छिनता जल-जंगल-जमीन

Submitted by RuralWater on Thu, 12/10/2015 - 16:09

विश्व मानवाधिकार दिवस, 10 दिसम्बर पर विशेष


.1950 के दशक में विश्व के अधिकांश देशों से औपनिवेशिक शासन का खात्मा हो गया। पूरे विश्व में स्वतंत्रता की किरण ने नया सन्देश दिया। अब देशों की स्वतंत्रता के साथ ही मानव मात्र की स्वतंत्रता का उद्घोष शुरू हुआ। 10 दिसम्बर 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने 'विश्व मानवाधिकार दिवस' मनाने का निर्णय लिया।

अब हर व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके जीने के लिये न्यूनतम साधनों पर बहस चलने लगी। सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार और जीने के लिये साधनों को सुनिश्चित करना सरकारों का कर्तव्य माना गया। प्राकृतिक संसाधनों जैसे जल-जंगल और ज़मीन पर सारे लोगों का नैसर्गिक अधिकार हो गया।

तब से पूरे विश्व और भारत में आम आदमी को बहुत अधिकार मिले। लेकिन 1990 में शुरू हुए उदारीकरण ने एक बार फिर से आम जनता के अधिकारों का न्यूनीकरण शुरू कर दिया है। सरकारें विकास के नाम पर आदिवासियों, दलितों और गरीबों से जल-जंगल और ज़मीन छीनने के षड़यंत्र में लगी हैं।

2015 के विश्व मानवाधिकार दिवस का ध्येय का वाक्य- 'हरदम-हमारी स्वतंत्रता और हमारा अधिकार।' है। इस लिहाज से इस वर्ष मानवाधिकार का क्षेत्र बहुत ही व्यापक हो गया है। लेकिन भारत और विश्व के अधिकांश देशों में मानवाधिकार की ज़मीनी सच्चाई अलग ही है।

भारत के आदिवासी बहुल राज्यों में उनको जंगल से खदेड़ा जा रहा है। सदियों से काबिज ज़मीन पर से उनको बेदखल किया जा रहा है। जबकि हकीक़त यह है कि जंगल ही उनके जीवन और आजीविका का मुख्य और अन्तिम साधन रहा है। आदिवासी क्षेत्रों में ऐसा लगता है कि न तो कानून का राज है और न कहीं संविधान लागू है। सुप्रीम कोर्ट की अवमानना सत्ता वर्ग के बाएँ हाथ का खेल है।

आर्थिक सुधारों, विकास और बुनियादी सुविधाओं के नाम, शहरीकरण और औद्योगीकरण के बहाने देश के चप्पे-चप्पे पर मानवाधिकार का हनन हो रहा है। भारत में मानवाधिकार व नागरिक अधिकारों की अनुपस्थिति की मुख्य वजह वर्णवर्चस्वी सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था और इसके तहत जाति व्यवस्था, नस्ली भेदभाव, आदिवासियों का अलगाव और भौगोलिक कारण है। जबकि किसी भी इंसान की जिन्दगी, आज़ादी, बराबरी और सम्मान का अधिकार ही मानवाधिकार है।

देश में मानवाधिकार की बेहद जटिल परिस्थितियाँ हैं। आदिवासी समुदाय निरन्तर अपने अधिकारों को खोता जा रहा है। मुक्त बाजार की व्यवस्था और ग्लोबीकरण ने पूरे तंत्र को ही युद्धक अर्थशास्त्र बना दिया है।

जो भारत में धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद और वर्णवर्चस्वी नस्ली जाति व्यवस्था व भौगोलिक भेदभाव, एकाधिकारवादी कारपोरेट आक्रमण और प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट, जल, जंगल, ज़मीन आजीविका नागरिकता के निरंकुश बेदखली अभियान में लगा है। वैसे भी विश्व के समस्त देशों के नागरिकों को अभी पूर्ण मानव अधिकार नहीं मिला है।

भारत में हरिजनों तथा अनेक परिगणित जातियों को व्यवहार में समता और सम्पत्ति के अधिकार नहीं मिल सके हैं। दो तिहाई मानव जाति का अभी भी आर्थिक शोषण होता चला आ रहा है। भारत में तो पचास फीसदी जनता मानवाधिकार से वंचित है और उन्हें इसका अहसास तक नहीं है।

भारत सरकार द्वारा वर्ष 1990 में भारतीय सीमा के भीतर रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को समान रूप से मानवाधिकार प्रदान करने की व्यवस्था की गई है। हालांकि संविधान द्वारा भी मनुष्यों को विभिन्न प्रकार के मौलिक अधिकार प्रदान किये गए हैं, लेकिन उनका क्षेत्र बहुत हद तक सीमित है।

जहाँ मौलिक अधिकारों का प्रयोग केवल नागरिक ही कर सकते हैं, वहीं मानवाधिकार भारत की शासकीय सीमा में रहने वाले सभी व्यक्तियों, चाहे वे भारत के नागरिक हों या ना हों, पर समान रूप से लागू होते हैं। भले ही शहरी क्षेत्रों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के चलते व्यक्ति बहुत हद तक अपने अधिकारों के विषय में जागरूक रहने लगे हों, लेकिन ग्रामीण इलाकों में आज भी यह परिस्थितियाँ विकसित नहीं हो सकी हैं।

विश्व मानवाधिकार दिवस के अवसर पर छत्तीसगढ़ राज्य के कई इलाकों में आदिवासियों की जल, जंगल और ज़मीन के मुद्दे के साथ भू-विस्थापित परिवारों की स्थिति पर चर्चा चल रही है। आदिवासी हितों व पेसा एक्ट को दर किनार किये जाने के मामले में विस्तृत बातचीत हो रही है। इसके साथ ही सिलिंग एक्ट के तहत भूमिहीन परिवारों को उद्योगों में जमा बेकार पड़ी भूमि आबंटन का मामला भी उठाया जा रहा है।

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में तेजी से भूजल का स्तर गिर रहा है। धरमजयगढ़ जिले के औद्योगिक क्षेत्र तमनार ब्लाक में भूजल की स्थिति खतरनाक स्तर पर पहुँच गई है। तमनार ब्लाक में सरकारी आँकड़ों के अनुसार 150 फीट तक भूजल का स्तर नीचे गिर गया है, लेकिन इस मामले में जानकारों की मानें तो ब्लाक में 2 सौ से लेकर 3 सौ फीट तक नीचे पानी का स्तर चला गया है।

यह भयावह स्थिति प्रशासन के संज्ञान में है लेकिन मामले को जानकर भी अनजान बन रहा है। अंचल में स्थित लगभग तीन दर्जन से अधिक सभी औद्योगिक घरानों द्वारा चोरी से भूजल का दोहन कर रही है। सम्बन्धित विभाग हर वर्ष मामले को रफा-दफा करने के लिये सरचार्ज लगाकर जुर्माना राशि की वसूली कर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है।

प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर आदिवासियों के हक पर डाका डाला जा रहा है। भू-विस्थापित परिवार की महिलाओं व बच्चों की स्थिति क्षेत्र में बेहद खराब है। इसके अलावा सीएसआर से होने वाले विकास कार्य सहित शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार के अवसर बहुत ही कम हैं।

इसी तरह पूर्वोत्तर के राज्य में आम नागरिकों के मानवाधिकारों का हनन करने वाले और सैन्य बलों को अगाध छूट देने वाले आफ्स्पा कानून को लम्बे समय से रद्द करने की माँग की जा रही है। इस कानून की आड़ में पिछले 50 सालों से पूर्वोत्तर राज्यों में सेना ने अपना बर्बर राज चला रखा है। लूट, बलात्कार, मार-पीट, हत्या आदि का इस्तेमाल आम जनता के खिलाफ तथाकथित रूप से उग्रवाद को दबाने के लिये किया जाता है।

परन्तु सच तो यह है कि इन 50 सालों में इस इलाके में राज्य के दमन और मुख्यधारा से काटे रखने की राजनीति के फलस्वरूप उग्रवाद बढ़ा ही है। इस कानून का असर सबसे ज्यादा महिलाओं को ही झेलना पड़ता है। 'आफ्स्पा' जम्मू और कश्मीर में भी लगाया गया है और वहाँ भी पिछले 25 सालों में सेना के अत्याचार तथा केन्द्र सरकार द्वारा लोकतंत्र की प्रक्रियाओं से खिलवाड़ के फलस्वरूप उग्रवाद और आतंकवाद बढ़ा है।

जब जनता जल, जंगल, ज़मीन और जीने के अपने अधिकारों के लिये लड़ती है तो उसे दबाने के लिये राजनैतिक सत्ता पुलिस, सेना एवं कानून का सहारा लेती है। इसलिये देश की जनता को लूटकर निजी कम्पनियों के हाथों में प्राकृतिक संसाधन सौंपने की नीतियों का चारों तरफ विरोध हो रहा है।

विश्व मानवाधिकार दिवस के अवसर पर झारखण्ड के दूर-दराज के जनजातीय इलाकों से आये सैकड़ों आदिवासियों ने राँची आकर राजभवन तक पैदल मार्च किया था।

वे यहाँ विकास परियोजनाओं में न तो अपनी हिस्सेदारी की माँग करने के लिये आये थे और न ही उनकी मंशा राजनीतिक ताकत बटोरने की थी। बल्कि वे लोग सैकड़ों किमी का सफर तय करके झारखण्ड की राजधानी राँची में सरकार से अपनी ज़मीन पर अधिकार की माँग को लेकर यहाँ पहुँचे थे, यह ऐसी ज़मीन थी जो औद्योगिक अथवा खनन परियोजनाओं के चलते उनसे छीनी जा रही थीं।

विश्व मानवाधिकार दिवस के अवसर पर छत्तीसगढ़ राज्य के कई इलाकों में आदिवासियों की जल, जंगल और ज़मीन के मुद्दे के साथ भू-विस्थापित परिवारों की स्थिति पर चर्चा चल रही है। आदिवासी हितों व पेसा एक्ट को दर किनार किये जाने के मामले में विस्तृत बातचीत हो रही है। इसके साथ ही सिलिंग एक्ट के तहत भूमिहीन परिवारों को उद्योगों में जमा बेकार पड़ी भूमि आबंटन का मामला भी उठाया जा रहा है।

वर्ष 2006 में वनवासी जनजातियों को भूमि अधिकार देने के लिये वनाधिकार अधिनियम बनाया गया था, जिस पर आज तक ठीक से अमल नहीं हो सका है। प्राकृतिक सम्पदा के बड़े पैमाने पर हो रहे दोहन के बावजूद, आज भी हमारे जंगलों में अकूत खनिज सम्पदा और जैव-विविधता भरी पड़ी है, जिस पर विदेशी कम्पनियों की नजरें गड़ी हुई हैं।

औद्योगिक विस्तार के लिये ये कम्पनियाँ स्थानीय लोगों को उनके आवास और खेती-बाड़ी से बेदखल कर रही हैं। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि गत छह दशकों में भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था से आदिवासियों को कुछ हासिल हुआ तो वह शोषण, भेदभाव, वंचना एवं पीढ़ियों से भूमि को जोतने और बोने से बेदखली के रूप में मिला है।

आदिवासियों ने वनों के स्वाभाविक निवासी होने के नाते अपने अधिकारों की जब भी माँग की तो उसे सभी सरकारें खारिज करती रहीं और जब भी जनजातीय समुदायों ने स्वयं के परम्परागत वनवासी होने का दावा पेश किया तो उन्हें आधिकारिक तौर पर विभिन्न कानूनी प्रावधानों की आड़ में पेड़ों, नदियों, पहाड़ों और जंगली जानवरों का दुश्मन ठहराकर जंगल से बाहर खदेड़ने की प्रक्रिया आरम्भ कर दी गई।

इतने पर भी जब आदिवासियों ने अपनी जमीनों को तथाकथित विकास परियोजनाओं के लिये देने से इनकार कर दिया तो उन पर विभिन्न प्रकार के आपराधिक मामले दर्ज कर लिये गए और उन्हें अपने देश की ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के रक्षक कही जाने वाली पुलिस की गोलियों का भी शिकार बनना पड़ा।

उपनिवेशवादी हुकूमत ने संसाधनों के दोहन के लिये जिस तरह का ढाँचा बनाया था, आज़ादी के बाद भी कानून एवं नीतियों की आड़ में संसाधनों की लूट का यह सिलसिला ठीक उसी तरह से चलता रहा।

भारतीय संविधान ने औपनिवेशिक नीति का अनुसरण करते हुए जनजातीय इलाकों पर अधिकार शासन व्यवस्था को देकर वनों के स्वाभाविक निवासियों को उनके परम्परागत आवास से कानूनी तौर पर बेदखल कर दिया गया। बाद में जब संरक्षित वन और अभयारण्यों की अवधारणा का जन्म हुआ तो मामला और भी पेंचीदा हो गया।

इस तरह वनोत्पादों पर परस्पर आश्रित समूचे जनजातीय समाज को हाशिए पर और गरीबी के दलदल में धकेल दिया गया, जहाँ न तो आजीविका थी, न आवास और न ही आत्मसम्मानपूर्ण एवं आत्मनिर्भर जीवन का अहसास ही बचा रह सका था।

Disqus Comment