पूरा कुनबा बलिदान किया था तब भरा था बड़ोह का तालाब

Submitted by Hindi on Sat, 01/02/2016 - 11:06
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अनसुना मत करो इस कहानी को (परम्परागत जल प्रबन्धन), 1 जुलाई 1997

पानी के लिये समर्पित लोगों का यह कीर्ति-स्मारक बस अब खत्म होने ही वाला है। अगली सदी में सिर्फ बच्चों को सुनाने के लिये कहानी बचेगी कि कभी ऐसे भी लोग हुआ करते थे, जिन्होंने तालाब बनाने के लिये अपना पूरा कुनबा न्यौछावर कर दिया था।

बड़ोह के एक गड़रिए को सन्त ज्ञाननाथ (गैयननाथ) की कृपा से बहुत धन मिल गया था। सन्त के प्रति आभार प्रकट करने के लिये गड़रिए ने मन्दिर के साथ-साथ बड़ोह का तालाब भी बनवाया था। तालाब तो बन गया, लेकिन उसमें पानी नहीं रुकता था। तालाब भरता था और खाली हो जाता था, तब गड़रिए ने तालाब को जलपूरित करने के लिये अपने दो बेटों, बहू और इकलौते बेटे की बलि दे डाली। बस तब से इस विशाल तालाब में पानी रुकने लगा। यह कहानी बड़ोह के ग्रामीणों ने 1875 के आसपास अंग्रेज पुरातत्त्ववेत्ता कनिंघम को सुनाई थी। शायद हुआ यह था कि तालाब के निर्माण में गड़रिए के दो बेटे, बहू और पोते ने श्रम करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे। उनका यह बलिदान जब कहानी के रूप में चला, तो बिगड़ते-बिगड़ते बलि देने तक आ गया। जो भी हुआ हो, पर आज हकीक़त यह है कि उन्होंने अपना बलिदान देकर जिस तालाब को जलपूरित किया, उसे मिटाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही है।

कभी बड़ोह-पठारी एक ही बस्ती थी, नाम था बटनगर। बटनगर उजड़ते-उजड़ते दो गाँवों की शक्ल में रह गया है- पठारी और बड़ोह। बड़ोह गाँव के एक तरफ है, पठारी का तालाब और दूसरी तरफ है, बड़ोह तालाब। गैयननाथ पहाड़ दोनों गाँवों की सीमा बनाता है। इस पहाड़ की उत्तरी ढलान का पानी यदि पठारी के तालाब में जाता था, तो दक्षिणी ढलान का पानी ‘रैक’ में से होते हुए बड़ोह तालाब में समाता था।

बड़ोह के तालाब के किनारे बना गड़रमल का मन्दिर पुरातत्त्ववेत्ताओं के मुताबिक नवीं सदी का निर्माण है। यदि ऐसा ही है, तो तालाब कम-से-कम एक हजार साल पुराना तो है ही। इस तालाब के तीन तरफ बहुत ऊँची पाल है। पाल की चौड़ाई भी कम नहीं, ढाई जरीब है। मिट्टी के पाल के अन्दर के हिस्से में पत्थर की मोटी-मोटी शिलाएँ लगी हैं; लेकिन वे अब पूरी तरह कभी नहीं डूबतीं क्योंकि पहाड़ की दक्षिणी तलहटी में खदान खुद जाने से पानी तालाब तक पहुँच ही नहीं पाता है।

तालाब के किनारे गड़रमल का मन्दिर, मढ़िया, दशावतार, सोलहखम्बी जैसे पुरातात्त्विक महत्त्व के स्थल तो हैं ही, भरपूर पानी अपने पेट में धरे पुराने कुएँ-बावड़ियाँ भी हैं। पुराने लोगों के मुताबिक इस विशाल तालाब में पहले बावन सीढ़ियाँ थीं, पर अब तो दस-बारह सीढ़ियाँ ही नजर आती हैं, बाकी कीचड़ में समा चुकी हैं।

तालाब और उसके साथ की बावड़ियों की पता नहीं कब से सफाई नहीं हुई। बड़ोह में हैण्डपम्प और जल-नल योजना लग गई है, लेकिन जब हर साल गर्मियों में ये नई व्यवस्थाएँ दम तोड़ देती हैं, तो काम देते हैं, प्रभु की बावड़ी और चौपड़ा कुआँ। बड़ोह तालाब की पाल की एकदम जड़ में बनी यह बावड़ी काफी कुछ पुर जाने पर भी कभी सूखती नहीं है। तालाब के सहारे जिन्दा यह बावड़ी बड़ोह के लोगों को प्यासा नहीं रहने देती। भीषण गर्मी में बड़ोहवासियों को पानी का दूसरा सहारा है, चौपड़ा कुआँ। पठारी तालाब के दक्षिण पूर्वी किनारे पर बना सैकड़ों वर्ष पुराना यह चौकोर कुआँ मीठे पानी का समृद्ध स्रोत है।

सौ बीघा से भी ज्यादा का बड़ोह तालाब अब तेजी से पश्चिम की ओर पुरता चला जा रहा है। सरकारी कागजों में अभी भी तालाब में औसतन चौदह हेक्टेयर क्षेत्र में पानी भरा बताया जाता है, लेकिन इस पानी में गहराई नहीं है। ‘रैक’ मिट गई है, पश्चिम का आधा तालाब खेतों में बदल दिया गया है। पाल पर खड़े हजारों सीताफल, कबीट और आम के पेड़ पिछले कुछ सालों में काट दिये गए हैं। रियासत के समय इस तालाब में जल-पक्षियों और मछलियों के शिकार पर पाबन्दी थी, हजारों जल-पक्षी इस बारहमासी तालाब में वक्त-बेवक्त बसेरा करते थे, पर अब खुलकर शिकार होने से जल-पक्षी नहीं आते। तालाब में सिंघाड़े की खेती किये जाने से अब तालाब में मछलियाँ भी खत्म-सी ही हैं। फिर, तालाब के दक्षिण में पत्थर-खदानें खुद जाने से उनकी मिट्टी बहकर अब तालाब में ही आती है। तालाब साल-दर-साल उथला ही होता जा रहा है।

तालाब से निकाली गई नहर से तो पानी निकाला ही जाता है, अब तो हर साल पाल पर रखे बीसियों सिंचाई पम्प भी इस तालाब से पानी की आखिरी बूँद तक चूसने की कोशिश करते हैं।

पानी के लिये समर्पित लोगों का यह कीर्ति-स्मारक बस अब खत्म होने ही वाला है। अगली सदी में सिर्फ बच्चों को सुनाने के लिये कहानी बचेगी कि कभी ऐसे भी लोग हुआ करते थे, जिन्होंने तालाब बनाने के लिये अपना पूरा कुनबा न्यौछावर कर दिया था।

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