जल प्रयोगशाला का है खस्ताहाल

Submitted by RuralWater on Thu, 12/17/2015 - 10:06
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पाँच वर्ष से अधिक प्रयोगशाला की स्थापना के हो गए हैं, लेकिन प्रयोगशाला अब तक आधारभूत संरचना से लैस नहीं हो पाया है। मुंगेर का पूरा प्रयोगशाला एक रसायनज्ञ के भरोसे चल रहा है। यहाँ रसायनज्ञ सुनील कुमार बताते हैं कि यदि वे जलजाँच के सिलसिले में क्षेत्र के परिभ्रमण के लिये निकलते हैं तो प्रयोगशाला बन्द रहता है। इसे लेकर तरह—तरह की भ्रान्तियाँ रहती है। कहा जाता है कि सुरक्षित पेयजल जीवन का आधार है। आज जहाँ भूजल की गुणवत्ता को लेकर तरह—तरह के सवाल उठ रहे हैं। सुरक्षित पेयजल के अभाव में लोग तरह—तरह की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। स्वच्छ जल की आपूर्ति में केन्द्र और राज्य सरकारें करोड़ों खर्च कर रही हैं।

केन्द्रीय पेयजल मंत्रालय के अनुसार हर राज्य में जिला अनुसार परीक्षण केन्द्र होने का प्रावधान जरूरी है। वहीं जल की जाँच के लिये सरकारी प्रयोगशाला की स्थिति बदहाल है। न तो यहाँ सृजित पद के अनुसार कर्मचारी की व्यवस्था है न ही आवश्यक आधारभूत संरचना ही है।

राज्य में बढ़ चला बिहार जैसा अभियान चला और करोड़ों रुपए यूँ ही उड़ाए गए। कहा तो गया था विजन डॉक्यूमेंट बनेगा। कोई विजन डॉक्यूमेंट नहीं बना। आज भी बिहार जैसे राज्य में पानी का सवाल हाशिए पर है। राज्य में जल जाँच के लिये लो​क स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग के 38 प्रयोगशालाएँ हैं।

जल की गुणवत्ता की जाँच ​के लिये राज्य के हर जिले में जल जाँच प्रयोगशाला की स्थापना की गई है। मुंगेर प्रमंडलीय मुख्यालय है। मुंगेर में बिहार सरकार की योजना योजनान्तर्गत 11 लाख रुपए की प्राक्कलित राशि जिला स्तरीय प्रयोगशाला भवन का उद्घाटन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया था।

पाँच वर्ष से अधिक प्रयोगशाला की स्थापना के हो गए हैं, लेकिन प्रयोगशाला अब तक आधारभूत संरचना से लैस नहीं हो पाया है। मुंगेर का पूरा प्रयोगशाला एक रसायनज्ञ के भरोसे चल रहा है। यहाँ रसायनज्ञ सुनील कुमार बताते हैं कि यदि वे जलजाँच के सिलसिले में क्षेत्र के परिभ्रमण के लिये निकलते हैं तो प्रयोगशाला बन्द रहता है। इसे लेकर तरह—तरह की भ्रान्तियाँ रहती है।

प्रयोगशाला में एक सहायक रसायनज्ञ, कम्प्यूटर आॅपरेटर होने चा​हिए, लेकिन सारी गतिविधियाँ एक रसायनज्ञ पर केन्द्रित​ रहती है।

इससे पहले जिले के हर पंचायत से पंचायत प्रतिनिधियों का चयन कर जल जाँच के लिये प्रशिक्षित किया था। साथ ​ही उन्हें जल जाँच के लिये आवश्यक कीट्स मुहैया कराए गए थे। वह योजना यू टाँय टाँय​ फिस हो गया। यूँ ही सरकार के पैसे पानी में गए।

सरकार की ओर से जल जाँच के लिये जो कीट्स मुहैया कराया गया, उसका भी कोई अता—पता नहीं है। ये पंचायत प्रतिनिधि अपने—अपने क्षेत्रों में जल की जाँच तक नहीं कर पाये। उसके बाद जिले के प्रयोगशाला की व्यवस्था की गई।

दरअसल में जल जाँच का मकसद था कि पेयजल की अशुद्धता और प्रदूषण के स्तर के बारे में पता लग सके और उसका हल तलाशा जा सके।

लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग बिहार सरकार द्वारा वर्ष में चापाकलों का दो बार सर्वेक्षण करने का प्रावधान है। इसके मानसून पहले व मानसून बाद यह सर्वेक्षण होना चाहिए। जाँच के क्रम में साथ ही चापाकलों के आसपास पाई जाने वाली तत्वों को भी इसमें शामिल किये जाने की व्यवस्था है। इसके लिये निर्धारित प्रपत्र उपलब्ध भी हैं।

इसमें स्थल विवरणी, ग्राम पंचायत, पेयजल स्रोत के निकट रहने वाले परिवार की मुखिया का नाम अंकित रहेगा। सभी नमूनों को वायल में एकत्र कर जहाँ से इस नमूने को जाँच प्रयोगशाला लाया जाना है। जाँच में दस बिन्दुओं को शामिल किया गया है।

लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग की ओर से चापाकलों की गुणवत्ता की जाँच के उपरान्त प्रभावित चापाकलों पर लाल निशान से अंकित किये जाते हैं। यह काम भी विभाग की ओर ठीक ढंग से नहीं किया गया हैं, ताकि पता चल सके कि कहाँ के पानी का इस्तेमाल पीने के लिये करें और कहाँ का नहीं।

मुंगेर के ग्रामीण क्षेत्रों की बात तो दूर शहरी क्षेत्रों में भी यह नजर नहीं आता है। लिहाजा लोगों को यह पता ही नहीं कि कहाँ का पानी पिएँ या नहीं? इसकी वजह से जलजनित बीमारियाँ आम हो गई है।

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