परसवानी में सीमेंट फ़ैक्टरी पी गई पूरे गाँव का पानी

Submitted by RuralWater on Thu, 12/31/2015 - 13:38
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बीस बरस पहले इस गाँव में सीमेंट बनाने वाली फ़ैक्टरी लगने के बाद यहाँ की चट्टानों को खोदकर ज़मीन को ऐसा बर्बाद किया कि बाँध में पानी कम पड़ गया।

.रायपुर। चूना पत्थरों की खदानों ने हमारी जिन्दगी तबाह कर डाली। बीस बरस पहले इस गाँव में सीमेंट बनाने वाली फ़ैक्टरी लगने के बाद यहाँ की चट्टानों को खोदकर ज़मीन को ऐसा बर्बाद किया कि बाँध में पानी कम पड़ गया। इस साल सूखे में तो हमारे खेत और पशुओं को पानी पिलाना मुश्किल हो गया।

फ़ैक्टरी चालू करने से पहले पूरे गाँव को नौकरी और शिक्षा सुविधा देने का वादा किया था, जो बस झाँसा बनकर रह गया। यह दर्द रायपुर से करीब दो घंटे दूर परसवानी (बलौदाबाजार) के रहवासियों का है।

इनके मुताबिक 1992 में निजी कम्पनी की सीमेंट फ़ैक्टरी लगने के साथ ही यहाँ चूना खदानों का विस्तार होता चला गया। लगातार खनन के चलते इन लोगों के हाथ से अब जल और ज़मीन भी निकलती जा रही है।सरपंच बलरामजी कहते हैं, गाँव के नक्शे पर 80 फीसदी चूना खदानें हैं। पहले यहाँ 1007 एकड़ ज़मीन पर खेती होती थी, लेकिन अब 200 एकड़ खेत ही हैं। खेत खराब होने से ज्यादातर लोग बेकार हैं।

लोकराम वर्मा के मुताबिक, चूना पत्थरों की लगातार खुदाई के चलते मिट्टी की गुणवत्ता में आई कमी ने उपज की गुणवत्ता गिरा दी। साथ ही आबोहवा को भी जहरीला बना दिया। चारा तक खरीदने को मजबूर हैं किसान।

सामाजिक कार्यकर्ता लालजी गायकवाड़ बताते हैं, ‘दो दशक पहले यहाँ ढाई हजार से ज्यादा पशु थे, लेकिन अब हजार से भी कम पशु बचे हैं। खनन गतिविधियों के कारण यहाँ न पानी बचा और न ही चारागाह। 75 पशु अकाल मौत मर गए। 1980 के पहले यहाँ चारागाह के लिये 200 एकड़ ज़मीन थी, लेकिन अब चूना पत्थरों के खनन के लिये सरकार ने चारागाह के नाम पर महज 2 एकड़ की ज़मीन छोड़ी है।’

हालत यह है कि पशुओं के लिये अब हमें चारा खरीदना पड़ रहा है। पानी के क्षेत्र में काम कर रहे मकरंद पुरोहित बताते हैं कि खेतों में सिंचाई के मकसद से 1964 को यहाँ बाँध बनाया गया था, लेकिन खनन ने बाँध के जलग्रहण क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया है। बारिश कम होने से पहले से भी कम पानी बाँध में बचा है।

सीमेंट संयंत्र में पहुँचा पानी


किसानों के लिये गंगरेल बाँध से छोड़ा गया पानी किसानों को नहीं सीमेंट संयंत्र में पहुँच रहा है। इसमें जल संसाधन विभाग के अधिकारियों की मिली-भगत होने की आशंका जताई जा रही है।

अम्बुजा माइंस के समीप बीबीसी कैनाल 9 मई को फूट गया। इससे कैनाल का पूरा पानी सीमेंट संयंत्र में जा रहा है।

अधिकारियों द्वारा फूटी कैनाल की मरम्मत करने पानी को बन्द करवाने की कोई पहल नहीं की गई। जिससे कैनाल में छोड़ा गया हजारों क्यूसेक पानी गत तीन दिनों में संयंत्र की खदान में जमा हो चुका है।

तीन वर्ष पूर्व भी कैनाल के ठीक इसी स्थल पर फूटने से खदान में एकत्रित हजारों क्यूसेक पानी का उपयोग अम्बुजा संयंत्र में स्थापित पॉवर प्लांट तथा अन्य आवश्यकताओं के लिये किया गया था। जिससे संयंत्र प्रबन्धन को जल संकट से निजात मिली थी।

कोयले के साथ डाली जा रही मैगी


बलौदाबाजार की अम्बुजा सीमेंट फ़ैक्टरी में सीमेंट बनाने के लिये लाइम स्टोन को पिघलाने के लिये कोयले के साथ प्रतिबन्धित मैगी का इस्तेमाल किया जा रहा है।

एक्सपायरी मैगी के पैकेट को पॉलीथीन समेत भट्ठे में कोयले की जगह डाला जा रहा है। साथ ही दवाइयों का भी कचरा इसमें मिलाया जा रहा है। बदबूदार और काले धुएँ को गाँव वालों ने महसूस किया, तो उनसे रहा नहीं गया।

ग्रामीणों ने मिलकर इस पूरे मामले की बलौदाबाजार के कलेक्टर से शिकायत कर कार्रवाई की माँग की। यह वही मैगी है, जिसे लेकर देश भर में बवाल मचा था।

सीमेंट फैक्टरी से बर्बाद हुआ पानीइसमें लेड की मात्रा पाये जाने के बाद केन्द्र सरकार ने इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। अब अरबों रुपए के इसी मैगी के पैकेट को नष्ट करने के लिये कम्पनी कई तरह के रास्ते अपना रही है।

सम्बन्धित विभागों द्वारा प्लांट लगाने की अनुमति कब और किन शर्तों पर किसने प्रदान की है, इसकी जानकारी लोगों को भी नहीं है।

ग्राम रवान के डॉ. बीएल साहू ने प्लांट को अतिशीघ्र बन्द करने की बात कहते हुए कहा कि प्लांट से निकलने वाली गैस की बदबू से सिर दर्द व उल्टी होने की शिकायत मिल रही है।

विकास के लिये जुटीं 28 पंचायतें


अंचल के सीमेंट संयंत्रों के आश्रित पंचायतों व गाँवों में अपेक्षित विकास कार्य नहीं कराए जाने के विरोध में ग्रामीण एक हो रहे हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि सीएसआर की राशि का उपयोग प्रभावित गाँवों में पंचायत के माध्यम से ही हो, संयंत्र में रिक्त होने वाले पदों पर स्थानीय शिक्षित बेरोजगार लोगों को भर्ती किया जाये, युवाओं को काम दिया जाये, संयंत्र द्वारा संचालित स्कूलों में स्थानीय बच्चों को प्रवेश दिया जाये तथा स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाये।

ग्रामीणों का कहना है कि प्रबन्धन ने संयंत्र लगने के पूर्व शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पानी की व्यवस्था करने के वादे शासन को लिखकर देती है, परन्तु बाद में मुकर जाती है।

आश्रित गाँवों के मौजूद सरपंचों ने बताया कि संयंत्र प्रबन्धन को गाँव या पंचायत के लिये दस काम बताया जाता है तो वह एक काम करती है।

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शिरीष खरेशिरीष खरेमासक्मयुनिकेशन में डिग्री लेने के बाद चार साल डाक्यूमेंट्री फिल्म आरगेनाइजेशन में शोध और लेखन.उसके बाद दो साल 'नर्मदा बचाओ आन्दोलन, बडवानी' से जुड़े रहे. सामाजिक मुद्दों को सीखने और जीने का सिलसिला जारी है.

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