भारत का नुकसान और फायदा

Submitted by RuralWater on Sun, 12/20/2015 - 10:40
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 19 दिसम्बर 2015
भारत के लिये यह अनिवार्यता अब दोहरी है। पहला, हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि लगातार चलने वाली प्रणाली विकसित देशों और उनके प्रयासों पर अपना दबाव क़ायम रख सकेगी। इसके लिये अन्य देशों के योगदान को विश्लेषित करने की हमारी योग्यता को बढ़ाने की आवश्यकता होगी तथा इसे लगातार अद्यतन भी करना होगा एवं आने वाले वर्षों में पेरिस समझौते के लिये कार्यान्वयन की भाषा को ठीक तरह से रखने को लेकर सक्रिय रूप से उसे आकार देना होगा। जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौता भारत के हक़ में अच्छा है या बुरा? कपटपूर्ण वार्ता के चार साल बाद जो जटिल दस्तावेज़ सामने आया है, वह इस सवाल का एक सरल जवाब भी नहीं दे पा रहा है। मगर यह सवाल भारत के लिये मायने रखता है और जिसे जवाब की दरकार है। चूँकि भारत जलवायु प्रभाव की ज़द में बहुत बड़े खतरे में है, इसलिये इस बात पर एक सन्तुलित हिसाब-किताब करने की आवश्यकता है कि भारत ने क्या खोया है और क्या पाया है?

हमारी ऊर्जा भविष्य की सुरक्षा


खोने की तरफ़ देखा जाये तो जलवायु वार्ता में भारत का लम्बे समय से प्रतीक्षारत उद्देश्य ऊर्जा विकल्प पर अनावश्यक समय सीमा की उपेक्षा हुई है। यह महत्त्वपूर्ण है। आने वाले दशकों में भारत को बड़ी मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होगी: वाणिज्यिक इस्तेमाल के लिये ईंधन, बिजली की पहुँच, आजीविका उपलब्ध कराने के लिये उद्योग एवं वाणिज्य के लिये ऊर्जा चाहिए होगी।

हालांकि इन आवश्यकताओं की मात्रा अनिश्चित है और वह इस बात पर निर्भर करती है कि भारत किस तरह का विकास करता है और प्रौद्योगिकी में किस तरह का बदलाव लाता है। यह अनिश्चितता भी वार्ता को मुश्किल बनाती है क्योंकि यह बता पाना कठिन है कि नुकसान पहुँचाए बिना कितना मोल-भाव किया जाये।

सुनिश्चितता के प्रति भारत के दृष्टिकोण का आधार, हम भविष्य की ऊर्जा को नहीं बर्बाद करते हैं, वाला सिद्धान्त है, जो ‘समान लेकिन अलग-अलग ज़िम्मेदारी एवं सन्दर्भगत सामर्थ्य’ पर आधारित है और जो जलवायु परिवर्तन पर अन्तर्निहित फ्रेमवर्क कन्वेंशन में सन्निहित है। इस सुरक्षा कवच के बिना, सभी देश एक ही स्तर पर रखे गए होते।

समस्या को लेकर थोड़े से योगदान तथा इसको हल करने की सीमित सामर्थ्य रखने के बावजूद भारत पर समय से पहले ही उत्सर्जन को सीमित करने के लिये अनुचित दबाव डाला गया होता। इस सिद्धान्त को कमज़ोर करने के लिये विकसित देशों के पास यह कहते हुए दीर्घकाल से तर्क रहा है कि 1990 से बहुत सारे बदलाव आये हैं।

विकसित-विकासशील का भेद


इस गतिरोध को पेरिस में यह स्वीकार करते हुए तोड़ा गया कि विश्व सचमुच बदल गया है, मगर इतना भी नहीं बदला है कि ये श्रेणियाँ अप्रासंगिक बन गई हों; विकसित तथा विकासशील देश की श्रेणियाँ क़ायम हैं। मगर इसमें तरलता भी आई है। इसके अलावा, यह समझौता उपयोगी रूप से निर्दिष्ट करता है कि शमन, अनुकूलन, वित्त, और पारदर्शिता प्रावधानों जैसे मुख्य जलवायु नीति क्षेत्र के लिये व्यवहार में इस सिद्धान्त का मतलब क्या है?

उदाहरण के लिये, केन्द्रीय शमन क्षेत्र में समझौता कहता है कि विकसित देशों को अपनी अर्थव्यवस्था में व्यापक उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य को ध्यान में रखना चाहिए जबकि विकासशील देशों को समय के साथ ऐसा ही करने की आकांक्षा करनी चाहिए, यह स्वीकारते हुए कि उन्हें अपने उत्सर्जन को बढ़ाने की आवश्यकता होगी।

यह कुछ देशों को श्रेणियों को पार करने की अनुमति भी देता है, जब वे उचित समझें, जैसा कि चीन ने अपने उत्सर्जनों के ‘चरम वर्ष’ का संकल्प लेते हुए किया है जबकि अन्य को इजाज़त देते हुए भारत की तरह उत्सर्जन तीव्रता का संकल्प के साथ जारी रहता है तथा जो उत्सर्जन को बढ़ाने की अनुमति देता है।

महत्त्वपूर्ण रूप से, कुछ हद तक एक छिद्रयुक्त सीमा को बनाने का एक ही मॉडल का उपयोग करते हुए, यह जलवायु वित्त की व्यवस्था में विकसित और विकासशील देशों के बीच एक अन्तर को बनाए रखता है। यह भेदभाव भारत के लिये एक महत्त्वपूर्ण विचार क़ायम करता है, जो विकासशील देशों द्वारा शमन कायरे की अपेक्षाओं को विकसित देशों से समर्थन की उम्मीदों से सम्बन्धित है।

कुल मिलाकर, देशों की श्रेणियों की अवधारणा तथा मुख्य प्रावधानों में उनके संचालन इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि पेरिस में भारत को हुए नुकसान सीमित हैं। एक महत्त्वपूर्ण चेतावनी यह है कि एक अपेक्षाकृत अभेद्य सीमा को पारगम्य बना दिया गया है, इस बात का खतरा भी बढ़ रहा है कि भारत पर इस बात के लिये दबाव बनाया जाएगा कि वह बाद में उस सीमा का स्वैच्छिक रूप से उल्लंघन करे।

इस सन्दर्भ में, तापमान में 2 डिग्री सेंटीग्रेड के बदले 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड की बढ़ोत्तरी सीमा का विचार अन्तिम पल का एक सफल प्रयास था, जबकि सैद्धान्तिक तौर पर अधिक वांछनीय ‘महत्त्वाकांक्षा’ में यह बढ़ोत्तरी व्यवहार में किसी बढ़ोत्तरी, खासकर विकसित देशों की तरफ़ से समर्थित नहीं था, भारत से कहा जा जाएगा कि खतरा बढ़ रहा है और समय से पहले खाई को भरने के लिये वो कदम उठाए।

राष्ट्रीय संकल्प


तो आखिर भारत को क्या मिला? इस बहस की एक सामान्य बात यह है कि पेरिस समझौता वास्तविक उत्सर्जन सीमा को लेकर अपेक्षाकृत दन्तविहीन है। यह देशों (भारत सहित) को सूत्रबद्ध नहीं करता है, इसके पास समझौते को लागू करने के लिये कोई प्रणाली नहीं है और इसलिये इसका प्रभाव भी सीमित है। अगर ऐसा है तो भारत को हासिल करने के लिये थोड़ा है। लेकिन यह विवरण पूरी तरह से असलियत से परे है।

यह इस पूर्वधारणा पर आधारित है कि अन्तरराष्ट्रीय समझौते घरेलू सक्रियता को संचालित करता है, यहाँ तक कि चल रही घरेलू राजनीति के भी विपरीत है। पेरिस समझौता एक बिल्कुल अलग तर्क पर निर्मित है और वह है : ऊर्जा प्रणाली में परिवर्तन के लिये यह प्रेरक शक्ति अलग-अलग देशों की घरेलू नीतियों से निकलेगी, लेकिन अन्तरराष्ट्रीय प्रक्रिया घरेलू घटकों को विस्तार देगा तथा उन्हें सशक्त बनाएगा।

इस तर्क के आधार पर पेरिस समझौते के मुख्य तत्त्व वह राष्ट्रीय संकल्प हैं, जो पेरिस समझौते से पहले वाला है तथा समय के साथ वहाँ की प्रणाली ही उस संकल्प को प्रोत्साहित करेगी। इस प्रणाली में शामिल हैं : सभी संकल्पों का एक अनिवार्य पाँच-वार्षिक अद्यतन प्रक्रिया; जलवायु कार्यों और वित्तीय योगदान दोनों की एक तकनीकी समीक्षा प्रक्रिया, जिसका मतलब यह सुनिश्चित कराना होगा कि सभी देश अपनी अद्यतन प्रक्रिया को गम्भीरता से आगे बढ़ा रहे हैं।

पारदर्शी प्रावधान और इन कार्यों के कुल प्रभाव पर एक नियंत्रण पड़ताल। यह विचार है कि पेरिस समझौता अनिवार्य प्रावधानों को सही स्थान पर रखेगा, जो बाद में हर देश में एक संवादात्मक प्रक्रिया को प्रेरित करेगा। आदर्श रूप में अब तक निम्न कार्बन उत्सर्जनकारियों के प्रति बड़े बदलाव को उत्प्रेरित करना है।

अद्यतन तथा ज़रूरी प्रणाली आवश्यक है; इस प्रणाली की रूप-रेखा कुछ इस तरह बनाई गई है कि ज्यादातर महत्त्वाकांक्षी संकल्पों के एक वास्तविक चक्र को प्रेरित करे; निम्न उत्सर्जन विकल्पों में बड़ा निवेश तथा निम्न लागत एवं उन विकल्पों के कार्यान्वयन को लेकर जो बाधाएं हैं; उन्हें लेकर ज्यादा संकल्प की अब भी आवश्यकता है।

यदि ऐसा हो पाता है तथा जलवायु परिवर्तन को सीमित करने के लिये ज़ोरदार सामूहिक कार्य के रूप में परिणाम आता है, तो भारत स्पष्ट रूप से लाभदायक स्थिति में होगा।

एक मज़बूत ऊर्जा नीति के लिये


भारत के लिये यह अनिवार्यता अब दोहरी है। पहला, हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि लगातार चलने वाली प्रणाली विकसित देशों और उनके प्रयासों पर अपना दबाव क़ायम रख सकेगी। इसके लिये अन्य देशों के योगदान को विश्लेषित करने की हमारी योग्यता को बढ़ाने की आवश्यकता होगी तथा इसे लगातार अद्यतन भी करना होगा एवं आने वाले वर्षों में पेरिस समझौते के लिये कार्यान्वयन की भाषा को ठीक तरह से रखने को लेकर सक्रिय रूप से उसे आकार देना होगा।

दूसरा, शायद सबसे महत्त्वपूर्ण भी है कि हमें अपनी ऊर्जा तथा जलवायु के भविष्य की जाँच के लिये चल रही एक राष्ट्रीय प्रक्रिया को और मज़बूत बनाना होगा ताकि भारत के मौजूदा तदर्थ, असंयोजित, ऊर्जा योजना की प्रक्रिया एवं नीति को बदला जा सके।

इसके लिये ज्यादा सक्षम और संवेदनशील प्रणाली की आवश्यकता होगी ताकि ऊर्जा से सम्बन्धित सूचना को एकत्रित किया जा सके और उसका विश्लेषण किया जा सके। इसमें खोज सम्बन्धी कार्यविधियों की भी आवश्यकता होगी, जो विकास तथा जलवायु परिणामों (जैसे ऊर्जा कुशलता एवं सार्वजनिक परिवहन) के बीच तालमेल बैठा सके, क्योंकि यह अर्थव्यवस्था को लेकर सीधी लागत से सम्बद्ध होती है।

हमें दीर्घकालीन सवालों के जवाब की भी ज़रूरत है, जो भविष्य के संकल्पों के लिये महत्त्वपूर्ण हैं और इनमें शामिल हैं, हमें कितनी सम्भावित अतिरिक्त कोयला ऊर्जा की आवश्यकता है और उच्च कार्बन लॉक-इन को सीमित करते हुए हमें किस हद तक शहरीकृत होना है?

दोनों पहलुओं को देखते हुए, भारत को सीमित नुकसान है, क्योंकि समझौता ज्यादा ऊर्जा के इस्तेमाल की गुंजाईश बनाता है, लेकिन इसके साथ इसमें यह चेतावनी भी है कि एक राष्ट्रीय प्रक्रिया के माध्यम से हमें बेहतर तरीक़े से अपनी कार्रवाई को न्यायसंगत ठहराना होगा, जो अन्तरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय होगा।

इसके अलावा, अन्यों के विवरण पर पकड़ बनाए रखने के लिये इन्हीं प्रणालियों को हम इस्तेमाल कर सकते हैं और हमें करना भी चाहिए। इसका सकारात्मक पक्ष प्रशंसनीय है, अगर चुनौतिपूर्ण है, तो यह कि जलवायु परिवर्तन एवं इसके हानिकारक प्रभाव को सीमित करने के लिये उन्नत नियंत्रण कार्रवाई का रास्ता निकालना।

पेरिस समझौता ऊर्जा योजना एवं नीति के लिये एक ज्यादा मज़बूत घरेलू प्रक्रिया को स्थापित करने के लिये भारत को भी तुच्छ लाभ नहीं प्रदान करता है। मेरे विचार से यह सन्तुलन शुद्ध और सकारात्मक है।

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