जाने वालों का ताँता लगा रहा और एक के बाद एक कई प्रस्ताव बने। सन् 1859 में गोरखपुर के कलक्टर बर्ड ने गंडक से नहरों की बात उठाई थी पर यह भी वैसे ही आई गई हो गई।

1871-72 में चम्पारण में प्रस्तावित एक नहर को बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर ने बंगाल में दामोदर नदी पर किये गए बाढ़ नियंत्रण और सिंचाई की असफलता के मद्देनज़र इसलिये खारिज कर दिया कि इससे जल जमाव बढ़ेगा, मलेरिया फैलेगा और केवल अवर्षण के साल में ही इस नहर का उपयोग लोग करेंगे और कैनाल रेट फिर भी नहीं देंगे जिससे लगाई गई पूँजी पर ब्याज भी वापस नहीं लौट पाएगा।

सन् 1854 से ही गंडक पर उनकी नज़र पड़ चुकी थी और यह आशनाई बिहार में पहले शुरू हुई। उत्तर प्रदेश (उस समय का नॉर्थ वेस्ट प्रॉविन्स) में इंजीनियरों को गंगा, यमुना नहरों और बाद में केन, बेतवा और शारदा आदि पर काम करने के बहुत से अवसर थे इसलिये उन्होंने कभी गंडक में उतनी रुचि नहीं ली। फिर गोरखपुर की आबोहवा भी इनको रास नहीं आती थी। इसके अलावा प्रस्तावित कमांड क्षेत्रों में भूजलस्तर पहले से ही काफी ऊपर था जो कि नहर बनने से और ऊपर आकर नुकसान करता। वर्षा तब आमतौर पर इस इलाके में धोखा नहीं देती थी। फिर 1873-74 के अकाल में एक बार और इस नहर के लिये प्रस्ताव किया गया। लाट साहब फिर भी नहीं माने। मगर इसी बीच छोटे पैमाने पर सारण जिले में सारण नहर और चम्पारण में तिउर नहर पर काम शुरू हुआ। यह नहरें बनीं तो जरूर पर कभी अपना खर्च निकाल नहीं पाईं और इन्हीं नहरों की नज़ीर देकर चम्पारण (त्रिवेणी) नहर का काम टलता रहा जो कि 1896 के अकाल के बाद राहत काम की शक्ल में शुरू हुआ।

उत्तर प्रदेश में अभी भी सरकार गोरखपुर में नहर बनाने के पक्ष में नहीं थी। त्रिवेणी नहर का काम पूरा तो 1913 में हुआ। पर सिंचाई 1909 से शुरू हो गई थी। यह नहर कभी भी अपनी क्षमता को प्राप्त नहीं कर पाई और न ही अपना खर्च उठा पाई।

इस नहर से एक परेशानी और हुई। यह नहर भैंसालोटन से शुरू होकर सीधे पूर्व की ओर जाती थी और ज़मीन का ढाल था उत्तर से दक्षिण की ओर। उत्तर से बहकर आता हुआ पानी इस नहर को जगह-जगह तोड़ दिया करता था जिससे इसकी मरम्मत पर भी बहुत खर्च होता था और साधारण वर्षा वाले इस साल में इस नहर की जरूरत ही नहीं पड़ती थी।

जब जरूरत पड़ती थी तब नहर के टूटी रहने के कारण समय से सिंचाई नहीं मिल पाती थी। समय के साथ सारण तथा तिउर कैनाल की हालत ऐसी हो गई कि निलहे गोरे और चम्पारण के जमींदार इन संचालन का खर्च पेशगी देने के लिये तैयार थे पर सुनिश्चित सिंचाई देने के लिये सिंचाई विभाग तैयार नहीं था। तंग आकर कई बार इन नहरों को तोड़ डालने का प्रस्ताव तक किया गया।

उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने 1907-1909 के बीच में त्रिवेणी नहर की तर्ज पर अपने यहाँ गोरखपुर में एक नहर का प्रस्ताव किया जिसको वहाँ के तत्कालीन कलकक्टर मोलोनी ने पूर्वकथित कारणों से खारिज कर दिया। उत्तर प्रदेश में 1937 में जब पहली कांग्रेसी सरकार ने प्रान्त का शासन सम्भाला तब बहुत सी नई-नई सिंचाई परियोजनाओं को सरकार ने अपने कार्यक्रम में शामिल किया पर जल जमाव के बेकाबू हो जाने के डर से गंडक नहरों का प्रस्ताव नहीं किया गया।

बिहार में तब भी गंडक नहरों के विकास की बात जिन्दा थी। अब तक जल जमाव तथा खेतों पर रेह की परत बैठने के कारणों की समीक्षा हो चुकी थी। यह समझा जाने लगा था कि जब भूमिगत जल की सतह ऊपर उठते-उठते पौधों के जड़ों की चूषण सीमा के अन्दर आ जाये तो पानी से घिर जाने के कारण पौधों की ऑक्सीजन की सप्लाई अवरुद्ध हो जाती है और उनका विकास रुक जाता है।

जड़ें जो पानी आस-पास की जमीन से चूसती हैं वह पौधों की पत्तियों से भाप बनकर उड़ता रहता है। जब भूजल की सतह ऊपर आ जाती है तो पानी के साथ-साथ उसमें घुले लवण भी पौधे चूस लेते हैं। यह लवण वाष्पीकृत नहीं होता और ज़मीन पर धीरे-धीरे इकट्ठा होता रहता है और रेह की शक्ल में दिखाई पड़ता है।

रेह बैठ जाने पर ज़मीन की उर्वराशक्ति समाप्त हो जाती है और ज़मीन ऊसर हो जाती है। जल जमाव के लिये यह जरूरी नहीं है कि पानी धरती की सतह पर ही दिखाई पड़े। उसका पौधों की जड़ों की चूषण सीमा के अन्दर तक पहुँच जाना ही फसल बर्बाद करने के लिये काफी है। ज़मीन पर रेह की सफेद पपड़ी जल जमाव की निश्चित सूचना मानी जाती है। जहाँ ज़मीन पर ही पानी अटक जाये तो उस जमीन का भगवान ही मालिक है।

1946 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने, जो कि उस समय केन्द्र में अन्तरिम सरकार के कृषि मंत्री थे, उत्तर प्रदेश और बिहार सरकार को गंडक से नहरें निकाल कर सिंचाई की सम्भावना तलाशने का प्रस्ताव किया। अब बिहार ने तो पहल की पर उत्तर प्रदेश में अब भी यह मान्यता थी कि इस इलाके में भूमिगत जल की सतह काफी ऊपर है अतः नहरें नहीं बनेंगी पर उन्होंने इतना अवश्य किया कि बिहार के इंजीनियरों को जरूरत के हिसाब से आँकड़े उपलब्ध करवाए और थोड़ा-बहुत सर्वेक्षण करने की अनुमति अपने यहाँ दे दी।

1948-49 के दो वर्षों में गोरखपुर और देवरिया में अवर्षा के कारण अकाल की स्थिति पैदा हुई और तब वहाँ भी सिंचाई की व्यवस्था की माँग उठी और वहीं से राजनीति ने दूसरा रुख लिया। आम जनता केवल सिंचाई की माँग कर रही थी और उसका उद्देश्य कुओं या ट्यूबवेल जैसे पारम्परिक भूमिगत स्रोतों के विकास की ओर था पर कुछ नेताओं ने बिहार की कोसी नदी पर प्रस्तावित बाराह क्षेत्र में बनने वाली 177 करोड़ रुपए की विशाल योजना जैसी किसी योजना के माध्यम से सिंचाई सुनिश्चित करने की बात उठाई।

अब प्रश्न केवल सिंचाई का नहीं रहा बल्कि किसी विशालकाय योजना से सिंचाई का सवाल था। सिंचाई अब गौण थी और योजना की विशालता मुख्य माँग बनी। यह वही समय था जब बड़ी-बड़ी योजनाओं को आधुनिक भारत का मन्दिर कहा जाता था। उत्तर प्रदेश सरकार अब ऊहापोह की स्थिति में थी और 1957 में आकर उसकी सौ साल पुरानी ‘ना’ जैसे-तैसे ‘हाँ’ में बदल गई और गंडक नहरों के विस्तार पर उसका बिहार से समझौता हुआ।

मगर उस समझौते के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार गंडक परियोजना के प्रति बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं थी जिसकी जड़ में वहाँ जल-जमाव की आशंका थी। एक समय ऐसा भी आया जबकि बिहार ने यह सिद्धान्त लिया कि यदि उत्तर प्रदेश समुचित सहयोग नहीं करता है तो यह परियोजना बिहार अपने बूते पर और अपनी ज़मीन पर बनाएगा जिसमें उत्तर प्रदेश के सहयोग की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

बहरहाल, दोनों प्रान्तों का राजीनामा कायम रहा और नहर योजना के काम का शिलान्यास होते-होते 1964 आ गया। गंडक परियोजना का शिलान्यास सम्भवतः पंडित नेहरू का किया हुआ आखिरी शिलान्यास था।

आज यह नहरें एक विस्तृत क्षेत्र पर बनी हुई हैं। योजना यद्यपि अधूरी है फिर भी सिंचाई होती है। इन नहरों से रिसाव, टूटने की घटनाओं तथा पहले से ही भूमिगत जल की सतह ऊँचा होने और अब उसके और ऊँचा उठने के कारण गंडक क्षेत्र में अभूतपूर्व जल जमाव बढ़ा है। इन नहरों की लम्बाई उत्तर प्रदेश में 3,244 किलोमीटर है और इनका विस्तार गोरखपुर, महाराजगंज, देवरिया तथा पड़रौना में है और बिहार में गंडक नहरों की लम्बाई उत्तर प्रदेश में गंडक नहरों की लम्बाई के दुगुने से कहीं ज्यादा है।

जल-जमाव की बिगड़ती हुई परिस्थिति के लिये सारा दोष गंडक नहरों पर मढ़ देना अच्छा नहीं होगा। इसके अन्य बहुत से कारण भी हैं। सन् 1857 के विद्रोह के पहले सड़क के नाम पर बिहार में आज के गंडक कमांड क्षेत्र में छपरा को मोतिहारी से जोड़ने के लिये एक सड़क थी और मुज़फ़्फ़रपुर को मोतिहारी तथा हाजीपुर से जोड़ने का मार्ग था।

उधर गोरखपुर को फैज़ाबाद और आजमगढ़ को जोड़ने के लिये सड़क जैसा कुछ था। सड़क के नाम पर मात्र वहीं कुछ रास्ते थे। विद्रोह के बाद ब्रिटिश हुक़ूमत को शीघ्र ही सेना और पुलिस भेजने की गरज से सड़कों तथा रेल लाइनों का तेजी से विस्तार करना पड़ा जिससे किसी भी प्रकार के असन्तोष को समय रहते कुचला जा सके।

इसके अलावा निलहे गोरों के तैयार माल तथा साल्टपीटर की ढुलाई और अंग्रेजों के मौज-मस्ती की महफिलों में आवागमन के लिये सड़कों का विकास जरूरी था जिस पर कम-से-कम उनकी बग्गियाँ चल सकें।

यह सड़कें धीरे-धीरे पानी के रास्ते की रुकावटें बनी और रेल लाइनों ने तो दो-तरफा हमला किया। दमन के अलावा वन सम्पदा का दोहन इन संचार साधनों का लक्ष्य था। जंगल तो कटे ही व्यापारिक कारणों से पर रेल लाइनों के स्लीपर तथा रेलवे के ईंधन की आवश्यकता को पूरी करने के लिये तो जंगलों पर कहर ही बरपा हो गया।

कोयला तो रेलवे ने बहुत बाद में उपयोग करना शुरू किया। जंगल कटने से पानी के प्रवाह को रोक सकने का एक जरिया कमजोर पड़ने लगा और भू-क्षरण बढ़ा। अब बाढ़ समस्या के रूप में सामने आने लगी थी क्योंकि इन सड़कों और रेल लाइनों से होकर पानी की निकासी का समुचित प्रबन्ध नहीं था।

बाढ़ और जल जमाव की समस्या को बढ़ाने का एक अन्य और तीसरा महत्त्वपूर्ण कारण भी है। आदिकाल से भारत में नदियों और बाढ़ से बचाव के लिये स्थानीय तौर पर ग्रामीणों की अपनी एक बहुत ही कारगर तथा समय सिद्ध व्यवस्था हुआ करती थी। अंग्रेजों ने जब भारत पर अपनी पकड़ मजबूत की तो उन्हें लगा कि नदियों पर तटबन्ध बनाकर बाढ़ से लोगों का बचाव करके तथा बाद में इन्हीं क्षेत्रों में सिंचाई की व्यवस्था करके आमदनी बढ़ाई जा सकती है।अब सड़क टूटने लगी और रेल लाइनों ने पानी रोककर बाढ़ की समस्या को बढ़ाया। सोनपुर से लखनऊ को जोड़ने वाली रेल लाइन के अवैज्ञानिक निर्माण को लेकर 19वीं शताब्दी में अच्छी खासी बहस हुई थी।

सन् 1895 में सारण में रेल लाइन पर बने बंसवारचक पुल से पानी की निकासी न होने के कारण रेलवे ने साठ हजार रुपए का फसल हर्जाना इस पुल के आसपास के किसानों को दिया था और 1937 की बाढ़ में पंडित गोविन्द वल्लभ पन्त ने स्वयं लखनऊ-गोरखपुर रेल लाइन को सरयू पार क्षेत्र में बाढ़ का एक प्रमुख कारण माना था।

बढ़ती सड़कों का भी वही हाल था। उदाहरण के तौर पर चम्पारण को ले लें। सन् 1800 ई. में वहाँ जहाँ प्रायः कोई सड़क नहीं थी वहीं सन् 1876 में 700 किलोमीटर, सन् 1886 ई. में 1600 किलोमीटर, सन् 1906 ई. में 2091 किलोमीटर तथा सन् 1938 में 3770 किलोमीटर लम्बी सड़कें बन चुकी थीं।

आज़ादी के बाद सड़क मार्गों की लम्बाई में बेतरह वृद्धि हुई थी। इसी तरह गोरखपुर में सन् 1870 ई. तक कुल पक्की सड़क की लम्बाई 80 किलोमीटर थी। उस समय देवरिया और बस्ती भी गोरखपुर का हिस्सा था। केवल गोरखपुर और देवरिया जिलों की 1976 में सम्मिलित सड़क लम्बाई लगभग 2,900 किलोमीटर थी जिसमें कच्ची सड़कें शामिल नहीं हैं। उसके बाद भी सड़कों का बहुत विस्तार हुआ है।

आजकल जवाहर रोज़गार योजना की बढ़ती हुई सड़कों ने गाँव के बाहर हिलोरें लेते हुये बाढ़ के पानी को घर-घर के दरवाजे तक पहुँचाने में बड़ी मदद की है। दुर्भाग्यवश इन सड़कों के निर्माण में पहली बलि जल निकासी की हुई है क्योंकि इस तरह के निर्माण में सारी बचत पुलों और कलवर्टों के निर्माण में ही होती है।

विकास को ध्यान में रखते हुए इस तरह के निर्माण को रोका तो नहीं जा सकता पर अवैज्ञानिक निर्माण को रोकने का भी कोई प्रयास नहीं हुआ। आज यह पूरा क्षेत्र तरह-तरह की सड़कों से आच्छादित है और रेल लाइनें भी कम नहीं हैं और इस उन्नत परिवहन व्यवस्था की कीमत समाज बढ़ते जल जमाव की शक्ल में अदा कर रहा है।

बाढ़ और जल जमाव की समस्या को बढ़ाने का एक अन्य और तीसरा महत्त्वपूर्ण कारण भी है। आदिकाल से भारत में नदियों और बाढ़ से बचाव के लिये स्थानीय तौर पर ग्रामीणों की अपनी एक बहुत ही कारगर तथा समय सिद्ध व्यवस्था हुआ करती थी। अंग्रेजों ने जब भारत पर अपनी पकड़ मजबूत की तो उन्हें लगा कि नदियों पर तटबन्ध बनाकर बाढ़ से लोगों का बचाव करके तथा बाद में इन्हीं क्षेत्रों में सिंचाई की व्यवस्था करके आमदनी बढ़ाई जा सकती है।

इसका पहला संगठित प्रयोग उन्होंने सन् 1857 के विद्रोह के पहले बंगाल में दामोदर नदी पर किया और इस प्रयास में वह बुरी तरह असफल हुए। जल्दी ही उन्हें अन्दाजा लग गया कि नदी को बाँधने से सिल्ट और बालू के जमाव के कारण नदी का तल ऊपर की ओर उठने लगेगा और बाढ़ का पानी, जिसमें प्रचुर मात्रा में उर्वरक और पोषक तत्व होते हैं, खेतों तक नहीं पहुँच पाएगा।

एक मुक्त नदी में स्वतंत्र रूप से बारिश के पानी के पहुँचने की पक्रिया में बाधा पहुँचेगी और यह पानी तटबन्धों के बाहर ही अटक जाएगा। नदी की सहायक धारा भी तटबन्ध के कारण नदी से नहीं मिल पाएगी और तब एक स्लुइस गेट की माँग उठेगी। स्लुइस गेट अगर बना लिया जाय तो भी बाढ़ के समय उसे खोल कर नहीं रखा जा सकता क्योंकि ऐसा करने से मुख्य नदी का पानी उलटा सहायक धारा में बहने लगेगा और नए-नए इलाकों में बाढ़ आएगी।

यदि स्लुइस गेट बन्द रहता है तो सहायक धारा का पानी या तो पीछे की ओर फैलेगा या तटबन्ध से लगता हुआ नीचे की ओर बहेगा। अब बाढ़ में वे क्षेत्र फँसेंगे जहाँ पहले बाढ़ नहीं आती थी। स्लुइस गेट का भी बालू में फँस जाने का अन्देशा बना रहेगा। अब माँग होगी कि सहायक धारा पर भी तटबन्ध बन जाये और यदि ऐसा कर दिया गया तो मुख्य धारा और सहायक धारा के तटबन्धों के बीच में बारिश का पानी ही फँसकर तबाही पैदा करेगा जिसको पम्प करके निकालने के अलावा दूसरा तरीका तटबन्ध काटना ही बचता है।

गोरखपुर के निचले इलाकों तथा रामगढ़-ताल क्षेत्र में इस तरह के पम्पों को आसानी से देखा जा सकता है। तटबन्ध से होकर पानी के रिसाव की अपनी समस्या है। यदि नदी का तल ऊपर उठता रहे तो उसी के अनुरूप तटबन्ध को भी ऊपर उठाते रहना पड़ेगा जिसकी एक व्यावहारिक सीमा है। इसके अलावा कोई भी यह गारंटी नहीं दे सकता कि कोई तटबन्ध कभी टूटेगा नहीं।

सच यह है कि जितना ही ऊँचा और मजबूत तटबन्ध होगा, उसके पीछे शरण लेने वाले लोग उतने ही ज्यादा असुरक्षित होंगे। अंग्रेजों ने दामोदर के सामने हार मानकर गंगा तथा ब्रह्मपुत्र घाटी की नदियों पर तटबन्ध न बनाने की कसम खाई जिसे उन्होंने अन्त तक निभाया।

यही कारण था कि जब सारण जिले में माँझी के इलाके में सन् 1890 में घाघरा नदी में भयंकर बाढ़ आई तो सरकार ने बकले और ओल्डिंग नाम के दो इंजीनियरों को समस्या का अध्ययन करने और समाधान ढूँढने के लिये भेजा क्योंकि जनता बाढ़ से बचाव के लिये नदी पर तटबन्ध की माँग कर रही थी।

इन दोनों इंजीनियरों ने बाढ़ की समस्या को तो माना पर समाधान के तौर पर तटबन्ध की माँग को ठुकरा दिया क्योंकि उनके अनुसार इस तरह के निर्माण से बाढ़ समस्या दुरूह होने वाली थी। उनका मानना था कि यदि बिहार में इस नदी पर तटबन्ध बनता है तो उत्तर प्रदेश में बलिया में तबाही बढ़ेगी। अतः अव्वल तो तटबन्ध बनें ही नहीं और तटबन्ध बनाए बिना अगर काम किसी भी तरह से न चल पाये तो भी कम-से-कम सरकार तो यह काम कभी भी न करे।

लोग यदि अपनी सुरक्षा के लिये अपने खर्च से तटबन्ध बना लेते हैं तो सरकार को इस काम में बाधा भी नहीं डालनी चाहिए। ठीक यही दलील उत्तर प्रदेश के अधीक्षण अभियन्ता जी.सी. पामर ने 1898, ब्रैडशॉ स्मिथ ने 1937 में पटना बाढ़ सम्मेलन में तथा ए.पी. वाटल ने 1939 में घाघरा पर तटबन्धों के प्रस्ताव के विरोध में दी थी।

आज़ादी के बाद जब बाढ़ नियंत्रण के बाजार में उछाल आया तो पचास के दशक में गोरखपुर में रोहिन, राप्ती और घाघरा को इस तरह बाँध दिया गया जैसे पहले के इंजीनियर कुछ जानते या समझते ही नहीं थे। इसके पहले पूर्वी उत्तर प्रदेश में 1954 की बाढ़ के बाद लगभग 4,700 गाँवों की सतह को ऊँचा उठाने का एक बहुत ही मूर्खतापूर्ण और कुटिल काम हाथ में लिया गया था जिसे बाद में व्यापक जन-प्रतिरोध के कारण हमेशा-हमेशा के लिये छोड़ दिया गया।

इधर कुछ वर्षों से बिहार में गाँवों को ऊँचा करने की बात राजनीतिज्ञों द्वारा उठाई जाती है और यह कहकर उठाई जाती है कि उत्तर प्रदेश में इसका सफल प्रयोग हुआ है जबकि सच्चाई एकदम उलटी है। गंडक (नारायणी) जो कि उत्तर प्रदेश में मुक्त थी उसे भी छितौनी से निचलौल तक पचास के दशक में बाँध दिया गया।

बिहार में गंडक अंग्रेजों के आने के पहले से ही बँधी हुई थी। इसके तटबन्ध को बंगाल के नवाब मीर कासिम के नायब धौसी राम ने सन् 1756 में बनवाया था। अंग्रेजों ने जैसे-तैसे और अनिच्छा से इस तटबन्ध के रख-रखाव का जिम्मा लिया था। आजादी के बाद इसे मज़बूती प्रदान की गई। सारण जिले में गंगा को भी घेरने के प्रयास हुए और घाघरा की भी नाकेबन्दी हुई।

फिलहाल, बिहार में घाघरा और गंडक पर बने तटबन्धों की लम्बाई प्रायः 605 किलोमीटर है।

तटबन्धों का टूटना और अब एक रोजमर्रा की घटना है। बिहार में पिपरा-पिपरासी तटबन्ध हो या चम्पारण तटबन्ध, कोई भी सुरक्षित नहीं है और यही स्थिति उत्तर प्रदेश में अहिरौलादान-पिपरा घाट तटबन्ध की है। पिपरा-पिपरासी तटबन्ध के टूटने का तो कुछ साल पहले तक उठौना लगा हुआ था पर जब से अहिरौलादान-पिपरा तटबन्ध टूटने लगा तब से कुछ राहत बिहार में हुई है।

चम्पारण में दामोदरपुर-लौकरिया तटबन्ध टूटने की घटना को अब कोई महत्त्व नहीं देता वरना एक समय था जबकि गोरखपुर में मोलोनी बाँध जब नन्दुआ गाँव के पास (29 जुलाई 1955) टूटा तो उसकी जाँच राय बहादुर आयोध्या नाथ खोसला जैसे नामी गिरामी इंजीनियर ने की थी और इसकी पूरी रिपोर्ट, जिसमें उन्होंने स्थानीय इंजीनियरों को दोषी पाया था, समाचार पत्रों में प्रमुखता के साथ और शब्दशः प्रकाशित की गई थी।

इस अध्ययन से अंग्रेजों के भारत में रहने तक यही स्थिति बनी रही और थोड़ी बहुत जानकारी जल-जमाव और कृषि पर उसके प्रभाव पर बढ़ी पर काम कुछ भी नहीं हुआ। यहाँ तक कि 1903 में पहले इरीगेशन कमीशन के सामने गोरखपुर के तत्कालीन कलक्टर मोलोनी ने बयान दिया कि वह जब अलीगढ़ में कलक्टर के पद पर पदस्थापित थे तो उन्होंने वहाँ जल जमाव जैसी कोई चीज नहीं देखी थी। सन् 1928 में रॉयल कमीशन ऑफ एग्रीकल्चर की रिपोर्ट में जल जमाव के बारे में बात तो जरूर उठाई गई पर नतीजा कुछ नहीं निकला।आजकल बिहार में हालत यह है कि जल संसाधन विभाग तटबन्ध टूटने की घटना को मानने से भी आनाकानी करता है। उसकी मान्यता है कि गंडक तटबन्ध बाढ़ से लगभग शत-प्रतिशत सुरक्षा दे रहे हैं।

योजना के सम्बन्ध में इससे बड़ा झूठ शायद दूसरा न हो। परिवहन, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण की माँग के साथ-साथ राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा और तकनीकी जी-हुजूरी के संयोग से जो काम हुआ, उसका प्रभाव पड़ना ही था।

अब जो भवितव्य था वह सामने आ गया है। बिहार में गोपालगंज जिले के गोपालगंज, माँझा, बरौली और बैकुण्ठपुर प्रखण्ड, सारण जिले के मशरख, तरैया, आमनौर, परसा, मकेर, दरियापुर, सोनपुर, माँझी, जलालपुर तथा रिविलगंज प्रखण्ड, सिवान जिले के गुठनी, दरौली, आन्दर, रघुनाथपुर तथा सिसवन प्रखण्ड, पश्चिमी चम्पारण जिले के बगहा एक, बगहा दो, जोगा पट्टी, बैरिया, नौतन, मधुबनी, मितहा, पिपरासी तथा ठकराहा प्रखण्ड, पूर्वी चम्पारण के पहाड़पुर, अरेराज तथा केसरिया प्रखण्ड, मुज़फ़्फ़रपुर जिले के साहेबगंज, पारू, सरैया और कुढ़नी प्रखण्ड तथा वैशाली जिले के वैशाली, लालगंज, हाजीपुर, सहदेई बुजुर्ग, बिद्दुपुर और महनार प्रखण्ड गंगा, गंडक या घाघरा की बाढ़ और जल-जमाव का दंश सीधे झेलते हैं।

कमोबेश यही स्थिति उत्तर प्रदेश में गंडक के किनारे महाराजगंज से पड़रौना के गंडक के तटीय प्रखण्डों की है। घाघरा के बँध जाने के बाद बाढ़ विस्थापितों के गाँव माँझी से दरौली तक दिखाई पड़ते हैं। तो उस पार बलिया में आशियाने तटबन्धों पर बने हैं। शादियाँ तक तटबन्ध पर मण्डप गाड़ कर होती हैं।

उत्तर प्रदेश की घाघरा, रोहिन, आमी तथा राप्ती के किनारे-किनारे बसी बस्तियों और इन नदियों की परवान चढ़ती बाढ़ के अपने अलग किस्से हैं तो बिहार में झरही, दाहा और मही की अपनी दास्तान है। यह गंडक नदी पर बने तटबन्धों की कृपा है कि बिहार में गंडक की दो सहायक नदियों, बाया और मही, का पानी अब गंडक में न जाकर सीधे गंगा में गिरता है।

सड़कों, रेल लाइनों, तटबन्धों और नहरों का जाल है इस पूरे क्षेत्र में। कुछ संचार के लिये, कुछ सिंचाई के लिये तो कुछ बाढ़ से बचाव के लिये जिसमें से यातायात को छोड़कर बाकी का कितना उद्देश्य पूरा होता है यह एक बहस का मुद्दा है।

सड़कों, तटबन्धों, रेल लाइनों तथा नहरों से पूरी जल निकासी की व्यवस्था अवरुद्ध हो गई है और जल-जमाव भयंकर रूप धारण करके सामने खड़ा है। यह समस्या कोई रातों-रात पैदा हुई हो या इसके बारे में पहले से जानकारी नहीं थी ऐसा नहीं है। सन् 1830 के बाद से जब से यमुना नहरें बनीं, तभी से जल-जमाव का चर्चा है।

यह सिर्फ प्रभावित लोग ही नहीं कहते थे, लाट साहब भी कहते थे और अपनी व्यवस्था को कोसते थे कि नहरों के लाभ को तब तक पूरा नहीं माना जा सकता जब तक कि जल-जमाव को हटा नहीं दिया जाता पर यह सब ज़बानी जमा खर्च था।

सन् 1873 में जब आर.जी. केनेडी नाम के एक इंजीनियर ने, जो कि पंजाब में नहर विभाग में काम करते थे, यह सिद्ध किया कि नहर के हेडवर्क्स से छोड़े गए पानी का मात्र 28 प्रतिशत खेतों तक पहुँचता है और बाकी पानी भूजल की सतह को ऊपर करता है और जल जमाव बढ़ाता है और यदि सरकार सिंचाई का श्रेय लेती है और उसके लिये पैसा लेती है तो उसे जल-जमाव की भी जिम्मेवारी लेनी चाहिए और इसकी समुचित व्यवस्था करनी चाहिए तो सच उजागर करने के दंड स्वरूप केनेडी का तबादला अफगानिस्तान के युद्ध क्षेत्र में कर दिया गया।

अट्ठारह साल बाद यह इंजीनियर जब वापस लौटा तो जहाँ अपना काम 1873 में छोड़ गया था वहीं से फिर शुरू किया और प्रशासन की आँख की किरकिरी तब तक बना रहा जब तक उसने सरकार की नौकरी की। ब्रिटिश सरकार अपने इंजीनियरों को बहुत इनाम-इकराम देती थी पर 1907 में जब केनेडी ने अवकाश प्राप्त किया तो वह एक हारे हुए जुआरी की तरह चुपचाप वापस इंगलैंड चला गया।

उधर सन् 1876 में अलीगढ़ के रॉबर्ट नाम के एक निलहे गोरे ने सरकार पर दावा किया कि उसकी खेती गंगा नहर के पानी के लगातार उपयोग के कारण चौपट हो गई है और उसका उसे मुआवजा दिया जाय। उस समय जल-जमाव, रेह की पर्त या नहरी पानी से खेती को नुकसान पहुँचने का रहस्य वैज्ञानिकों तथा इंजीनियरों की भी नहीं मालूम था।

फसल के नुकसान का कारण जानने के लिये तब सरकार ने एक रेह कमेटी नियुक्त की। इंगलैंड से एक कृषि वैज्ञानिक वोल्कर को मशविरा देने के लिये बुलाया। वोल्कर भारत के नहरी क्षेत्रों में काफी घूमा पर वह यहाँ की पारम्परिक सिंचाई व्यवस्था देखकर दंग रह गया। उसने जो कुछ भी सुझाव दिया उसमें अधिकांश सिंचाई के इन्फ्रास्ट्रक्चर को दुरुस्त करने के लिये थीं।

उसके इस अध्ययन से अंग्रेजों के भारत में रहने तक यही स्थिति बनी रही और थोड़ी बहुत जानकारी जल-जमाव और कृषि पर उसके प्रभाव पर बढ़ी पर काम कुछ भी नहीं हुआ। यहाँ तक कि 1903 में पहले इरीगेशन कमीशन के सामने गोरखपुर के तत्कालीन कलक्टर मोलोनी ने बयान दिया कि वह जब अलीगढ़ में कलक्टर के पद पर पदस्थापित थे तो उन्होंने वहाँ जल जमाव जैसी कोई चीज नहीं देखी थी। सन् 1928 में रॉयल कमीशन ऑफ एग्रीकल्चर की रिपोर्ट में जल जमाव के बारे में बात तो जरूर उठाई गई पर नतीजा कुछ नहीं निकला।

यह परम्परा आज भी कायम है। जल-जमाव को और उसके कारणों को स्वीकार सभी करते हैं। कितने शोध संस्थान खुले हैं। कितने कमीशन गठित हुए, समितियाँ बनीं, कभी नहर के पानी के सीमित उपयोग, कभी पानी की राशनिंग तो कभी नहरी पानी और भूमिगत पानी के सम्मिलित और यथोचित उपयोग (कन्जक्टिव यूज़) को उछाला गया।

कभी कंक्रीट का लाइनिंग तो कभी पॉलीथीन की लाइनिंग के असफल प्रयोग हुए तो कभी जल-जमाव वाले क्षेत्रों में मछली पालन को बढ़ावा देने तक की बातें हुईं। कौन सी ऐसी सरकारी रिपोर्ट है जिसमें सड़कों, रेल लाइनों, नहरों और तटबन्धों के विस्तार की लानत-मलामत न की गई हो।

कुछ नहीं बन पड़ा तो किसानों को दोष दिया गया कि पानी उपलब्ध होने पर वह अपने खेतों में बहुत ज्यादा पानी दे देते हैं। यह कभी नहीं कहा जाता कि वह इसलिये ऐसा करते हैं क्योंकि उनको अगले क्षण पानी मिलने का भरोसा नहीं है। वही किसान ढेंकुल से या पम्प से जब अपने खेतों को सींचता है तो एक भी बूँद ज्यादा पानी क्यों नहीं देता है?

बिहार में 1935 से चौरों की जल निकासी को लेकर आज तक जो नाटक हुए उसमें कभी भी कोई सफलता नहीं मिली। क्या यह दोष भी किसानों का है। या गोरखपुर-देवरिया में भूमिगत जल की सतह को नीचा करने के लिये जो ट्यूबवेल नहरों के किनारे लगाए गए थे और आज महज उनका मजार बाकी है, यह गलती भी किसानों की है। वास्तव में जल-जमाव के प्रति कोई गम्भीर नहीं रहता है इसलिये जल-जमाव की समस्या अपनी जगह पर कायम है।

इसका एक सामाजिक पक्ष है। नहर बनाकर सिंचाई की व्यवस्था कर देना, सड़क बनाकर दो स्थानों को जोड़ देना, रेल की सुविधा मुहैया करना, तटबन्ध बनाकर बाढ़ से सुरक्षा देना आदि, यह सब रचनात्मक कार्य हैं और बहु-प्रचारित राजनीति के अंग हैं जिनको सम्पन्न करके नेता और इंजीनियर भगीरथ तथा विश्वकर्मा का पद प्राप्त करता है और शुद्ध भारतीय परम्परा में जो बीत गया उसके बारे में चिन्ता न करने की आदत हमें कभी भी अपने किये का मूल्यांकन करने से रोकती है।

जो यश, जो वाहवाही, जो सम्मान या यदि मोटे शब्दों में कहें तो जो सत्ता सुख, इस तरह के रचनात्मक काम कर देने में मिल सकता है उसका सौंवा हिस्सा भी जल निकासी करके नहीं मिल सकता फिर भले ही लोग डूबते उतराते रहें। आर्थिक दृष्टि से तो सरकार के लिये यह पूरी तरह से घाटे का सौदा है।

जल-जमाव पूरी स्थानीय उत्पादन प्रक्रिया को चौपट करके इलाके के बाशिन्दों को एक कभी भी खत्म न होने वाले मनी ऑर्डर के इन्तजार में ढकेलता है और बहुत सी सामाजिक विकृतियों और समस्याओं को जन्म देता है। इन हालात से निबटने का कोई बना बनाया हल नहीं है पर कहीं-न-कहीं से एक पहल करनी पड़ेगी जहाँ से समाधान की दिशा में कुछ प्रयास हो सके। यह पारस्परिक सहयोग और संगठन तथा सरकार द्वारा समस्या को सही परिप्रेक्ष्य में देखने से ही सम्भव है जिसके बिना कोई समस्या को सुनने को भी तैयार नहीं होगा।यही वजह है कि गंडक कमांड क्षेत्र से बिहार में आठ-आठ तथा उत्तर प्रदेश में एक (कुल मिलाकर 9) मुख्यमंत्री होने के बावजूद इस समस्या पर कोई पहल नहीं हो पाई और यही वजह थी कि अंग्रेजों के शासन काल में भी लॉर्ड स्ट्रेशी से लेकर लॉर्ड वैवेल तक सभी ने जल निकासी की बात की पर काम कुछ नहीं हुआ।

आज उत्तर प्रदेश का सिंचाई विभाग गंडक कमांड में जल जमाव नगण्य होने का दावा करता है तो बिहार का जल संसाधन विभाग जल-निकासी के लिये योजना पर योजना बनाए जा रहा है जबकि क्रियान्वयन के नाम पर प्रायः कुछ भी नहीं हो रहा है।

उत्तर प्रदेश में गंडक की मूल योजना (1959) 15.47 करोड़ रुपयों की थी जिसके द्वारा 4.45 लाख हेक्टेयर जमीन में सिंचाई देने का अनुमान किया गया था। यहाँ लगभग दस गुना खर्च कर लेने के बाद इस नहर से मूल अनुमान के मात्र 50 प्रतिशत क्षेत्र पर सिंचाई होती है। बिहार में गंडक की मूल योजना (1957) में 40.54 करोड़ रुपए की थी।

सन् 1995 तक इस आधी अधूरी योजना पर लगभग 428 करोड़ रुपए खर्च हो चुके थे। यह नहरें सरकारी आँकड़ों के अनुसार 11.53 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र की जगह करीब साढ़े तीन लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई करती है और करीब साढ़े सात लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गंडक कमांड में जल जमाव है। अब इस जल जमाव को हटाने के लिये एक 445 करोड़ रुपए की योजना तैयार है। कोसी तथा गंडक क्षेत्र से जल-जमाव हटाने की एक अन्य योजना में लगभग 221 करोड़ रुपए की माँग है।

बिहार के जल संसाधन विभाग का एक बहुत महत्त्वपूर्ण काम है कि इन योजनाओं के प्राक्कलन का पुनर्निधारण करके उसे अलग-अलग जगहों पर स्वीकृति के लिये भेजना। 1999-2000 की विभाग की वार्षिक रिपोर्ट (पृष्ठ 18) में राज्य में जल-जमाव की समस्या का कुछ विवरण दिया हुआ है।

रिपोर्ट कहती है, ....‘‘बिहार में लगभग 9.00 लाख हेक्टेयर भूमि जल जमाव के समस्या से ग्रसित है जिसका 8.00 लाख हेक्टेयर क्षेत्र का हिस्सा उत्तर बिहार में एवं 1.00 लाख हेक्टेयर क्षेत्र मोकामा टाल में पड़ता है। अभी तक किये गए प्रयासों से 1.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को जल-जमाव की समस्या से मुक्त किया जा सका है। योजना आयोग के निर्देश पर उत्तर बिहार के जल जमाव की समस्या के निदान हेतु एक विशेष टास्क फोर्स का गठन किया गया था, जिसमें प्राथमिकता के आधार पर गंडक एवं कोशी कमांड क्षेत्र के क्रमशः 11 एवं 13 जल निस्सरण योजनाओं का चयन किया गया है, जिसकी लागत वर्ष 1998 के अनुरूप लगभग 318.08 करोड़ रुपए है तथा इससे 1.50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को जल जमाव की समस्या से मुक्त किया जा सकता है, परन्तु निधि के अभाव में कई वर्षों से जल जमाव की समस्या से निदान का कार्यक्रम स्थगित था। लगभग 10 वर्षों तक जल निस्सरण योजनाओं के कार्यान्वयन हेतु राज्य योजना के तहत नगण्य निधि उपलब्ध हो पाई। वर्ष 1998-99 में 5.00 करोड़ रुपए का बजट उपबन्ध किया गया, किन्तु वर्षों से इन योजनाओं का कार्य बन्द रहने के कारण पुनः सर्वेक्षण की आवश्यकता महसूस की गई। जल निस्सरण योजनाओं पर सर्वेक्षण एवं निर्माण कार्य तभी हो सकता है जब चौर का पानी सूख जाय। बरसात के बाद भी पानी सूखने में काफी समय लगता है। इन कारणों से निर्माण कार्य हेतु बहुत कम समय मिलता है, फिर भी वर्ष 1999-2000 में जल निस्सरण की योजनाओं पर कार्य आरम्भ किया गया जिसमें एक पूरी की गई। इन पर 101.808 लाख रुपए व्यय कर 886 हेक्टेयर क्षेत्र को जल जमाव से मुक्त किया गया है।’’

प्रश्न यह है कि अगर दस साल के अन्तराल के बाद विभाग जल-जमाव के निराकरण के लिये 101.808 लाख रु. खर्च कर पाता है तो इन कुछ चुनी हुई योजनाओं के लिये निर्धारित राशि 301.08 करोड़ रुपयों को खर्च करने में कितनी शताब्दियाँ लगेंगी। वह भी तब जब कि प्राक्कलन 1998 के मूल्यों पर स्थित बना रहे।

इन योजनाओं पर कब अमल होगा पता नहीं। शायद हो भी नहीं सकता क्योंकि पानी की निकासी के लिये नाले बनाकर के नदी तक ही तो ले जाएँगे जबकि तटबन्ध बन जाने के कारण नदी का तल आसपास की ज़मीन से ऊपर है और जब तक तटबन्ध काटा नहीं जाएगा तब तक बाहर अटके पानी की एक बूँद भी नदी में नहीं जाएगी। बात किसी से छिपी नहीं है मगर किसी भी रिपोर्ट में नहीं लिखी जाती।

यहाँ यदि इंजीनियरों से पूछा जाता है कि आप की योजनाओं के कारण इतना जल जमाव बढ़ा है तो वह बताते हैं कि जल-जमाव योजनाओं से नहीं बढ़ा वह तो पहले से ही था। तब यदि अगला प्रश्न पूछा जाये कि जब इतना जल-जमाव पहले से ही था तो इस इलाके में नहर बनाने की क्या जरूरत थी तब उनके उत्तर नहीं याद आता है।

हमारे लिये जल-जमाव न तो तकनीकी मसला है और न ही इसे राजनीति से जोड़ कर देखने से हमें कुछ लाभ होने वाला है। यह तो इस क्षेत्र के किसानों के लिये जीवन-मरण का प्रश्न है जो कि यहाँ की ज़मीन, जंगल और जल संसाधनों पर राजनैतिक महत्त्वकांक्षा, तकनीकी अक्षमता, निहित स्वार्थ और सम्मोहक प्रचार के सामूहिक बलात्कार का परिणाम है जिसे यहाँ के लोग भोगने के लिये अभिशप्त हैं।

जल-जमाव सिर्फ खेती का रकबा ही कम नहीं करता वह छोटे और सीमान्त खेतिहरों को भूमिहीन बनाता है और रोजी-रोटी की तलाश में बाहर भटकने को मजबूर करता है। अपनी जरूरत भर अनाज पैदा कर लेने वाले किसानों को मजदूर बनाता है। खेतों को तालाब बनाता है और गेहूँ-धान की जगह मछलियाँ, घोंघे और केकड़े पैदा करता है। सड़क पर चलने वाली बस, जीप, तांगा, इक्का या साइकिल जैसी सवारियों को नाव में तब्दील करता है।

कालाजार, मलेरिया और जापानी इंसिफिलाइटिस जैसी जानलेवा बीमारियों को जन्म देता है। पति के जिन्दा रहते हुए महिलाओं को विधवा की तरह जीने को मजबूर करता है और मासूम बच्चों को पिता के प्यार और अनुशासन से हीन करके उन्हें कालीन बनाने या होटलों में जूठन साफ करने के लिये प्रेरित करता है।

जल-जमाव पूरी स्थानीय उत्पादन प्रक्रिया को चौपट करके इलाके के बाशिन्दों को एक कभी भी खत्म न होने वाले मनी ऑर्डर के इन्तजार में ढकेलता है और बहुत सी सामाजिक विकृतियों और समस्याओं को जन्म देता है। इन हालात से निबटने का कोई बना बनाया हल नहीं है पर कहीं-न-कहीं से एक पहल करनी पड़ेगी जहाँ से समाधान की दिशा में कुछ प्रयास हो सके। यह पारस्परिक सहयोग और संगठन तथा सरकार द्वारा समस्या को सही परिप्रेक्ष्य में देखने से ही सम्भव है जिसके बिना कोई समस्या को सुनने को भी तैयार नहीं होगा।

 

गंडक क्षेत्र और जल-जमाव का घाव

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

गंडक क्षेत्र और जल-जमाव का घाव

2

Stagnating pools and the gandak command

 

लेखक की आगामी पुस्तक ‘अभिशप्त गंडक’ से साभार

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