बिहार में तालाबों और आहर-पइन प्रणाली अपनाने की जरूरत

Submitted by RuralWater on Thu, 12/17/2015 - 14:34
.सूखे से निपटने की नायाब योजना लेकर आई है बिहार सरकार। वह ग्रामीण क्षेत्रों में जो तालाब सूख गए हैं, उनमें नलकूप से पानी भरने जा रही है। गर्मी के मौसम में सूखे तालाबों को नलकूपों के पानी से भरने की यह योजना मत्स्यपालन को बढ़ावा देने के लिहाज से तैयार की गई है। मंत्री अवधेश कुमार सिंह ने कहा कि तालाबों में नलकूप से पानी भरने के लिये 50 प्रतिशत अनुदान दिया जाएगा।

मत्स्यपालन से जुड़ी सहकारी समितियों को प्राथमिकता दी जाएगी। सूखे की हालत को देखते हुए यह योजना आकर्षक लगती है। इससे मत्स्यपालन और पशुओं के पेयजल की समस्या का फौरी समाधान भी हो सकता है। परन्तु प्रश्न यह है कि सूखाड़ की वजह से उत्पन्न समस्याओं का वास्तविक समाधान ऐसी योजनाओं से हो सकता है?

हर दो-चार साल में ऐसी हालत बन जाती है। दरअसल, ऐसी योजनाओं की वजह से बिहार का जलसंकट गहरा होता जा रहा है और संकट के वास्तविक स्वरूप की समझ भी नहीं बन पा रही है। बिहार के उन इलाकों की हालत अधिक खराब है जो अतिवृष्टि और बाढ़ग्रस्त कहलाते हैं।

बिहार समेत देश के आधे हिस्से में सूखे की हालत है। देश के 29 राज्यों में से 9 राज्यों ने आधिकारिक तौर पर सूखा की घोषणा कर दी है। 18 राज्यों में औसत से कम वर्षा हुई है। देश के 640 जिलों में से 302 जिलों में औसत से 20 प्रतिशत कम बारिश हुई। यह सुखाड़ का लगातार तीसरा साल है।

अकालग्रस्त राज्यों- तेलंगाना, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, ओड़िशा और मध्य प्रदेश में हालत अधिक खराब है। हालांकि केन्द्र सरकार ने नवम्बर के तीसरे सप्ताह में अल्प वर्षा वाले सभी राज्यों को सूखा के बारे में तत्काल ज्ञापन देने का निर्देश दिया।

राज्यों को राष्ट्रीय सूखा राहत कोष से सहायता पाने के लिये वित्तीय ज्ञापन भी प्रस्तुत करने के लिये कहा गया।

जानकारी मिलने के बाद केन्द्रीय टीम स्थिति का जायजा लेने और आवश्यक सहायता का आकलन करने के लिये राज्यों का दौरा करेगी। सूखा राहत मद में सहायता पाने के लिये नवम्बर तक कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के ज्ञापन मंत्रालय को मिल चुके थे।

बिहार में सुखाड़ जैसी हालत उत्पन्न होने की घोषणा जून में ही हो गई थी और हालत से निपटने के लिये सरकारी कवायद आरम्भ हो गई।

सरकारी कवायद का मतलब-डीजल अनुदान और दूसरे मदों में सरकारी धन का आवंटन। वैसे इस तरह के अनुदान की रकम कभी वास्तविक किसानों तक पहुँच नहीं पाती, दूसरे यह इतना कम होता है कि उन्हें खास राहत नहीं मिलती। फसल मारी जाती है।

सच्चाई यही है कि इन अनुदानों, मौजूदा सिंचाई योजनाओं और कृषि विकास की तमाम घोषणाओं के बावजूद बिहार के खेतों की उपज लगातार घट रही है। डीजल और खाद का खर्च लगातार बढ़ रहा है।

वर्षा लगातार कम होती गई है। नेपाल से आने वाली नदियों में पानी घट गया है। इसके मद्देनज़र जल संरक्षण के उपाय और जल की किफायती इस्तेमाल निहायत जरूरी हो गया है। पर सरकारें लगातार वैसी एकांगी योजनाएँ लेकर सामने आती हैं, जो कालान्तर में समस्या को बढ़ाने वाली साबित होगी।

नलकूपों से तालाब भरने की योजना ऐसी ही है। इससे भूगर्भ जल भण्डार का दोहन बढ़ेगा जबकि वहीं तालाब वर्षाजल के संचय के माध्यम बन सकते हैं जिनसे भूगर्भ जल भण्डार का पुनर्भरण हो सकेगा।

मत्स्यपालन के लिहाज से कम गहरे तालाब बनते हैं क्योंकि वे तेजी से बढ़ने वाली नस्ल की मछलियों के अधिक अनुकूल होती हैं और मछली के कारोबार में अधिक कमाई हो पाती है। जबकि जल संचय के लिहाज से गहरे तालाब अधिक उपयोगी होते हैं। उनमें देशी नस्ल की मछलियों का पालन भी हो सकता है।

तालाबों की परम्परा पूरे मिथिलांचल में रही है और उनके नष्ट होने का असर भी पूरे इलाके पर पड़ा है। तालाबों में एकत्र जल भूमिगत कुंडों से सीधे सम्पर्क के कारण सदा तरोताजा बना रहता है और सूर्य के ताप के प्रभाव में विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों का स्वतः उपचार कर स्वयं को शुद्ध और स्वच्छ बनाए रखता है। इनमें एकत्र जल रिस-रिसकर भूजल-कुंडों को भरता है। तालाबों का भूजल कुंडों से सम्पर्क दोतरफा लाभदायक होता है। उसके सतह पर पड़ी वर्षा की बूँदें अपनी आवेगिक गति और शक्ति के कारण भूगर्भ में अधिक गहराई तक जाती है। उन नस्लों की मछलियों की कीमत भी अधिक होती है, पर कम समय में अधिक आमदनी के फेर में कारोबारी तथाकथित उन्नत नस्ल की मछलियों का पालन करते हैं। सरकारी तौर पर उन्हीं तथाकथित उन्नत नस्ल के मत्स्यपालन को प्रोत्साहित किया जाता है।

बिहार में इस वर्ष औसत से 31 प्रतिशत कम बारिश हुई है। परन्तु खरीफ फसल में धान का आच्छादन 97.71 प्रतिशत और मक्के का आच्छादन 89.7 प्रतिशत हुआ है। आंकड़ों के इस मकड़जाल का सच केवल इतना है कि बीचड़े लगाने से लेकर रोपाई तक नलकूपों का भरपूर इस्तेमाल हुआ है।

अब फसल को सूखने से बचाने में डीजल का एकमात्र सहारा है। धान की फसल में फूलों के दाने बनने के समय पानी की भरपूर जरूरत होती है। इसके मद्देनज़र नवनिर्वाचित सरकार ने तीन बार डीजल अनुदान देने, रबी फसलों को भी डीजल अनुदान के दायरे में लेने इत्यादि घोषणाएँ की। इस मद में 430 करोड़ आवंटित हो चूके हैं।

पिछले आठ वर्षों से 15 जून से 15 जुलाई के बीच औसत से कम बारिश हो रही है। यह धान के बीज डालने का समय है। इस वर्ष उस दौरान लगभग 32 प्रतिशत की कमी रही।

कम बारिश की वजह से इस दौरान केवल 16 प्रतिशत खेतों में समय पर बुआई हो सकी। नलकूप का सहारा लेने के पहले किसान वर्षा का भरपूर इन्तजार करते हैं। केवल वही किसान बिचड़ा डाल पाये या उसे सूखने से बचा पाये जिनका सामर्थ डीजल खरीदने की थी।

और बिजली विभाग को ग्रामीण क्षेत्रों में आठ-दस घंटा बिजली देने का निर्देश भले मुख्यमंत्री दें, पर बिजली चालित पम्पों की संख्या बहुत कम है। जिन इलाकों में नहरें हैं, वहाँ अन्तिम छोर तक पानी पहुँचने में समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। बिजली चालित पम्प खासकर उन्हीं इलाकों में अधिक है।

उत्तर बिहार के बाढ़ग्रस्त जिलों की हालत अधिक खराब है। पचास साल पहले तक इन गाँवों में जरूरत के मुताबिक तालाब होते थे। पोखर ग्राम्य जीवन के अभिन्न अंग होते थे। इनसे कई प्रयोजन सिद्ध होते थे। बरसात के मौसम में वर्षाजल इनमें संचित होता था।

बाढ़ आने पर वह पानी पहले तालाबों को भरता था। गाँव और बस्ती डूबने से बच जाते थे। अगर कभी बड़ी बाढ़ आई तो तालाबों के पाट, घाट मवेशियों और मनुष्यों के आश्रय स्थल होते थे। अगर बाढ़ नहीं आई तो अगले मौसम में सिंचाई के लिये पानी उपलब्ध होता था।

तालाबों से सिंचाई के लिये पानी निकालने की कई तकनीकें प्रचलित थी। इसके कई उपकरण थे। एक उपकरण था करीन, जिसका जोड़ शायद अन्यत्र नहीं मिलता। पर करीन तो अब विलुप्त हो गए हैं। नई पीढ़ी के लोगों ने करीन देखा भी नहीं होगा। हालांकि बीस-तीस साल पहले यह पूरे मिथिलांचल में तालाब से सिंचाई करने का सबसे अधिक प्रचलित उपकरण था।

बड़े खेतों की सिंचाई में इसका उपयोग होता था। यह काठ का पतला, लम्बा नावनुमा उपकरण होता है जिसे रस्सी और बाँस के सहारे तालाब के किनारे लगाया जाता है। बैलेंस-पुली तकनीक से इसके एक सिरे को पानी में डाला जाता और फिर निकालने पर दूसरे सिरे से पानी उलीचा जाता है।

आहर पईनअब नलकूप गाड़ने वाले कारीगर लगभग उसी तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। जब अपेक्षाकृत कम पानी की जरूरत हो तो बाँस की टोकरी में रस्सी बाँधकर उपकरण बनाया जाता है जिसे दो आदमी मिलकर पकड़ते और झटके से पानी उलीचते।

यह पानी मोरियों के सहारे खेतों में पहुँचा दिया जाता। बाद में जब डीजल पम्प आये तो उन पम्पों से भी तालाब का पानी निकाला जाने लगा। डीजलपम्प लगाकर तालाब से पानी निकालना नलकूप से पानी निकालने की अपेक्षा सस्ता होता है। सूर्य की रोशनी और हवा के सम्पर्क से तालाब का पानी अधिक गुणवत्तापूर्ण होता है।

तालाबों की परम्परा पूरे मिथिलांचल में रही है और उनके नष्ट होने का असर भी पूरे इलाके पर पड़ा है। तालाबों में एकत्र जल भूमिगत कुंडों से सीधे सम्पर्क के कारण सदा तरोताजा बना रहता है और सूर्य के ताप के प्रभाव में विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों का स्वतः उपचार कर स्वयं को शुद्ध और स्वच्छ बनाए रखता है। इनमें एकत्र जल रिस-रिसकर भूजल-कुंडों को भरता है।

तालाबों का भूजल कुंडों से सम्पर्क दोतरफा लाभदायक होता है। उसके सतह पर पड़ी वर्षा की बूँदें अपनी आवेगिक गति और शक्ति के कारण भूगर्भ में अधिक गहराई तक जाती है। यही कारण है कि कुएँ और तालाब आज भी भूगर्भ के इस्तेमाल के भी सर्वोत्तम साधन बने हुए हैं।

कुओं का उपयोग यद्यपि सीमित प्रयोजनों से होता था। पहले इसे पेयजल का बेहतरीन स्रोत माना जाता था। भूगर्भीय जल-कुंडों से सम्पर्कित होने से इसका जल तरोताजा बना रहता है। आज जब भूजल में आयरन, फ्लोराइड, आर्सेनिक इत्यादि हानिकर रसायन निकलने लगे हैं, तब उनके निराकरण का उपाय खोजना पड़ता है।

ऐसे में कुओं की प्रासंगिकता और उपयोगिता बढ़ गई है। भूजल में इन जहरों के बारे में शोध करने वाले वैज्ञानिकों ने कुओं को बेहतरीन पाया है। खुली हवा, सूर्य की रोशनी और भूगर्भीय जलकुंडों के प्रत्यक्ष सम्पर्क की वजह से कुओं में ऐसे रसायनों का प्राकृतिक उपचार हो जाता है।

पेयजल के स्रोत के तौर पर कुओं का इस्तेमाल करने में केवल इतना ध्यान रखना होता है कि उसमें गन्दा पानी नहीं जाये, केवल वर्षा का शुद्ध जल ही एकत्र हो। इसके खास इन्तजाम किये जाएँ। ऊँचा जगत बने। उसकी नियमित मरम्मत की जाये। सम्भव हो तो बरसात को छोड़कर बाकी दिनों में कुएँ को ढँककर रखा जाये।

समय-समय पर नीम के पत्ते या चूना डालकर कीटाणु रहित बनाए रखने के इन्तजाम किया जाये। कुएँ से पानी निकालने में पहले आमतौर पर बाल्टी-डोरी का व्यवहार होता है। कुँओं के अधिक गहरा होने पर चरखी भी लगाई जाती है।

चापाकल की तकनीक आने के बाद कुएँ में पाइप डालकर पम्प भी लगाए गए। पर विकास के मौजूदा दौर में तालाबों और कुओं की सम्पूर्ण भूमिका की व्यावहारिक तौर पर अनदेखी की गई।

सूखे के वर्तमान दौर में बिहार में जल प्रबन्धन के मौजूदा तौर तरीकों की समीक्षा करने और तालाब, कुएँ आहर-पइन की परम्परागत प्रणाली को अपनाने की जरूरत रेखांकित हुई है। इसे कहने की जरूरत नहीं।

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