काला झंडा, काला धुआँ और अपनी पृथ्वी

Submitted by Hindi on Sat, 12/05/2015 - 10:43
Source
नया इंडिया 5 दिसम्बर 2015

असल दुनिया लगातार यही मंत्र जाप कर रही है कि ‘ड्रील बेबी ड्रील’। मतलब निकालों कोयला-तेल और उड़ाओ धुआँ! तभी अमेरिका के शेल फील्ड और गल्फ की खाड़ी पर आर्कटिक के ग्लेशियर कुर्बान हुए जा रहे हैं। नतीजा सामने है। इस दशक का हर वर्ष 1998 के पहले के हर वर्ष के मुकाबले अधिक गर्म हुआ है। 2015 इतिहास में दर्ज अभी तक के रिकार्ड का सर्वाधिक गर्म वर्ष घोषित हुआ है। कोई आश्चर्य नहीं जो दिल्ली में अभी भी ठंड महसूस नहीं कर रहे हैं और चेन्नई में बारिश का कहर बरपा। खतरा गम्भीर है और घड़ी की सुई बढ़ रही है। जलवायु विशेषज्ञों की भविष्यवाणी है कि सिर्फ तीस वर्ष बचे हैं, सिर्फ तीस। अपने को हम सम्भाले। कार्बन उत्सर्जन रोकें अन्यथा बढ़ी गर्मी ऐसी झुलसाएगी कि तब बच नहीं सकेगें।

पेरिस इन दिनों चिन्ता व चिन्तन का केन्द्र है। हम-आपके भविष्य, अपनी पृथ्वी की वहाँ चिन्ता हो रही है। पिछले महीने पेरिस से ही युद्ध की एक घोषणा हुई थी। आतंक के खिलाफ जंग का वह एलान था। फिलहाल एक और युद्ध का संकल्प बनता लगता है। मसला जहाँ छूटा था वहीं से पकड़ दुनिया भर के नेता सिर खपा रहे हैं कि वे जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कैसे युद्ध लड़े? जलवायु कूटनीति क्या और कैसे हो? पेरिस में भीड़ बहुत है पर माहौल संजीदा है। दुनिया भर के नेता, प्रतिनिधि एक ऐसा रोडमैप बना लेना चाहते हैं जिससे काले धुएँ के काले उत्सर्जन के खिलाफ जंग छिड़ जाए। कुछ दिन पहले इसी पेरिस में जीवन को बर्बरता से रौंदने वाले आईएस के काले झंडे के खिलाफ युद्ध का ऐलान हुआ था अब प्राण वायु को सोखने वाली काली गैसों के खिलाफ स्वैच्छिक संकल्प से युद्ध की शुरुआत होते दिखती है। चिन्ता जबरदस्त है। दबाव भारी है। सभी मान रहे हैं कि वक्त आ गया है जो आम राय बने और शुरू हो पृथ्वी को बचाने की लड़ाई।

हम लोग 1992 से अपनी पृथ्वी की चिन्ता में दुबले हुए जा रहे हैं। विश्व नेता कई बार मिले। सरकारों के प्रतिनिधि वार्ताकारों ने अपने आपको खपाए रखा। बर्लिन, क्योटो, ब्यूनस आर्यस, माराकेस, नई दिल्ली, मिलान, फिर ब्यूनस आर्यस, मॉन्ट्रियल, नैरोबी, बाली, कोपेनहेगन, दोहा और लीमा मतलब कहाँ-कहाँ नहीं जमावड़ा लगा। सिलसिला सा बना हुआ है। विश्व नेता, उनके प्रतिनिधि मिलते हैं, दलील देते हैं, गुस्सा होते हैं और एक-दूसरे को ललकारते हुए कहते हैं कि वह एक्शन ले, समझौता करें, वायदे के साथ पृथ्वी को बचाने का प्रोटोकॉल अपनाएँ।

इन तमाम कोशिशों का अंत नतीजा अभी तक सिर्फ दो सप्ताह की बैठक बाद बने 1992 का संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन कॉनवेंशन फ्रेमवर्क और 1997 का क्योटो प्रोटोकॉल है। मतलब कुछ भी नहीं। यों मानने को माना जाता है कि पृथ्वी के गर्माने को रोकने के आन्दोलन में क्योटो प्रोटोकॉल मोड़ निर्णायक था। लेकिन तथ्य यह भी है कि क्योटो में सालों की मेहनत के बाद 1997 में जो संधि हुई वह 2005 में जा कर अमल में आई और उसके परिणाम निराशाजनक थे। क्योटो संधि इसलिए व्यर्थ हुई क्योंकि जिन्हें वायदों पर अमल करना था उन मुख्य देशों ने वैसा नहीं किया। अपनी बात से मुकरे। अमेरिका और चीन बड़े जिम्मेवार देश थे तो भारत भी समस्या को बढ़वाने और उलझवाने में पीछे नहीं था। हल्की कुछ प्रगति हुई भी, यूरोपीय देशों ने अपनी वाहवाही बनाई, क्योटो के वायदे अनुसार अपना अमल बताया तो उसके पीछे हकीकत सोवियत साम्राज्य के बिखरने के बाद कबाड़ हुए कारखानों के बन्द होने की थी।

लगातार हर साल पिछले बीस सालों से दुनिया के देशों के प्रतिनिधि बन्द कमरों में बन्द होते हैं, सौदेबाजी करते हैं और उत्सर्जन रोकने, खुदाई घटाने की वायदेबाजी सोचते हैं। लेकिन असल दुनिया लगातार यही मंत्र जाप कर रही है कि ‘ड्रील बेबी ड्रील’। मतलब निकालो कोयला-तेल और उड़ाओ धुआँ! तभी अमेरिका के शेल फील्ड और गल्फ की खाड़ी पर आर्कटिक के ग्लेशियर कुर्बान हुए जा रहे हैं।

नतीजा सामने है। इस दशक का हर वर्ष 1998 के पहले के हर वर्ष के मुकाबले अधिक गर्म हुआ है। 2015 इतिहास में दर्ज अभी तक के रिकार्ड का सर्वाधिक गर्म वर्ष घोषित हुआ है। कोई आश्चर्य नहीं जो दिल्ली में अभी भी हम ठंड महसूस नहीं कर रहे हैं और चेन्नई में बारिश का कहर बरपा। खतरा गम्भीर है और घड़ी की सुई बढ़ रही है। जलवायु विशेषज्ञों की भविष्यवाणी है कि सिर्फ तीस वर्ष बचे हैं, सिर्फ तीस। अपने को हम सम्भाले। कार्बन उत्सर्जन रोकें अन्यथा बढ़ी गर्मी ऐसी झुलसाएगी कि तब बच नहीं सकेगें। उस नाते संयुक्त राष्ट्र के क्रिश्चियन फिग्यूरेस का यह कहा सही है कि जलवायु इमरजेंसी है इसलिए भागना बन्द करें।

सवाल है यह महज एक और कांफ्रेस क्या साबित होगी? सौदेबाजी फिर अगले वर्ष के लिये मुल्तवी नहीं हो जाएगी?

पेरिस में सीओपी21 का प्रारम्भ उम्मीदों के खुशगवार माहौल में इसलिए हुआ है क्योंकि इस दफा नेता एक मंच पर थे तो सबने एक सा राग भी गाया, सदिच्छा व मंशा जताई। इसी कारण कुछ ठोस हो सकने की शुरुआत हुई लगती है। पर क्या सचमुच?

यहाँ पेंच है। फिलहाल एक आरकेस्ट्रा से निकल रही आवाज, ध्वनियाँ हैं। लेकिन दो सप्ताह का वक्त जब खत्म होने को होगा तो अलग-अलग आवाज, अलग-अलग मुद्दे दिखलाई देगी। कोई कुछ कहता हुआ मिलेगा तो कोई कुछ! विश्व के ये नेता दुनिया की हकीकत की राजनैतिक दिक्कतों, मजबूरियों से पार नहीं पा सकते हैं। हालाँकि ये सब इनकी खुद की बनवाई हुई है। दुनिया के सभी देश बुनियादी तौर पर खुद की चिन्ता करने वाले हैं। हम एक ही वक्त स्वार्थी हैं और झगड़ालू भी। पेरिस में जितने देशों की भागीदारी है उन सभी में हर देश कार्बन उत्सर्जन को उतना ही रोकने को तैयार होगा जिससे उनकी आर्थिकी को नुकसान न हो। और हाँ, हर देश यह भी चाह रहा है कि दूसरा देश, सामने वाला जरूर यह वायदा करें कि वह जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिये अपना कार्बन उत्सर्जन बाँधेगा। इसी के चलते पिछले तमाम अधिवेशन हल्के वायदों और बिना ठोस एक्शन के खत्म हुए थे।

बावजूद इसके पेरिस की मौजूदा सीओपी21 इसलिए आखिरी अवसर है क्योंकि 2011 में वार्ताकारों में सहमति बनी थी कि कुछ भी हो 2015 के आखिर तक सौदा होगा। तभी दुनिया के लगभग सभी देशों के प्रतिनिधियों को यह करार करना ही है कि वे भविष्य के अपने उत्सर्जन को रोकने और जलवायु को गर्म होने से रोकने के लक्ष्य में कहाँ तक जा सकते हैं। क्या यह मुमकिन होगा? क्या महाखलनायक माने जाने वाले चीन, भारत और अमेरिका झुकेंगे?

जोखिम बढ़ रही है, लगातार बढ़ती जा रही है। वक्त का तकाजा है कि जलवायु कूटनीति सिर चढ़े। यह वैश्विक समस्या है। अस्तित्व का खतरा है तो जबर्दस्त आर्थिक असर का खतरा भी लिये हुए है। यह हर कोई मान रहा है कि ऐसे परिवर्तन जरूरी है जिनसे जलवायु का बदलना रुके और अंततः ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन पूरी तरह रूक ही जाए। इसके लिये आर्थिकियों का ट्रांसफॉरमेशन भी जरूरी है।

सो यह विश्व व्यवस्था का कुल झमेला है। वैश्वीकरण के जिस मुकाम पर आज हमारी दुनिया है। भूमंडलीकरण के बाद की जो नई विश्व व्यवस्था है उसमें एक साथ इतनी तरह के चैलेंज बने है कि एक तरफ दुनिया में जहाँ एकजुटता बन रही है, साझापन बन रहा है तो वहीं यह सहमति भी नहीं होती कि कैसे आगे बढ़ा जाए? फिर मसला आतंक के काले झंडे का हो, सशस्त्र संघर्ष का हो, आर्थिकियों के बेदम होने का हो या जलवायु परिवर्तन का मुद्दा हो। ये सब हम इंसानों की बनाई समस्याएँ हैं। पर इंसान को यह इमरजेंसी भी समझ नहीं आ रही है कि पृथ्वी को, इस ग्रह को सूखाने, आग का गोला बनने देने के कैसे दुष्परिणाम होंगे!

इसलिए पेरिस में जमा राष्ट्रपतियों, प्रधानमन्त्रियों के लिये गतिरोध तोड़ने और कार्रवाई करने का वक्त है। यदि हवाई हमले और बम फेंकने के फैसले क्षण भर में लिये जा सकते हैं, युद्ध की घोषणा तुरन्त हो सकती है तो ऐसा करने वाले नेता उतने ही साहसी, व्यवहारिक निर्णय जलवायु परिवर्तन मसले पर क्यों नहीं कर सकते जिन पर अरबों लोगों या पूरी मानव जाति का भविष्य दाँव पर है।

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