बढ़ता प्रदूषण : नीतिगत कार्रवाई की दरकार

Submitted by RuralWater on Sat, 12/19/2015 - 15:30
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 19 दिसम्बर 2015
दिल्ली में हर दिन सड़कों पर चौहद सौ नए वाहन उतर जाते हैं। अभी शहर में नौ लाख वाहन हैं। रात के समय भी वायु को साफ होने का मौका नहीं मिल पाता। दिल्ली के नागरिक हर सुबह कोहरे में आँखें खोलते हैं, जो आधी रात और तड़के स्थानीय और क्षेत्रीय सामान पहुँचाने में जुटे 80 हजार शहर की आबोहवा में पसरा जाते हैं। केन्द्र-राज्य सरकारों को फैसला करना ही होगा कि उन्हें किनका उद्योगपति या नागरिकों के हितों का संरक्षण करना है। सख्त कानून बनाया जाना और उन्हें लागू किया जाना कोई मुश्किल काम नहीं है। तमाम सामाजिक, पर्यावरणीय और आर्थिक तर्क हैं, जो आक्रामक अन्दाज में प्रदूषण प्रबन्धन का समर्थन करते हैं। भारत में प्रदूषण कोई नई समस्या नहीं है। लेकिन इसमें हाल के वर्षों में जिस कदर सघनता आई है, उससे नीतिगत कार्रवाई करने की बेहद जरूरत आन पड़ी है। भारत के राजनेता और नागरिक, दोनों ही अब इस चुनौती की तरफ से मुँह नहीं फेर सकते। नियंत्रण मीडिया में चीन में बढ़ते प्रदूषण को खतरे की घंटी करार दे दिया गया है।

बीते हफ्ते बीजिंग में प्रदूषण को लेकर पहली बार ‘रेड अलर्ट’ जारी करना पड़ा है। स्कूलों को बन्द कर दिया गया। भवन निर्माण रोक दिया गया।

इस वर्ष के शुरुआती दिनों में एक अध्ययन से पता चला था कि वायु प्रदूषण के परिणामस्वरूप पनपीं स्वास्थ्य सम्बन्धी जटिलताओं के चलते हर दिन चार हजार से ज्यादा चीनी नागरिकों की मृत्यु होती है।

भारत भी बेहद खतरनाक प्रदूषण के संकट का सामना कर रहा है। बीते जून माह में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दिल्ली की वायु गुणवत्ता को विश्व में सबसे खराब करार दिया था।

बीते एक हफ्ते में दिल्ली की वायु बीजिंग की वायु से डेढ़ गुना ज्यादा खराब हो गई है। फिर भी दिल्लीवासी कारपुलिंग और उपयोग में लाये जा रहे वाहनों की संख्या कम करने को लेकर चिन्तातुर हैं, मुसीबत का सबब बने वायु प्रदूषण के स्तर उन्हें कोई चिन्ता नहीं।

कुछ आँकड़ों के मुताबिक, भारत में प्रदूषण से हर साल तेरह लाख लोगों की मृत्यु होती है। 2010 के बाद से श्वास सम्बन्धी बीमारियों से ग्रस्त होने वाले लोगों की संख्या में 30 प्रतिशत का इज़ाफा हो चुका है। वायु प्रदूषण से समय-पूर्व मौत का शिकार हो जाने वाले लोगों की संख्या के लिहाज से दिल्ली जल्द ही विश्व में पहले स्थान पर जा पहुँचेगा।

वायु प्रदूषण के गिरते गुणवत्ता-स्तर का सम्बन्ध तेजी से गिरती कृषि उपज से बताया गया है। 2013 में भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रदूषण का प्रभाव 80 बिलियन डॉलर आँका गया था। यह जीडीपी का 5.7 प्रतिशत बैठता है। उसके बाद से इसमें बढ़ोत्तरी ही हुई होगी। प्रदूषण ऐसी समस्या है, जो नीति-निर्माताओं का सरोकार है।

गिरती कृषि उपज के साथ ही औद्योगिक गतिविधियाँ और उपभोक्ताओं की बढ़ती पसन्द भी प्रदूषण बढ़ने के अन्य प्रमुख कारक हैं। दिल्ली में हर दिन सड़कों पर चौदह सौ नए वाहन उतर जाते हैं। अभी शहर में नौ लाख वाहन हैं।

रात के समय भी वायु को साफ होने का मौका नहीं मिल पाता। दिल्ली के नागरिक हर सुबह कोहरे में आँखें खोलते हैं, जो आधी रात और तड़के स्थानीय और क्षेत्रीय सामान पहुँचाने में जुटे 80 हजार शहर की आबोहवा में पसरा जाते हैं।

आईआईटी-कानपुर द्वारा किये गए एक अध्ययन के मुताबिक, इन ट्रकों का शहर में वाहनों से फैलने वाले प्रदूषण में 24-25 प्रतिशत हिस्सा रहता है। दोपहियों का हिस्सा 18 प्रतिशत तथा यात्री कारों का हिस्सा 14-15 प्रतिशत रहता है।

इन ट्रकों में जरूरत से ज्यादा माल लदा होने या इनसे होने वाले उत्सर्जन की चिन्ता अमूमन इनके चालकों या पुलिस को नहीं होती। स्वच्छ ईंधन से होने वाले फायदे भी दिल्ली की भीड़भाड़ वाली सड़कों पर इतनी ज्यादा संख्या में वाहनों के होने से काफूर हो जाते हैं।

प्रदूषण फैलने के स्रोत उद्योग और भीड़भाड़ से कहीं आगे तक फैले हैं। दक्षिण एशिया के कुछ हिस्सों में बड़े पैमाने पर कृषि उपज या अवशिष्ट कृषि पदार्थों को जलाए जाने से संकट खासा बढ़ गया है।

सुमात्रा में कृषि उपज निपटान के सीजन में उपज या कृषि अवशिष्टों को जलाए जाने से फैला ‘हेज’ या धुआँ (सम्भवत: इसे इसी नाम से पुकारा जाना चाहिए जो यह है भी) तेजी से पड़ोसी देश सिंगापुर तक में फैल जाता है। इस क्षेत्र में सीमा-पार से आ धमकने वाली यह समस्या राजनीतिक सब्र का इम्तिहान ले रही है।

इंडोनेशिया इस समस्या के निवारण की दिशा में कुछ ठोस करने के बजाय सिर्फ माफीनामें में जुटा है। इंडोनेशिया की भाँति भारत में भी बेकार या फ़ालतू उपज को जलाया जाना किसानों के लिये सस्ता और आसान रहता है। भारतीय किसानों के पास इस काम के लिये साफ-सुथरे साधनों की कमी है।

हर साल जाड़ों के मौसम में पंजाब और हरियाणा में करीबन 500 मिलियन टन कृषि उप-उत्पादों या अवशिष्टों, जिन्हें ठूँठ भी कहा जाता है, को जलाया जाता है। इस जलावन गतिविधि पर लगाम लगाने के मद्देनज़र कानून कमजोर हैं। उन्हें लागू भी आधे-अधूरे अन्दाज में किया जाता है।

राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड नगण्य भूमिका में दिखलाई पड़ते हैं। अलबत्ता, ऐसे संकेत जरूर हैं कि भारत सरकार इस मामले में कुछ ठोस करना चाहती है। 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में तिपहियों, बसों और अन्य वाहनों के लिये सीएनजी (कंप्रेस्ड नेचुरल गैस) गैस का उपयोग करने का आदेश दिया था। इस पहल से दिल्ली में वायु की गुणवत्ता में खासा सुधार हुआ। लेकिन इससे विकास की रफ्तार धीमी हो गई।

उसके बाद से दिल्ली प्रशासन/सरकार ने वायु प्रदूषण की समस्या से पार पाने की गरज से कुछ सार्थक नीतियाँ बनाई। सरकार के हस्तक्षेप की सार्थकता के अनेक उदाहरण गिनाए जा सकते हैं। हाल में लांच किये गए एयर क्वालिटी इंडेक्स से ही समझा जा सकता है कि शहर में हालात क्या हैं और इन्हें लेकर नागरिकों और नीति निर्माताओं का रुख क्या है।

बिगड़ते प्रदूषण और उसके स्पष्ट कारणों की जानकारी होने के बावजूद विनिर्माता नियम-विनियमनों की अवहेलना करते रहे हैं। केन्द्र और राज्य सरकार, दोनों को फैसला करना ही होगा कि उन्हें किनके उद्योगपति या नागरिकों के हितों का संरक्षण करना है। सख्त कानून बनाए जाना और उन्हें लागू किया जाना कोई मुश्किल काम नहीं है।

तमाम सामाजिक, पर्यावरणीय और आर्थिक तर्क हैं, जो आक्रामक अन्दाज में प्रदूषण प्रबन्धन का समर्थन करते हैं। बाइपास मार्ग ही पर्याप्त नहीं हैं। इन हालात में तो कतई नहीं कि उनकी योजना बना तो ली जाती हैं, लेकिन उन्हें समय से बनाया नहीं जाता।

‘मेक इन इण्डिया’ की सफलता के लिये एक समर्थ और साक्ष्य-आधारित पर्यावरण नीति होनी जरूरी है ताकि बेतरतीबी से होते औद्योगिक विस्तार के फ़ायदों से ऊपर समाज के कल्याण को तरजीह मिल सके। आर्थिक विकास से रोज़गार बढ़ता है।

जीवन-स्तर ऊँचा होता है। लेकिन ये इस तरह से बढ़ें कि पर्यावरण को नुकसान न होने पाये। सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ये भारी न पड़ जाएँ। इतना ही नहीं, अगर हमारे यहाँ दुनिया का सबसे खराब वायु प्रदूषण होगा तो हमारी प्रतिष्ठा वह नहीं रह पाएगी जिसके बल पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आता है। ट्रकों से होने वाले प्रदूषण में कमी लाने, कारों के उपयोग को घटाने तथा यातायात के सार्वजनिक साधनों का इस्तेमाल बढ़ाने का प्रयास किया जाना कोई आसान काम नहीं है। न ही एकमात्र विकल्प। लेकिन इन्हें नहीं आज़माया जाना हमारी बड़ी लापरवाही होगी।

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लेखक, पर्यावरण से सम्बद्ध नीतिगत मामलों के जानकार हैं।

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