क्या है चेन्नई की बाढ़ की हकीक़त

Submitted by RuralWater on Sat, 12/05/2015 - 11:07
.देश का चौथा सबसे बड़ा महानगर चेन्नई जो कभी केरल का प्रवेश द्वार तक कहा जाता था और समूची दुनिया में पर्यटन की दृष्टि से आकर्षक शहरों की सूची में 52 जगहों में एक था, आज अप्रत्याशित कहें या अभूतपूर्व बारिश के कारण पानी-पानी हो गया है।

असलियत यह है कि चेन्नई में हुई बीते दिनों की बारिश ने पिछले 100 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। नवम्बर के महीने में इस साल चेन्नई में कुल 1025 मिलीलीटर बारिश हुई जबकि 1918 में 1089 मिलीलीटर बारिश दर्ज की गई थी। जाहिर है इस साल बारिश ने बीते सालों के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं। वहाँ बारिश से जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त है।

अगले सात दिन तक बारिश की आशंका को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। मौसम विभाग की मानें तो अगले 72 घंटे में भीषण बारिश की आशंका है। दरअसल बारिश से 86 लाख की आबादी वाला शहर डूब रहा है। बारिश से सात जिले सर्वाधिक प्रभावित हैं। पचास लाख लोग बाढ़ के पानी की चपेट में हैं।

कई मोहल्ले वीरान हो गए हैं। हर जगह हाहाकार मचा हुआ है। पानी का बहाव इतना तेज है कि लोगों के पैर ठहर ही नहीं पा रहे। आज हालत यह है कि 12 ट्रेनें रद्द की जा चुकी हैं। वायु सेवा प्रभावित हुई है। नतीजन चेन्नई एयरपोर्ट बन्द कर दिया गया है। रनवे पर हवाई जहाज के पहिए पानी में डूबे हुए हैं।

इस कारण चेन्नई एयरपोर्ट से सभी उड़ानें रद्द कर दी गई हैं। कारण चेन्नई एयरपोर्ट और रनवे पानी में डूबा हुआ है। चेन्नई एयरपोर्ट पर फँसे 700 यात्रियों को निकालने के प्रयास जारी हैं। उन्हें समीपस्थ एयरपोर्ट तिरुपति के माध्यम से सुरक्षित निकालने के लिये हरसम्भव कोशिशें की जा रहीं हैं। आगामी दस दिनों तक के लिये सभी स्कूल-कॉलेज बन्द कर दिये गए हैं।

डीएसएम की गार्डन सिटी पूरी तरह डूब चुकी है। 17 मंजिल वाली इमारत में बिजली-पानी का संकट है। सारा इलाका पानी से सराबोर है। इस वजह से लोग मृतकों का अन्तिम संस्कार भी नहीं कर पा रहे हैं। तिरुमंगलम पुलिस स्टेशन पानी में डूब गया है। अस्पतालों और घरों में पानी घुसा हुआ है। वहाँ एक से डेढ़ मीटर तक पानी भरा हुआ है। अस्पतालों तक मरीजों का पहुँचना मुश्किल हो रहा है।

चेन्नई का इंडस्ट्रीयल एरिया पानी में डूबा है। अड्यार नदी का पानी नदी के पुल के ऊपर से बह रहा है। सत्यभामा यूनीवर्सिटी, सदापुरम, ताम्ब्रम, बेलाचेरी, नंदीपुरम आदि इलाके पानी में डूबे हुए हैं। ताम्ब्रम में तो हालत यह है कि यहाँ पानी में डूबी कार के ऊपर से नाव चल रही है। इस बारिश से उत्तरी तमिलनाडु सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है।

चारों ओर सुरक्षित स्थानों पर जल्दी-से-जल्दी पहुँचने की लोगों में होड़ लगी है। सेना, नौसेना व एनडीआरएफ की टीमें बाढ़ प्रभावित इलाकों में राहत कार्य में जी जान से जुटी है। एनडीआरएफ के डीजी ओ पी सिंह कहते हैं कि अभी तक उनकी टीमों ने 500 लोगों को बचाया हैं। वहीं उनके सलाहकार अनुराग गुप्ता कहते हैं कि चेन्नई में हर तरफ पानी-ही-पानी है।

इस सैलाब ने चेन्नई में तबाही ला दी है। एनडीआरएफ की टीमें छोटी-छोटी नावों की मदद से लोगों को पानी से बाहर निकालने में जी-जान से जुटी हैं। विशाखापट्टनम से आईएनएस ऐरावत चेन्नई भेजा गया है। समूचे बाढ़ प्रभावित इलाकों की ड्रोन कैमरों से निगरानी की जा रही है।

चेन्नई की मध्यवर्गीय कालोनियों में हैलीकॉप्टरों की मदद से खाने की सामग्री के पैकेट और पानी की बोतलें गिराई जा रही हैं। तात्पर्य यह कि प्रशासन द्वारा राहत के हरसम्भव प्रयास जारी हैं। फिर भी राज्य की राजधानी चेन्नई और उसके पड़ोसी जिले कुडलोर और पुडुचेरी में बारिश से तकरीब 200 के करीब मौतें हो चुकी हैं। लेकिन बाढ़ के हालात में कोई सुधार नहीं है।

चेन्नई के लोगों का कहना है कि उन्होंने आज तक ऐसी बाढ़ कभी नहीं देखी। राज्य सरकार के मुताबिक इस बारिश से अभी तक 8000 करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ है जबकि नुकसान का पूरी तरह आकलन अभी तक नहीं हो सका है जो होना अभी बाकी है।

चेन्नई में हुई बीते दिनों की बारिश ने पिछले 100 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। नवम्बर के महीने में इस साल चेन्नई में कुल 1025 मिलीलीटर बारिश हुई जबकि 1918 में 1089 मिलीलीटर बारिश दर्ज की गई थी। जाहिर है इस साल बारिश ने बीते सालों के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं। वहाँ बारिश से जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त है। अगले सात दिन तक बारिश की आशंका को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। मौसम विभाग की मानें तो अगले 72 घंटे में भीषण बारिश की आशंका है।

अब यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह अभूतपूर्व बारिश जलवायु परिवर्तन का परिणाम है? पेरिस सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन के सवाल पर गम्भीर मंथन शुरू हो गया है। इसके केन्द्र में बिगड़ती मौसम की चाल है।

संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट की मानें तो बीते 20 सालों में मौसम की बिगड़ी चाल के चलते 80.5 करोड़ से ज्यादा भारतीय बाढ़, सूखा और तूफान से प्रभावित हुए। इसमें 47 फीसदी मौतें बाढ़ से हुई हैं। इसके कारण सबसे ज्यादा परेशान दुनिया के नेता हैं। क्योंकि दुनिया में मौसम के बदलाव के चलते सूखे, बाढ़ की घटनाएँ बढ़ रही हैं।

यदि चेन्नई में आई बाढ़ पर नजर डालें तो यह तो जगजाहिर है कि समुद्र से सटे मैदानी भूभाग पर यह महानगरी बसी हुई है। ग़ौरतलब यह है कि इस महानगर के आसपास आधा दर्जन नदी प्रणालियों की भरमार है। अड्यार, बकिंघम कैनाल और कूवम ये तीन नदियाँ तो इस महानगर के बीच में आड़ी-तिरछी होकर गुजरती हैं।

इसमें से एक बकिंघम कैनाल की गहराई में समय के साथ-साथ कमी आती गई। कारण एक तो इसमें शहर के गन्दे नालों का गिरना बराबर जारी रहा और दूसरे इसके जल-शोधन की व्यवस्था पर न के बराबर ध्यान दिया गया। यहाँ बड़े और गहरे नाले नहीं हैं जिसके कारण बारिश का पानी छोटी-छोटी नालियों के साथ जा मिलता है।

नतीजन बारिश का वह पानी आसपास के इलाकों में फैलकर बाढ़ जैसे हालात पैदा कर देता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस महानगरी की भूआकृति इस तरह की नहीं है जिससे पूरे शहर की जल की निकासी सीधी तरह से समुद्र में जा सके। जो लोग इस बारिश को जलवायु परिवर्तन का कारण बता रहे हैं, वे यह भूल जाते हैं कि इस राज्य में आधी से अधिक बरसात पूर्वोत्तर मानसून से होती हैं।

उस लिहाज से यह बारिश अपेक्षित ही कहलाई जाएगी। ग़ौरतलब यह है कि जिस तरह इस बार बारिश हुई है और जिस मात्रा में हुई, वह अभूतपूर्व है और अप्रत्याशित है। इसलिये इसे मौसम के बदलाव का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता।

लेकिन बारिश ने जो भयावह हालात पैदा कर दिये हैं और उसके चलते बाढ़ की विकरालता ने जो विनाशलीला की है, उसने इसके बारे में सोचने पर ज़रूर विवश कर दिया है। वह बात दीगर है कि इस बारिश का ठीकरा सरकार इन्द्रदेव पर डाले और अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने का प्रयास करे।

विशेषज्ञों की मानें और चेन्नई महानगर की मौजूदा संरचना पर दृष्टिपात करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इस महानगर की मौजूदा बाढ़ की स्थिति उस बदहाल नगरीय नियोजन की परिणति थी जो नगरीय योजनाकारों की अविवेकी नगरीय विस्तार नीति का दुष्परिणाम है।

यहाँ इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि योजनाकारों की नगरीय विस्तार की यह पूरी नीति आवासीय कालोनियों, बहुमंजिली अट्टालिकाओं या आवासीय भूखंडों की संरचनाओं या स्थानीय जल-विज्ञान की अधूरी जानकारियों के बिना उन्हें मंजूरी दिये जाने का परिणाम थी। इसके पीछे उनके निहित स्वार्थ थे जिसे झुठलाया नहीं जा सकता।

इसका सबसे बड़ा कारण यही है। इसमें दो राय नहीं है। उन्होंने तो उपनगरीय इलाकों में भूमाफिया को साँठ-गाँठ के तहत वहाँ बहुमंजिली इमारतें और मॉल आदि बनाने की इजाज़त दे दी जहाँ कभी झील और तालाब थे। हाँ यह बात पूरी तरह सच है कि इसके चलते पानी की निकासी के वह सारे-के-सारे रास्ते बन्द हो गए और उन जगहों पर गगनचुम्बी इमारतें खड़ी कर दी गई।

योजनाकारों ने यह सोचना गवारा ही नहीं किया कि उस हालत में पानी जाएगा कहाँ। जो शहरी दलदली ज़मीन एक समय जिसका दायरा 250 किलोमीटर के करीब था, वह अतिक्रमण का शिकार हो गई। आज उसका दायरा बहुत छोटा होकर रह गया है।

चेन्नई में बाढ़ से परेशान लोगदुख इस बात का है कि सरकारें वह चाहे किसी भी दल की क्यों न रही हों, उन्होंने शहरी संरचना की इस विडम्बना की ओर कतई ध्यान नहीं दिया। इसे यदि यों कहें कि इसकी उन्होंने पूरी तरह उपेक्षा की तो गलत नहीं होगा। बारिश के बाद की स्थिति राज्य सरकार के लिये चुनौती भरी होगी।

जाहिर सी बात है कि चेन्नई को इस तबाही के बाद अपनी पुरानी छवि को पाने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। सबसे बड़ी चिन्ता की बात यह है कि 50 लाख जिन्दगियों को बचाने की कोई योजना सरकार के पास नहीं है। यहाँ दुख इस बात का भी है कि साल 2004 में आई सुनामी का जिस तरह चेन्नई ने मुकाबला किया था, वही चेन्नई बाढ़ की इस त्रासदी का सामना करने में खुद को क्यों असहाय सा दिखाई दिया। यह समझ से परे है।

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