खाद्य सुरक्षा पर ग्लोबल वार्मिंग की आँच

Submitted by RuralWater on Sat, 12/19/2015 - 17:21
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 19 दिसम्बर 2015
वैज्ञानिक रिपोर्टों में बताया गया है कि तापमान बढ़ने से गेहूँ और चावल की गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ेगा। तमिलनाडु में अन्य प्रमुख फ़सलों पर भी इस प्रकार के अध्ययन किये गए। सन् 2050 तक यहाँ उपज में औसतन 9 से 22 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की जा सकती है। प्रमुख फसल नारियल पर दक्षिण भारत में इसकी फसल पर अच्छा असर पड़ेगा तो देश के पूर्वी तटीय क्षेत्रों में प्रतिकूल असर होगा। जिस खतरे को कभी सम्भावना और आशंका बताई जा रही थी, वह आज एक हकीक़त के रूप में देश के खेतों पर उतर आई है। भारत भी ग्लोबल वार्मिंग नामक नियंत्रण आपदा की चपेट में है। सूखे के बढ़ते प्रकोप से लेकर आकस्मिक बाढ़, कड़ाके की शीतलहरी, तापमान में अचानक उतार-चढ़ाव, बेमौसमी ओलावृष्टि और मूसलाधार बारिश जैसी आपदाओं का बढ़ते तापमान के साथ गहरा जुड़ाव देखा जा रहा है।

यूँ तो इन आपदाओं का असर जनजीवन से जुड़े सभी पहलुओं पर पड़ता है, परन्तु कृषि पर पड़ने वाला इसका तीखा प्रभाव जहाँ एक ओर किसानों की हालत दयनीय बना देता है, वहीं देश की खाद्य सुरक्षा को भी कमजोर करता है। नई दिल्ली स्थित प्रख्यात भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान ने अन्तरराष्ट्रीय अध्ययनों के हवाले से बताया है कि 2020 तक भारत के औसत तापमान में 1.0 से 1.4 डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोत्तरी हो सकती है।

यदि इस विपदा पर काबू पाने में कोई विशेष सफलता नहीं मिली तो 2050 तक 2.2 से 2.9 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ सकता है। तापमान में बढ़ोत्तरी के साथ वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की भी मात्रा बढ़ेगी, जिसका फ़सलों की पैदावार पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ेगा।

बरसात पर भी पड़ेगा असर


देश के कृषि मौसम के हिसाब से देखें तो रबी यानि सर्दियों के मौसम में तापमान में ज्यादा बढ़ोत्तरी होगी, जबकि खरीफ यानी मानसूनी मौसम में तापमान में अपेक्षाकृत कम वृद्धि होगी। इसका सबसे पहला और सीधा असर बरसात पर पड़ेगा। खरीफ में देश के ज्यादातर भागों में वर्षा बढ़ने की आशा है, जबकि रबी के दौरान कुछ क्षेत्रों में बरसात कम हो जाएगी।

हमारे देश का लगभग 60 प्रतिशत फसल क्षेत्र अभी भी बारानी यानी असिंचित है। इन क्षेत्रों में उगाई जा रही फसल सिंचाई के लिये वर्षा पर निर्भर रहती हैं, इसलिये वर्षा की मात्रा में हेरफेर होने से पैदावार पर चोट पड़ेगी। विश्व बैंक ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत में भूजल की दशा भी कमजोर और शोचनीय है, इसलिये फसलों पर वर्षा की कमी के गम्भीर प्रभाव पड़ेंगे।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों में पानी कम होने से करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। वैज्ञानिक अध्ययन कहते हैं कि 10 से 15 वर्षों के भीतर पड़ने वाले प्रभावों को चार से छह प्रतिशत के दायरे में बाँधा जा सकता है, जबकि दीर्घकालीन प्रभाव 25 प्रतिशत तक पहुँच सकते हैं।

अनुमान लगाया जा सकता है कि इससे देश की खाद्य सुरक्षा पर कितनी गहरी चोट पड़ने की सम्भावना है। देश की खाद्य सुरक्षा के आधार कहे जाने वाले गेहूँ की बात करें तो तापमान में मात्र एक डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी से गेहूँ के उत्पादन में लगभग 60 लाख टन की कमी आ सकती है, जबकि 5.0 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी लगभग पौने-तीन करोड़ टन की भारी गिरावट ला सकती है।

अनुमान लगाया गया है कि यदि तापमान का बढ़ना इसी प्रकार से बेरोकटोक जारी रहा तो सन् 2050 तक गेहूँ के कुल उत्पादन में लगभग 1 करोड़ 17 लाख टन की कमी आ सकती है। इसी प्रकार अनुमान लगाया गया है कि सन् 2030 में चावल का उत्पादन हरियाणा में आठ प्रतिशत, पंजाब में लगभग सात प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में लगभग चार प्रतिशत और बिहार में लगभग ढाई प्रतिशत तक गिर सकता है।

इसका चावल के कुल उत्पादन पर गहरा असर पड़ेगा। दक्षिण भारत के राज्यों के लिये ये अनुमान और ज्यादा डराने वाले हैं, तमिलनाडु में सन् 2050 में चावल की पैदावार में लगभग 15 प्रतिशत की गिरावट होने की आशंका जताई गई है जो सन् 2080 तक बढ़कर लगभग 28 प्रतिशत पहुँच सकती है।

वैज्ञानिक रिपोर्टों में बताया गया है कि तापमान बढ़ने से गेहूँ और चावल की गुणवत्ता पर भी बुरा असर पड़ेगा। तमिलनाडु में अन्य प्रमुख फ़सलों पर भी इस प्रकार के अध्ययन किये गए और अनुमान जताया गया है कि सन् 2050 तक यहाँ उपज में औसतन 9 से 22 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की जा सकती है।

दक्षिण भारत की बात चली है तो नारियल की बात भी करनी होगी, जो यहाँ की एक प्रमुख फसल है और लोगों के खान-पान से सीधे जुड़ी है। पश्चिम तटीय राज्यों जैसे केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक में नारियल की फसल पर जलवायु परिवर्तन का अच्छा प्रभाव पड़ेगा, जबकि पूर्वी तटीय क्षेत्रों में प्रतिकूल असर होगा।

कुल मिलाकर सन् 2050 तक नारियल की पैदावार में 10 प्रतिशत की वृद्धि होने की सम्भावना जताई गई है। एक अन्य प्रमुख खाद्य फसल आलू में अनुमान लगाया गया है कि पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी व मध्य उत्तर प्रदेश में सन् 2030 तक इसके उत्पादन में लगभग साढ़े-तीन से सात प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हो सकती है लेकिन शेष भारत में विशेष रूप से पश्चिम बंगाल और पठारी भागों में आलू का उत्पादन 4 से 16 प्रतिशत तक गिर सकता है।

पोषण सुरक्षा पर असर


देश की पोषण सुरक्षा से जुड़े फलों की बात करें तो तापमान बढ़ने से हिमाचल प्रदेश में सेब के उत्पादन और उत्पादकता में कमी आई है। दरअसल, इस प्रदेश में अब सेब को लम्बे समय तक उतना कम तापमान नहीं मिल पाता, जितनी इसको जरूरत होती है। इसीलिये अब सेब का उत्पादन अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों की ओर खिसकता जा रहा है।

मैदानी भागों में आम का उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है। अधिक तापमान के कारण आम के पेड़ों पर फरवरी-मार्च के महीनों में ही बौर आ जाती है, जो इस दौरान चलने वाली तेज हवाओं के कारण झड़ भी जाती है। इसका नतीजा कुल पैदावार में कमी के रूप में सामने आता है।

सागरों से मिलने वाली विविध प्रकार की मछलियाँ तथा अन्य जीव भी देश की खाद्य सुरक्षा में एक अहम भूमिका निभाते हैं, परन्तु इनके अस्तित्त्व पर भी बढ़ते तापमान का खतरा मँडरा रहा है। अनुमान है कि सन् 2100 तक भारतीय सागरों की सतह का तापमान तीन डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है।

वैज्ञानिकों ने सम्भावना जताई है कि इससे मछलियों की अंडा देने की क्षमता तथा उनका आवास प्रभावित हो सकता है, जिससे मछलियों की कुल संख्या में भी गिरावट आ सकती है। हालांकि यह सम्भावना भी जताई गई है कि कुछ क्षेत्रों में इसका अच्छा प्रभाव भी पड़ सकता है।

सागरों के अलावा विभिन्न नदियों में भी मछलियों के आवास और इनकी संख्या पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना जताई जा रही है। बढ़ते तापमान के कारण दुधारू पशुओं की उत्पादकता पर भी बुरा असर पड़ने की आशंका है। अनुमान है कि सन् 2020 तक देश के कुल दुध उत्पादन में 16 लाख टन और 2050 तक डेढ़ करोड़ टन की गिरावट आ सकती है।

कृषि वैज्ञानिक ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूक, सतर्क और सचेत हैं। भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद के नेतृत्व में ‘क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर’ विकसित करने की पहल की गई है, जिसके आशाजनक नतीजे सामने आने लगे हैं। इसके अन्तर्गत किसानों को जलवायु अनुकूल कृषि तकनीक अपनाने के लिये जागरूक तथा सक्षम बनाया जा रहा है।

आशा है कि ग्लोबल वार्मिंग पर अंकुश लगाने के उपायों के साथ इसका सामना करने की तकनीकों को अपनाने से हमें इसके बुरे प्रभावों को कम करने में कामयाबी मिलेगी।

लेखक, मौसम सम्बन्धी मामलों के जानकार हैं।

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