चन्द दिनों की ही जिन्दगी बाकी है

Submitted by Hindi on Sat, 01/02/2016 - 16:01
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अनसुना मत करो इस कहानी को (परम्परागत जल प्रबन्धन), 1 जुलाई 1997

सन 1903 से 1916 के बीच तालाबों पर जो काम हुआ, उसमें मजदूरी ‘कुड़याब’ से दी जाती थी यानि मिट्टी की हर खेप के बदले एक कौड़ी मज़दूर को मिलती थी। यह तरीका कुड़याब के रूप में याद किया जाता है। पाँच खेप मिट्टी पाल पर डालने पर पाँच कौड़ियाँ मिलती थी। यह इकाई एक गण्डा कहलाती थी। ऐसे बारह गण्डे मिलकर एक पैसा बनता था। तब चार पैसे की एक इकन्नी और सोलह इकन्नियों का एक रुपया होता था।

बरमढ़ी पोतला, दुसेहरी, शेखपुर, दैलाखेड़ी, बैहलौट, सौंसेरा, जैसे दूर-पास के गाँव में गर्मियों में जब किसी की गाय-भैंस खो जाती है, तो वह ज्यादा परेशान नहीं होता, क्योंकि जानता है कि ढोर कहाँ मिलेगा। चल देता है, गुलाबरी की तरफ। मई-जून की गर्मी में जब आसपास चरने को कुछ नहीं बचता, पानी के सारे ठिये सूख जाते हैं, तो हैरान-परेशान जानवर गुलाबरी के तालाब की शरण में पहुँच जाते हैं। तालाब में पीने को पानी भी खूब रहता है। फिर तेज चिलचिलाती दुपहरिया में तालाब के किनारे के घने बड़, पीपल, इमली, महुओं का छांहरा तो है ही। गर्मियों-भर गुलाबरी के तालाब पर ढोर-डंगरों का मेला भरा रहता है। इनमें पचासों जानवर ऐसे भी होते हैं, जिनका कोई धनी-धोरी नहीं होता।

आसपास के पचासों गाँवों में गुलाबरी का तालाब अपनी तरह का अकेला है। करीब साठ बीघे के इस तालाब में पाल के अन्दर की तरफ पत्थर की मोटी-मोटी शिलाएँ लगाई गई हैं। गाँव में किसी को नहीं पता कि तालाब कब, किसने और क्यों बनवाया था! वंश-परम्परा का हिसाब-किताब रखने वाले जागा या पटिए जब कभी गाँव आते हैं, तो बताते हैं कि तालाब, इसके किनारे बना मन्दिर और बैठक को किसी गुलाब सिंह ने बनवाया था। उसी के नाम पर गाँव का नाम गुलाबरी पड़ा। यह तालाब उसने इतना गहरा खुदवाया था कि तालाब में पानी नीचे से झिर आया था। पूरी अठारह सीढ़ियाँ थीं तालाब में, पर आज सारी कीचड़ में डूब गई हैं।

करीब नब्बे साल पहले इस तालाब की फिर से मरम्मत कराई गई थी। तब रियासत ने ‘कुड़याब’ से तालाब ठीक कराया था। ‘कुड़याब’ यानी कि कौड़ियों के बदले मजदूरी। बताते हैं, जब अकाल पड़ा था, उस बुरे वक्त में उन कौड़ियों ने गुलाबरी और आसपास के कई गरीब-गुरबों को सहारा दिया था।

फिर देश आजाद हो गया। जमींदारी खत्म हुई, तालाब भोइयों के नाम हो गया। कुछ दिन सब ठीक-ठाक चला, फिर गाँववालों में झगड़े शुरू हो गए। हालात यहाँ तक बिगड़े कि तालाब को लेकर कई बार लट्ठ चले।

गाँव में सिंचाई का कोई साधन नहीं है। फिर भी, इस तालाब से न तो कोई खुद सिंचाई करता है, न दूसरे को करने देता है। जब बिना सिंचाई के ही तालाब लगभग सूख चला है, तो तालाब को बिल्कुल रीता करके क्या ढोर-डंगरों को प्यासा मारना है? बस यही सोच ग्रामीणों को सिंचाई करने से रोके हुए हैं।

पहले कभी इस इलाके में जंगल था, फिर धीरे-धीरे खेत बने और अब पूरब की ओर से खेतों से बहकर आया पानी अपने साथ ढेर सारी मिट्टी बहाकर लाता है। हर साल सैकड़ों फीट नई ज़मीन तालाब से निकलती आ रही है। तालाब अब एक छिछली झील में बदल गया है। ऐसी झील मेहमान परिन्दों को खूब रास आती है और फिर यहाँ तो उनके शिकार का भी डर नहीं रहता, सो हर साल गर्मियों में यदि तालाब किनारे पशुओं का मेला लगता है, तो जाड़े में पक्षियों का जमावड़ा होता है। हर साल हजारों जाने-अनजाने परदेशी पक्षी जाड़े में इस तालाब को अपना ठिकाना बनाते हैं।

गुलाबरी और दूर-पास के दर्जनों गाँवों के मूक जानवरों और हजारों मील फलांग कर आये परदेशी पक्षियों के लिये गुलाबरी का तालाब सच्ची-मुच्ची का स्वर्ग है।

कुड़याब से बने थे तालाब


छप्पन के काल के किस्से आज भी लोग सुनाते मिल जाते हैं। तब तीन वर्ष तक बारिश बहुत कम हुई थी। छप्पन मतलब कि संवत 1956, तब गरीब जनता को पलायन से रोकने और रोज़गार से लगाने के लिये तत्कालीन रियासत ने बड़े पैमाने पर सन 1903 से 1916 तक जिले में तालाबों के निर्माण और सुधार का सिलसिला चलाया था।

उस समय विदिशा और गंज बासौदा तहसीलों में कुल 54 तालाबों पर काम कराया गया था। इनमें से 7 बिलकुल नए और बाकी 47 बहुत पुराने तालाब थे। इनके अलावा, जिले में सैकड़ों दूसरे पुराने तालाब और भी थे, जो पता नहीं कब से जनता और पशुधन को पानी उपलब्ध कराते रहे थे।

सन 1903 से 1916 के बीच तालाबों पर जो काम हुआ, उसमें मजदूरी ‘कुड़याब’ से दी जाती थी यानि मिट्टी की हर खेप के बदले एक कौड़ी मज़दूर को मिलती थी। यह तरीका कुड़याब के रूप में याद किया जाता है। पाँच खेप मिट्टी पाल पर डालने पर पाँच कौड़ियाँ मिलती थी। यह इकाई एक गण्डा कहलाती थी। ऐसे बारह गण्डे मिलकर एक पैसा बनता था। तब चार पैसे की एक इकन्नी और सोलह इकन्नियों का एक रुपया होता था। गरीब वर्ग तालाब के काम में लगकर हर रोज 2-3 पैसे की मजदूरी कर लेता था और तब से ही यह कहावत है कि भैया दो पैसे कमाकर बच्चे पाल लेने दो।

यह उस दौर की बात है, जब सोना 9 रुपए तोला मिलता था। ऐसे में पुरा घटेरा जैसे तालाब के निर्माण और सुधार पर एक लाख रुपए से भी ज्यादा राशि खर्च की गई थी।

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