गंगा में गन्दगी को देख एनजीटी हैरान

Submitted by RuralWater on Mon, 12/14/2015 - 15:13
1. 41 एमएलडी पानी सीधे गंगा में, ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता 9 एमएलडी
2. शोधन के बाद पानी में क्षारीय तत्त्व, पीएच वेल्यू 9
3. ज्यादातर टेनरी नहीं कर रही प्राथमिक सोधन
4. क्रोमियम 2 मिलीग्राम के सापेक्ष 70 मिलीग्राम प्रतिलीटर, टोटल सॉलिडसस्पेंडेड 600 मिलीग्राम के सापेक्ष 4000 मिलीग्राम

टेनरियों से आने वाले कचरे और पानी में क्रोमियम 70 मिलीग्राम प्रतिलीटर तथा टोटल सॉलिड सस्पेंडेड 4000 मिलीग्राम प्रतिलीटर निकला। जो मानक से कई गुना ज्यादा था। मानक के अनुसार कामन ट्रीटमेंट प्लांट में टेनरियों का प्राथमिक शोधन के बाद आने वाले पानी में 2 मिलीग्राम क्रोमियम तथा 600 मिलीग्राम टीएसएस ही आना चाहिए। क्योंकि कामन ट्रीटमेंट प्लांट की शोधन क्षमता इतने प्रदूषित पानी की नहीं है। आदेशों की अनदेखी को परखने को दिल्ली से कानपुर आई एनजीटी टीम उस समय हतप्रभ रह गई जब उन्होंने देखा कि शहर की टेनरियों से आने वाले पानी में अत्यधिक मात्रा में क्रोमियम आ रहा है जिसे कामन ट्रीटमेंट प्लांट शोधन कर ही नहीं सकता है।

दिल्ली से कानपुर आई नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की टीम ने कामन ट्रीटमेंट प्लांट की हक़ीकत परखने को अचानक परखा तो तमाम अनियमितता देख हतप्रभ रह गए। केन्द्रीय प्रदूषण बोर्ड के सचिव डॉ. अगोलकर ने देखा कि प्लांट में टेनरियों के शोधन को गिरने वाले कचरे और पानी में क्रोमियम की मात्रा इतनी अधिक है कि प्लांट से साफ किया ही नहीं जा सकता है। तब उन्होंने सत्यता परखने को किट से सैम्पल की जाँच करने को कहा, जब जाँच रिपोर्ट आई तो उनके होश उड़ गए।

टेनरियों से आने वाले कचरे और पानी में क्रोमियम 70 मिलीग्राम प्रतिलीटर तथा टोटल सॉलिड सस्पेंडेड 4000 मिलीग्राम प्रतिलीटर निकला। जो मानक से कई गुना ज्यादा था। मानक के अनुसार कामन ट्रीटमेंट प्लांट में टेनरियों का प्राथमिक शोधन के बाद आने वाले पानी में 2 मिलीग्राम क्रोमियम तथा 600 मिलीग्राम टीएसएस ही आना चाहिए। क्योंकि कामन ट्रीटमेंट प्लांट की शोधन क्षमता इतने प्रदूषित पानी की नहीं है।

सीटीपी प्लांट से शोधन के बाद निकलने वाला पानी खेतों के लिये तो बेहद हानिकारक है ही साथ ही भूजल को भी प्रदूषित कर रहा है। बेहद आपत्तिजनक ये है कि तमाम मसक्कतों की दौड़ भाग का नतीजा शिफर है। स्थानीय अधिकारी अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वहन ठीक से कर ही नहीं रहे हैं।

टीम के सदस्यों ने प्लांट के अन्तिम बेल पर जाकर देखा तो सभी एक दूसरे को हैरानगी से देखने लगे क्योंकि शोधित पानी में 9 पीएच वेल्यू निकली। शोधन के बाद भी पानी में इतने क्षारीय तत्व रह जाते हैं जो मनुष्यों के लिये अनुपयुक्त माना जाता है।

एनजीटी की टीम में केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सचिव डॉ. अगोलकर, उत्तराखण्ड प्रदूषण बोर्ड के सचिव विनोद सिंहल, आइआइटी दिल्ली के प्रो. डॉ. एस शेख़, केन्द्रीय बोर्ड के जोनल इंचार्ज पीके मिश्र, यूपी प्रदूषण बोर्ड मुख्य अभियन्ता एसके सिंह तथा सदस्य एससी यादव, जल निगम के प्रभारी विनेश सिंह ने संयुक्त बैठक कर सभी से सहयोग के लिये कहा गया।

मालूम हो कि सीटीपी की शोधन क्षमता 9 एमएलडी की है जबकि शहर में 402 टेनरियाँ हैं जिनसे प्रतिदिन 50 एमएलडी पानी निस्तारित किया जा रहा है ऐसे में यह तय है कि 41 एमएलडी पानी सीधे गंगा में गिर रहा है। इस समस्या को हल करने को जरूरी है कि 41 एमएलडी पानी के शोधन के लिये सीटीपी प्लांट की व्यवस्था और की जाय।

बड़ी बात ये है कि टेनरियों के लिये सख्त आदेश हैं कि उनकी टेनरी से निकलने वाले पानी को वो प्राथमिक स्तर पर शोधन करने के बाद ही सीटीपी प्लांट को भेजेंगे लेकिन ज्यादातर टेनरियाँ इस आदेश का पालन ही नहीं कर रही हैं। उससे भी ज्यादा हैरानी की बात ये है कि जिन अधिकारियों पर आदेश पालन करवाने की जिम्मवारी है वो भी नाकारा साबित हो रहे हैं।

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